तीन कविताएँ / मधु संधु

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(1)


पितृ सत्ताक के षडयंत्र तो
जन्मघुट्टी में पिला दिए जाते हैं मुझे ।
मैंने की हैं भैया दूज को
तुम्हारे लिए
ढेरों मंगल कामनाएं।

पर्व से शुद्ध मन से रखे हैं
सोमवार के उपवास
तुम्हारे लिए ,
कार्तिक मास के
कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को
करवा चौथ के निर्जला व्रत ।

मैंने किए हैं
पुत्र के लिए शुक्लपक्ष के
आठ मंगलवारों को जिउतिया व्रत,
पौष मास में
पुत्रदा एकादशी व्रत
या
बच्छदुआ पर्व
या
अहोई अष्टमी ।

दुआएं क्या सिर्फ तुम्हें चाहिए
अमरता की
स्वास्थ्य की
ऊंचाइयों की
सातवें आसमान की ।

क्या मेरे लिए कोई
व्रत -त्योहार, उत्सव -पर्व
नहीं
कोई बहन दूज,
कोई एकादशी, अष्टमी, दुआ
की जरूरत नहीं
मुझे लिखना है एक नया धर्म शास्त्र
बहन दूज का त्योहार
मातृ पूजन का उत्सव
पत्नीव्रत का पर्व
पुत्रीकांक्षा कां व्रत
पर
पता नहीं कब ?

 

(2)
मेरे पुरुष
मेरे पति
मेरे परमेश्वर
पूजा की थाली में ज्योति क्यों काली है
औरत की आंखों से कैटेरैक्ट
किस ने, कब ,क्यों, किसलिए उतारी है ।

भारी और तीखी आवाज़ें
बाहुबली की शक्ति
हाथी के पांव को
संस्कारों के कवच को
किसने आ छेदा है
चींटी की लघुता में गुरुत्व किसने सहेजा है।

मेरे बिना जीना
और
मेरे बिना मरना
किसने समझाया है
किसका यह लफड़ा है।

टके टके की गप्पें इन्टलेक्चुअल डिस्कशन थी
सोशल भेडिया रिश्तो की डगर थी
वॉट्सऐप इम्प्रेशन था
सद् सम्पर्क सेशन सा
थकान थी जशन सी
अस्वस्थता चमत्कार सी
सेवा आ जुटती थी
मौजें थी मस्ती थी।

पूजा की थाली में ज्योति क्यों काली है
औरत की आंखो से कैटरैक्ट
किस ने, कब, क्यों, किस लिए उतारी है।

 

(3)
बैक ग्राउंड म्यूजिक की तरह
मन की परतों में निरंतर बजता है
एक उद्घोष
कि मुझे पिता बनना है-
स्पष्टवादी, साहसी और निर्भीक
कर्त्ता होने का सुख भोगना है
अपना साम्राज्य फैलाना है |
माँ बहुत अच्छी है
उसका धैर्य
ज़्यादतियों को झेलने का सहज भाव
उसकी सहनशीलता, लगाव
असहाय मजबूरी में लिपटे त्याग
मेरा आदर्श नहीं बन सकते |
पिता की गरिमा और आत्मगौरव
संचालन सुख और वीतराग
मुझे किसी विकल्प में नही डालते,
मैंने नंगी आँखों से जीवन देखा है
बिना किसी पूर्वाग्रह का चश्मा लगाए
मै कहती हूँ मुझे पिता बनना है |
परम्परा या आदर्शों का पालन
स्व अस्तित्व का जनाजा
स्वीकार नहीं मुझे
आरोपित उद्देश्यों और ठहराव की जड़ता घेरती है |
अशान्त मानसिकता
रिक्तता , अंतहीन शून्य,
खोखलापन
आदर्श और बलिदान के आलौकिक कवच
से छुटकारा पाना है
नए संतुलन खोजने हैं
मुझे पिता बनना है |
सम्बन्धों की मशीनी जिंदगी में
निरीह और हताश
सबको अपनापा देकर
अपने को भुलाने वाली
सजायाफ्ता औरत मुझे नहीं बनना
मुझे पत्नी नहीं
पति का पति बनाना है
भेड़ बकरी नहीं, सिंह बनना है |
मुझे नहीं घुट घुट के जीना
नहीं पालनी अन्तर्मन में गहरी दहशतें
नहीं झेलने सैलाब
मानसिक उलझनें, द्वंद्व
पिता मैं हूँ तुम्हारी आत्मजा
सिर्फ तुम्हारा प्रतिरूप बनना है
मुझे पिता बनना है |


madhu_sd19@yahoo.co.in

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2 टिप्पणियाँ "तीन कविताएँ / मधु संधु"

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