सोमवार, 2 मई 2016

ये तेरी सरकार है पगले / व्यंग्य / सुशील यादव

दुनिया के तमाम पागलों से क्षमा मांगते हुए मै लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। वैसे क्षमा मांगने पर पागलों की क्या प्रतिक्रिया होती है, या हो सकती है कुछ कहा नहीं जा सकता। ये तो भक्त और भगवान के बीच वाला मामला लगता है। भक्त लाख जतन से मांगता है भगवान सुन के अनसुनी कर देता है। कभी-कभी या अक्सर सुनता भी नहीं।

वे लोग सुबह-सुबह मेरी दस बाई दस की खोली में आये। कहने लगे हमें आपकी अगुवाई में ये सरकार गिराने का है। उनके टपोरी लेंग्वेज में ही कुछ तोड़ने-गिराने की बू झलक रही थी।

मैं आत्मसंयत हो के पूछा ,मेरे नेतृत्व में ही क्यों भइ ?न तो मैं विधायक हूँ न आप लोगों का लीडर ....?

नहीं-नहीं ....आपकी छवि जुझारू है ....।

आपने, पिछली सरकार से प्राप्त पुरूस्कारों को लौटाया है

आपको अनशन का तजुर्बा है ....

आप लिखते अच्छा हैं ।

तरह-तरह के बोल फूट रहे थे।

सामान्य लोगों के बीच घिरा होता तो गदगद हो जाता ये शब्द नई कविता की पंक्तियाँ हो जाती जिसके हर लाइन में दाद देने को जी करता , मगर मुझे मालूम था कि मैं निहायत घाघ किस्म के लंम्पटों के बीच फंसा हूँ। मैंने चेहरे के भावों को अपनी सोच के मुताबिक़ बदलने नहीं दिया।

शिष्टाचार के शाल को कंधे पर ठीक से जमाते हुए मैंने कहा ,भाई लोग ,मुझे तफसील से माजरा तो बताओ आखिर आप चुनी हुई अपनी सरकार को गिराने के पीछे क्यूं पड गए ....?

मुझे मालूम था इन धुरंधरों के बीच से इस सवाल का जवाब निकलवा पाना मुश्किल ही नहीं ,नामुमकिन भी है ,फिर भी इस ‘पीवेट’ यानी धुरी में रिवाल्व हुए बिना आगे कैसे बढ़ा जा सकता था। वही वाजिब सा प्रश्न ठोंक दिया।

मैंने सोचा ,वे अगल-बगल देखेंगे, मगर इसके विपरीत वे एक के बाद एक फिर शुरू हो गए ...

-सी एम ने अपने चुनावी वादों में, जनता से वादा किया था कि वे हर नल में पानी इतनी इफरात उगलवायेंगे कि सड़कें-,नालियों में उफान आ जाएगा। लोगों ने एहतियातन नल की टोंटियां खरीद ली थी कि ज्यादा पानी आये तो नाश न हो।

बोर ,ट्यूब वेळ, तालाब-गहरीकरण की योजनायें थी। सब सी एम, दबा के बैठ गए।

मंनरेगा में काम बाटने का वक्त आया तो अपने सगे- समाधी के गावों की तरफदारी में ले गए।

माइनिग ठेके में अपने लोगों को डालने में नहीं चूके

एक्साइज और एंट्री की चुगियों में उंनके सेक्योरिटी वाले तैनात हुए।

ट्रांसफर-पोस्टिंग में रोजगार पाने वालों में , इनके चाटुकारों का बोलबाला रहा

मुझे, उनकी बातों में सी-एम को हटाने जैसा कोई ख़ास एलिमेंट या वजह नजर नहीं आ रहा था सो मैंने कहा ये तो आप पिछले पच्चीस साल के अखबारों को उठा के देख ले,कई सी एम इन्हीं हालात के, इसी तबीयत के पाए जाते रहे हैं ,कोई नई बात है नहीं ....?समय समय पर हम खुद इन सब बातों पर खिचाई करते रहते हैं।

वे लोग कहने लगे, एक ही ढर्रे के लोगों को पिछले दस-सालों से केबिनेट में लिए रहते हैं। वे कहते हैं ये अब हमारे किचन-केबिनेट के पारिवारिक लोग हैं बिना वजह कहाँ डालें भला इन्हें ....?

उनके किचन-केबिनेट के लोग अब बड़े-बड़े आसामियों को हलाल कर तंदूर तक ला- ला के कबाब परोस रहे हैं .....ये तो है ना उनको हटाने की सही वजह जनाब ....?

अब तो आप अगुवाई करंगे .....?

दरअसल हम लोग चाहते हैं, कि एक साल पहले तख्ता-पलट हो। फिर माहौल बने। एक स्वच्छ आदमी का चेहरा अपना अलग मायने रखता है लिहाजा आपके पास आये हैं ।

मुझे अपने स्वच्छ होने का एहसास पहली बार हुआ ,वरना मेरे कमरे में आने के बाद गंदगी-राग के सैकड़ों गीत बीबी गा जाती है। कचरा फेंकने का काम्पीटिशन हो तो इनाम के लालच में मुझे फेंक आये।

वैसे मुझे तुरंत ये अहसास भी हुआ कि, स्वच्छता के मायने, घर -जमीन ,जंगल-दफ्तर, हर जगह अलग-अलग होते हैं। राजनीति में तो और भी जुदा मायने होते हैं।

मैंने प्रगट में कहा ,आप लोग चाहते क्या हैं मुझसे .....?

मुझे ये भी लगा कि अब ज्यादा भाव खाने से बात बिगडनी शुरू हो जायेगी। मेरी स्थिति यूँ थी कि ग्राहक को भाव पसंद न आये तो खिसकने की तैय्यारी कर लेता है तब दूकानवाले को उन्हें उनकी शर्तों पर रोकना पड़ता है।

मेरे भीतर नेत्रित्व के गुण जो आठवीं क्लास की मानिटरशिप के बाद नदारद हो गई थी, जागने लगी। मैंने कहा बताओ क्या प्लान है।

वे लोग, खुल के मुझको पूरे पट्टे सम्हालने नहीं देने वाले थे ...आप बस साथ चलिए, प्लान आप ही आप बनता जाएगा।

वे लोग चले गए।

मुझे रात भर नींद नहीं आई।

रह रह कर मुझको ‘चेतक घोड़ा’, उसका टूटा पैर ,जे ऍन यू. आरक्षण ,देशद्रोह ,मुक़दमे ,जेल न जाने कैसे-कैसे खतरनाक किस्म के सैकड़ों विचार क्यों आसपास मंडराते दीखने लगे .....?

निगेटिव विचारों को पाजेटिव ऊर्जा देने के लिए,मैं खुद ही, विचारों को डाइवर्ट करने के नाम पर. स्वयं को फीता काटते हुए ,बड़ी बड़ी हस्तियों से उनकी समस्याओं का हल देते हुए ,पी एम के बुलावे पर सरकारी पर्सनल फ्लाईट से टेक आफ करते हुए,लाखों पब्लिक को भाषण में देशभक्ति के सीख देते हुए,जैसे सुन्दर मनभावक दृश्यों से लबरेज करने की कोशिश करता रहा।

अब से आगे की दिनचर्या कैसी होगी .....?

जल्दी उठना पड़ेगा ...?मेहनत भी ज्यादा करनी पड़ेगी। स्कूटर-ऑटो से घूमना-फिरना बन्द करना पड़ेगा। वी. आई. पी. बनते ही आम आदमी की कई मुश्किलों का हल यकायक हो जाता है। मसलन रिजर्वेशन, गेस सप्लाई ,जैसी आम आदमी नुमा लाइन में लगना बन्द हो जाएगा ?

दिन के ग्यारह बज गए।

कल के मुलाकातियों में अबतक किसी का अता पता नहीं ....?

हरेक के मोबाइल में ट्राय किया सब के सब बंद मिले।

अंदरुनी घबराहट ,बेचैनी बढी, टी व्ही खोल बैठा।

प्रादेशिक समाचारों में ब्रेकिंग न्यज चल रहा था ,’पुनीत राम’ मंत्री-मंडल का विस्तार...... छह नए केबिनेट मत्रियों को शाम चार बजे गाधी मैदान में पद और गोपनीयता कि शपथ दिलवाई जायेगी। कल वाले ये चेहरे बड़े खुशहाल दिख रहे थे।

मुझे अपने पडौसी कुत्ते पर नाहक क्रोध आया, साला रातो रात तलुए चंट आया होगा ....?

मैंने खिडकी खोल के देखा, बाहर कोई मीडिया वाला ,या खोजी पत्रकार कहलाने वालों में से कोई एक भी नहीं था। रोड तक वीरानी फैली थी।

मै खुद को अल्प समय में, बिना बहुमत के, गिरी हुई सरकार मान कर, अपनी अंतरात्मा को स्तीफा पेश करने में लग गया।

--

 

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

susyadav7@gmail.com ०९४०८८०७४२० :::2.5.16

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