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परीदेश की सैर / रोमांचक बाल उपन्यास / श्रीनाथ सिंह

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गोपाल उड़ गया (प्रस्तुति - डॉ. पुष्पेंद्र सिंह - dr.pschauhan123@gmail.com ) एक् लड़का था । बड़ा प्यारा, बड़ा दुलारा और बड़ा हँसमुख । उसका ना...

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गोपाल उड़ गया

(प्रस्तुति - डॉ. पुष्पेंद्र सिंह - dr.pschauhan123@gmail.com )

एक् लड़का था । बड़ा प्यारा, बड़ा दुलारा और बड़ा हँसमुख । उसका नाम था गोपाल । बाप की छड़ी को वह घोड़ा बनाकर चलता था और सिर पर लाल रंग की टोपी लगाता था । गोपाल से दो वर्ष बड़ी उसकी एक बहन थी । उसका नाम था चमेली । चमेली अपने पास हमेशा एक छोटी सी बांस की सन्दूक रखती .थी जिसमें उसकी गुड़िया बन्द रहती थी ।

ये दोनों भाई-बहन रोज सबेरे घर से निकल कर खेत में टहलने जाते थे । गोपाल अपने बाप की घड़ी को घोड़ा बनाता था । चमेली अपनी बांस की सन्दूक लेकर उसके पीछे खड़ी होती थी और दोनों टिक-टिक करते हुये हरे-भरे खेतों का एक चक्कर लगा आते थे ।

अब उस दिन की बात सुनिये जिस दिन से हमारी यह कहानी शुरू होती है । उस दिन गोपाल की नींद जरा जल्दी खुल गई । तारे कुछ-कुछ फीके पड़ गए थे पर चन्द्रमा फीका नहीं पड़ा था । गोपाल ने बिस्तर पर लेटे ही लेटे कहा-चमेली दीदी, चमेली दीदी!

चमेली ने जवाब दिया-मैं बड़ी देर से जग रही हूँ । तुमको विश्वास न हो तो चन्द्रमा में: जो बुढ़िया बैठी है उससे पूछ लो । तब से वह मेरी ही ओर देख रही है ।

गोपाल बोला-उठोगी नहीं, बहाना करोगी ।

चमेली ने कहा-पहले: अपने घोड़े को तैयार करो ।

कू कू कू ''

''चमेली दीदी! चमेली दीदी! बाग: में कोयल बोल रही. है । आज उसी तरफ चलेंगे । उठो: जल्दी करो ।''

चमेली उठ कर बैठ गई । गोपाल उठकर खड़ा हो गया । कोयल की आवाज न सुन पड़ती तो शायद ये दोनों अभी कुछ; देर और बिस्तर पर पड़े-पड़े बातें करते और फिर माँ के उठाने से उठते ।

कोयल की कू-कू ने झटपट दोनों को तैयार कर लिया ।' चमेली ने अपनी बांस की सन्दूक ली और गोपाल ने अपना'- घोड़ा सँभाला ।

अब दोनों घर से बाहर गाँव के रास्ते पर थे । सब तारे डूब चुके थे । सिर्फ एक तारा फीके चन्द्रमा के पास चमक रहा था ।

गौपाल ने कहा-जान पड़ता है । मङ्गल तारा यही है । मास्टर साहब बताते थे कि यह हमारी था के बहुत करीब: है और इसमें भी आदमी बसे हैं ।

चमेली ने कहा-नहीं यह शुक्र होगा । देखो न कानी आँख- की तरह कैसा टकटकी बाँधे देख रहा है । शायद चन्द्रमा को चिढ़ा रहा है । बड़ा ऐबी जान पड़ता है ।

गोपाल बोला-तब इसे शनीचर कहो । ऐबी तो शनीचर होता है।

“कूँ!”

चमेली ने चिल्लाकर कहा-रास्ता देखो! घोड़े को तेज करो चाबुक लगाओ । चलो बढ़ो ।

दोनों खटपट-खटपट दौड़ने लगे और गाने लगे-

चल-चल धोड़े सरपट चल ।

झटपट झटपट झटपट चल ।।

 

बहुत दूर जाना है हमको ।

फिर वापस आना है हमको ।।

पल में चलकर पार पियारे ।

जंगल झाड़ी ऊसर दल-दल ।।

 

चल चल धोड़े सरपट चल ।

झटपट झटपट झटपट चल ।।

 

दोनों दौड़ने लगे । हरी घास पर बिखरे ओस के कितने, मोती उनके पैरों से लग कर टूट गए, इसका उन्हें पता भी नहीं चला । गोपाल की टोपी की तरह पूरब की दिशा लाल हो रही: थी पर इसकी ओर भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया । बस, कोयल की कू-कू'' की ओर कान लगाए दोनों थिरकते हुए चले जा रहे थे। एकाएक गोपाल बोल उठा – चमेली दीदी! जरा सामने देखो तो क्या है?

“नीम का पेड़ है और क्या है?”

“नहीं नहीं, ऊपर देखो!”

“ऐं! यह तो गुब्बारा जान पड़ता है”।

'' हां! हां! जान पड़ता है कहीं उड़ा जा रहा था पेड़ में अटक गया ।''

अब दो में से एक को भी कोयल की कू-कू का ध्यान न रहा । पेड़ के पास पहुंचते हो घोड़ा रुक गया । गोपाल ने उसे फौरन एक झाड़ी से बाँध दिया । चमेली ने बाँस की सन्दूक बोलकर अपनी गुड़िया को बाहर निकाला और कहा-प्यारी गुड़िया सबेरे की हवा का आनन्द लो । सबेरे की हवा बड़ी फायदेमन्द होती है ।

इसके बाद दोनों पेड़ के पास पहुंचे । गुब्बारा एक रस्सी से पेड़ की डाल से बंधा था और हवा के झोकों से हिल रहा था ।

'चमेली ने कहा-गोपाल, तुम यही खड़े रही, मैं पेड़ पर चढ़ूंगी ।

गोपाल बोला-नहीं मैं चढ़ूंगा। तुम लड़की हो, लड़कियों को पेड़ पर न चढ़ना चाहिए ।

चमेली झुंझला कर बोली-बहुत बात करना सीख गया है । मैं तुझे पेड़ पर नहीं चढ़ने दूंगी । कहीं कुछ हो जाय तो मां मेरे ही ऊपर बिगड़ेंगी ।

''नहीं-नहीं, अम्मा को मालूम है कि मैं पेड़ पर चढ़ता हूँ । तुम्हें उस दिन की बात याद है जब उन्होंने खुद ही दातौन तोड़ने के लिए मुझे पेड़ पर चढ़ाया था ।''

अन्त मैं गोपाल ही पेड़ पर चढ़ा । और ऐसी फुर्ती से चढ़ा जैसे बन्दर चढ़ते हैं । चमेली ने मुस्कराकर कहा-वाह रे बंदर!

फिर उसने कहा-रस्सी पकड़ कर खींचो । देखो गुम्बारा नीचे आता है या नहीं?

गोपाल ने जोर लगाया ।

हाँ आता है! ''

''अच्छा । पहले खूब खींचकर दूसरी जगह बाँध दो तब बाकी रस्सी लेकर नीचे उतर आओ ।' '

गोपाल ने कहा-बहुत मामूली गुब्बारा है । इसे मैं एक ' हाथ से ही खींचकर नीचे ला सकता हूँ ।

चमेली ने डांटकर कहा-अरे बन्दर! कहीं गुब्बारा तुझे लेकर उड़ न जाय । जरा सावधानी से काम कर ।

चमेली अपनी यह बात खतम भी नहीं कर पायी थी कि उसे पेड़ में फड़फड़ाहट सी सुनाई पड़ी । उसने ऊपर की ओर देखा तो उसके होश उड़ गए । गुब्बारा उत्तर की ओर उड़ा चला जा रहा था और उसमें लटका हुआ गोपाल कह रहा था-अहा हा! देखो! देखो! ''

चमेली अपनी गुड़िया छोड्‌कर उसी ओर को दौड़ पडी ।. उसे डर था कि कहीं गोपाल गुब्बारे के साथ उड़कर अनजान देश को न चला जाय ।

धीरे-धीरे गुब्बारा ऊँचा उठने लगा । अब चमेली और भी डरी । गोपाल को भी डर मालूम होने लगा । घबड़ाहट की आवाज में उसने कहा-''चमेली दीदी! ''

चमेली ऊपर की ओर आँखें किये दौड़ी जा रही थी । एका-एक गड्‌ढे में पैर पड़ जाने से वह फिसलकर गिर पड़ी ।

पर उसका भाई संकट में था। तुरन्त ही वह फिर उठी। अब गोपाल बहुत ऊँचे पहुँच चुका था और पतले तागे में बंधे मेढ़क की तरह झूलता हुआ दिखाई दे रहा था। चमेली की आँखों से आँसू बहने लगे । वह जोर-जोर स रोने लगी- हाय हाय! भैया गोपाल अब क्या करूँ? किसको पुकारूँ? अम्मा! अम्मा! गोपाल उड़ा जा रहा है ।

पर उस सुनसान स्थान में उसकी मदद करने वाला वहाँ कोई न था ।

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हिमालय की ओर

'सूरज निकल रहा था । सामने उत्तर की ओर एक बड़ा पहाड़ खड़ा था । यह पहाड़ काले बादल की तरह बड़ा डरावना दिखाई देता था । पहाड़ पूरब से पच्छिम तक बहुत दूर तक लम्बा चल गया था । उसकी चोटी पर सबेरे की धूप ने एक सुनहली लकीर खींच दी थी । जान पड़ता था जैसे किसी बादल के सिरे पर बिजली चमकी हो और चमक कर रह गई हो, गायब न हुई हो । गोपाल ने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था । थोड़ी देर को वह भूल गया कि वह कहाँ है और पहाड़ की चोटी पर सबेरे की यह सुनहली शोभा देखने लगा । वह उड़ता जा रहा था और सबेरे की यह शोभा देखता जा रहा था ।

गोपाल ने सोचा शायद यह हिमालय. है । चमेली का वह गीत उसे याद था –

 

उत्तर में खड़ा हिमालय

बहुत बड़ा है बड़ा हिमालय।

 

बादल उसमें अड़ जाते हैं

मनमाना जल बरसाते हैं।

भारत से जो लड़ने आते

उसे देख कर डर जाते हैं।

 

योद्धा सा है अड़ा हिमालय

उत्तर में है खड़ा हिमालय।

 

कुछ दूर तक वह इस गीत को गाता रहा और मन में सोचता रहा-यह हिमालय बड़ा दयावान होगा । योद्धा लोग बड़े दयावान होते हैं । मेरी मदद यह जरूर करेगा । मैं इससे कहूँगा-हिमालय दादा! नमस्कार!

कुछ जवाब जरूर देगा । शायद कहे-- गोपाल खुश रहो ।.'

रोज खड़ा-खड़ा बहुत दूर तक की चीजें यह देखता रहता है ।' कौन जाने मुझको यह पहचानता हो । सुना है इसके शरीर मैं बड़े-बड़े पेड़ वैसे ही उगे हैं जैसे हमारे शरीर में रोएं होते हैं ।

मैं हिमालय से एक घोड़ा मागूँगा । जरूर दे देगा । उसी पर बैठ कर घर लौटूँगा । अहा हा!

' जैसे सबेरे की धूप से हिमालय हँस रहा था वैसे ही खुशी से गोपाल का चेहरा खिल उठा । उसने पीछे की ओर देखा कि. कितनी दूर उड़ आया हूँ । पर उसे कुछ पता न चला । चारों तरफ हरियाली ही हरियाली उसे दिखाई देती थी । खेतों में

किसान काम कर रहे थे । वे उसे चमेली के गुड्‌डों की तरह दिखाई पड़ते थे । उनके बैल ऐसे जान पड़ते थे मानों सफेद खरगोश के जोड़े हों । सड़कें सफेद लकीर की तरह दिखाई देती थीं और गांव और शहर गुड़ियों की छावनी की तरह जान पड़ते थे । गोपाल मदरसे में सुना करता था कि सूरज पृथ्वी से बहुत बड़ा है पर दूर होने की वजह से इतना छोटा दिखाई पड़ता है । पहले यह बात उसकी समझ में नहीं आती

थी। अब साफ-साफ समझ आने लगी। दूर से चीजें छोटी दिखाई पड़ती हैं।

एकाएक उसके कान में धीमी आवाज आई – देखो-देखो! मेंढ़क उड़ा जा रहा है। शायद कोई कौआ उसे पकड़े है।

गोपाल ने नीचे की ओर देखा। एक गांव में बहुत से लड़के जमा होकर उसकी ओर देखकर चिल्ला रहे थे। गोपाल ने जोर से कहा – मैं मेंढक नहीं हूँ । आदमी हूँ । पर शायद उसकी आवाज किसी ने नहीं सुनी । लड़के तब भी मेंढक-मेंढक चिल्लाते रहे ।

गोपाल के जी में आया कि नीचे जमीन पर कूद पड़े और इन शैतान लड़कों को यह दिखलावे कि वह मेंढक नहीं है । पर फासला ज्यादा था । कहीं ऐसा न हो कि उसकी हड्‌डी पसली तक का पता न चले । बेचारा मन मसोस कर रह गया ।

गुब्बारे की रस्सी पकड़े-पकड़े उसकी मुट्ठियों में दर्द होने लगा । उसकी अँगुलियाँ कटी जा रही थीं । लटके-लटके उसकी बाहों में और कँधों में दर्द होने लगा । अब क्या करे? कब तक इस तरह लटका रहे? अन्त में उसे एक उपाय सूझा । रस्सी में नीचे के सिरे पर एक मोटी सी गांठ लगी थी, गोपाल दोनों पैरों के तालुओं से रस्सी को दबाकर और मुट्‌ठियों को ढीली करके नीचे की ओर खिसकने लगा । खिसकते-खिसकते वह गांठ तक पहुँच गया और उस पर मजे से बैठ गया । फिर उसने दांत से रस्सी को पकड़ कर अपनी अँगुलियों को खोला । अँगुलियों में बड़ा दर्द हो रहा था और वे सीधी नहों हो रही थी । धीरे-धीरे उसका हाथ ठीक हुआ ।

अब गोपाल को भूख मालूम होने लगी । इतनी देर में वह दो बार खा चुकता था । भूख लगने के साथ ही उसे अपनी माँ का ध्यान आया । फिर चमेली का ध्यान आया । वह सोचने लगा--माँ क्या कहती होगी । चमेली घर पहुंची होगी या' नहीं? उसकी आखों में पानी भर आया । वह रोने लगा । क्या वह भूखा-प्यासा बिना अपनी प्यारी माता और बहन को देखे ही मर जायगा? आखिर कहाँ तक उड़ कर जायगा । क्या वह पृथ्वी के सिरे पर पहुँच जायगा मगर नहीं । उसने सोचा कि जमीन गोल है? यह तो हो सकता है कि वह घूम कर फिर वहीं आ जाय जहाँ से उड़ा था । पर इस यात्रा में कितने दिन लगेंगे? कुछ ठिकाना है? गोपाल का चेहरा उदास हो गया ।

गुब्बारा बहुत ऊँचे उठ गया । गोपाल ने जो नीचे की ओर देखा तो उसे डर मालूम हुआ । उसने तुरन्त अपनी आँखें मूँद लीं । आँखें बन्द करके उड़ते-उड़ते उसे नींद आ गई । इस तरह बहुत देर तक वह सोते-सोते उड़ता रहा ।

एकाएक रस्सी से एक झटका लगा और गोपाल की नींद खुल गई । गुब्बारा पहाड़ की चोटी पार कर चुका था और रस्सी एक पेड़ की डाल से उलझ गई थी । गोपाल रस्सी छोड़ कर ऐसा उठने लगा जैसे कोई नींद खुलने पर बिछौने से उठता है । नतीजा यह हुआ कि वह गिर पड़ा और नीचे लुढ़कने लगा । पहाड़ पर कहीं-कहीं झाड़ियों और घासें थीं । गोपाल उनको पकड़ने की कोशिश करता पर पकड़ न सकता । उसका तमाम बदन छिल गया । उसके कपड़े फट गये । अन्त में उसने अपने हाथ-पाँव ढीले कर दिये और लुढ़कते-लुढ़कते वह एक गहरे खड्‌ड में जा गिरा ।

खड्‌ड में घुटने भर पानी था और वह भी बहुत ठंडा । शरीर गरम होने के कारण पहले तो गोपाल को कुछ न जान पड़ा पर बाद को उसे जाड़ा मालूम होने लगा । अब वह करे तो क्या करे? खड्‌ड में से कैसे निकले । बेचारे बालक पर इतनी मुसीबत कभी नहीं पड़ी थी । वह रोने लगा ।

अब शाम हो चुकी थी और आसमान में तारे निकल आये ये । तारों की छाया खड्‌ड के पानी में पड़ रही थी । गोपाल रो रहा था और सर्दी में सिकुड़ रहा था । भूख अलग जोर से .लगी हुई थी'।

अँधेरे में गोपाल इधर-उधर हाथ से टटोलने लगा कि कहीं .सूखी जमीन मिल जाय तो वह उस पर लेटे । एक कोने में उसे ऐसी थोड़ी सी जमीन मिली । गोपाल पानी से निकल कर उसी जमीन पर खड़ा हो गया । और पैर से टटोलने से उसे' एक गुफा सी जान पड़ी । वह फौरन उस गुफा के भीतर घुस गया और आगे बढ़ने लगा । वह गुफा असल में एक सुरंग का द्वार थी । जिसे गोपाल ने टटोल कर मालूम कर लिया । काले कम्बलों की तरह अंधेरा चारों तरफ फटा था । पर गोपाल को यह निश्चय हो चुका था कि इस सुरंग का कहीं न कहीं अन्त जरूर होगा । इससे वह बराबर आगे बढ़ता गया ।

सामने की तरफ कुछ फासले पर गोपाल को उजाला दिखाई पड़ा । कुछ और बढ़ने पर ऐसा जान पड़ा जैसे कोई चिराग जलाकर बैठा हो । आशा से गोपाल का दिल हरा हो गया । उसने अपने आप से कहा-वाह रे गोपाल, तूने फतेह कर लिया । सचमुच सुरंग का खातमा हो गया था और गोपाल एक .हरे-भरे सुन्दर देश में पहुंच गया था । रात में उसे यह नहीं .मालूम हो सका कि यह देश कैसा है । पर इतना पता तो उसे चल ही गया कि जिस देश में वह आ गया है वह एक अजीब देश है । क्योंकि जो रोशनी सुरंग से उसको दिखाई पड़ रही थी उसके पास उसने एक अजीब आदमी को बैठे हुए देखा ।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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रचनाकार: परीदेश की सैर / रोमांचक बाल उपन्यास / श्रीनाथ सिंह
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