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संचार क्रान्ति और हम - जयश्री जाजू

 

"काश मुझे पंख लग जाएँ और इतनी ख़ुशी की बात मैं अपने मायके में सुना आऊँ, ब्याह के इतने दिनों बाद ईश्वर ने मेरी झोली भर दी।"

"हे भगवान तू इतना निष्ठुर क्यों है,क्यों तुझे लज्जा नहीं आई। मेरा पूरा परिवार कोलकाता में और मैं यहाँ अकेली। इस विपदा में कोई तो अपना मेरे पास हो।"

सुख-दुःख, हर्ष-विषाद ये ऐसे भाव हैं जो हम अपनों के साथ तुरंत बाँटना चाहते हैं। कुछ साल पीछे जाकर देखो तो एक दूसरे से दूर बैठे लोग आपस में अपने भावों को बाँटने के लिए पत्र का सहारा लेते थे। समय की खपत - पत्र लिखो, पोस्ट करो। पत्र लिखने के बाद उस समाचार की प्रतिक्रिया जानने के लिए लम्बे समय की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी| ख़बर जानने के लिए हाल बुरा हो जाता था। ये तो हुई बीते दिनों की बातें। आज तो चारों ओर संचार का जाल ऐसा बिखरा पड़ा है कि मन के किसी भी भाव को तुरंत अपने सगे-संबंधी, साथी, मीत को बता सकते हैं।

मोबाइल से हम अपनों से तुरंत संपर्क साध सकते हैं चाहे वह हमारा पडोसी हो या कोई दूर बैठा रिश्तेदार| किसी विषय को जानना हो, किसी देश के बारे में जानना हो बस एक बटन दबाओ उस विषय का इतिहास आपके सामने आ जाता है। एक ही स्थान पर बैठकर बिना किसी झँझट के तुरंत जानकारी हासिल। अब आप सोच रहे होंगे कि भाई भला ये क्या है- हाँ, हाँ सही समझा इंटरनेट।

अब इंटरनेट के कमाल देखिए - व्यस्त जीवनशैली में ख़रीददारी को आसान बनाया, बिछड़े मीत मिले, नए दोस्त बने, बैठे-बैठे आगे की पढ़ाई के लिए विश्वविद्यालयों की खोज आसान की।

इंटरनेट जहाँ रोज़मर्रा के जीवन को सरल बना रहा है, जैसे रेल के टिकट का आरक्षण, बिल जमा करना आदि। वहीं सामाजिक जीवन में भी अपनी पैठ जमा रहा है। इंटरनेट की इस क्रांति में मानव का जीवन तो सहज और सरल हुआ है - इसमें कोई दो राय नहीं। किंतु आज की इस संचार क्रांति से भाव तो बाँटे जा सकते हैं, किंतु मन के भाव मर भी रहे हैं। मोबाइल पर किसी विशेष दिन की बधाई तो हम अपने रिश्तेदारों को और पड़ोसी को दे देते हैं लेकिन जब यही लोग हमारी आँखों के सामने हों तो देखकर अनजान बन जाते हैं।

इस संचार क्रांति ने हमारे जीवन स्तर में बढ़ोतरी की है; इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन कहीं न कहीं सामाजिकता का ह्रास हो रहा है। जीवन जीने के मूल्य घट रहे हैं। मनुष्य ने एकाकीपन को ओढ़ लिया है और घरों में, बाहर कहीं भी उसे किसी के साथ भी बातचीत करना पसंद नहीं है।

मोबाइल ने इस बातचीत को चैटिंग का रूप दे दिया।

हर घर में रिश्ते दरक रहे हैं क्योंकि परिवार के प्रत्येक सदस्य ने मोबाइल को अपना रिश्तेदार बना लिया है।

माना इस संचार क्रांति से हम भाग नहीं सकते, लेकिन हमें अपने आप पर नियंत्रण रख कर इन उपकरणों पर समय की सीमा रखकर कार्य करना चाहिए।

आज इस सुन्दर दुनिया में जो अपराधिक प्रवृति बढ़ रही है, नकारात्मक सोच पनप रही है तो इसकी वज़ह क्या है? इस प्रश्न का उत्तर हमारे पास ही है। यदि आज हम नहीं जागेंगे तो शायद देर न हो जाए। बच्चे सिर्फ इंटरनेट के ही होकर न रह जाए और वह सामाजिक दायित्व उठाने लायक न रहें।

और अंत में मैं इतना ही कहूँगी कि इस संचार क्रांति के हमें लाभ तो अनगिनत हैं- यदि एक सकारात्मक सोच के साथ व सामाजिक जीवन का आनंद लेते हुए करो तो। यदि इस सोच के साथ इसका उपयोग न हुआ तो जो हानि होगी शायद वह सोच से परे है।

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टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन मानव सेवा को नमन - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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