शनिवार, 7 मई 2016

माहौल / कविताएँ / धर्मेन्द्र निर्मल


1.माहौल
खोटे रहे उछल
फटे रहे चल
दराजें रही मचल
आदमी
हो गया सवार
पैसों पर
संसार
व्यापार ! व्यापार !! व्यापार !!


2. दुनियादारी
दुनियादारी -रिश्ते-नाते
मकड़जाल सब
फँसकर
टूट
छूट
टूट-छूटकर
फँस।

3. शीर्षक
अक्सर लोग/रोज की भी
देखी सुनी
जानी पहचानी
गुजरी परखी
बातों चीजों व घटनाओं को
रखते चले जाते है
स्मृति के हाशिए पर
कोई कोई होता है ऐसा
जो उन्हें
हाशिए से निकाल
देता है स्थान
समय के पन्नों पर
शीर्षक
ऐसे ही बनते है।

4.मोह
पेड़
चाहते हैं तट पर
खड़े रहना
नदी नहीं चाहती
मोह माटी का
नहीं छोड़ पाते
पेड़ न पानी
हो जाते हैं
एक दूजे के
कभी बरसते हैं
कभी उफनते हैं
पर रीते नहीं होते।

5.हार
हदय की अकथ पीड़ा
पीकर -सी कर होंठ
तार- तार हो
हार -जीत
जग- गए
सुमन।

6.रास्ते
तंग आकर
शहर की जिंदगी से
लौटना चाहता हूँ
गाँव।
गाँव की ओर से
आते तो है मगर
जाते नहीं रास्ते।

7.जातिवाद
चुम्बक खींचेगा
टिन ही क्यों न हो
हीरा अमूल्य है
चंदन बहुमूल्य
क्या लेना क्या देना उसको
उसे चाहिए जाति अपनी
चुम्बक खींचेगा
टिन ही क्यों न हो।


8.जंगलराज
देखा
फूलते - फलते
पेड़
कंटीले और टेढ़े।

सीधे सुग्घर
पेड़
कटते देखा।

देखा
लड़ाई में आपसी
बड़ों की
छोटों को
जिंदगी से
जिंदगी के लिए
जूझते देखा।

9.बातें

बहुत कुछ
होती है
ऐसी बातें
सह जाते है
न चाहकर भी

न चाहकर भी
बातें
ऐसी भी होती है
बहुत कुछ कह जाते है

बहुत कुछ
होती है
ऐसी बातें
सिर के बाल
नहीं छूती

छूती ही नहीं
ऐसी भी होती है
बहुत कुछ बातें
लग जाती है दिल को।।


10.मेरा मन

समाँ में पसरी हवा
काँटे से चीरती है
झीनी चादर-से
भीगो कर पलकें
सर्द हो जाती है
कली की मुस्कान खातिर
उदास जिन्दगी
नहीं मालूम
तुम्हें
हँसते देखने के लिए
रोज इसी तरह
बिंधता है
मेरा मन।।

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