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हिंदी में हाइकु (१४) स्त्री, स्मृति और प्रकृति / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

बिलब-पत्र

हिंदी में हाइकु (१४) स्त्री, स्मृति और प्रकृति

डा. सुरेन्द्र वर्मा

उर्मिला कौल एक जानी-मानी हाइकुकार हैं. (अब स्मृति शेष) वह सन ७७-७८ से लगातार हाइकु रचनाएं कर रही हैं. उनकी इन रचनाओं में जीवन और जगत के अनुभव, यथार्थ और सौन्दर्य के चित्र शब्द-बद्ध हैं. <बिल्ब पत्र> (हिमजा प्रकाशन, आरा, २००४) में उनके १९९० से २००१ तक के हाइकु संग्रहीत हैं. इस कृति में उन्होंने ७० शीर्षकों के अंतर्गत लगभग १००० हाइकु प्रस्तुत किए हैं.

पुस्तक का शीर्षक ‘बिल्ब पत्र’ अपने आप में बड़ा सार्थक है. हिन्दी मुहावरे में ‘ढाक के तीन पात’ वाला बिल्ब पत्र भी इसी तरह तीन तीन पत्तियों से निर्मित एक पत्र संघात है. यही बिल्ब पत्र उर्मिला कौल के संग्रह में हाइकु का प्रतिनिधित्व करता है. हाइकु में भी तीन पंक्तियाँ होती हैं. जिस तरह बिल्ब पत्र प्रकृति और अध्यात्म से जुड़ा है, उसी तरह जापान में काइकू भी मुख्यत: प्रकृति और आध्यात्मिक साधना से जुडी एक काव्य विधा है. किन्तु ‘बिल्ब पत्र’ में संग्रहीत हाइकु अपनी पृष्ठभूमि और विषय को लेकर पूरी तरह भारतीय परिवेश में रचे-बसे हाइकु हैं. इनमें अनेकों हाइकु व्यक्तिगत अनुभूतियों से जुड़े हैं, लेकिन वे भी ‘निजी’ न होकर स्त्री की सार्वजनिक पीड़ा और उसकी कुचली-दबी महत्वाकांक्षाओं को वाणीं देते हैं. अपनी तमाम स्वतन्त्र हाइकु-रचनाओं में श्रीमती कौल ने एक विषय या विचार को ही हाइकु की विषय-सामग्री नहीं बनाया है. वह सामाजिक दशाओं पर टिप्पणियाँ हैं तो कहीं अपसंस्कृति पर चोट करती रचनाएं हैं. साथ ही साथ प्रकृति और दर्शन से भी वे परहेज़ नहीं करतीं. इसका मुख्य कारण यह है की वह अपने परिवेश से कटकर संसार में नहीं रहतीं. किन्तु वह जितनी ही बहिर्मुखी हैं उतनी ही अंतर्मुखी भी. वे विगत की अपनी भली-बुरी स्मृतियों को खंगालती हैं और अपनी रचनाओं में उन्हें ससम्मान स्थान देती हैं. वस्तुत: यह पूरा हाइकु-संग्रह एक तरह से स्त्री, स्मृति और प्रकृति केन्द्रित ही कहा जाएगा.

यों तो श्रीमती कौल ने अन्य अनेक साहित्यिक विधाओं में स्वयं को अभिव्यक्त किया है लेकिन वह जितना हाइकु रचनाओं में रचा बसा अनुभव करती हैं और विधाओं में उतना नहीं. वह कहती हैं –

हाइकु संग

रहते रहते मैं

बनी हाइकु *

उर्मिला कौल उन स्त्रियों में नहीं हैं जो अपनी अस्मिता खोकर ज़िंदगी से समझौता कर लें, लेकिन उन्हें यह देखकर बड़ा दुःख होता है कि नारी की खुद्दारी समाज को गवारा नहीं है. वह सीधे-सीधे पूछती हैं कि जब

खुदा खुद ही

खुद्दार है तो खुद्दारी

मेरी खता क्यों *

यह समाज बेशक एक खुद्दार औरत को आराम से जीने नहीं देता और एक संवेदनशील स्त्री के लिए यह बात बहुत दुखदाई है. यही कारण है कि उर्मिला जी वेदना और निराशा में डूबते-उतराते सहज ही कुछ ऐसे हाइकु लिख डालती हैं –

जितना छुआ

उतना बिखरी मैं

रेत का घर *

रेगज़ार में

टुप से गिरा आंसू

और वो मैं थी *

छूते ही टूटा

बुलबुला, हाय वो

मेरा दिल था *

उडी पतंग

हां वो काटा, थी वो

मेरी उमंग *

उर्मिला जी के हाइकु-संसार में स्त्री की पीड़ा बड़ी शिद्दत से उभरी है. उन्हें लगता है कि बचपन से लेकर वार्धक्य तक नारी को जैसे सुख नसीब ही नहीं है –

फ्राक से साड़ी

साड़ी से कफ़न रे

नारी जीवन *

मोमबत्ती की

पिघलती काया रे

मेरा जीवन *

अपने पति के निधन पर वह अपने को बेहद अकेली और बेबस महसूस करने लगीं. वह सोचने लगीं कि जीर्ण तन और मन लेकर वह अकेली कितने डग चल सकेंगीं? क्या हिमालय जिसकी गोद में उनका मायका है उनका सूना ललाट देखकर पूछेगा नहीं, तेरी बिंदिया कहाँ गई? अपने पिता के घर वह अब कैसे जावेंगीं? ये भावनाएं उन्हें सहज ही उद्वेलित करती हैं.

जीर्ण तन में

जीर्ण मन एकल

कितने डग ? *

वतन भेजा

सुहाग सहित कैसे

लौटूं अकेली ? *

सूना ललाट

हिमालय पूछेगा

बिंदिया कहाँ? *

केवल स्मृतियाँ ही साथ देतीं है ओर वे ही सांत्वना प्रदान करती हैं. कवियित्री यादों के मोती पिरोती है और समझ नहीं पाती मोतियों की यह माला किसे दी जाए?

यादों के मोती

चली पिरोती सुई

हार किसे दूँ? *

इस सन्दर्भ में उर्मिला जी के काव्य में ‘कांगड़ी’, जिसे पहाडी महिलाएं अपने ह्रदय के पास रखकर ठिठुरती सर्दी में अपने तन को सेंकती हैं, बार बार नमूदार हो जाती है.

ठिठुरा तन

यादों की कांगड़ी से

सेंकता मन *

बैठी सेंकूँ मैं

यादो भरी कांगड़ी

दिल से लगा *

लापता लगा

सेंकती मैं यादों की

ऊष्म कांगड़ी *

ज़ाहिर है यह दर्द केवल व्यतिगत नहीं है. यह दुःख किसी भी स्त्री का हो सकता है. एक दुखी स्त्री सदैव अपनी स्मृतियों से जुडी रहती है और विगत दिनों की सुखद यादें ही उसके वर्त्तमान में जीने का संबल बनती हैं.

उर्मिला कौल के हाइकु जितने स्त्री और स्मृति से जुड़े हैं, प्रकृति के भी उतने ही वे नज़दीक हैं. कवियित्री ने प्रकृति के कुछ इतने सजीव चित्र खींचे हैं कि मानों कैमरा लेकर कोई उन्हें उतार रहा हो. एक चित्र देखें –

धुली फ्लेश से

नभ ने खींचा फोटो

नहाती भू का *

केवल पावस ऋतु ही नहीं उर्निला जी को बारी बारी से आने वाली प्रकृति की सभी ऋतुएँ प्रिय हैं. शरद में जब सारी धरती ठिठुरती होती है उन्हें लगता है,

ओढ़ सो गयी

शरद की चांदनी

भोली धरती *

इसी तरह हेमंत में जब पीले पत्ते पेड़ों से झड़ने लगते हैं उन्हें वे वृक्षों के श्रवण-पुत्र लगते हैं जो पिता के चरणों में लोट जाते हैं-

श्रमण पुत्र

पैरों पे लोट गए

पिता चरण

वसंत में तो कली के कान में भौंरा के गुनगुनाने की देर है कि वह खिल उठती है.

कली के कान

भौंरा गुनगुनाया

खिल उठी वो *

ग्रीष्म ऋतु में जब सूर्य की तपन से धरती झुलसने लगती है तो रंग भरने के लिए अमलतास की शाखों पर सोने के लटकते कर्ण-फूल इतराने लगते हैं –

स्वर्ण झुमके

शाखें इतरा उठीं

अमलतास *

जब भी प्रकृति की बात होती है प्रेम और परिवेश हमें अपनी तरफ खींचे बगैर नहीं रहता, उर्मिला जी ने पहाड़ों पर कटते वृक्षों से दुखी होकर जो नारी बिम्ब उठाया है, वह अद्भुत है –

उकुदूं बैठे

शर्मसार पहाडी

ढूँढ़ती साड़ी *

एक अन्य हाइकु में वह प्रेम में डूबी स्त्री के लिए कहती हैं, यह स्त्री भला कितनी देर रूठी रह सकती है?

रूठी बैठी है

कोकिला, आम्र बौर

मना ही लेंगे *

प्रकृति आश्वस्त करती है किन्तु मानव समाज अपनी विद्रूपताओं के चलते उर्मिला जी के काव्य में सहज ही व्यंग्य-पात्र बन जाता है. कितनी विडम्बना है कि पहले गुलाम बिका करते थे अब सांसद बिक रहे हैं. किसी के भी मन में गरीब के लिए करुणा शेष नहीं रह गई है. रोज़ रोज़ राजनैतिक रैलियाँ होती हैं और दरिद्रों के पैसे से नेतागण सत्ता के मद में रंगरेलियां मनाते हैं.

दास बिकते

अब बिक रहे हैं

सांसद, हाय *

रैली के रंग

सत्ता की भंग घोटे

गरीब संग *

सामाजिक-राजनैतिक स्थितियां सचमुच शोचनीय हैं और उनकी विसंगतियों को उजागर करने में उर्मिला कौल कोई कोताही नहीं करतीं. इसमें संदेह नहीं कि वह अपनी हाइकु रचनाओं में एक सम्पूर्ण जीवन जीती हैं.

-डा,सुरेन्द्र वर्मा १०, एच आई जी / १,सर्कुलर रोड इलाहाबाद 211001 मो. ९६२१२२२७७८ ब्लॉग- surendraverma389.blogspot.in

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