रविवार, 1 मई 2016

सुबह का भूला / बाल कहानी / शालिनी मुखरैया

सुबह का भूला

बालहंस में प्रकाशित

शाम का धुंधलका घिर आया था ।सुरेश पार्क के एक कोने में विचारमग्न था। किसी का कंधे पर स्पर्श पा कर वह चौंक उठा।

"यहीं बैठे रहोगे भैया घर नहीं जाओगे। "

यह चमन था जो हर सुबह उनके घर अखबार देने आता था।

"मैने घर हमेशा के लिये छोड़ दिया है" सुरेश ने बोझिल स्वर में कहा।

"मगर क्यों भैया ?"  चमन ने प्रश्न किया ।

‘घर में सब लोग मुझे बस पढ़ाई के लिये टोकते हैं ।मगर मेरा मन नहीं लगता पढ़ाई में’ ़ सुरेश ने तल्खी भरे स्वर में कहा।’

‘माँ बाप बहुत किस्मत से मिलते हैं। आप तो बहुत भाग्यशाली हो जो आपको इतने अच्छे माता पिता मिले हैं ।’ चमन की आँखें तरल हो उठीं। आँखों की कोर में आये हुये आंसुओं को उसने झट से पोंछ लिया ।

‘कहां प्यार करते हैं वो मुझे बस हमेशा पढ़ाई के लिये डांटते रहते हैं और कभी यह मत करो तो कभी वह मत करो कहते हैं ।’ सुरेश के स्वर में गुस्सा था ।

‘मगर इस प्रकार टोकने के पीछे भी तो उनके स्नेह की भावना है ।वे तुम्हारा भला चाहते हैं तभी तो वे तुम्हें तुम्हारी गलत बातों के लिये टोकते हैं । उनकी डांट में भी स्नेह है अपनापन है ।’चमन ने समझाया ।

सुरेश अवाक हो कर चमन की बुद्धिमत्तापूर्ण बातों को सुनता रहा। मगर अभी भी उसके मन में माता पिता के प्रति नाराज़गी का अंश था।

‘नहीं मैंने फैसला कर लिया है कि मैं घर छोड़ दूंगा और तम्हारी तरह कोई काम करके गुजारा कर लूंगा ।’

‘मगर काम तो मुझे मजबूरी में करना पड़ता है ।आज अगर मेरे माता पिता होते तो मुझे यह काम कभी न करने देते ।मैं खाली वक्त में स्कूल भी जाता हूँ ।मेरा तो बस यही सपना है कि मैं माता पिता के उन अधूरे सपनों को पूरा कर सकूं जो कभी उन्होंने मेरे लिये देखे थे चाहे इसके लिये मुझे कितनी ही मेहनत क्यों न करनी पड़े।’ चमन के चेहरे पर विश्वास की चमक थी।

चमन के इन उद्र्गारों ने सुरेश को विस्मित कर दिया। कहां तो चमन अपने स्वर्गीय माता पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिये निरंतर कर्मपथ पर अग्रसर है । उसे अपने आप पर ग्लानि महसूस होने लगी ।उसने आज तक क्यों यह नहीं सोचा कि उसके माता पिता की भी उससे कुछ अपेक्षाएं होंगी ।आखिर वे उसके शुभ चिंतक हैं वे उसका क्यों बुरा चाहेंगे। माता पिता के छिपे प्यार को वह अब महसूस कर रहा था ।एकाएक उसे एहसास हुआ कि उसे अब घर चलना चाहिये । माता पिता उसके घर न पहुँचने पर दोपहर से कितने परेशान होंगे ।

‘तुमने मेरी आँखों खोल दीं चमन ‘सुरेश ने कृतज्ञता भरे स्वर में कहा।

‘मैं भटक गया था तुमने मुझे सही राह दिखाई है। माता पिता के स्नेह से अब तक मैं अनजान बना रहा और उन्हें कष्ट पहुँचाता रहा। इसका अब मुझे अफसोस हो रहा है। सुरेश ने पश्चाताप भरे स्वर में कहा़।

‘अच्छा मैं घर चलताा हूँ। माँ मेरे लिये कितना परेशान हो रही होगी। सुरेश ने चमन से विदा ली

चमन सुरेश को घर जाते देखता रहा। उसे खुशी थी कि सुबह का भूला शाम को घर लौट चला था।

 

श्रीमती शालिनी मुखरैया

पंजाब नैशनल बैंक

वार्ष्णेय डिग्री कॉलेज अलीगढ।

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