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हमसे तो पशु अच्छे हैं - डॉ. दीपक आचार्य

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हम इंसान हैं या पशु, हममें इंसान के कौनसे गुण हैं और पशुओं से हमारी कितनी समानता है?  कभी फुरसत पाकर इस बात पर थोड़ी गंभीरता के साथ हम चिन्तन कर लें और इंसानों की तुलना पशुओं से करने लगें तो पता चलेगा कि आजकल के इंसानों की तुलना में पशु लाख गुना अच्छे हैं।

हम जिस दैनिक जीवनचर्या, परंपराओं, आदर्शों और सिद्धान्तों की बात करते हैं उन मामलों में पशु इंसानों से कहीं अधिक श्रेष्ठ दिखते और अनुभवित होते हैं। दैनंदिन जीवन की ही बात कर लें तो पशुओं का रोजाना का पूरी तरह क्रम निर्धारित बना हुआ है। पशुओं में न बेवक्त खान-पान है, न अनावश्यक जागरण, और न ही हमारी तरह वे वृत्तियां जो हमें भोग-विलास और आरामतलबी की ओर प्रवृत्त करने लगी हैं।

पशुओं का शयन और जागरण निर्धारित है। बेवक्त वे न बोलते हैं न भ्रमण करते हैं। उनके अपने कोई गुट नहीं हैं, न ऎसे संगठन हैं जहां अहो रूप -अहो ध्वनि का माहौल हो। खान-पान के मामले में भी पशु हमसे लाख दर्जा अच्छे हैं। शहर की आबोहवा और इंसानों की झूठन खा-खा कर आवारा हो गए जानवरों की बात हम नहीं कर रहे हैं बल्कि उन पशुओं की बात कर रहे हैं जो वाकई पशु कहे जाते हैं।

हम लोग सूरज के उगने के बाद काफी देर तक सोये रहते हैं। हमें पता ही नहीं कि उगते सूरज का रंग कैसा है, प्रभात की हवाएं कैसी होती हैं, संध्या की लालिमा किस तरह की होती है। यों हम बात-बात पर उलाहना देते हुए लोगों को जानवरों के नाम पर डाँट दिया करते हैं लेकिन जरा उन जानवरों की अच्छाइयों को भी देखें जिनका नाम लेकर हम किसी को कुत्ता, गधा, सूअर, उल्लू, मेंढ़क, चूहा, बंदर, भालू, कछुआ, लोमड़ी, हाथी आदि तमाम प्रकार के जानवरों को याद करते रहते हैं।

पशु कभी चिल्लाते नहीं, न ही कहीं इकट्ठा होकर बिना वजह किसी की निन्दा करते रहते हैं, किसी की पेढ़ी पर देर रात तक बैठकर गप्पे नहीं हाँकते, तरह-तरह का पुराना और सड़ा बासी माल नहीं खाते। किसी पशु को कभी तम्बाकू, गुटखा खाते या भंग-दारू का पान करते देखा है? दारू पीकर चिल्लाते और बकवास करते देखा है? कभी नहीं, क्योंकि पशु हमसे अधिक सभ्य है। 

उसे यदि इंसानों की भाषा में बोलना आता तो वे गांवों की चौपालों से लेकर दिल्ली के इण्डिया गेट तक हमारे बारे में सच-सच बताते हुए इतनी क्रान्ति कर डालते कि हमारा जीना हराम हो जाता। पशु कभी रिश्वतखोरी, जमाखोरी, भ्रष्टाचार, दहेज, गुण्डागिर्दी की सोच भी नहीं सकते।

पशुओं में एक-दूसरे को नीचा दिखा कर सिंहासन पर कब्जा कर डालने की नीयत भी नहीं होती। कोई पशु सरकारी या गैर सरकारी जमीन पर कभी अतिक्रमण नहीं करता। किसी को लूटता नहीं, लूट-खसोट में उसका विश्वास नहीं।

पशु कभी झूठ नहीं बोलते। उनकी मुखमुद्रा और व्यवहार से उनके भीतर की थाह आसानी से पायी जा सकती है। इंसान के बारे में ऎसा नहीं हैं। पशु एक ही मुँह लेकर चलता है, और आदमी सौ-सौ मुखौटों के साथ चलता रहता है।

इंसान आजकल जो कुछ कर रहा है वह पशुओं से भी गया-बीता हो गया है। विश्वास तो यही किया जाता था कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन आदि सारे कामों के सिवा एक बुद्धि होने के कारण इंसान पशुओं से श्रेष्ठ और सामाजिक है लेकिन इस बुद्धि का आसुरी इस्तेमाल करने की आदत ने इंसान को लाचार और पशुओं से भी हीन बना दिया है।

जिस बुद्धि के कारण उसे पशुओं से श्रेष्ठ माना गया था उसी बुद्धि की वजह से इंसान पशुओं से भी गया-बीता हो गया है। दुर्बुद्धि का भरपूर दुरुपयोग करते हुए आज का इंसान जो कुछ कर रहा है वह इंसानियत के साथ धोखा तो है ही, आदमी ने पशुओं से भी अपने आपको नीचे गिरा लिया है।

हम सारे आसुरी कर्म करने के लिए स्वतंत्र हो गए हैं। जब चाहें दूसरे पालों और बाड़ों में छलांग लगा देते हैं और पूरा शहद चाट लेने के बाद, झूठन-खुरचन तक को चट कर जाने के बाद पाले बदल डालते हैं।

हमारे लिए कोई मर्यादा नहीं है जिसे जब सूझ पड़े, जब हूक उठ जाए, वो उस कर्म में जुट जाता है। हमारे बहुत से कामों का कोई मौसम नहीं रहा। इस मामले मेंं हम पशुओं से भी सौ गुना आगे निकल गए हैं। जब कभी कहीं मौका मिलता है सब कुछ कर गुजरते हैं। पशुओं जितना धैर्य और संयम भी अब हम नहीं रख पाते हैं।

बहुत से लोग पशुओं से भी बदतर जिन्दगी जी रहे हैं। उनका न कोई समय निश्चित है, न अनुशासन। सब कुछ फ्री-स्टाईल है। हमें अब अपनी मर्यादाओं के बाड़े में रहना भी पसंद नहीं है। दूसरों के बाड़ों में ताक-झाँक से लेकर घुसपैठ तक में हमें आनंद आने लगा है।

ईमानदारी के साथ अपनी तुलना करने लगें तो हमें सच्चे मन से पूरी लज्जा और शर्म से लबालब भर यह स्वीकार करने को राजी होना ही पड़ेगा कि हम जो कुछ कर रहे हैं, जिस दोहरी-तिहरी और आसुरी मानसिकता में जी रहे हैं, जो कुछ कर रहे हैं उस स्थिति में हर मामले में पशु हमसे बेहतर हैं।

कम से कम उन पशुओं में अहंकार तो नहीं है, वे जैसे भी हैं, उसी रूप में स्वीकारते हैं, लाल-नीली-पीली बत्तियों के प्रभाव में आकर अपने आपको भुलाते नहीं क्योंकि उनका विश्वास इन रंगों की बजाय प्रकृति के शाश्वत रंगों में होता है। पशु प्रकृतिस्थ रहा करते हैं न कि एयरकण्डीशण्ड माँदों में, इसलिए उन्हें जगाने के लिए कागज के लाल-हरे-नीले-काले टुकड़ों या मुद्राओं की खनक की जरूरत भी नहीं पड़ती।

भगवान ने उन्हें यदि इंसानी भाषा नवाज दी होती तो आज हालात कुछ और ही होते। अपने आपको जानें और इंसान बनने-बनाने का यत्न करें। हममें से अधिकांश लोग ऎसे हैं जिनके बारे में लोग कह भले न पाएं, मगर महसूस जरूर करते हैं कि हम पशुओं से भी गए-बीते हैं, हमसे तो पशु अच्छे हैं।

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