गुरुवार, 12 मई 2016

तालमेल के अभाव में टूट रहे परिवार / डॉ. सूर्यकांत मिश्र

15 मई परिवार दिवस पर विशेष

 

० अति महत्वाकांक्षा से हो रहा बिखराव

अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस वह दिन कहा जाना चाहिए, जो कि संयुक्त परिवार से लेकर एकल परिवार तक की खूबियों और कठिनाईयों को चिह्नित करने वाला होता है। वर्तमान परिवेश पूरी तरह से परिवार की परिभाषा को बदलता दिखाई पड़ रहा है। आज से तीन-चार दशक पूर्व जिस परिवार का अर्थ कुटुम्ब से लगाया जाता था, वह अब सीमित दायरा अख्तियार करते हुए पति-पत्नि और एक या दो बच्चों तक सिमट कर रह गया है। भारतीय पुरातन परंपरा ‘संयुक्त परिवार’ ने तो लगभग दम ही तोड़ दिया है या सिसकियां लेता जीवन यापन कर रहा था। पूरे विश्व में भारत वर्ष ही ऐसा देश रहा है, जिसने परिवार की अहमियत और पारिवारिक सदस्यों के प्रेम स्नेह का सुंदर चित्रण संसार को दिखाया है। अब बदली हुई परिस्थितियों में हमारा भारतीय परिवेश पूरी तरह संयुक्त परिवारों की कड़ी से अलग-थलग दिखाई पडऩे लगा है। अब हमें माता-पिता के साथ, भाईयों का साथ वह राग नहीं दे पा रहा है, जिसके लिए हम गर्व किया करते थे। क्या कारण है कि हम अपना जीवन साथी पाते ही अपने जीवनदाता को अपने से अलग कर रहे है! अब भाई भाई नहीं लगता, माता-पिता की स्नेह भरी झिडक़ी जो कभी सुकून दिया करती थी अब न जाने क्यों अपमानित करने वाली लगने लगी है। अब परिवार का सहकार हमें भला क्यों नहीं लग रहा है? इन सारी विषमताओं पर गहन चिंतन जरूरी है।

परिवार की सार्थकता को तार-तार करने में सबसे ज्यादा प्रभाव अनावश्यक जरूरतों ने डाला है। आज हम वह सभी सुविधाएं पाना चाहते है, जो कभी संपन्न घरानों तक सीमित हुआ करती थी। ऐसी ही चाह को अपने भविष्य के सपनों में संजोते हुए हमनें वास्तव में ऐसी योजनाओं को स्वीकारा है, जो अपनों से अपनों को दूर करने वाली साबित हुई है। हम अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजते है, उनके लिए सुविधाएं जुटाने हर कठिन जतन को भी पूरा करते है। यह कोई गलत कदम भी नहीं है। भविष्य को स्वर्णिम बनाने देखा गया यह सपना तब हमें खलने लगता है जब अच्छे अंकों के साथ उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाला हमारा बेटा या बेटी बड़ी कंपनी में नौकरी पाकर महानगरों में जा बसता है। हम फिर भी आशा की किरण को कम नहीं होने देते और सोचते है कि उसकी शादी के बाद एक परिवार की तरह खुशियों को बटोर लाऐंगे। तकलीफ तो तब होती है, जब वह बेटा या बेटी बाहर रहकर अपने मनपसंद लड़के या लड़की को अपना जीवन साथी बनाकर हमें अपने विचारों से अवगत कराता है। वैवाहिक बंधन में बंध जाने के बाद दोनों एक साथ काम करते हुए अपनी पारिवारिक वृद्धि और योजनाओं से जुडक़र जहां अपना परिवार बसाने की सोच रहे होते है, वहीं दूसरी ओर एक परिवार टूटने की दर्दनाक पीड़ा से कराह उठता है। वृद्धावस्था का सहारा चाहने वाला अशक्त माता-पिता का जीवन अंधकार की कोठरी में लुप्त हो जाता है।

एक परिवार को ताकत देने के लिए अथवा उसे बनाए रखने के लिए सदस्यों के बीच तालमेल की बड़ी जरूरत है। कुंठा और जलन की भावना का त्याग तथा महत्वाकांक्षा पर काबू रखना भी जरूरी है। आपसी मनमुटाव के चलते एक परिवार चल नहीं सकता, वह केवल घसिट ही सकता है। इन सारी मानवीय विकृतियों के पीछे सबसे बड़ा कारण एक ही है, और वह है पैसा! पैसा ही अपनों के बीच विवाद का कारण बनता है। एक अच्छा चलता फिरता व्यवसाय या प्रतिष्ठान अथवा उद्योग महज आर्थिक विवाद के चलते ही गर्त में चला जाता है। सदियों से यह कहावत चली आ रही है कि दुनिया में आपसी मनमुटाव और दंगा फसाद महज तीन कारणों से होते रहे है और वे है, जर, जोरू और जमीन। इन्हीं तीन चीजों ने एक सुंदर सलोने परिवार को अकेलेपन के दौर में घसीटा है। परिवार में रहते हुए एक-दूसरे को पछाडऩे की भावना वह काम कर दिखाती है, जो एक परिवार को छिन्न-भिन्न करने के लिए पर्याप्त होती है। यही वह प्रतिस्पर्धा है जो आपसी मतभेद को जन्म देती है। यह एक ऐसा विकार है, जो परिवार की ईंट से ईंट बजा देता है, और परिणाम परिवार के टूटन के रूप में सामने आता है। परिवार के हर सदस्यों को यह बात समझनी चाहिए कि पारिवारिक रिश्ता बड़े ही नाजुक धागे से बंधा होता है, उसमें ज्यादा खींचतान से वह टूटकर बिखर जाता है।

21वीं सदी में सबसे बड़ी घटनाएं पति-पत्नी के बीच विवाद के रूप में सामने आ रहा है। घर एवं परिवार बसने से पूर्व ही दोनों की महत्वाकांक्षाएं आपसी टकराव के रूप में सामने आने से दूरी को बढ़ा रही है। जीवन की शुरूआत से पहले की पति-पत्नी का रिश्ता तलाक जैसी पीड़ा को सहता देखा जा रहा है। पुरूष प्रधान समाज में पुरूष अपनी महत्वाकांक्षा पर हल्का सा प्रहार भी बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं होता है। वहीं पढ़ी-लिखी युवती को चंद दिनों पूर्व ही वैवाहिक बंधन में बंधी हो, खुद को किसी पर आश्रित नहीं छोडऩा चाहती है। वह खुद की काबिलीयत के आधार पर एक मुकाम पाना चाहती है। ऐसी स्थिति में यदि पति-पत्नी के संबंध टूटने की स्थिति में पहुंच जाए तो हम केवल उस युवती को ही दोष नहीं दे सकते। यहां पुरूष को अपनी समझदारी दिखाते हुए अपनी जीवन संगिनी के साथ मिलकर परिवार की हर जरूरत को पूरा करने का जज्बा दिखाना चाहिए। यहां पर बात एक दूसरे के समक्ष झुकने की नहीं, बल्कि एक दूसरे को समझने के रूप में सामने आनी चाहिए। अनेक बार ऐसा होता है कि प्रतिभा संपन्न और महत्वाकांक्षी पत्नी का पति प्राय: हीनभावना का शिकार हो जाता है, फिर शुरू होता है, एक ऐसा युद्ध जो सब कुछ खत्म होने से पहले मैदान नहीं छोडऩा चाहता। द्वंद्व, कशमकश, चिढ़ और कुंठाग्रस्त पति यह जानता है कि वह हर मुकाबले में अपनी पत्नी से पीछे है, यह ऐसी किंकर्तव्यविमुढ़ वाली स्थिति होती है, जिसमें एक पति अपनी पत्नी को न तो ठीक से स्वीकार कर पाता है और न ही अस्वीकार।

परिवार में पति-पत्नी और अन्य सदस्यों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा एक सुखद गृहस्थी और मजबूत दांपत्य के बीच जहर का काम ही करती है। एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान और चाहत की कद्र ही परिवार की नींव को मजबूती दे सकती है। परिवार का कोई भी सदस्य अपनी योग्यता के आधार पर विकास की सीढ़ी चढऩा चाहता हो, तो उस सीढ़ी की पायदान बनना ही पारिवारिक सदस्यों का कर्तव्य होना चाहिए। फिर उक्त विकास के मार्ग पर घर की लक्ष्मी मानी जाने वाली पत्नि ही क्यों न चलना चाहे। इस मामले में एक बात उन पत्नियों को भी ध्यान में रखनी होंगी कि उनकी चाहत या महत्वाकांक्षा के कारण पति की भावनाएं आहत न हो, और उन्हें ठेस न पहुंचे।

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(डॉ़ सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो़ नंबर 94255-59291

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