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अनंत प्रेम दो / कविताएँ / अर्जुन सिंह नेगी

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“अनंत प्रेम दो”

मैं अधीर हूँ
शाँत करो
अनंत प्रेम दो
हृदय मे धरो
स्वप्न मे तुम रहो
जीवन मे तुम रहो

मेरी जिव्हा
मेरे नेत्र
मेरे हाथ
और कलम बनो
मेरी कविताओं में
गीतों में
तुम ही रहो
छंद बनो, बंध बनो
अलंकार और श्रृंगार बनो
सजाओ मेरी रचनाएँ
मेरे गीत, गज़लें
और मेरा प्रेम

चमको सितारों की तरह
छाओ घटाओं की तरह
बसा लो
नयनों के काजल में
छुपा लो
अपने आँचल में
बिंदिया, झुमके, कंगन
मुझसे अपना श्रृंगार करो
अधरों की लाली बनाकर
समीप ला दो
अपने मन मंदिर में
मेरी मूरत सजा दो

मैं तरसता हूँ
पागल बरसता हूँ
मेरी बूंदों से स्नान करो
मेरी भावनाओं का
सम्मान करो
तुम देवी हो
कल्याण करो

दूसरी किसी युक्ति से
नहीं युक्त हो सकता हूँ
बस तुम्हारे सान्निध्य से
मैं मुक्त हो सकता हूँ
तुम्हारे हाथों का स्पर्श पाकर
मेरे सब पाप धुल जाएँगे
तुम्हारे हृदय में समाकर
मुझे दोनों लोक मिल जाएंगे
मेरे प्रति उदारता दिखाओ
हृदय में बसाकर
विशालता दिखाओ
छुपा लो दुनिया से
कोई पहचान ना सके
हम एक हो जाएँ
प्रेम में खो जाएँ

 

 

“परमात्मा तुम ही हो”

तुम्हारी मुस्कान
झरने के समान
बहती चली जाती है
पंछियों की भाँति तुम
हवाओं में रहती हो
और
उन्मुक्त होकर
मेरे मन में
आकाश का खुलापन देखकर
उड़ती रहती हो
तनिक अपना आँचल लहराओ
मुझे सुनहरे केश तले सुलाओ
मैं खो जाना चाहता हूँ
प्रेम गंगा में नहाना चाहता हूँ
तुम भी तो मुझे ढूंढती हो
एकांत में बैठकर सोचती हो
मैं जानता हूँ
हृदय से पहचानता हूँ
तुम नदी बनकर
सागर में समाने को आतुर हो
सागर तो सदैव
बांह पसारे रहता है
प्रतीक्षा रहती है उसे
नदी की
तुम बह कर तो देखो
मुझसे कहकर तो देखो
एक हो जाएंगे
नदी और सागर की तरह
खो जाएंगे इक दूजे में
हवा और सुगंध की तरह
तुम मेरी दृष्टि बनना
मैं तुम्हारे पाँव बनूँगा
साथ-साथ चलेंगे
जैसे नदी के संग किनारे

सोना क्या है
तुम सुहागा हो
सोना तुमसे सजता है
हीरा तुम पर मरता है
तुम मेरा श्रृंगार हो
मजबूत आधार हो
सदा हृदय चुराते रहना
प्रेम अनंत लुटाते रहना
मेरा तो अस्तित्व तुम ही हो
देह तुम ही हो
आत्मा तुम ही हो
मेरे प्रेम और
परमात्मा तुम ही हो

                   

 

सिक्कों की खनक


चँद सिक्कों की खनक में
ईमान का स्वर खो रहा है
भ्रष्टाचार की अँधेरी गलियों में
मानव निज घर खो रहा है
नौकरी के लिए पहुँच चाहिए
पैसा भी हाथ में बहुत चाहिए
बेरोजगार इस देश का युवा
स्वाभिमान दर ब दर खो रहा है
कार्यालयों में फाईल दबी है
जन सेवक की जेब ठंडी है
हर एक सरकारी कार्यालय से
सेवा का सफ़र खो रहा है
न्यायालयों में न्याय न मिले
न्यायाधीश बिके तो किस से गिले
तराजू लिए खड़ी है देवी
न्याय उसका मगर खो रहा है
बहुत खेले, अब फिक्सिंग करते
विदेशी मुद्रा में देसी मिक्सिंग करते
खेल भी अब खेल हो गया
भावनाओं का असर खो रहा है
चुनाव में मांगो नेताओं से नोट
जो दे, केवल उसे डालो वोट
संसद में भी नोट चल रहे
संविधान भी आदर खो रहा है
मंदिर कमेटी से कमाई हो रही
भगवन के नाम धन उगाही हो रही
दर्शनों में भी स्वार्थ छिपा है
भक्ति का मंजर खो रहा है
हर क्षेत्र में फैला भ्रष्टाचार है
क्या अर्जुन यही सदाचार है
भौतिकता की इस अंध दौड़ में
भगवान् का डर खो रहा है

                       

अर्जुन सिंह नेगी
कनिष्ठ अभियंता
रामपुर परियोजना (412मे० वाट)
झाकरी १७२२०१

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