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शोध व अन्य लघुकथाएँ / दिलीप भाटिया

 

चरित्र


    संस्कार शाला के प्रधान बोले, ''देखिए, हमारे गुरूजी ने यह चरित्र निर्माण की पुस्तक लिखी है, आप को इसी पुस्तक में से बच्चों को समझाना होगा, अलग से अपना ज्ञान नहीं बखानेंगे'' प्रशिक्षु जयन्त ने विनम्रता से कहा, ''श्रीमान चरित्र तो हममें ही नहीं है, मात्र भाषण देने से क्या होगा? मैं तो इन बच्चों की आदतें सही कर पाया, सही रास्ते पर जीवन जीने के नियम बतला पाया, यही बहुत होगा।''

विधवा


    संजना बोली, ''मम्मीजी, करवा चौथ की पूजा करवाइए ना'' मम्मीजी बोली, ''बहू में पूजा में कैसे बैठ सकती हूँ, अपशकुन होगा'' संजना बोली, ''नहीं मम्मीजी, मां मां होती है, न सुहागन, न विधवा, करवा चौथ की पूजा में अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद तो मैं आप से ही लूंगी, पुरानी सोच छोड़िए मम्मीजी, जल्दी आइए पूजा में'' भीगी पलकों से मम्मीजी संजना की पूजा करवा रहीं थीं।

स्नेह


    पांच वर्षीया नन्ही गुड़िया मम्मी से पूछती, ''मम्मी, आशीष अंकल हमेशा मेरे लिए चाकलेट गिफ्ट लेकर आते हैं, मैं उनके लिए क्या कर सकती हूँ?'' मम्मी बोली, ''तुम अभी बहुत छोटी हो, जब बड़ी हो जाए, तब जो मन में हो वह करना'' आशीष अंकल जब भी घर आते, तो कहती, ''अंकल, यहीं पर खाना खाकर ही जाऐंगे, अंकल को खाना खिलाए बिना मैं जाने ही नहीं दूंगी।'' निर्मल स्नेह से आशीष की पलकें भीग जाती थीं।

राखी


    नवम्बर महीने में पाठिका मनीषा दीदी के यहां से जब कैलाश राखी बंधवा कर आया, तो लौटते में दो तीन दिन मनीषा दीदी की मम्मी के यहां भी रूकना था, वे बोली, ''अभी कौन सा राखी का मौसम है?'' कैलाश बोला, ''नानीजी, दीदी की स्नेह ममता प्यार भरी राखी तो मेरे लिए अनमोल आशीर्वाद है'' जब तक राखी का धागा स्वतः ही नहीं गल गया कई महीनों तक कैलाश की कलाई में वह राखी बंधी रही।

तिलक


    पुरूषोत्तमजी बोले, ''संध्या तो आपकी बेटी समान है, परसों हम लड़के वालों के यहां तिलक का दस्तूर लेकर जा रहे हैं, आप तो परिवार के सदस्य समान हैं, चलना ही है।'' राजकिशोर बोले, ''जी, मुझे गरीबों के यहां जाकर रहने खाने के लिए भार नहीं बनना'' पुरूषोत्तम बोले, ''पर उनका तो करोड़ों का व्यापार है, गरीब कैसे?'' राज किशोर बोले, ''इतना होते हुए भी तिलक में 11 लाख रूपए नगद मांग रहे हैं, मांगने वाला गरीब ही होता हैं।''

भामाशाह


    स्कूल कमेटी में वार्षिक उत्सव में मुख्य अतिथि के चयन पर निर्णय हेतु मंथन चल रहा था, ''स्कूल के भामाशाह दान दाता यशपालजी को बुलाते हैं, स्कूल के बच्चों के प्रति उनका स्नेह भी है।'' कमेटी अध्यक्ष बोले, ''नहीं, यशपालजी तो बेवकूफ हैं, वे तो निःस्वार्थ दान हेतु अगले वर्ष फिर आ जाऐंगे, हम तो बिजली घर के प्रबंध निदेशक को बुलाऐंगे, सरकारी फंड से कुछ देने की घोषणा तो कर ही जाऐंगे।''

जीवन


    रेखा नाराज़ थी, ''पिछले महीने ही तो मम्मीजी को आपने खून दिया था, एक महीने बाद ही झूठ बोलकर आज मेरे लिए फिर एक बोतल खून दे दिया, अपना भी तो ख्याल रखों।'' नीहार बोला, ''मेरा ख्याल रखने के लिए तुम दोनों हो ना, मुझे तो मम्मी का भी जीवन बचाना था, तुम्हारा भी, तुम दोनों स्वस्थ रहो, मां की सेवा करना मेरा कर्त्तव्य है, तुम्हें भी स्वस्थ रखना मेरा प्रेम है'' रेखा भीगी पलकें पोंछ रही थी।

शोध


    श्रीवास्तवजी के मित्र सलाह दे रहे थे, ''शोध रिसर्च पी.एच.डी. से क्या मिलेगा? क्यों पैसा लगा रहे हो बेटी की रिसर्च में? नौकरी करवाते'' श्रीवास्तवजी बोले, ''बंधु नौकरी तो कभी भी कर लेगी, पी.एच.डी. की डिग्री तो उम्र भर कभी भी सहायक ही होगी, रिसर्च में लगा पैसा खर्च नहीं, निवेश है, पूंजी है, स्थायी सम्पत्ति है, मुझे गर्व है कि मेरी बेटी डा. मिली से पहचानी जाएगी।'' पापा को सुनकर डा. मिली पलकें पोंछ रही थी।

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दिलीप भाटिया (Dileep Bhatia), रावतभाटा 323307, मो. न. : 09461591498,
ई-मेल : dileepkailash@gmail.com <mailto:dileepkailash@gmail.com>

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