रविवार, 29 मई 2016

सादगी ही असली बाकी सब पाखण्ड - डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

 

आदमी जैसा है वैसा ही दिखता है, जो कुछ अपने पास है वहीं दिखाता है, अपने पास जो हुनर है उसी का प्रदर्शन करता है तभी वह असली इंसान माना जा सकता है। सच्चे इंसान की यही पहचान है। वह दोहरे-तिहरे चरित्र और सैकड़ों मुखौटों का इस्तेमाल करने वाला व्यभिचारी-व्यवहारी नहीं होता।

यह वही इंसान कर सकता है जिसे मनुष्य होने पर गर्व हो तथा इस बात का पूरा और पक्का भान हो कि इंसान के रूप मेंं उसके क्या कर्तव्य हैं, क्या अधिकार हैं तथा भगवान से उसे इंसान का शरीर देकर क्यों पैदा किया है।

यह सहजता और व्यक्तित्व की शुचिता वे ही लोग रख सकते हैं जो कि प्रकृति के करीब हों। सच्चे, अच्छे और श्रेष्ठ इंसान की यही पहचान है कि वह सहज, सरल और सादगी पसंद होता है।

जिन लोगों में सरलता, सहजता और सादगी का अभाव है, वे चाहे अपने आपको कितना ही बड़ा, महान और लोकप्रिय व ईश्वर तुल्य मान लें, एक सामान्य आदमी से भी गए बीते होते हैं।

कारण साफ है कि एक आम इंसान भोला-भाला, शुद्ध हृदय का और निरपेक्ष दिमाग का होता है जबकि जिन लोगों को हम महान, अमर और सार्वभौम सम्राट मानकर पूजते हैं वे लोग पूरी तरह डुप्लीकेट होते हैं जैसे कि चाईना का माल हो। इनकी कोई गारंटी नहीं।

जो मौलिकता लिए हुए हो, जिसमें सादगी हो वही संसार में पूरी मस्ती के साथ मुक्त होकर जी सकता है। जो लोग सादगी से  जितना अधिक दूर रहते हैं वे अपने आत्म तत्व से भी दूर रहते हैं और इस कारण भले ही ये लोग कितने ही मनोहारी, आकर्षक और प्रभावशाली दिखें, लुभावनी पैकिंग मेंं कैद सड़े, बासी और पुराने माल की तरह ही होते हैं।

इन लोगों को जीवन भर अपने बनावटी स्वभाव को बरकरार रखने के लिए बहुरूपियों, स्वाँगियों, मदारियों और जमूरों की तरह बन-ठन कर रहने को विवश रहना पड़ता है।  अपने शरीर और मन-मस्तिष्क पर जाने कितनी सारी मटमैली या शौख चटख रंगों वाली चादरों के आवरण बनाए रखनी की मजबूरी में जीते हैं और यह तक भूल जाते हैं कि वे इंसान भी हैं।

आजकल सादगी गायब होती जा रही है। हर इंसान अपनी औकात से बहुत कुछ आगे बढ़-चढ़ कर दिखना और दिखाना चाहता है इसलिए सादगी का स्थान ले लिया है दिखावों, भोग-विलास के स्थलों, कृत्रिम आनंद देने वाले पात्रों और आडम्बरों ने।

इसमें आदमी का अपनापन और मौलिकता खत्म होती जा रही है और वह मशीनी या कठपुतलिया जिन्दगी जी रहा है।  बिसलरी का पानी चाहिए, आलीशान होटलों का खान-पान चाहिए और जो कुछ चाहिए वह मुफतिया हो। आनंद सारे हमारे पाले में हों और खर्च करें दूसरे।

पराये और बिना मेहनत के पैसों पर मौज उड़ाने का जो शगल चल रहा है वह सादगी को हमसे दूर ही करता जा रहा है। जितना आदमी प्रकृति और सादगी से दूर रहेगा उतना दिखेगा भले अच्छा लेकिन होगा नहीं।

सादगी को अपनाने वाले इंसानों की अखण्ड मौज-मस्ती का आनंद ही कुछ अलग है। इसे वे लोग कभी नहीं जान पाएंगे जिनकी सादगी गिरवी पड़ी है और जो हवाओं में उछालें मार रहे हैं।

जो हवाओं मेंं उड़ कर आसमान की ऊँचाइयां पाने को उतावले हैं उन्हें हवाएं ही ठिकाने लगा देंगी, इनके लिए चिन्तित न हों।

जीवन में आनंद को बरकरार रखना चाहें तो अपने व्यक्तित्व में सादगी को अपनाएं, सहजता और सरलता लाएं तभी जीवन सफल भी है और निरापद भी।

जीने का मजा वही ले पाएगा जो सादगी से भरा होगा। जो सादगी को त्यागेगा वह भटकता ही रहेगा। सादगी छोड़ने वाला हर इंसान चरित्र, नैतिकता, सिद्धान्त, संवेदनशीलता, मानवीयता और अपरिग्रह त्यागने वाला होगा। और इसलिए उसे अपनी मौलिकता में जीने का स्वभाव मिल जाता है। इस कारण से दुनियावी आडम्बरों और दिखावों की उसे कोई जरूरत नहीं पड़ती।

सादगी से ही समाज और ईश्वर को पाया जा सकता है। इसलिए जीवन के हर कर्म और व्यवहार में सादगी को अपनाएं और आजीवन मौज-मस्ती का वरदान पाएं।

---000---

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------