दोहे / अनन्त आलोक

झिलमिल काली ओढ़नी, मुखड़े पर है धूप |
जग सारा मोहित हुआ , तेरा रूप अनूप ||
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कश्मीरी हो सेब ज्यों , हुआ तुम्हारा रूप |
छुअन प्रेमिका सी लगे, ये जाड़े की धूप ||
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रामदुलारी रो रही, चूल्हे पर धर नीर |
बच्चों से कब तक कहे, बेटा धरियो धीर||
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मोटे चावल में मिला , दिया जरा सा नीर |
माँ के हाथों से बनी, बिना दूध की खीर ||
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वासंती रुत आ गई , ले फूलों का हार |
नव यौवन नव यौवना , कर लो आँखें चार ||

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अम्मा को लिख भेज दो , थोड़ी दुआ सलाम |

उसके तन मन को लगे , ज्यों केसर बादाम ||

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बूढ़ी अम्मा रो रही , शहर हो गया गाँव |

ना बरगद का पेड़ है , ना पीपल के छाँव ||

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मामा तेरे खेत में , उगते लाखों लाल |

झिलमिल झीलमिल खेत है, तू भी मालामाल ||

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तन गंगा में धो लिया , धुला न मन का पाप |

मन मंदिर को धो सखा , हो तन निर्मल आप ||

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ईश्वर तेरे नाम से , लगा रहे हैं भोग |

पेट बढ़ाये जा रहे , खाते पीते लोग |१०|

अनन्त आलोक

साहित्यालोक , बायरी डॉ ददाहू

जिला सिरमौर हिमाचल प्रदेश

173022 Email: anantalok1@gmail.com

मोब :9418740772

1 टिप्पणी "दोहे / अनन्त आलोक"

  1. दोहे प्रकाशित करने के लिए ह्रदय से आभार आदरणीय रवि जी , आपका स्नेह सर आँखों पर , स्नेह आशीष बनाये रहिएगा

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