विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

कहानी संग्रह - अपने ही घर में / मुक्ति : तीर्थ चांदवाणी

कहानी संग्रह - अपने ही घर में /

मुक्ति

तीर्थ चांदवाणी

मैंने उसे देखा, देखकर एक अजीब किस्म की झुंझलाहट महसूस की। गुस्से के कारण एक बार फिर मुंह लाल हो गया। लेकिन दूसरे पल ही महसूस किया कि ऐसे तेवर दिखाना मेरी ग़लती होगी, क्योंकि वह ऋणदाता था और मैं ऋणी। इन बीते दस दिनों में यह उसका तीसरा चक्कर था।

मैं चुपचाप गुस्सा दबाकर मुस्कराने लगा। हालांकि ऐसे समय में जब खुद किसी आदमी को दिल से धिक्कारा जाय और उसी के सामने आ जाने पर स्वभाविक हो जाना कुछ कठिन है। उसके बावजूद भी मैं कोशिश करके शांत भाव चेहरे पर ला पाया। सहज व सरल ढंग से लेनदार की ओर देखा। उसका हाल-चाल पूछते हुए उसे कमरे में ले आया। पत्नी कुर्सी पर बैठी चावल साफ़ कर रही थी। उसने नज़रें उठाकर, मेरे इस दोस्त की ओर देखा और फिर अपने काम में व्यस्त हो गई। सजे हुए एक साफ़-सुथरे कमरे में एक बदसूरत आदमी का समावेश न कर पाने की सूरत में, उसे छिटपुट स्वरूप में पाया जाता है। मैंने दूसरी कुर्सी उठाकर उसके सामने रखी और बैठने का इशारा किया। मैं सामने पड़ी खाट पर बैठ गया। वह चुपचाप कुर्सी पर गर्दन झुकाए बैठा रहा। मैं सोचता रहा कि आखिर वह इस तरह गर्दन झुकाकर बैठे-बैठे क्या सोचता होगा? इतने में मेरा छोटा बेटा दूसरे कमरे से आया, अपनी मम्मी के पास जाकर उससे पूछने लगा.‘मम्मी यह कौन है?’

मम्मी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘यह अंकल है!’

उसने गर्दन ऊपर उठाकर मेरे बेटे की ओर देखा, फिर उठकर मेरी धर्मपत्नी के पास से बच्चे को उठा लिया। मुन्ने को शायद उसकी शक्ल न भाई, वह रोने लगा। मैंने तुरन्त उठकर मुन्ने को अपनी गोद में ले लिया। वह मेरी पत्नी की ओर देख रहा था। मेरी पत्नी काफ़ी सुंदर है, शायद इसीलिये। उसका इस तरह बेबाकी से उसकी ओर निहारना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा। लेकिन मैं ख़ामोश ही रहा; क्योंकि वह लेनदार था। मैं किसी भी हालत में उससे संबंध बिगाड़कर, एक़दम ही पैसों की पूर्ति न कर पाने के कारण, बेइज़्ज़ती कराने के लिये तैयार न था। उसने मेरी पत्नी की ओर देखते हुए कहा.‘भाभी चाय-वाय मिलेगी?’ मेरी पत्नी ने मुस्कराने की कोशिश करते कहा.‘हां-हां...क्यों नहीं...’

वह उठकर रसोईघर में गई, मैं उसके पीछे चला गया। उसने बताया कि चाय बनाने के लिये दूध का होना ज़रूरी था और दूध अभी तक आया न था। जिससे पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रहा था, अब उसी के लिये बाहर से दूध ले आने को तैयार हो गया। पर पत्नी को उसके साथ अकेला छोड़ने का साहस अभी तक जुटा रहा था। पर फिर कर्ज़ का ख़याल आते ही साहस करने का विचार स्थगित करना पड़ा। ग्लास लेकर ऊपरी तौर पर मुस्कराते (भीतर में कच्ची-पक्की बेढंग, हां, उस वक़्त मेरी मानसिक स्थिति इतनी खराब बन चुकी थी कि मैं ढंग की कोई गाली देने में असमर्थ था) उससे कहा, ‘बैठो यार; मैं अभी दूध लेकर आया!’ उसने भी मुस्कराते हुए कहा, ‘नहीं यार नहीं! इतनी भी ज़रूरत नहीं थी।’ उसके ‘यार’ के संबोधन से मुझे महसूस हुआ कि वह खास क़िस्म की आत्मीयता जोड़कर अपने रिश्ते को और क़रीब लाना चाहता है। लेकिन मैं जान चुका था कैसे मेरी पत्नी की सुंदरता, उसे यहाँ से जाने से रोक रही थी और वैसे भी वह अभी तुरन्त यहाँ से जाना भी नहीं चाहेगा। मैं मुस्कराता हुआ दूध लेने चल पड़ा।

बाज़ार से गुज़रते मैं सोच रहा हूँ अपने/ फर्ज़ / पत्नी के बारे में। कर्ज़ो का हिसाब लगा रहा हूं। उसके बारे में सोच रहा हूँ। उसकी नीयत ठीक नहीं है। उसे जो भी समय, जो भी पल इस तरफ़ आने के लिये मिले हैं/ उसने निकाले हैं, मेरी पत्नी के सामने आकर बैठना चाहा है; उसका साथ चाहा है/ उसके सानिध्य में बैठते उसने सच/झूठ कहकर उसके सामने अपनी शाहूकारी/अच्छाई/नेकनामी का प्रभाव डालना चाहा है। मैंने हमेशा दिलोजान से उसे धिक्कारा है। मैंने कभी नहीं चाहा है कि वह हमारे घर आए और मेरी पत्नी से बातचीत करे। पर मेरे चाहने, न चाहने से क्या होने वाला है। वह मेरा लेनदार है और मैं उसका ऋणी। इसी कारण मुझे उसका ख़याल रखना है। हालांकि बात वैसे भी उसके ख़याल रखने की नहीं; लेकिन मेरी इज़्ज़त वह बाज़ार/मेरी पत्नी के आगे, प्याज़ के छिलकों की तरह उतारकर नंगा कर दे, बेइज़्ज़ती की खाई में फेंक दे, सदा के लिये नीचा दिखाकर उनकी नज़रों में गिरा सकता है। इसी कारण, सवाल अपनी इज़्ज़त का ज़्यादा और उसका कम है। दूसरे पल मैं सोचता हूँ, मुझे क्यों सोचना चाहिए कि वह मेरी पत्नी की सुंदरता के कारण मेरे पास आता होगा। हो सकता है वह किसी और ही विचार से इस ओर आने के पश्चात, मेरे पास आता हो। उसके चाहने से क्या कुछ होने वाला है? वह कर भी क्या सकता है? ज़्यादा से ज़्यादा मेरी पत्नी से दो-चार बातें वह बिलाशक करे। वह वैसे भी बात करने में होशियार है। दूसरे पल मुझे लगा मैं तंगदिल होता जा रहा हूँ। आदमी को आज़ाद और विशाल सोच अपनाने की ज़रूरत है। पर सबसे बड़ी बात कि जब मुझे पत्नी पर पूरा विश्वास है तो फिर कोई सवाल ही नहीं उठता। वर्ना कई बार देखा गया है कि हद से ज़्यादा ज़ाब्ता रखने पर पत्नियां भी बेवफ़ा हुईं हैं और बहुत आज़ादी मिलने पर भी उन्होंने वफ़ा की रस्म निभाई है। आख़िर विश्वास का भी कुछ मतलब है। पर यहाँ विश्वास/अविश्वास का सवाल कहाँ है?

सोचता हूँ.कुछ समय पहले मैं यूँ कर्ज़ से घिरा हुआ न था। पर इस बढ़ती महंगाई और जीवन के स्तर को क़ायम रखने की ज़रूरत ने मुझे कर्ज़ लेने पर मजबूर किया। पेट को जो चाहिये कच्चा/पक्का, ज्यादा/कम मिलना तो चाहिये। फिर चाहे वह कर्ज़ लेकर दिया जाय या किसी सही/ग़लत काम से हासिल करके दिया जाय। सही और ईमानदारी से काम करने से तो पेट भरना ही नामुमकिन है। मैं भी ईमानदारी से सरकारी नौकरी करता हूँ, फिर भी पेट भरने के लिये कर्ज़ लिया है। बाक़ी सवाल रहा ग़लत का। ग़लत कामों से पकड़े जाने का/पुलिस/अदालत के लफड़े होने का डर तो रहता है। वैसे तो जीवन में हर पल डर रहता ही है। कभी एक्सीडेंट का, कभी मौत का। डर शायद इन्सान में कहीं न कहीं छुपा हुआ तो रहता है या इन्सान के खून में ही मिला हुआ है। भाई, हर चीज़ में मिलावट होगी, तो इन्सानी खून में कैसे न होगी? मेरे मामले में पुलिस के हाथों पकड़ा जाना मुझे डरा देता है। पुलिस वाले को देखते ही मुझे जंगल में रह रहे शेर का ख़याल आता है। एक बार साइकिल पर डबल सवारी के लिये, पुलिस वाले ने हमें सीटी बजाकर रोका था; तब मेरा दम ही निकल गया था। मैं उसके क़दमों में ख़ुद को बस गिराने से संभाले हुए था। जबकि साइकिल मैं नहीं बल्कि मेरा दोस्त चला रहा था, मैं तो सिर्फ़ आगे बैठा था। उस वक़्त मैंने मिन्नतें करके, हाथ-पांव जोड़कर पुलिसमैन को अपना नाम लिखवाने और ‘केस’ दर्ज करने से रोक ही लिया। इसके लिये मैंने उसे दस रुपये भी दिये थे। मेरा दोस्त, जो साइकिल चला रहा था, वह झगड़ा करने पर उतारू हो गया। लेकिन मैंने मिन्नतें करके उसे भी रोक लिया। बाद में उसने मुझे बताया कि ऐसे किस्म के गुनाह के लिये कोर्ट में फ़क़त दो रुपये दंड ही लिया जाता है।

लेकिन कोर्ट...? ना बाबा...उसके बाद पुलिस वाले को कहीं भी देखने के पश्चात मैं एक़दम दूसरी ओर/साईड जैसे लेनदार को सामने/पीछे से अक्सर आते देखकर घूम जाता हूँ। अगर कहीं बिलकुल सामने ही पुलिस वाला मिल जाता है, तो गर्दन झुकाकर इस तरह निकल जाता हूं जैसे मैंने कोई बड़ा गुनाह किया है और सामने से आने वाला पुलिस वाला सिर्फ़ मुझे ही पकड़ने आ रहा है। इसी कारण कभी भी मैंने कोई छोटा/बड़ा, कच्चा/पक्का कम और अधिक गुनाह ही नहीं किया है। ऐसा नहीं कि गुनाह करने की इच्छा पैदा नहीं हुई है। गुनाह और वहशियत तो हर एक आदमी में थोड़ी-बहुत छुपी ही रहती है। लेकिन इस इच्छा के सामने, पुलिसमैन/ख़ाकी कपड़ा/जेल/अदालत और ऐसी अनेक बातें एक ज़ंजीर बनकर मेरे हाथों/पैरों/दिल/दिमाग़ को जकड़ लेती हैं। मैंने हमेशा उन सबके सामने खुद को लाचार/बिचारा/निराश्रय महसूस किया है। इन सब बातों ने खौफ़नाक डर मुझमें भर दिया है। इसी कारण, चाहते हुए भी मैंने कोई छोटा/बड़ा गुनाह नहीं किया है।

दूध लेकर मैं घर आया हूँ। ‘उसकी’ ओर देखा है। उसके सामने कुर्सी पर आकर बैठा हूँ। पत्नी उसके साथ खुलकर बात कर रही है। यह देखकर मेरे मन में एक गुस्सा/पीड़ा/अविश्वास भर जाता है। चेहरा बिलकुल उतर जाता है। लेकिन हालात का निरीक्षण, वक़्त का तक़ाज़ा और ऋणदाता को सामने देखकर, मैं चुपचाप, ज़हर का एक बड़ा घूंट भरते हुए चेहरे पर स्वाभाविकता लाते हुए, होंठों पर एक चौड़ी पर फ़ीकी मुस्कान न चाहते हुए भी ले आने की कोशिश करता रहा.झुंझलाहट में पत्नी को दूध का गिलास देते हुए कुछ पल खामोशी से उसकी ओर निहारता हूँ।

‘यार, बात ऐसी है कि इस तरफ़ से गुज़रा तो विचार आया कि तुम्हारे पास भी होता हुआ जाऊं।’

‘हां-हां, अच्छा किया। तुम्हारा ही घर है। ऐसे ही कभी-कभी चले आया करो। शशि भी अक्सर आपके लिये पूछती है।’

‘अच्छा!’

वह शायद खुशी में कह उठता है, मुझे लगा कि मुझे ऐसा कहना नहीं चाहिये था।

‘क्या हाल-चाल है...? आजकल क्या चल रहा है?’

सोच रहा हूँ क्या जवाब दूँ। कुछ पल खामोशी से घूरता रहा हूँ। ग़ौर करता हूँ, यूँ बातों को घुमा-फिराकर पैसों की मांग करे, उससे यही बेहतर होगा कि मैं उसे पहले ही कोई बहाना/सच...मतलब जो भी कहना है, कह दूँ! एक पल के लिये उसके चेहरे से नज़रें हटाता हूँ। एक डर तेज़ी से दिल में घिर जाता है। इसने शशि को तो कर्ज़ के बारे में बताया होगा? ऐसा भी हो सकता है, अपनी बड़ाई करने के शौक़ से, मेरी एक कमज़ोरी ज़ाहिर करने की मुराद से/ अपने आपको उसपर हावी पड़ने के ख़याल से, वह सुना न बैठा हो। मैं फिर उसके चेहरे पर नज़रें टिकाकर, भाव पढ़ने की कोशिश करता हूँ। लगता है उसने अभी शशि से इस बारे में बात नहीं की है। नज़रें रसोईघर की ओर घुमाता हूँ। शशि चाय बनाने में व्यस्त है, स्टोव की तेज़ आवाज़ आ रही है। एक नज़र सामने नेहरू की मैली और बेरंग तस्वीर पर डालता हूँ, जिसमें वे मुस्करा रहे थे।

वाक्यांश को ढंग से कहने के बारे में सोचता हूँ, खासकर गले को साफ़ करके कहने की हिम्मत समेटना चाहता हूँ। फिर रसोई घर में टंगी उस नेहरू की फोटो की तरफ़ भी देखता हूँ। जैसे कि नेहरू की फोटो और रसोईघर मुझे ‘कहने’ की शक्ति इकट्ठा करने और कहने में मदद करेंगे। एक बार फिर लगता है जैसे कुछ गले में, कांटे जैसा, नोकदार अटक गया है। बहाना/सच कहते हुए धीरे-धीरे जब दिल में विश्वास पैदा होता है, अब उसे ‘कुछ’ कह पाऊंगा, तब न जाने कहाँ से एक डर उभर आता है, दिल और दिमाग़ को घेर लेता है, कि कहीं शशि चाय बनाकर अभी ही लेकर न आ जाए, और हमारी बात सुन ले। पर जब विश्वास हो जाता है कि शशि चाय देने के बाद लौट कर रसोईघर में रात के खाने की तैयारी में लग जाएगी तो एक राहत का अहसास तन मन में सुकून भर देता है। सोचता हूँ कि जो बात अभी या बाद में कहनी है तो क्यों न अभी ही कह दूँ? वाक्यों को सोचे विचारे ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश शुरू करता हूँ, ‘‘यार, बात यूँ है कि...बात यूँ है कि मैं बहुत समय से खुद तुम्हारे पास आने की सोच रहा था, लेकिन बात यूँ है कि...अब यार तुमसे क्या छुपाउँ? तुम तो हमारे घर के सदस्य की तरह हो (मुझे लगा उसे घर का सदस्य बनाकर मैं अब उसके साथ कोई आत्मीयता जोड़ रहा था, जैसे पहले वह जोड़ रहा था)। समय आजकल कुछ कम सहकार दे रहा है, पैसों के ख़र्च के बारे में क्या कहूं? छोटा भाई अभी मैट्रिक में है। उसकी ट्यूशन की फीस, क़िताबों का ख़र्च और ऊपर से यह बढ़ती महंगाई। ऐसे....ऐसे...तुम्हें लगता होगा कि मैं व्यवहार के मामले में खरा आदमी नहीं हूं। वैसे...वैसे...यार मेरी मजबूरी आड़े आ जाती है। तुम तो समझ रहे हो और तुम जैसे शाहूकार लोगों को पैसों की क्या परवाह! तुम तो अपने हो, इसीलिये सब कुछ तुम्हें बिना किसी हिसाब के साफ़-साफ़ बता रहा हूं। अपनों से क्या छुपाना? लेकिन यार विश्वास करो, मैं तुम्हारे पैसे रखूंगा नहीं। ख़याल मत करना, तुम्हारी एक-एक पाई लौटा दूंगा। लेकिन यार, बस कुछ वक़्त के लिये रुक जाओ, भाई को मैट्रिक पास करने दे।’

‘छोड़ो यार, छोड़ो, तुम फिर कभी इस तरह की बातें करोगे तो मैं तुम्हारे पास आना छोड़ दूंगा। मैं क्या सिर्फ़ पैसों के लिये आता हूँ.ऐसे तुम कैसे कह सकते हो।’

शशि ने चाय लाकर टेबल पर रखी है। उसके साथ बिस्कुट भी है। वह शशि की ओर देख रहा है।

‘भाभी! बेकार ही आपको तकलीफ़ दी। लेकिन गुज़रे चार दिनों से आपके हाथ की चाय नहीं पी थी.इसी कारण चला आया!’

शशि चुपचाप उसकी ओर देखकर मुस्करा रही है। मेरे भीतर जैसे कोई आग भड़क रही है।

चाय पीने के पश्चात् वह उठ खड़ा हुआ। मेरे साथ हाथ मिलाता है.‘अच्छा यार चलता हूँ।’

मैं उठकर उसे दरवाज़़े तक छोड़ आता हूँ और दो-तीन लम्बे श्वास जल्दी-जल्दी लेता हूँ।

 

 

लेखकगण-परिचय

सुगन अहूजा (1921-1966)

जन्म : सखर, सिंध (पाकिस्तान)। कविता और कहानी के बीच करवटें बदलने वाले लेखक, मनोविश्लेषण पर विशेष बल देते रहे। उनका कहानी संग्रह ‘ऐश की कीमत’ और ‘बे-आग जलते हैं परवाने’ प्रख्यात हैं। उनकी कहानी ’पड़ोसन’ को आपकी सर्वोतम कहानी मान जाता है। रवायत में रहकर रवायत से अलग अपने फन और शख्सियत की पहचान कायम रखने वाले लेखक। लघुकथा, काव्य, आलेखों के संग्रह, रूप-माया, नारायण की कविताओं का समीक्षात्मक मूल्यांकन, कालेज में प्राचार्य पद से रिटायर। उनका उपन्यास ‘कंवल जाग उठा’ 1968 में उनके मरने के पश्चात् छपा।

आनंद टहलरामाणी (1932- )

सिन्धी समाज के कथा साहित्य में, नावल और सशक्त कहानी के सृजनहार। कुछ एकांकियों के रचयिता, कहानी संग्रह पर सी. एच. डी की ओर से पुरुस्कार। 25 साल तक निरंतर दो-माही सिंधी पत्रिका ‘संगीता’ के संपादक रहे। सिंधी समाज सेवी के रूप में प्रख्यात, अनेक संस्थाओं से सम्मानित।

पताः 21, चन्द्रा नगर सोसाइटी, वघारिया रोड, वडोदरा - 390001

मोहन कल्पना (1930-1992)

जन्म : सिंध (पाकिस्तान), करीब 250 कहानियाँ प्रकाशित । सिंध एवं हिन्द के कथा साहित्य में एक अहम नाम, कहानी को एक नया मोड़ देकर एक नए क्षितिज तक लाने वाले लेखकों में से एक। कहानी के सिवा अन्य सिन्फ पर भी कलम आजमाई। कहानी सं. 4, उपन्यास - 5, कविता सं. 1, समालोचना - 2 एवं आत्मकथा तथा अन्य पुस्तकें प्रकाशित। कहानी में विख्यात संग्रह- ‘मोही-निर्मोही, चाँदिनी और जहर, फरिश्तों की दुनिया’ और ‘वह शाम’ हैं। उनके प्रमुख उपन्यास ‘लगन’ और ‘विश्वास-अविश्वास’। सिंध में भी कई पुस्तकें प्रकाशित। अ.भा.सि.बो.सा. सभा, मुम्बई द्वारा 1983 में पुरस्कृत तथा ‘वह शाम’ कहानी संग्रह पर 1984 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित।

गुनो सामतानी (1933 -1997)

जन्म : हैदराबाद, सिंध (पाकिस्तान) । उनकी साहित्य की यात्रा छोटी है फिर भी सिन्धी के सफल कहानीकारों में उनकी गणना होती है। वर्णन-शैली में नवीनता और अनोखी ताजगी। उनका उपन्यास ‘वापस’, लघुकथा संग्रह व ’’अपराजिता‘‘ कहानी संग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित। महाराष्ट्र साहित्य अकादमी के सेक्रेटरी पद पर। पता : 16/74, आशियाना, ओशिवरा, जोगेश्वरी, मुम्बई - 400 102, (फोन : 022-2631 6025)

लखमी खिलाणी (1935- )

जन्म : सख्खर, सिंध (पाकिस्तान) । किसी भी वाद-विवाद से दूर अपने सृजन कार्य से जुड़े हैं। कहानी सं. - 5, उपन्यास - 3, नाटक - 4, जीवनी - 2, सफरनामा - 1 तथा अन्य - 3 प्रकाशित पुस्तकें । सिंधी बोली, साहित्य एवं कल्चर के प्रति समर्पित नाम। इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ सिंधोलाजी के डायरेक्टर, तीन दशकों से ‘रचना’ साहित्यिक पत्रिका के संपादक। कई संस्थाओं की ओर से तथा ‘गुफा जे हुन पार’ कहानी पर 1996 में साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित ।

पता : 6, मलीर, वार्ड 4-ए, आदीपुर - 370 205 (कच्छ)।

(फोन : 02836-260997)

इन्द्रा वासवाणी (1936-2012)

जन्मः मीरपुर खास, सिंध (पाकिस्तान)। तीन कहानी संग्रह प्रकाशित। वषरें से अच्छी कविताएँ भी प्रकाशित हो रही हैं। बहुत ही निकट परिवेश के पात्र इनकी कहानी में सजीव अनुभूतियाँ बुनते हैं। नवें दशक में लेखन करके, संवेदनशील ‘सहज’ कहानी में, ‘बदलाव’ को अंकित करती लगातार सक्रिय। ‘बेस्ट-टीचर’ के तौर पर राष्ट्रपति से सम्मानित। गुजरात सिंधी साहित्य अकादमी के गौरव पुरस्कार - 2004 एवं अ.भा.सि.बो.सा. सभा, जयपुर - 2008 द्वारा भी सम्मानित। पता : टी.एच.एक्स. - 23, आदीपुर - 370205 (कच्छ) (फोन : 02836-260629)

लाल पुष्प (1935-2009)

जन्म : लाड़काणो, सिंध (पाकिस्तान) । कथा साहित्य-कहानी और उपन्यास के व्यापक सृजनहार, अपनी अलग व निराली पहचान बनाए रखने में सक्षम। उपन्यास - 7, कहानी सं. - 11, आलोचना - 3, संपादित - 6, अन्य - 6 पुस्तकें प्रकाशित। रुमानी धारा से उत्तर आधुनिकता के पूरे अधिकार के सृजनशील कथाकार। पहले ‘पिरहफुटी’ मासिक पत्रिका के बाद में ‘सिन्धी इंटरनेशनल’ (अंग्रेजी) के संपादक रहे। ‘उसकी आत्मा की मौत’ उपन्यास पर 1974 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित।

पता : 6, डनहिल, आम्बेडकर रोड, खार (प.), मुम्बई - 400 052।

(फोन : 022-26461114)

हरि हिमथाणी (1933 - )

जन्मः हसब, मोरो, नवाबशाह, सिन्ध (पाकिस्तान)। उपन्यास - 10, कहानी सं. - 8 प्रकाशित पुस्तकें। उनका पूरा कथा साहित्य रुमान से सुगंधित। पाँच दशकों से पुरानी सिंधी शैली की महक के सक्रिय कथाकार। राजस्थान सिंधी अकादमी, जयपुर, अ.भा.सि.बो.सा.सभा, मुम्बई - 1993, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय दिल्ली से दो बार तथा ‘उदामंदड़ अरमान’ कहानी संग्रह पर 2002 में साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा सम्मानित। पता : 14, तिलोक नगर, अजमेर - 305 001 (राज.)

(फोन : 0145-2463591)

कृष्ण खटवाणी (1927-2007)

जन्म : ठारूशाह, सिंध (पाकिस्तान)। शांतिनिकेतन के स्नातक, शब्दों से चित्रकारी करने में दक्ष। मकबूल कहानीकार, नावल नवीस, उपन्यास -6, कहानी सं.- 9, कविता सं.- 2, नाटक - 1, अन्य - 4 पुस्तकें प्रकाशित। सही मायने में अनुशासित सृजन-कार्य, किसी भी खास विचारधारा एवं ‘लेबल’ से मुक्त, कहानीकार के रूप में ख्याति प्राप्त है। नामी कहानी संग्रह थेरू ‘टूटी हुई तारें, विंदरी और अन्य कहानियाँ, मिठरी तुम ने नहीं पहचाना’। उनका लिखित लघु-उपन्यास है ’’अमर प्यार‘‘। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा सामी पुरस्कार (1981) और गौरव पुरस्कार (2006), भारतीय भाषा परिषद, कलकता द्वारा (1991) तथा ‘याद एक प्यार की’ उपन्यास पर साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित (2005)। राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद द्वारा साहित्यकार सम्मान (2005)

रीटा शहाणी (1934-2013 )

जन्म : हैदराबाद, सिंन्ध (पाकिस्तान)। उपन्यास, कहानी, कविता, जीवनी, सफरनामा इत्यादि के लगभग तीस पुस्तकें प्रकाशित। 1983 से सृजन कार्य में बहुत ही सक्रिय, लेखन के अलग अंदाज और कल्पना के प्रख्यात कथाकार। सिन्ध में एक खास मुक्काम रखने वाली लेखिका, वहाँ बहुत ही प्रिय रही। महाराष्ट्र सिंधी अकादमी, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद, दिल्ली एवं कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

पता : 7, फिलोरिना एस्टेट, बोट क्लब रोड, पुणे-412 001

(फोन : 020-26122526)

खिमन मूलाणी (1944- )

जन्म : नवाबशाह के दर्स गाँव में। 1960 से लेखन कार्य सतत जारी है। उनके प्रकाशित 4 काव्य संग्रह, एक कहानी संग्रह ‘ओसीरो’। बाल साहित्य पर उनके दो संग्रह प्रकाशित हैं। अनुवाद के क्षेत्र में आप एक सिद्धस्त हस्ताक्षर हैं। 9 पुस्तकों का हिन्दी से सिंधी में अनुवाद। रवीन्द्रनाथ टैगोर की ‘गीतांजली’, नावल ‘जल तू जलाल तू, और डा. अंबेडकर का सिंधी अनुवाद विशेष हैं। सिंधी के अनेक संग्रह हिन्दी में अनुवाद किए हैं जिनमें ‘स्वामी के श्लोक’ चर्चित है। देश के जाने माने हस्ताक्षर लेखकों के कहानी संग्रह व उपन्यास अनुवाद किए हैं, कुछ प्रेस में हैं। राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद की ओर से-‘उडुर-उडुर रे पोपटड़ा’ के लिए 1992 में पुरुसकार हासिल, फिर मुसलसल 1995, 2004, 2010 में केन्द्रीय साहित्य अकादेमी के ओर से ‘सुहिणा गुलड़ा बार’ के लिए पुरुस्कार।

पताः ।-14/134 बैरागढ़, भोपाल-462030, च्ीरू 09827343735

ईश्वरचन्द्र (1937-1992)

जन्म : कोइट्या, बलोचिस्तान, सिंध (पाकिस्तान) । कहानी सं. - 10, विडियो नाटक - 2, बाल साहित्य - 1 प्रकाशित । उनके कहानी संग्रह- ‘ठंडे होंठ, मरा हुआ मकोड़ा, और अपने ही घर में’। हिन्दी और सिंधी में समान अधिकार से लिखने वाले, आधुनिक दौर के, नगर जीवन से जूझते मध्य वर्ग के संवेदनशील अनुभवों के सृजक एवं प्रख्यात कहानीकार, टी.वी. सीरियल ‘एक कहानी’ में पहला पुरस्कार। सारिका, धर्मयुग तथा अन्य कई हिंदी पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। राजस्थान सिंधी अकादमी, जयपुर एवं अ.भा.सिं.बो.सा. सभा, मुम्बई द्वारा सम्मानित। ब्भ्क् दिल्ली से पुरस्कृत। निवासः अजमेर (राजस्थान)

बंसी खूबचंदाणी (1943- )

जन्म : सख्खर, सिंध (पाकिस्तान) । सिन्धी के कथाकार जो आज की पीढ़ी के मनोविज्ञान से संबन्धित विषयों पर कहानी की विषय-वस्तु लेकर तीन दशकों से कहानी लिखने में सक्रिय कार्य कर रहे हैं। तीन कहानी संग्रह प्रकाशित ‘माजीअ जी गिसकण ते (1982), भागी हुई जिंदगी(1989), वापसी (2002)। समालोचना का संकलन-‘शब्दों की सुरहाण’ (2009)। इस संग्रह पर राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद की ओर से 2012 में पुरुस्कृत। आकाशवाणी के लिए लगातार समालोचना लेखन। पता : बी-603, वुडलैंड सोसायटी, अशोक अकादमी के पास, लोखण्डवाला काम्प्लेक्स, अंधेरी (वेस्ट), मुम्बई-400053

(फोनः 022-26350680, 09869359266)

पोपटी हीरानंदाणी (1924-2005)

जन्म : हैदराबाद, सिंध (पाकिस्तान)। सिंधी अदब का जाना माना नाम। पाँचवें दशक से लगातार सक्रिय सृजनकार्य एवं सबसे ज़्यादा लोकप्रिय। सिंधियत की हलचल से वाबस्ता सिंधी की प्रोफेसर। उपन्यास - 4, कहानी सं. - 10, कविता सं. - 3, तथा 15 पुस्तकें नाटक, आलोचना लेख, शोधकार्य इत्यादि प्रकाशित। कहानी संग्रह-‘रंगीन जिंदगी की गमगीन कहानियाँ’, पुकार, कली गुलाब की, सागर शराब का, और खिजाँ का दौर पूरा हुआ’। ‘मैंने तुम्हें प्यार किया’ कहानी संग्रह पर सेंट्रल एड्यूकेशन मिनिस्टरी-सिंधी प्रोग्राम अवार्ड। अ.भा.सि.के.सा.सभा, मुम्बई द्वारा 1982 में, साहित्य अकादमी पुरस्कार ‘मुहिंजे हयातीय जा सोना रूपा वर्क’ और 1982 में महाराष्ट्र सरकार गौरव पुरस्कार, राष्ट्रीय सिंधी बोली विकास परिषद दिल्ली और कई पुरस्कारों से सम्मानित।

डॉ. मोतीलाल जोतवाणी (1936-2008)

जन्म : सख्खर, सिंध (पाकिस्तान)। उपन्यास, कहानी, कविता, आत्मकथा, लेख, निबंध इत्यादि की लगभग 30 पुस्तकें प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी तथा अंग्रेजी में समान अधिकार से लेखन, अनेक शोध लेख, आलेख। ब्ण् भ्ण् क्ण् के एडवाइसरी बोर्ड पर एक टर्म वाइस-चेरमेन। लगभग तीन दर्जन अलग अलग विषयों पर प्रकाशित पुस्तकें। ‘शाह जो रसालों’ का हिन्दी अनुवाद, व अँग्रेजी में एक मिनी नावल प्रकाशित। 2003 में अ.भा.सि.बो.सा.सभा, जयपुर द्वारा तथा भारत सरकार की ओर से 2003 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित। पताः बी-14 दयानन्द कालोनी, लजपत नगर-4, नई दिल्ली 110024।

फोनः 011-26414044, 09810339522

हरिकांत जेठवाणी (1935-1994)

जन्म : जेकमाबाद, सिंध (पाकिस्तान)। सिंधी भाषा के प्रथम पंक्ति के कवि कहानीकार तथा नाटककार थे। उनके नाटक प्रकाशित तथा मंचित एवं चर्चित होते रहे थे। उनके दो कहानी संग्रह सिंधी में हैं और हिंदी में ‘आवाजों का जंगल’ एवं ‘एक थकी हुई मुस्कान’ प्रकाशित हैं। कहानी सं. - 2, कविता सं. - 5, नाटक - 4 तथा अनुवादित - 3, पुस्तकें प्रकाशित । नए भावबोध की नयी/ छोटी कहानी में विशिष्ट योगदान। ‘आखाणी’ कहानी पत्रिका से उन्होंने नयी कहानी को प्रोत्साहित किया था। वे आकाशवाणी के सिंधी न्यूज विभाग के प्रमुख के रूप में निवृत हुए थे। नई कविता में भाषा की धमाकेदार शैली में अनोखी प्रस्तुति के लिए प्रख्यात कवि। ‘सोच जूं सूरतूं’ कविता संग्रह पर 1991 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित। पताः 57-ठ ‘राधे हरी’, जीतेंद्र पार्क, झांझरड़ा रोड, झूनागड़-362001,

फोनः 08758186698

अमरलाल हिंगोराणी (1908-1956)

जन्म : सिन्ध में। पेशे से वकील, लेकिन स्वभाव और संवेदनशील हृदय से उच्च कोटी के लेखक। उनकी रचनात्मक शैली निराली व अत्यंत प्रभावशाली। उनकी श्रेष्ठ कहानियाँ-‘ अदो अब्दुल रहमान, कदीम की कृपा, और ‘यह भी राँझन की रम्ज’ हैं। ‘अदो अब्दुल रहमान’ कहानी यूनेस्को की ओर से भी प्रकाशित हो चुकी है।

तीर्थ चाँदवाणी (1946-2013)

जन्म : हैदराबाद, सिंध (पाकिस्तान) । उपन्यास -1, कहानी सं. 4, नई पीढ़ी के नई कहानियाँ लिखने में सक्रिय। मध्यवर्ग के पात्रों के अंतःमन-संसार की अभिव्यक्ति में उनकी एक अलग पहचान है। उनके चार कहानी-संग्रह हैं.ज़िन्दगी का नंगा लाश (1981), ‘फानूस घर’ (1984) और ‘टूटा हुआ ताजमहल’ (1986) में। तीनों पुस्तकों को गुजरात साहित्य अकादमी पुरस्कार मिले। उनका एक और संग्रह ‘सुर्ख मेंहदी मुअल सुरखाब’ भी प्रसिद्ध है। पता : ए-4, शांतिनिकेतन सोसायटी, अनीसन, कालेज रोड, जूनागढ़ - 362001, फोन : 0285-2674675, भारती -09429158789।

अनुवादिका परिचय : देवी नागरानी

जन्मः 1941 कराची, सिन्ध (पाकिस्तान), 8 गजल-व काव्य-संग्रह, एक अंग्रेजी, 2 भजन-संग्रह, 4 अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिन्धी, हिन्दी, तथा अंग्रेजी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी-सिन्धी में परस्पर अनुवाद।

प्रसारणः कवि-सम्मेलन, मुशायरों में भाग लेने के सिवा नेट पर भी अभिरुचि। कई कहानियाँ, गजलें, गीत आदि राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित। समय समय पर आकाशवाणी मुंबई से हिंदी-सिंधी काव्य-गजल पाठ. राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं - छश्रए छल्ए व्ैस्व्ए महाराष्ट्र अकादमी, दिल्ली अकादमी, सिंधी राजस्थानी अकादमी, रायपुर, जोधपुर, हैदराबाद, लखनऊ, तमिलनाडू, कर्नाटक यूनिवर्सिटी (धारवाड़), मध्य प्रदेश अकादमी, द्वारा सम्मानित एवं राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरुस्कृत।

संपर्क 480 वेस्ट सर्फ स्ट्रीट एल्महर्स्ट प्स्.60126

त त त

देवी नागरानी

जन्मः 11 मई, 1941, कराची (तब भारत)

सम्प्रतिः शिक्षिका, न्यूजर्सी, यू.एस.ए (रिटायर्ड)

प्रकाशित पुस्तकेंः

सिन्धी संग्रह-गम में भीगी खुशी, आस की शम्अ, उड़ जा पंछी, गजल, सिंध जी आऊँ जाई आह्याँ(काव्य-कराची से प्रकाशित)

हिन्दी संग्रहः चरागे-दिल, दिल से दिल तक, लौ दर्दे-दिल की, भजन-महिमा, सहन-ए-दिल (गजल संग्रह-प्रेस), मई और ताजमहल (कहानी संग्रह-प्रैस)

हिन्दी से सिन्धी अनुवादः बारिश की दुआ, अपनी धरती (कहानी) रूहानी राह जा पांधीअड़ा-काव्य, बर्फ जी गरमाइश-लघुकथा, चौथी कूट (सा.अ. पुरस्कृत वरियम कारा का कहानी संग्रह-प्रकाशन-साहित्य अकादमी)

सिन्धी से हिन्दी अनुवादः और मैं बड़ी हो गयी, पन्द्बह सिन्धी कहानियाँ, सिन्धी कहानियाँ, सरहदों की कहानियाँ, अपने ही घर में, दर्द की एक गाथा, एक थका हुआ सच (अतिया दाऊद का सिन्धी काव्य), भाषाई सौंदर्य की पगडंडियाँ, कायनात की गुफ्तगू।

सम्मान-पुरुसकार :

अंतराष्ट्रीय हिंदी समिति, शिक्षायतन व विध्याधाम संस्था छल् -काव्य रत्न सम्मान, काव्य मणि- सम्मान- च्तवबसंउंजपवद भ्वदवत ।ूंतक.डंलवत व`ि छश्र, सृजन-श्री सम्मान, रायपुर -2008, काव्योत्सव सम्मान, मुंबई -2008, ’’सर्व भारतीय भाषा सम्मेलन’’ में सम्मान, मुंबई -2008, राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद .पुरुस्कार-2009, ’’खघ्ुशदिलान-ए-जोधपुर‘‘ सम्मान-2010, हिंदी साहित्य सेवी सम्मान-भारतीय-नार्वेजीयन सूचना एवं सांस्.तिक फोरम, ओस्लो-2011, मध्य ङ्क्तदेश तुलसी साहित्य अकादेमी सम्मान-2011, जीवन ज्योति पुरुसकार, गणतन्त्र् दिवस-मुंबई-2012, साहित्य सेतु सम्मान -तमिलनाडू हिन्दी अकादमी-2013, सैयद अमीर अली मीर पुरुस्कार- मध्य ङ्क्तदेश राष्ट्रभाषा ङ्क्तचार समिति-2013, ड०. अमृता ङ्क्तीतम लिट्ररी नेशनल अवार्ड, नागपुर-2014, साहित्य शिरोमणि सम्मान-कर्नाटक विश्वविध्यालय, धारवाड़-2014, विश्व हिन्दी सेवा सम्मान-अखिल भारतीय मंचीय कवि पीठ,यू.पी-2014, भाषांतर शिल्पी सारस्वत सम्मान- भारतीय वाङमय पीठ-कोलकता-जनवरी 2015, हिन्दी सेवी सम्मान .अस्माबी क०लेज, त्र्शिूर-केरल- सितंबर 2015,

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget