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सिंहस्थ किसके लिए ? श्रद्धा या राजसी वैभव प्रदर्शन - डॉ. दीपक आचार्य

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अब हमारे तकरीबन सारे तीज-त्योहार, पर्व, मेले-ठेले, उत्सव और अनुष्ठानों से लेकर कुंभ तक घिर गए हैं पाखण्ड, प्रदर्शन, पर्यटन और पूंजीवादी चकाचौंध से। जहाँ आम और गरीब श्रद्धालु के लिए कोई स्थान नहीं है बल्कि जो पैसा फेंकने-उछालने में जितना अधिक माहिर है, भगवान और भगवान के दलालों, बाबों, पण्डितों, पुजारियों और भगवान के मन्दिरों को चलाने वाले महाधार्मिकों को रिझाने और उन्हें खुश करने की कलाओं में प्रवीण है, धर्म के नाम पर धंधा चलाने और धंधेबाजों को पनपाने का हुनर रखता है वही धर्म का कर्ता-धर्ता होकर आम समाज से ऊपर हो जाता है।

अब हमारे धार्मिक महोत्सव और कुंभ भी रुपए-पैसों की मायावी चकाचौंध से भरने लगे हैं। तरह-तरह के मायावी असुरों का बोलबाला होने लगा है। मुद्रासुर, भोगासुर, धर्मधंधासुर से लेकर तमाम प्रकार के आसुरी तत्वों का बोलबाला है जो कुंभ में अमृत की ललक जगाए हुए खुद के अमर हो जाने के लिए चिन्तित हैं और दूसरों को भी अमर होने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।

कुंभ हो या महाकुंभ, अब सब जगह लगता है जैसे राजसी वैभव का दिग्दर्शन कराने के बारहसाला उत्सव हो गए हैं। और यह राजसी वैभव किसी राजा-महाराजा के महलों से निकल कर नहीं आया है बल्कि उन बाबाओं, महंतों, महामण्डलेश्वरों, धर्माधिकारियों और अपने आप को महान सिद्ध, तपस्वी, ईश्वर का दूत मानने वाले लोगों के आश्रमों, मठों और मन्दिरों से निकल आ कर कुंभ में डेरा जमाए हुए है जिन लोगों ने भगवान की प्राप्ति के लिए संसार को छोड़ दिया है, माया का परित्याग कर दिया है और अपने आपको वीतरागी, विरक्त और संन्यासी मान कर चल रहे हैं।

लगता है जैसे कुंभ नहीं होकर मायावी सम्राटों का कोई महाधिवेशन हो  रहा हो या अपने राजसी वैभव की प्रदर्शनी, जिसमें उनकी प्रजा भी शामिल होकर अपने आपको धन्य महसूस कर रही है। एक तो अधिकाधिक राजसी वैभव दिखाकर अपने सिद्धत्व, संतत्व और तपःपूत जीवन का सार्वजनिक प्रकटीकरण कराने वालों का बोलबाला है और दूसरे वे लोग हैं जिन्हें अच्छी तरह पता है कि धर्म के नाम पर कैसी भी दुकान कहीं भी, और कभी भी चलायी जा सकती है, यह दौड़ निकलेगी।

पूरे कुंभ में आलीशान पाण्डाल, राजसी वैभव का दिग्दर्शन कराने वाले मण्डप, सिंहासन, रोशनी की जबर्दस्त चकाचौंध और वह सब कुछ है जिसे किसी बिजनेस या पैसों के मायावी संसार से कम नहीं आँका जा सकता।

यह बात नहीं है कि कुंभ में सब कुछ ऎसा ही हो। बहुत से निःस्पृह, निष्काम और सिद्ध-तपस्वी संत-महात्मा, महंत, महामण्डलेश्वर और बाबाजी हैं लेकिन उन्हें केवल क्षिप्रा मैया, नर्मदा और भगवान से ही सरोकार है और वे अपनी ही दिव्य मस्ती में रमे हुए हैं। न उन्हें संसार से कोई मतलब है, न मायावी चकाचौंध से।

और असल में देखा जाए तो इन्हीं तपस्वियों की वजह से ही कुंभ का दिव्यत्व और दैवत्व विद्यमान है लेकिन इनकी संख्या नगण्य ही है। बहुत से बड़े-बड़े और महान बाबाओं के राजसी पाण्डाल फब रहे हैं जहाँ भीड़ है।  इनमें से कई बाबा हैं जो वाकई श्रद्धालुओं की सेवा कर रहे हैं लेकिन दूसरी तरह के बाबा भी हैं जिनके लिए कुंभ अपने भक्तों की संख्या बढ़ाकर संख्या बल के आधार पर देश-विदेश में वर्चस्व जमाने के लिए शक्ति परीक्षण से कम नहीं है।

संसार को त्यागकर साधना, भक्ति और तप को अपना चुके ये संन्यासी और उनके चेले-चेलियों-चपाटियों की पूरी की पूरी फौज भक्तों को अपने बाबाजी के पाण्डाल में खिंच लाने के लिए सारे जतन कर रही है। और तो और किसी मेगा ट्रेड फेयर या विराट औद्योगिक मेले की तरह बाबाओं के सचित्र विज्ञापनों का पूरा नेटवर्क देश भर में ऎसा फैलाया जा रहा है जैसे कि विश्व स्तर पर कोई प्रतिस्पर्धा या जनमन संग्रह हो रहा हो। लोगों को ठहरने-ठहराने, मुफ्त में शुद्ध घी का लजीज खाना खिलाने, एयरकण्डीशण्ड आवास  सुविधा और वीआईपी ट्रीटमेंट की सुविधा का भरोसा दिलाया जा रहा है।

और जो लोग कुंभ में धार्मिक आयोजनों में बाबाओं के श्रीचरणों में रहकर सारी व्यवस्थाएं कर रहे हैं उनका पैसा कहां से आ रहा है यह कहने की जरूरत नहीं है। बेचारे जो भक्त मुफ्त में खा-पी रहे हैं उन्हें क्या पता कि वे भ्रष्टाचार की काली कमाई का पाप खा रहे हैं जहाँ कुंभ में पुण्य की बजाय वे पाप लेकर घर लौट रहे हैं।

कई श्रद्धालु सोचते हैं कि किसी भी बाबाजी का ओफर स्वीकार कर उनके पाण्डाल में खा लो, थोड़ी दक्षिणा उन्हें चढ़ा दो, हिसाब पूरा। लेकिन ऎसा नहीं होता।  भ्रष्टाचार और चंदे से जो कुछ खाया जाता है उसका पाप भी लगता है और भुगतना हमें ही पड़ता है। और फिर चढ़ावा चढ़ा दो, उसका पुण्य अलग खाते में जमा हो जाता है।

कुंभ के नाम पर दो तरफा काम हो रहे हैं। एक तो घोषित धंधेबाजों का जमघट है जो तरह-तरह के बिजनेस से कमा खा रहा है वहीं दूसरी तरफ उन लोगों का कारोबार चल रहा है जो अपने आपको परम धार्मिक कहते हुए धर्म की रक्षा और प्रचार में लगे हुए हैं लेकिन इनके सारे काम-काज कारोबारी और पूंजीवादी आभामण्डल से कम नहीं हैं।

हमारे धार्मिक आयोजनों को पर्यटन से जोड़कर पर्यटन उद्योग को बढ़ावा दिए जाने की मानसिकता ने भी कुंभ का कबाड़ा करके रख दिया है। किसी बाबाजी के अनुचर या वीआईपी बनकर कुंभ में जाने की बजाय आम श्रद्धालु की तरह जाएं और अनुभव करें तो हमें भी पता लग जाएगा कि धर्म के नाम पर धंधेबाजी और बाबागिरी किस हद तक हावी है।

पता नहीं कुंभ सामान्य से सामान्य और गरीब श्रद्धालु के लिए है या राजसी वैभव दिखाने के लिए। सिंहस्थ गुरु पर सभी प्रकार के सिंहासनस्थ गुरुओं की कृपा पाना चाहें तो एक बार जरूर उज्जैन जाकर आएं, सिद्ध गुरुओं की मायावी महिमा का दिग्दर्शन करें और धर्म लाभ पाएं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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