सोमवार, 23 मई 2016

अलक्ष्मी तो निकलेगी ही कैद से बाहर - डॉ. दीपक आचार्य

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चाहे जितना भ्रष्टाचार कर लो, पैसा बना लो, बचा लो, अतिक्रमण कर लो, जमाने भर को लूट लो, कमीशन डकार जाओ, परायी जमीन-जायदाद धौंस, दबाव या प्रलोभन से अपने नाम करवा लो, इसका कोई आनंद हम प्राप्त नहीं कर पाते हैं, न कर पाएंगे।

एक न एक दिन भाण्डा फूटेगा, पाप का घड़ा बीच चौराहे पर धमाकेदार आवाज करता हुआ टूटेगा-फूटेगा और सारा जमा किया हुआ अपनी आँखों के सामने हमें चिढ़ाते हुए कैद से बाहर निकल जाएगा।

जो पैसा अपनी मेहनत से कमाया जाता है, धर्मसंगत हो, वही अपना है, बाकी को भले ही हम अपने नाम लिखवा लें, चाहे ढेरों रजिस्टि्रयां करवा दें, बैंक लॉकरों में भर रखें। यह एक न एक दिन निकलना ही है।

लक्ष्मी का स्वभाव शांत, धैर्य और स्थिरता भाव में प्रतिष्ठित होता है। जब तक नारायण साथ रहते हैं तभी तक वह अपने पास रहती है। नारायण केवल भगवान का नाम मात्र नहीं है बल्कि पुरुषार्थ, माधुर्य, न्याय, धर्म, सत्य और सेवा-परोपकार के साथ जगत का पालन करने का प्रतीक है।

इसमें केवल अपना ही अपना स्वार्थ सोचने और करने का कोई भाव नहीं है बल्कि जो कुछ है वह भगवान का है, और जगत के लिए है, यही ध्येय रख जाए तो नारायण की कृपा बनी रहती है।

यह भाव न हो, हराम का माल हड़पा हुआ हो, रिश्वत, भ्रष्टाचार और कमीशन के फेर में उलझते हुए औरों से षड़यंत्रपूर्वक कब्जा किया हुआ हो, राष्ट्रपुरुष के ताने-बाने को दीमक की तरह खाने वाला हो, तब तय मान कर चलना होगा कि दुर्गति आएगी ही आएगी, चाहे हम अपने आपको कितना ही चतुर, लोगों को भ्रमित किए रखने में हुनरमंद,  मुखौटा एक्सपर्ट और अन्यतम क्यों न समझते रहें।

बिना मेहनत के कमाया हुआ धन, अन्न, वस्त्र और वैभव, बिना प्रतिभा के पाए हुए पुरस्कार, अभिनंदन, सम्मान और डिग्रियां एक सीमा तक प्रतिष्ठा दे सकती हैं, इनका कोई कालजयी वजूद नहीं होता। इनसे जितना सम्मान प्राप्त होता है उससे कई गुना अधिक अपमान का सामना करना ही पड़ेगा।

कोई अपने आपको कितना ही पद-प्रतिष्ठा से भरपूर, प्रभुत्वशाली, वर्चस्वी, स्वनामधन्य, लोकप्रिय और सर्वश्रेष्ठ क्यों न समझता रहे, यदि जीवन में शुचिता नहीं है, हराम का खान-पान और हराम की कमाई का शौक हो, बिना परिश्रम के खुद को ऊँचा और प्रभावशाली, वीआईपी और राजसी प्रभुत्व हड़पने का आदी हो, उसकी एक न एक दिन दुर्गति होनी ही है।

हमारे सामने बहुत सारे उदाहरण युगों-युगों से रहे हैं जिन्होंने इन हरामियों, लूटेरों, समाज, व्यवस्था और देश को खोखला करने वालों को पूजा और बाद में उसका तगड़ा दुष्परिणाम भी भुगता। और कई तो भयावह स्थितियों को सहन न कर पाए और भूत-प्रेत बन गए। 

स्थितियां, मानसिकता और लोगों की मनोवृत्ति हर युग में ऎसी ही रही है जैसी कि आजकल देखी जा रही है। चूूंकि यह युग कलिकाल है इसलिए इसमें आसुरी शक्तियों का वर्चस्व अधिक प्रतिभासित होता है।  इसका मूल कारण आसुरी और नकारात्मक भावों का शक्तिशाली होना नहीं है बल्कि ‘संघे शक्ति कलौयुगे’ की भावना का अभाव है। इस देश की सारी समस्याओं का मूल कारण यही है।

विभाजनकारी और संकीर्णता के हामी लोग किसी को एक नहीं होने देते। किसी को डरा-धमकाकर या कोई न कोई बाहरी दबाव डलवा कर अलग कर दिया करते हैं अथवा कंचन-कामिनी या भोग-विलास का कोई न कोई गुदगुदेदार झुनझुना या मखमली कैनवास सामने फेंक कर अपना बना लेते हैं अथवा ऎसी हालत पैदा कर दिया करते हैं कि जिससे कि सामने वाला हर दृष्टि से बेदम या अंधानुचर ही हो जाए। फिर आजकल मामूली स्वार्थ के लिए भिखारी की जिन्दगी पा लेने वालों की कोई कमी नहीं है। हर श्रेणी, वर्ग और क्षेत्र में वैभवशाली भिखारियों को देखा जा सकता है।

श्रेष्ठीजनों की संगठनहीनता और पलायन का स्वभाव ही सारी समस्याओं की मूल होने के साथ-साथ उन लोगों को पनपने के अवसर प्रदान करता है जिनके कैक्टसी, काँटेदार, जहरीले और बेशर्म स्वभाव के मारे जगत परेशान होने लगता है।

बिना मेहनत का रुपया-पैसा, चांदी-सोना, जमीन-जायदाद, खेत, फार्म हाउस, रिसोर्ट और दूसरे सभी प्रकार के भण्डारों के रूप में विद्यमान अलक्ष्मी का मूल स्वभाव ही यह होता है कि वह एक जगह टिक कर नहीं रह सकती। वह सदैव चलायमान रहना चाहती है इसलिए कैद से बाहर निकलने के लिए छटपटाती है।

जब हम कैद कर रखते हैं, उसे कोई नाम नहीं दे पाते, अनाम और अघोषित ही रखे रखना चाहते हैं तब वह बगावत पर तुल आती है और बाहर निकलने के सारे रास्ते तलाशने शुरू कर देती है। फिर एक न एक दिन ऎसा आता ही है कि जब हमारी प्रतिष्ठा और आभामण्डल के कवच मेें एक छोटा सा छेद तलाश कर बदनामी देती हुई बाहर निकल जाती है और इस तरह अलक्ष्मी खुद को पाक-साफ रखती हुई उस तरह बाहर निकल जाती है जिस तरह लबालब भरा बाँध टूट जाता है और मीलों तक के भविष्य को बरबाद कर देता है।

जो लूटेरे, भ्रष्ट, चोर-डकैत, बेईमान, कमीशनबाज और हरामखोर हैं, मुखौटा कल्चर से लोगों को भरमा रहे हैं, उन्हें देखते जाईये बस। एक न एक दिन पाप का घड़ा फूटने ही वाला है, कच्ची नींव पर टिका हर बाँध किसी दिन बाढ़ ला देता है और बड़े से बड़े वजूद वाले को मैदान की शक्ल में ढाल दिया करता है।

अच्छे दिन आ रहे हैं, देखते रहो, जगे रहो, जगाते रहो और अपने आपको उन लोगों से दूर रखो जिनका आभामण्डल पराया माल खाकर-जमा कर कलुषित और सडांध भरा हो गया है।

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