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व्यंग्य राग (५) लौटा दो – जल्दी करो / डा. सुरेन्द्र वर्मा

वह सवेरे सवेरे आ धमके | बोले, लौटाया या नहीं, जल्दी करो, वरना बाद में पछताओगे, कहे देता हूँ | मैंने पूछा, किसका क्या लौटाना है भाई ! मैंने न तो कुछ खरीदा जो खराब निकल गया हो और उसे लौटाना पड़े और न किसी का कुछ लिया | न दान लिया न उधार लिया, फिर लौटाने की यह बात कहाँ से आ गई ? हाँ, याद आया | कल एक पैन ज़रूर खरीदा था | लीक कर रहा है | शायद उसी को लौटाने की बात कर रहे हो क्या ? लेकिन इन्हें कैसे पता चला ?

मित्र बोले, भोले मत बनो. दुनिया जानती है और एक तुम हो जिसे मालुम ही नहीं | सिर्फ दान और उधार या खरीदा माल ही नहीं लौटाया जाता, सम्मान और पुरस्कार भी लौटाया जा सकता है | वह भी तो दान या भिक्षा की तरह ही दिया जाता है | साहित्य अकादमी का सम्मान तो लिया होगा, उसी को लौटाना है | कितनों को तो मिल गया | तुम्हें नहीं मिला? जब बंट रहा था, तुम कहां थे ? उसे लेने की दौड़ में तुम दौड़े थे या नहीं ? बस, तुममें यही खराबी है, दौड़ में हमेशा पीछे रह जाते हो| जब बांटा जा रहा था तो पीछे रह गए |अब जब लौटाया जा रहा है तो भी पीछे रह गए |

नहीं भाई मैंने अकादमी का कोई पुरस्कार लिया ही नहीं है, न ही मुझे मिला | तो लौटाने का प्रश्न ही कहाँ उठाता है ?

अरे इतने साल हो गए कलम घिसते हुए, तुम्हें अभी तक कोई पुरस्कार ही नहीं मिला. जब कालेज स्कूल में पढ़ते थे तब तो कोई न कोई पुरस्कार मिला होगा, कुछ नहीं तो अकादमी का समझ कर उसी को लौटा दो. जल्दी करो, समय निकला जा रहा है. फिर मत कहना कि मैनें तुम्हें आगाह नहीं किया | यही समय है जब लोहा गरम है | फायदा उठा लो. शहीद हो जाओगे | लेखन की आजादी के झंडाबरदार बन जाओगे | स्वतन्त्रता सेनानियों में तुम्हारा नाम दर्ज हो जाएगा | तुम लेखनी की स्वतंत्रता के लिए इतना सा बलिदान नहीं कर सकते कि अपना कोई भूला-बिसरा पुरस्कार लौटा सको | लौटाओगे तो कम से कम लोगों को पता तो चलेगा कि तुम्हें भी कभी एक पुरस्कार मिला था. वह अँधेरे में गुम हुआ सम्मान दुबारा प्रकाश में आ जाएगा | खुद ही देख लो | साहित्य अकादमी का सम्मान लौटाने वालों में कितने ही ऐसे थे जो गुमनामी का जीवन जी रहे थे, लौटाते ही अब फिर लाइम-लाईट में आ गए. तुम भी आ जाओगे. लौटाओ, जल्दी करो.

मैं अपना सर खुजलाने लगा. सोचने लगा मुझे कब, कहाँ, कौन सा पुरस्कार मिला था. याद ही नहीं आ रहा था. कुछ देर बाद, कुछ कुछ याद आया कि शायद जब मैं नवीं कशा में पढ़ता था तो स्कूल की मैगजीन में मेरी एक कविता छपी थी जिसे छपने वाली रचनाओं में प्रथम पुरस्कार मिला था. लेकिन मेरी मूर्खता देखिए कि उस पुरस्कार का प्रमाणपत्र मैंने सहेज कर नहीं रखा. मैंगज़ीन तो शायद कहीं पडी भी हो. लेकिन पुरस्कार का प्रमाण पत्र यदि कहीं मिल भी जाए तो उसे लौटाऊँगा कहाँ. सुनते हैं उस स्कूल का तो नाम ही बदल गया है.

क्या सोच रहे हो ? मेरे मित्र ने मेरे सोच में शायद जानबूझ कर बाधा डालने की कोशिश की | बोला, सुना नहीं, मैं क्या कह रहा हूँ- कोई पुरस्कार मिला हो तो लौटा दो. और शीघ्रता करो. कहीं ऐसा न हो कि अकादमी का नाम ही बदल जाए और तुम टापते रह जाओ. ज्यादह सोचना खतरनाक होता है. इससे पहले कि कोई परिवर्तन हो, जिस अकादमी से पुरस्कार मिला है, उसी को लौटा दो. तुम्हें अच्छा खासा प्रचार मिल जाएगा, नाम हो जाएगा. दुनिया नाम के लिए क्या नहीं करती !

मुझे सचमुच बड़ा अफ़सोस है कि मैं सिर्फ कलम ही घिसता रहा और पुरस्कार / सम्मान के लिए अधिकारियों की चरण वन्दना से चूक गया | नहीं तो आज भी मेरा नाम उन महान जुगाडू साहित्यकारों में होता जिनका शुमार पुरस्कार जुगाड़ने वालों में ही नहीं पुरस्कार लौटाकर शहीद होने वालों में भी लिया जाता है|

-सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी ,१, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

ब्लॉग, surendraverma389.blogspot.in

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