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धुवाँ उगलते शहर / जावेद अनीस

भारत के शहर जहरीले होते जा रहे हैं और यहाँ की हवाओं में ऐसे कणों की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है जो कैंसर,हार्ट अटैक जैसी घातक बीमारियाँ पैदा करते हैं. अभी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 795 शहरों में वायु प्रदूषण की स्थिति पर जो रिपोर्ट जारी की है, वह हमारे लिए एक गंभीर चेतावनी है और अगर हमने अभी भी थोड़ा ठहर कर इस पर विचार नहीं किया तो स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती हैं. पिछले दिनों एक खबर आई थी कि कनाडा की एक कंपनी जल्दी ही भारत में बोतलबंद हवा की बिक्री शुरू करने जा रही है. जाहिर सी बात है अगर यही हाल रहा तो हम पानी की तरह हवा खरीदने को भी मजबूर होंगें और हमारे हाथ में कांक्रीट व धुआं उगलते शहरों के अलावा कुछ नहीं बचेगा.

डब्लूएचओ ने 12 मई को रिपोर्ट जारी की है, उसके अनुसार दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के 10 शहर शामिल हैं. इस सूची में अगर ईरान का “जाबोल” शहर सबसे ऊपर है तो शायद अपने धूलभरे तूफानों के कारण, लेकिन “जाबोल” के साथ टॉप तीन शहर भारत के हैं, ग्वालियर दूसरे, इलाहाबाद तीसरे स्थान पर है. ये सूची यह भ्रम भी तोड़ती है कि बड़े शहर ही ज्यादा प्रदूषित हैं.

हम शहरीकरण के युग में रहते हैं, रोटी कमाने की मजबूरी और शहरों के आकर्षण ने आज दुनिया की करीब आधी आबादी को शहरों में रहने को मजबूर कर दिया है. भारत में भी ‘शहर' भरते जा रहे हैं और गावं खाली हो रहे हैं. हमारे देश में उदारीकरण के बाद तो जैसे शहरीकरण का विस्फोट हो गया है, सेवा क्षेत्र के विकास से शहर नए अवसरों के केंद्र बन गये हैं. हमारे देश की मौजूदा शहरी आबादी 41 करोड़ है जिसे 2050 में बढ़कर 81.4 करोड़ होने का अनुमान है, जो कि दुनिया की सर्वाधिक शहरी आबादी होगी. शहरों में तेजी से बढ़ रही आबादी के अनुपात में जगह की कमी है, इसलिए हम देखतें हैं कि शहरों में ऐसी बस्तियॉ बड़ी संख्या में हैं जहॉ जीने के लिए मूलभूत सुविधाएं तक मौजूद नहीं हैं, 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 13.7 मिलियन परिवार शहरी झुग्गी बस्तियों में रहते हैं, मात्र 32.7% शहरी निवासी नाली व्यवस्था से जुड़े हैं बाकी के लोगों के घरों का अपशिष्ट पानी खुले में प्रवाहित होता है. इसी तरह से शहरी क्षेत्रों के 12.8% लोग अभी भी खुले में शौच जाते हैं. हमारे शहर अव्यवस्था, गंदगी, धुओं, सूक्ष्म कणों व गाड़ियों से भरे पड़े हैं. जानकार बताते हैं कि अगर शहरों पर बढ़ रहे बोझ और प्रदूषण को नियंत्रित नहीं किया गया तो कुछ सालों में यहाँ इंसानों को रहना मुश्किल हो जाएगा.

भारत में जिसे हम नियोजित शहरी विकास कहते हैं उनका फोकस मुख्यतः जमीन के उपयोग तक ही सीमित रहा है और इसमें उनमें सामाजिक विकास व पर्यावरण के पक्षों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है इसलिए हमारे यहाँ शहरों का विकास बाजार के ताकतों के माध्यम से हुआ है और मोटे तौर पर वही तय कर रही हैं कि कैसे और किस दिशा में विकास करना है, मोदी सरकार ने 100 स्मार्ट सिटी बसाने की योजना की घोषणा की है उसमें भी सारा जोर एफडीआई पर है.

भारत में एक तरफ लोगों में पर्यावरण को लेकर जागरूकता कम है तो दूसरी तरफ सरकारें सुस्त हैं जिसकी वजह से हालत चिंताजनक होते जा रहे हैं. हमारे महानगरों में जो वायु प्रदूषण होता है उसमें 70 से 75 प्रतिशत योगदान वाहनों का है जो हाइड्रोकार्बन, नाइट्रो कार्बन और नाइट्रोजन आक्साइड जैसे खतरनाक गैसों के लिए जिम्मेदार हैं. कमजोर सार्वजनिक यातायात-व्यवस्थाओं और बढ़ते निजी वाहनों के पीछे मजबूत लॉबियां काम कर रही हैं.

डब्लूएचओ की ताजा सूची में अगर दिल्ली लुढ़क कर ग्यारहवें नंबर पर आ गयी है और वहां की आबो-हवा में पहले की तुलना में सुधार आया है तो इसके पीछे किये गये प्रयास हैं जिसमें ऑड-ईवन योजना और जन-जागरूकता योगदान रहा है, हालाँकि शुरुआत के लिए इन्हें अच्छा प्रयास कहा जा सकता है लेकिन यह कोई स्थाई विकल्प नहीं होने जा रहे. लम्बे समय को ध्यान में रखते हुए कुछ कड़े फैसले करने होंगें जिसमें सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को बढ़ावा देने, निजी वाहनों की बिक्री पर सख्ती करने और साइकिल जैसे वाहनों के लिए अलग लेन बनाने जैसे दीर्घकालिक उपाय करने होंगें. इन सबके बावजूद दिल्ली में ऑड-ईवन का प्रयोग बताता है कि अगर हम प्रदूषण को रोकने के लिए छोटा सा भी प्रयास करें तो इसका फर्क देखने को मिल सकता है .

हमें बीजिंग और पेरिस जैसे शहरों से सबक सीखने की जरूरत है जहाँ प्रदूषण आपातकाल लागू कर दिया जाता है और प्रदूषण स्तर कम होने पर ही आपातकाल हटाया जाता है. हमारे देश में आज वायु प्रदूषण एक राष्ट्रीय समस्या का रूप ले चुकी है लेकिन दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक नेतृत्व में इससे निपटने के लिए इच्छाशक्ति ही देखने को नहीं मिल रही है. दिल्ली के ऑड-ईवन योजना को लागू करने के दौरान राजनेता जिस तरह से एक दूसरे पर कीचड़ उछालते देखे गये वह दुखद है. अनियंत्रित और धुआं भरे शहर हमारा भविष्य नहीं हो सकते. खतरनाक होते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए दीर्घकालीन और समयबद्ध कार्ययोजना बनाने की जरूरत है जिसमें हमें सार्वजनिक परिवहन तंत्र को मजबूत करने, पेड़ लगाने ,स्वच्छ व अक्षय ऊर्जा की तरफ बढ़ने, नए व छोटे शहरों का विकास करने जैसे उपाय शामिल करने होंगें, इस कार्ययोजना सरकारों को नागरिकों, कॉर्पोरेट और वैज्ञानिकों को शामिल करना होगा.

लेकिन इन सबसे पहले हमें अपने सोच में बदलाव लाने की जरूरत है क्योंकि दिक्कत यह है कि हमारी व्यवस्था, नेताओं, समाज और कारोबारी वर्ग को प्रदूषण की समस्या नजर ही नहीं आ रही हैं. कोई भी प्रदूषण को रोकने के लिए गंभीर नहीं है.

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