रविवार, 29 मई 2016

व्यंग्य-राग (७) अथ मूर्ख नामा डा. सुरेन्द्र वर्मा

दुनिया मूर्खों से भरी पड़ी है | एक ढूँढो हज़ार मिलते हैं | कुछ अक्लमंद लोग मूर्खों से इतना परहेज़ करते हैं कि वे उनकी शक्ल नहीं तक नहीं देखना चाहते | ऐसे लोगों को एक महामूर्ख ने कहा है कि उन्हें अपने को किसी अकेली अंधी कोठारी में बंद कर लेना चाहिए | बल्कि उन्हें तो अपना आईना तक फोड़ देना चाहिए |

ऐसा नहीं है कि बुद्धिमान लोग मूर्खता नहीं करते | लेकिन वे बस, शुरू शुरू में ही मूर्खता करते हैं | बाद में संभल जाते हैं | किन्तु बाद में जब वे मूर्खता करते हैं तो वह छोटी-मोटी मूर्खता नहीं होती | वह हिमालयी- मूर्खता होती है |

किसी बड़े पद पर यदि कोई मूर्ख बैठा दिया जाता है तो एक पहाड़ पर बैठे इंसान की तरह उसे नीचे सब लोग बौने दिखाई देने लगते हैं | और मज़ा यह है कि नीचे के लोगों को वह भी बौना ही दीखता है !

हमारा प्रजातंत्र जनता का राज है | ज़ाहिर है, जनता में बुद्धिमानों की बजाय अधिकतर लोग मूर्ख ही होते हैं | और बुद्धिमान भी मूर्खता करने से बाज़ नहीं आते | हम मूर्खों में से ही अपना नेता चुनते हैं और बाद में खुद ही रोते हैं कि हम बड़े मूर्ख हैं जो ऐसा नेता चुन लिया | ऐसी गलती न करने की हम कसम खाते हैं लेकिन बार बार यही गलती कर बैठते हैं, क्या किया जाए, मूर्ख जो ठहरे | हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम अपने को मूर्ख बनाएं, लेकिन दूसरों को मूर्ख बनाने में हम खुद ही बन बैठते हैं |

एक मूर्ख और एक धूर्त में फर्क करना बड़ा कठिन होता है | जो वास्तव में मूर्ख है वह सच्चा मूर्ख होता है, धूर्त नहीं होता | वह कभी धूर्त बनने की कोशिश करे तो भी मूर्ख ही बन जाता है | मुश्किल तब आती है कि जब एक धूर्त अपनी धूर्तता कारगर करने के लिए एक मूर्ख का सफल अभिनय करने लगता है और लोग,जो कि अधिकतर मूर्ख ही होते हैं, उसके जाल में फंस जाते हैं | धूर्तों की सफलता मूर्खों पर ही आश्रित है | मुझे हमेशा मूर्खों से डर बना रहता है क्योंकि मैं कभी स्वयं को आश्वस्त नहीं कर पाता कि सामनेवाला मूर्ख है या धूर्त |

मूर्खों का भी एक प्ररूप-शास्त्र (टाइपोलाजी) है | सभी मूर्ख एक ही कोटि के नहीं होते | मूर्खता में वे भी कम और अधिक होते हैं | मूर्खता की मात्रा में अंतर रहता है | हर मूर्ख को अपनी प्रशंसा के लिए कोई न कोई उससे थोड़ा अधिक मूर्ख मिल ही जाता है | शायद शेक्सपियर ने ही महानता के बारे में कहा था कि कुछ लोग जन्म से महान होते हैं, कुछ महान बना दिए जाते हैं, और कुछों पर महानता थोप दी जाती है | वस्तुत: वह महानता के बारे में नहीं, मूर्खता के बारे में यह बयान देना चाह रहा था | लोक-लाज से बेचारा कह नहीं पाया | वरना लोग उसे ही मूर्खों की किसी न किसी कोटि में डाल ही देते |

आदमी मूर्ख पैदा हुआ है और ताउम्र मूर्ख ही बना रहता है | बच्चों की मूर्खताएं बचपना कहलाती हैं, जवानी की मुर्खता दीवानगी होती है (गधा-पचीसी) | और बुढापे की नासमझी तो मूर्खता से भी गई-बीती है| मेरा पोता मोबाइल हाथ में लिए मुझसे कह रहा था, बाबा आप तो समझते ही नहीं हैं ! मैंने कहा, तुम ठीक कह रहे हो | जब मैं बच्चा था, मेरे पिता मुझसे कहते थे, इतनी बार बताया तू समझता क्यूँ नही है | बड़ा हुआ तो यही जुमलेबाजी मुझे अपने स्कूल और कालेज के अध्यापकों से सुननी पड़ती थी | विवाह के बाद पत्नी ने मुझे समझाने में कोई कोर-कसर नहीं रखी | पर मैं मूर्ख का मूर्ख | अब मेरा बेटा और मेरे बेटे का बेटा कहता है, आप समझते क्यों नहीं बाबा ! हम तो जन्मजात और ताउम्र मूर्ख ही ठहरे, समझें कैसे?

एक अप्रेल करीब है | करीब क्या, बस आ ही गया समझो | क्या आपने मूर्ख दिवस के लिए तय्यारी कर ली है? दूसरों की मूर्खताओं पर हंसने की नहीं | खुद अपनी मूर्खताओं पर हंसने की तय्यारी ! दरअसल हम हर चीज़ में इतनी अधिक समझदारी बरतने लगे हैं कि यही समझ नहीं पाते कि हम मूर्खता कर रहे हैं | अभी पिछले मूर्ख दिवस की बात है | एक कार बनाने वाली कम्पनी ने ३१ मार्च को घोषणा की कि कल जो भी आफिस-कर्मचारी आफिस की बजाय सबसे पहले कार्यालय में अपनी हाजिरी लगाने पहुंचेगा उसे पुरानी कार के बदले कम्पनी एक नई कार देगी | हर किसी के समझदार मन ने कहा की कम्पनी अप्रेल-फूल बना रही है | लेकिन एक कर्मचारी मूर्ख बनने के खतरे को जानते हुए भी सच जानने के लिए कम्पनी के आफिस पहुँच गया और उसे कम्पनी की नई कार मिल गई !

स्वयं को हमेशा सही समझना सबसे बड़ी मूर्खता है | लेकिन स्वयं को हमेशा बेवकूफ समझना भी कम मूर्खता नहीं है | सुकरात ने एक बार कहा था, जो जानकार है और समझता है कि वह जानकार है वही वस्तुत: समझदार है | ज़ाहिर है, इसका विलोम, जो नहीं जानता और समझता है कि वह जानता है सर्वाधिक मूर्ख है | मूर्ख बेचारा अपनी मूर्खता देख नहीं पाता | लोगों को उसे कहना पड़ता है कि तुम मूर्ख हो, लेकिन वह अपने कान भी तो नहीं देख पाता ! पर असली मुद्दा तो यह है कि क्या कोई ऐसा है जो अपना कान देख सके ? यही वजह है कि हर कोई एक दूसरे को ही मूर्ख बताता है |

- सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद (उ.प्र.)-211001

मो. ९६२१२२२७७८

ब्लॉग – surendraverma389.blogspot.in

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------