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विजयश्री पाने जरूरी है आध्यात्मिक और दैवीय ऊर्जा - डॉ. दीपक आचार्य

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दुनिया का हर महान कार्य तभी संभव है जबकि हमारे पास दैवीय और आध्यात्मिक ऊर्जा का संबल हो अथवा किसी ऎसे व्यक्तित्व का पृष्ठबल हो जो कि धर्म-अध्यात्म, संस्कारों और चरित्र बल से भरा-पूरा या सिद्ध हो तथा जगत के कल्याण की भावना से ही जीने वाला हो, ईश्वरीय दूत की तरह काम करने वाला हो तथा जिसे किसी से कोई राग-द्वेष न हो।

रामायण और महाभारत हो या फिर किसी भी युग का कोई सा महासंग्राम। दैवीय उपासना से दैवीय ऊर्जा की प्राप्ति और अपने आपको हर मामले में श्रेष्ठ सिद्ध करने की कला मिलती है और यही हम सबके लिए प्रेरणा, शक्ति सामथ्र्य और विजयश्री वरण करने का सर्वश्रेष्ठ और अलौकिक माध्यम अनुभवित होता है।

अकेले इंसानों की भीड़ के आधार पर हम सफलता या संघर्ष में विजय प्राप्त नहीं कर पाते हैं। इस लिहाज से हम सभी के लिए यह जरूरी है कि जीवों और जगत के कल्याण के लिए पहले जगदीश्वर से ताकत प्राप्त करें और उसके बाद मानवोचित कर्मों में अपने आपको लगाएं। 

आजकल हमारी तमाम प्रकार की असफलताओं का मूल कारण यह है कि हम लोग दैवीय ऊर्जाओं के बिना जीवन संघर्ष में उतरते हैं और अन्ततः पग-पग पर आत्मविश्वासहीन होकर हताशा और निराशा के भंवर में घिर जाते हैं और असफल होकर या तो जीवन के बहुआयामी रंगमंचीय रणक्षेत्र से पलायन कर जाते हैं अथवा लम्बे समय तक अवसाद में रहकर दुःखी रहने लगते हैं।

आसुरी भावों से भरे लोगों के लिए आसुरी शक्तियां केन्द्र होती हैं जबकि सज्जनों के लिए दैवीय शक्तियां केन्द्र बिन्दु होती हैं। जो इस केन्द्र से जितना अधिक निकट होगा उतना उपास्य के घेरे में अधिक पास होगा और उसे उपास्य देव की कृपा सहजता से प्राप्त होती रहेगी। आभामण्डल अभेद्य कवच के रूप में कार्य करेगा और हर तरह से संरक्षित और सुरक्षित रहेगा।

हममें से किसी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि जिन लोगों को हम अपना मान बैठे हैं, जो भीड़ हमारे इर्द-गिर्द जमा रहती है, हमारा जयगान भी करती है और परिक्रमाएं भी, वह पूरी की पूरी  हमारी अपनी ही है। जिन लोगों को हम अब तक अपना मानते रहे हैं उनमें भी बहुत सारे लोग ढुलमुल, स्वार्थी, बिकाऊ, स्वाभिमानशून्य और गुलाम की तरह होते हैं। ये लोग इंसान न होकर वस्तु के रूप में स्वीकारे जाते हैं। और वस्तु के बारे में साफ है कि हर वस्तु बिकाऊ होती है और इसे कोई भी खरीद या बेच सकता है।

दुनिया भर में जो जंगल के जंगल साफ हो गए हैं उनमें लोहे की कुल्हाड़ी का दोष नहीं था, उन हत्थों का दोष ही था जो लकड़ी के बने थे।  आजकल सभी जगह यही हो रहा है। कौन कब किसका हत्था बनकर किस को काट डाले, यह पता ही नहीं चलता।

फिर आजकल हत्थे भी ऎसे लुभावने हो गए हैं कि सभी को भ्रम होता है कि ये चमकदार मनोहारी खिलौने होंगे, मगर जब घाव कर जाते हैं, पूरा का पूरा तना काटकर अधमरा कर दिया करते हैं तब जाकर इनकी असलियत का पता लगता है।

सदियों का इतिहास गवाह है कि इन्हीं हत्थों की खातिर गुलामी का दंश हमने भुगता, और आगे भी न जाने क्या-क्या होने वाला है। हरियाली को बचाना है तो पहले कुल्हाड़ी से पाणिग्रहण कर चुके लकड़ी के हत्थों को इकट्ठा कर सामूहिक होली जलानी होगी, उनकी भस्म को प्रवाहित करनी होगी, तभी जंगल भी सुरक्षित रहेंगे, पक्षियों की चहचहाहट भी बनी रहेगी, पशुओं की उन्मुक्त विचरण परंपरा भी जारी रह सकेगी और जीव मात्र को सुकून मिलता रहेगा।

इनके साथ ही यह भी जरूरी है कि दैवीय शक्तियों का आवाहन कर उनसे ऊर्जा और विजयश्री का वरदान मांगे। इनके साथ ही जगत और जीव मात्र के कल्याण के लिए निष्काम कर्मयोग को अपनाएं फिर देखें कि किस तरह विजयश्री हमारे चरण चूमती है, सकारात्मक महापरिवर्तन की भावभूमि रचती है और बदलाव का ऎसा दौर प्रकट कर देती है कि जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। 

आज के युग में महावीर हनुमान की उपासना की जानी चाहिए क्योंकि वे ही चिरंजीवी देवताओं में से एक हैं जिनकी कृपा से हमें बल, बुद्धि, विद्या को देते हैं और क्लेश तथा विकारों का उन्मूलन करते हैं। वर्तमान में हर तरफ आसुरी भावों का बोलबाला है, नज़र लगने का डर सबको सताता अनुभवित होता है, मामूली कामों से लेकर सार्वजनीन कामों तक मेें अड़चनें आने लगी हैं।

खासकर बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय कर्मों और लोक कल्याणकारी गतिविधियों में अवरोधों का तांता लगा रहता है। इन सारी स्थितियों में संघे शक्ति कलौयुगे‘’ के साथ ही महावीर हनुमानजी की उपासना करें। किसी भी श्रेष्ठ कर्म के आरंभ में वैयक्तिक और सामूहिक रूप से नाम जप तथा हनुमान चालीसा के पाठ होने चाहिएं।

सैकड़ों-हजारों की संख्या में जहां कहीं समागम होता है वहां मात्र दस बार ही हनुमान चालीसा के पाठ हो जाने से ब्रह्माण्ड में ऎसी अपरिमित परमाण्वीय शक्ति का उदय होता है जो कि दुनिया में कुछ भी कर सकती है।

इसलिए जीवन में व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर हनुमान चालीसा के पाठ को नियमित दिनचर्या में शामिल करें और किसी भी प्रकार के श्रेष्ठ कार्य के आरंभ से लेकर अंत तक यदि यह क्रम जारी रहे तो आशातीत एवं ऎतिहासिक सफलता पायी जा सकती है।

सिद्धों का यही अनुभव रहा है। इसे हम सभी को स्वीकारना और आजमाना चाहिए। बिना आध्यात्मिक और दैवीय शक्तियों के कहीं भी कोई पार नहीं पा सकता।

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