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रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1-2 / विक्लव / चन्द्रकिशोर जायसवाल

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चन्द्रकिशोर जायसवाल विक्लव अवध बाबू पावरोटी खरीदने बाजार गये थे। वहाँ उन्होंने दुकान में घुसते ही अपने हेली-मेली शंभुशरण के पोते अमन को देख...

चन्द्रकिशोर जायसवाल

विक्लव

अवध बाबू पावरोटी खरीदने बाजार गये थे। वहाँ उन्होंने दुकान में घुसते ही अपने हेली-मेली शंभुशरण के पोते अमन को देखा जो कुछ खरीदकर बाहर निकल रहा था। अमन उन्हें 'प्रणाम, दादा जी'बोलकर निकला था। जब अवध बाबू दुकान से बाहर निकले, तो फिर उनकी नजर अमन पर पड़ी। अमन उनके करीब आ गया था और बोला, "दादाजी, आपके यहाँ पुलिस भी गयी थी?"

"पुलिस?" अवध बाबू लड़खड़ाये, तो उनकी आवाज भी लड़खड़ा गयी, "नहीं तो। तुम्हें कैसे पता कि पुलिस...?"

"चौक पर जो पान की दुकान है," अमन ने बताया, "वहाँ मैंने दो पुलिस वालों को देखा पान वाले से आपके घर का पता पूछते।"

"पता पूछते!" अवध बाबू बड़बड़ाये और फिर अमन से पूछा, "कब?"

"अभी, एक घंटा पहले।"

"क्या पूछा था पुलिस वाले ने पान वाले से?"

"पूछा था, 'अवध भगत का घर किधर है?"ज्

उसके बाद अवध बाबू ने अमन से कुछ नहीं पूछा, हमेशा की तरह उसके दादा का हाल-चाल भी नहीं, और तेज चाल से अपने घर की ओर चले। कुछ सोचकर वे दस कदम चलकर ही रुके, जेब से मोबाइल फोन निकाला और नंबर मिलाकर पत्नी से पूछा, "वहाँ पुलिस भी आयी है?"

वे फिर घर की ओर चल पड़े, पहले की तरह तेज चाल से।

घर का ग्रील वाला दरवाजा खुला था, मगर कमरे का किवाड़ अन्दर से बन्द था। किवाड़ ठकठकाया उन्होंने। अन्दर से आवाज आयी, "कौन?"

"मैं हूँ; मैं हूँ, लक्ष्मी," अवध बाबू धीरे से बोले।

दरवाजा नहीं खुला; अन्दर से फिर आवाज आयी, "मैं कौन?"

अवध बाबू को अपनी गलती का अहसास हुआ; वे बोले, "मैं चकाचक; चकाचक हूँ, लक्ष्मी।"

'चकाचक'बोलते ही दरवाजा खुल गया।

"पुलिस आने वाली है," कमरे में घुसते हुए वे बोले, "ग्रील में भी ताला लगा दो।"

कमरे के अन्दर आकर उन्होंने हाथ का झोला मेज पर पटका और आलमारी से एक किताब ढूँढ़ निकाली।

अक्सर उस घर में रोज कोई न कोई चीज ढूँढ़ती पड़ती है। बुढ़ापे का ऐसा असर हुआ है उन दोनों ही पति-पत्नी पर कि यह याद ही नहीं रहता कि कौन चीज कहाँ रख दी थी। मगर अवध बाबू अपनी कुछ किताबों के साथ कुछ और भी जरूरत की चीजें ऐसी जगह सँभालकर रखते हैं कि उन्हें ढूँढऩे के पहले कुछ याद करने की जरूरत नहीं पड़ती।

उनके हाथ में एक कानून की किताब थी।

यह किताब उन्होंने पिछली बार ढूँढऩे का कष्ट किये बगैर तब निकाली थी जब पुलिस के वेष में आये कुछ डाकू रात के दस बजे उनके ही मोहल्ले के रतन साह के घर आये थे, किवाड़ खुलवा लिया था और लूटकर चले गये थे। उस वक्त भी उन्होंने किताब अच्छी तरह पढ़ ली थी, मगर अभी उन्हें अच्छी तरह याद नहीं आ रहा था कि क्या-क्या पढ़ा था उसमें और पुलिस के आने के पहले वे अपनी जानकारी शीघ्रातिशीघ्र बिलकुल ताजा कर लेना चाहते थे।

अन्दर आकर पत्नी ने झोला उठाया, उसके अन्दर झाँका और फिर बोली, "सिर्फ पावरोटी देख रही हूँ; दूध नहीं मिला?"

किताब पर निगाह टिकाये ही अवध बाबू ने जवाब दिया, "दूध खरीदने का समय नहीं मिला।"

"समय नहीं मिला!" पत्नी बुदबुदायी, तो अवध बाबू बोले, "हाँ, समय नहीं मिला; मैं पुलिस को देखता कि दूध को?"

पावरोटी खरीदकर चार कदम आगे जाने के लिए समय नहीं मिला! पत्नी ने बतकही से बेहतर माना चुप रह जाना। एक अकेली वह ही तो चाय नहीं पीती, असली तलब तो इन्हें होती है चाय की। अब करते रहिये फरमाइश।

पत्नी जाने के लिए मुड़ी, तो पति ने रोक लिया, "यह जानकारी हर किसी को, तुम्हें भी, होनी चाहिये कि पुलिस से वास्ता पड़े, तो किस समय हमें अपने किस अधिकार का उपयोग करना चाहिये। बैठो, मैं पढक़र सुनाता हूँ।"

"मुझे समय नहीं है बैठने और सुनने का; ढेरों काम हैं।" बोलकर पत्नी चली गयी। पति ने गुस्से से एक बार उसकी ओर देखा और फिर किताब पढऩे में तल्लीन हो गये।

वे किताब तो पढ़ रहे थे, मगर एक बात उन्हें लगातार मथ रही थी कि पुलिस के आने का क्या कारण हो सकता है?

पिछले तीस वर्षों से उन्हें एक थानेदार का यह कथन डराता रहा है कि हर आदमी अपराधी है और कहीं न कहीं, कभी न कभी, कानून को तोड़ता है। उन्हें मालूम भी तो नहीं कि देश में क्या-क्या कानून हैं और कहाँ-कहाँ थानेदार अपना डंडा चला सकता है।

उन्हें याद आया, एक बार बूढ़े को...

उन्हें यह भी याद आ गया कि करीब सात-आठ दिन पहले उन्होंने सडक़ के किनारे खड़े-खड़े पेशाब किया था। जहाँ उन्होंने शाम में पेशाब किया था, वहाँ उन्होंने लोगों को दिन दहाड़े पेशाब करते देखा है। कुछ भी गलत नहीं किया था उन्होंने और बहुत मजबूरी हुई है तभी उन्होंने कभी-कभार सडक़ के किनारे पेशाब किया है; तब नहीं किया है जब सडक़ पर लोगों का आना-जाना हो रहा हो, तब तो बिलकुल नहीं जब कोई महिला आ रही हो। मगर...

मगर पुलिस कह सकती है, "आपको बंगाली मिष्टान्न वाली गली में कल शाम सात बजे बहुत अश्लील तरीके से पेशाब करते देखा गया है।"

"कल शाम?"

"हाँ, गवाह हैं हमारे पास," पुलिस कहेगी, "है आपके पास कोई गवाह जो कहे कि उसने आपको बंगाली मिष्टान्न वाली गली में कल शाम सात बजे पेशाब करते तो देखा है, मगर, कम या बहुत, अश्लील तरीके से पेशाब करते नहीं देखा है?"

गवाह! वे बेचैन हो गये। अभी साल भर भी नहीं हुआ है जब पड़ोसी संतलाल के बेटे ने नाली को लेकर उन पर लाठी चमकायी थी। भयंकर हो-हल्ला हुआ था। सारे मोहल्ले वाले तमाशा देखने आ गये थे। पुलिस बुलानी पड़ी थी। मगर उनकी ओर से कोई गवाही देने को तैयार नहीं हुआ। किसी ने नहीं कहा कि कोई हो-हल्ला भी हुआ है। सबने यही कहा कि कुछ भी नहीं हुआ है, कुछ भी नहीं देखा उन लोगों ने। लोग तो अपने पक्ष में झूठे गवाह ला खड़ा करते हैं, पर उनकी ओर से तो सच्ची गवाही देने वाला भी कोई एक नहीं है इस मोहल्ले में।

उन्होंने अपने को चक्कर खाने से बचा लिया। उन्हें अचानक होश आया कि अभी तो ऐसा कुछ नहीं हुआ है, अभी तो पुलिस आयी तक नहीं है।

किताब पढऩा अचानक बन्द कर उन्होंने अपना मोबाइल फोन निकाला और उसमें कोई नम्बर ढूँढऩे लगे। नम्बर नहीं मिला, तो वे कुछ बेचैन हुए। बेचैनी को रोककर वे अपनी मोबाइल-बही ढूँढऩे लगे इस विश्वास पर कि उसमें नम्बर अवश्य दर्ज होगा। बही नहीं मिली, तो वे रसोई में खटर-पटर कर रही पत्नी के पास जा पहुँचे और उससे पूछा, "तुमने फोन-बही देखी है?"

"नहीं।" पत्नी का छोटा-सा जवाब आया।

"जहाँ रखी हुई थी, वहाँ नहीं मिल रही है?"

"होगी कहीं।"

"कहाँ हो सकती है, बताओ तो," कुछ खीझकर बोले अवध बाबू, "कोई और तो नहीं है घर में इधर-उधर रख देने वाला। कोई चूहा तो नहीं उठा ले गया होगा फोन-बही?"

"घर के तीनों कमरों में फैला रहता है आपका सामान," पत्नी ने बताया, "आप मुझे कभी बताते तो नहीं कि अब आप अपना फलाँ सामान फलाँ कमरे में रखने जा रहे हैं। रख आने के बाद आप बिलकुल भूल जाते हैं कि कहाँ क्या रख दिया। आप तीनों कमरों में ढूँढिय़े; मिल जायेगी किसी ने किसी कमरे में।";

"चलो, तुम ढूँढक़र निकाल दो।"

"मैं अभी नहीं जाऊँगी; काम कर रही हूँ। बाद में ढूँढ़ दूँगी।"

अवध बाबू को पत्नी का यह असहयोग अच्छा नहीं लगा, मगर अभी समय नहीं था उससे तकरार करने का। उन्होंने शान्त और सधे स्वर में पत्नी से कहा, "तुम मेरी बेचैनी समझा करो, लक्ष्मी। हमेशा एक तरह का जवाब मत दिया करो। किताब बोलती है कि थाना-कचहरी के मामले में वकील की सलाह लेनी चाहिये। कानून की जानकारी मुझे है नहीं; न जाने क्या कानून लेकर पुलिस वाले ढूँढ़ रहे हैं मुझे! विपिन बाबू की अचानक याद आ गयी। एक वही वकील है जो मेरा परिचित है और कभी भी बुलाने पर आ सकता है। सोचा, फोन से पता तो कर लूँ कि घर पर हैं या नहीं। इधर बहुत दिनों से मुलाकात भी तो नहीं हुई है। अगर बात हो जाये, तो हाल-चाल पूछकर कुछ इशारा भी कर दूँ कि हमारे घर पुलिस आने वाली है, तो आप भी आ जायें; पुलिस से लोहा कोई वकील ही तो ले सकता है। उनका नम्बर मेरे मोबाइल से कैसे तो गुम हो गया है, मगर मुझे अच्छी तरह याद है कि नम्बर फोन-बही में दर्ज है। फोन-बही मिल नहीं रही है और मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही है। तुम मेरी बेचैनी नहीं समझ रही।"

"इसमें बेचैन हो जाने की क्या बात हुई!" पत्नी बोल गयी, "चार डेग पर तो विपिन बाबू का घर है। जाने में दस मिनट भी लगेंगे क्या? आप ऐसा कीजिये कि उनसे मिल ही आइये। फोन पर कुछ बतियाने से बेहतर होगा जाकर मिल आना। इधर बहुत दिनों से गये भी तो नहीं हैं। आदमी को चाहिये कि अपने लोगों से मिलते-जुलते रहें। कोई क्या सोचेगा कि काम पड़ा तो फोन कर रहा है!"

"अच्छा, भाषण मत दो; जा रहा हूँ।"

जब अवध बाबू बाहर निकलने के लिए तैयार होने लगे, तो पत्नी ने सुनाया, "उधर से दूध भी लेते आइयेगा।"

"दूध भी? उफ्!" इससे अधिक नहीं बुदबुदाये अवध बाबू। घर से निकलने के पहले एक और डर समा गया उनके अन्दर। अगर घर से निकलकर दो डेग चलते ही... "आप अवध भगत हैं न? चलिये थाना।"

यहीं वकील की जरूरत पड़ती है। वह पुलिस वालों को जवाब दे सकता है, "क्यों जायेंगे ये थाना? कोई अदालत का कागज-पत्तर लेकर आये हैं आप? दिखाइये कागज। पहले तो यह बताइये कि आप पुलिस वाले हैं, यह कैसे मानूँ मैं?" कोई अवध भगत या उसके जैसा आदमी इस तरह ऐंठकर बोल सकता है किसी पुलिस वाले से? गुस्से में आकर कुछ और दफे लगा देगा।

बेचारे साहू जी! अच्छा पद है, अच्छी तनख्वाह है और अच्छी इज्जत है। कहीं बाहर गये थे और महीने भर बाद लौटकर घर आये थे। जिस दिन आये उसी दिन उनके दफ्तर के एक चपरासी की मौत $जहर खाने से हुई थी। चपरासी की पत्नी ने पुलिस से कह दिया कि उसके पति का साहू जी के साथ झगड़ा चल रहा था और उसकी मौत में साहू जी का ही हाथ है। पुलिस साहू जी को उनके घर से उठाकर थाना ले गयी, जबकि मोहल्ले में आम चर्चा थी कि चपरासी को उसकी पत्नी ने ही $जहर देकर मारा है।

साहू जी की एक न सुनी गयी और उन्हें थाना में रोक लिया गया। थानेदार ने कौन-कौन दफा लगेगा, यह सब सुना देने के बाद पचीस हजार से अपनी बोली शुरू की और लगातार कहता रहा कि आरक्षी-अधीक्षक कभी भी थाना का निरीक्षण करने आ सकते हैं और तब मामला लाख का बन जायेगा। साहू जी ने बहुत रो-गिड़गिड़ाकर सात हजार में थानेदार को पटाया था और बहुत खुशी-खुशी वापस घर आये थे।

साहू जी थानेदार की धौंस में आ गये; उनके विरुद्ध कोई मामला नहीं बनता था। यहाँ उन्हें वकील साफ बचा लेता। खुद साहू जी ने उनसे कहा था, "मैं घबरा गया था, सर। थाना-कचहरी कोई अच्छी चीज तो है नहीं। उस समय तो यही लगता था कि कोई भी रकम देकर यहाँ से निकलो।"

जिस दिन साहू जी ने अपनी यह कहानी सुनायी थी, उसी दिन उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था, "एक बात गिरह बाँध लो कि अगर कभी पुलिस मुझे थाना ले गयी, तो मुझे छुड़ा ले आने के लिए तुम किसी को एक पैसा भी घूस नहीं देना। मैं गलत करता नहीं, तो फिर किस बात का घूस देना? मुकदमा लड़ लूँगा मैं; दो-चार दिन जेल में रहना भी पड़ गया, तो रह लूँगा।"

अवध बाबू दूध ले आने और विपिन बाबू से मिलने घर से निकले तो, मगर दूध खरीद लेने के बाद जब वे विपिन बाबू के घर की ओर चले, तो मन में कुछ ऐसा खटका हुआ कि सीधे तेज कदमों से घर की ओर चल पड़े। अगर अपराधी रंगे हाथ गिरफ्तार हो रहा हो, तब वकील भी क्या करेगा? थानेदार को पटककर तो नहीं छुड़ा लेगा अपने असामी को?

खटका हुआ और वे रास्ते भर यही सोचते आये कि घूस चटाने का इल्म उन्हें भी होना चाहिये। यह घूस ही तो है कि पैसे वालों की इज्जत बचा रही है। माना कि वे कुछ भी गलत नहीं करते, मगर क्या ठिकाना आदमी कब झूठ-सच में फँस जाये और ऐसा फँस जाये कि बगैर घूस दिये कोई रास्ता ही नहीं मिले मुसीबत से पार पाने का। क्या कहा होगा साहू जी ने थानेदार से?- वे सोचने लगे-कहा होगा, "कितना घूस दे दूँ, थानेदार साहब?" घूस लेन-देन के भी तो'सभ्य'और'असभ्य'तरीके होते होंगे। ऐसा नहीं हो कि वे 'असभ्य' तरीके से पूछ बैठें, "पहले हथकड़ी लगाता हूँ, उसके बाद चाटूँगा घूस।" उन्हें अफसोस हुआ इस बात का कि उन्होंने साहू जी से अच्छी तरह पूछ नहीं लिया था कि थानेदार के साथ घूस की बातचीत कैसे-कैसे शुरू हुई थी और कैसे समाप्त हुई।

पत्नी की बोली-वाणी पर उन्हें कभी भरोसा नहीं रहा। गुस्से में आकर किसी को कुछ सुनाती है वह, तो फिर उसे अपनी औकात का खयाल ही नहीं रहता। उसे यह होश ही नहीं रहता कि हम मामूली, बेसहारे लोग हैं, और हमें सोच-समझकर कुछ बोलना-बकना चाहिये। ऐसा जरूर हुआ है कि कभी-कभी इसकी बोली का अच्छा असर भी हुआ है कि दुश्मन बेदम होकर चुप हो गये हैं, हार मान ली है, मगर अक्सर तो ऐसा हुआ है कि इसकी बोली के कारण उन्हें शर्मिन्दा होना पड़ा है, छोटे लोगों से भी उन्हें क्षमा माँगनी पड़ी है। अभी ही कोई ठीक नहीं कि थानेदार उनके घर पर आ गया हो और उसे देखते ही पत्नी बोल गयी हो, "चले आये घूस चाटने? कोई और दरवाजा नहीं मिला? एक पैसा नहीं मिलेगा इस घर से। अभी भगत जी नहीं हैं घर में। जब रहेंगे तब आइयेगा। जाइये अभी।" इस बोली पर थानेदार को गुस्सा नहीं आयेगा कि अब इस भगत को कमर में रस्सा बाँधकर ही ले जाऊँ?

घर में घुसते ही उन्होंने पत्नी से पूछा, "घर में कोई कुछ रखकर भी गया है?"

"कुछ क्या?" कुछ समझ नहीं पाने के कारण पत्नी ने पूछा।

"कुछ, मतलब कोई मोटरी-गठरी।"

"नहीं।"

"रुपये-पैसे?"

"नहीं," पत्नी बोली, "मगर यह सब आप पूछ क्यों रहे हैं?"

"मान लो, कोई आदमी तुम्हारे पास कोई गठरी रख गया हो। उस गठरी में तो गाँजा, भाँग या पिस्तौल। पुलिस आती है और घर की तलाशी लेती है। पुलिस गठरी पकड़ती है, तो फिर हमें पकड़ेगी या नहीं? मुझे गिरफ्तार कर ले जायेगी या नहीं? तुम लाख कहती रह जाओ कि गठरी तुम्हारी नहीं है, तब भी मानेगी क्या? है हमारे परिचय का कोई ऐसा आदमी जो हमें जेल जाने से बचा ले?"

"कोई अपरिचित कैसे रख जायेगा अपनी गठरी-मोटरी हमारे घर? मैं ही कैसे उसे रखने दूँगी? ऐसा कहीं होता है क्या?"

"कोई परिचित तो कर सकता है ऐसा," अवध बाबू ने सुनाया, "तुम्हारे मायके का ही कोई आदमी आया हो गठरी रखने; नहीं रखने दोगी?"

"क्यों आयेगा मेरे घर गाँजा वाली गठरी रखने? मायके में कोई दुश्मन नहीं है मेरा। जब कभी जाती हूँ, पूरा गाँव उमड़ आता है हाल-चाल पूछने।"

"आदमी मायके का हो या कहीं और का, अब हर कोई अपने मतलब से मतलब रखता है, यह कोई नहीं सोचता कि दूसरे का, फुआ या मौसी का, क्या नुकसान हो सकता है। तुम अपने $जमाने से बाहर निकल ही नहीं रही हो। तुम्हें याद होगा कि तुम्हारी धरमपुर वाली दीदी का बेटा रात के नौ बजे आया था और पचास हजार रुपये तुम्हारे पास रखकर चला गया था। उसका नाम मुझे अब याद नहीं आ रहा।"

"हाँ, श्यामसुन्दर था, रात भर के लिए पैसे रखकर गया था। सुबह तो आ ही गया था अपने पैसे लेने।"

"मैं पैसे नहीं रखता, मगर तुमने मुझे बताया ही तब जब वह पैसे रखकर चला गया था।"

"पैसे रख लिये, तो क्या हो गया?"

"कुछ नहीं हुआ, मगर कुछ भी हो सकता था।"

"क्या हो सकता था?"

"तुमने मुझे बताया था कि तुम्हारा यह श्यामसुन्दर सहरसा के किसी ऐसे गिरोह में है जो गाँजा-भाँग का धंधा करता है।"

"था, अब नहीं है।"

"तब तो था," अवध बाबू गुस्से में आ गये, "जब उसने पैसे रखे थे तुम्हारे पास?"

"हाँ, तब था," पत्नी मिनमिनाकर बोली, "मुझे किसी के धंधे से क्या लेना-देना!"

"कोई लेना-देना नहीं," अवध बाबू ने जवाब दिया, "मगर जब आपके श्यामसुन्दर आपके पास पैसे रख गये, तब लेना-देना हो गया। 'लेना' भी नहीं, 'देना' हो गया।"

"क्या देना हो गया?" पत्नी भडक़ उठी, "रात में तो खाना तक नहीं खाया उसने और सुबह भी मेरी जिद पर चाय पीने भर के लिए रुका वह।"

"रात में खाना तक नहीं खाया वह," अवध बाबू का जवाब था, "मगर मैं तो रात भर बेचैन रहा, सो नहीं पाया रात भर।"

"आप तो इस तरह बोल रहे हैं जैसे कि वह हमसे पचास हजार माँगकर ले गया हो और आप रात भर बेचैन रहे, सो नहीं पाये, कि अब वह पैसे लौटायेगा या नहीं। एक प्याली चाय पीकर गया तो आप बेचैन हो गये कि अब वह परक जायेगा और जब-तब खाना खाने और चाय पीने चला आया करेगा। यह कैसा 'देना' हुआ कि आप बेचैन हो गये, रात भर सो नहीं पाये?"

पत्नी की बातें ध्यानपूर्वक सुनीं अवध बाबू ने, उसे चिढ़ाने के लिए मुस्कुराये और क्षण भर चुप रहकर बोलना प्रारम्भ किया, "यह हो सकता था कि सुबह तुम्हारा श्यामसुन्दर अकेला नहीं आता; उसे हथकड़ी लगाये पुलिस आती हमारे घर; आते ही हमसे पूछती, 'इस शख्स ने आपके पास एक लाख रुपये रखे हैं?' तुम झट बोलती, 'एक लाख नहीं, पचास हजार।' थानेदार अपने साथ आये सिपाहियों को आदेश देता, 'घर की अच्छी तरह तलाशी लो और देखो कि गाँजा-भाँग की कोई गठरी-मोटरी अभी भी तो नहीं है घर में।' और फिर थानेदार मुझसे पूछता, 'सच-सच बताइये, आप कितने साल से हैं इस धन्धे में? आपके चेलाचाटी तो बता रहे हैं कि आप ही गिरोह के सरदार हैं।' और फिर, 'आपने अपनी पत्नी को भी लगा रखा है इस धंधे में?ज्

"ऐसा कुछ नहीं हो सकता था," पत्नी ने घुडक़कर कहा, "ऐसा होता है आपके खाली दिमाग में। कोई काम-धाम तो है नहीं; अलाय बलाय सोचते रहते हैं। सोचते रहिये; मैं चली।"

"रुको," अवध बाबू ने पत्नी को जाने से रोका, "किसी बात को हल्के से मत लो।"

"और कुछ कहना बाकी है क्या?"

"हाँ।"

"तो जल्दी बोलिये," पत्नी उकता गयी थी, "मुझे काम है या नहीं? आपका प्रवचन सुनने का समय नहीं है मेरे पास।"

अवध बाबू ने सुनाया, "हो यह भी सकता था कि उस रात में ही श्यामसुन्दर के जाने के घंटा भर बाद डाकू आते और कहते, 'पचास हजार रुपये निकालो। रुपये अभी तुम्हारे पास जमा हुए हैं।' पिस्तौल दिखाता और पैसे ले जाता।"

"कैसे डाकू आते? कैसे वे जान जाते कि हमारे पास पचास हजार जमा हुए हैं?"

"राम नारायण बाबू के यहाँ क्या हुआ था? भूल गयी क्या? उनकी पत्नी के पास शाम में दस हजार रुपये रखकर गया था उसका भतीजा और रात के बारह बजे डाकू आ गये उस पैसे को लेने।"

"वह तो इसलिए हुआ कि पैसे उसकी एक सहेली के सामने दिये गये थे और उस सहेली ने खबर कर दी अपने एक डाकू भाई को। मुझे किसी ने नहीं देखा था श्यामसुन्दर से पैसा लेते।"

"श्यामसुन्दर गिरोह के अपने ही किसी साथी से कहता, मैं पैसे रखकर आ रहा हूँ, तुम जाकर ले आना। दो बूढ़ा-बूढ़ी हैं, बेहद डरपोक। पिस्तौल दिखाओगे नहीं कि झट पैसे ले आकर रख देंगे तुम्हारे सामने। मैं अपने जमा किये पैसे तो वसूल ही लूँगा।' बोलो, तुम पैसे दे देती या नहीं? जान देती, रामनारायण बाबू की पत्नी ने जान दी थी? झट पैसे निकालकर दे दिये थे।"

"तो क्या अब आदमी किसी अपने का भी भरोसा नहीं करे? किसी अपने के मामले में भी हर घड़ी 'सावधान-सावधान' होता रहे? मैं ऐसी जिन्दगी नहीं जी सकती।"

बोलकर चल पड़ीं लक्ष्मी जी, तो उसके पीछे हो गये अवध बाबू और बोलना चालू रखा, "किसे कहती हो अपना? अब बेटा भी अपना रहा क्या? मैं रोज तुम्हें अखबार पढक़र बेटों के किस्से सुनाता हूँ। तुम्हारे ध्यान में कोई बात आती क्यों नही?"

"अखबार में सिर्फ कपूतों के किस्से छपते हैं, सपूतों के नहीं छपते। कपूतों के किस्से सुन-सुनकर मैं अपना दिमाग खराब नहीं कर सकती।"

"तुम्हारा बेटा सपूत है?"

"हाँ, है; जरूर है।"

"बहुत प्यारा?"

"हाँ, बेटा है तो प्यारा है ही।"

"सारे बेटे शुरू-शुरू में सपूत ही होते हैं और माँ-बाप के बहुत प्यारे, जैसे तुम्हारा बेटा सपूत है और तुम्हें बहुत प्यारा है, मगर नये $जमाने की ज्यों ही हवा लगती है उन्हें, वे कपूत होना शुरू कर देते हैं। ये सब अपने माँ-बाप के बड़े प्यारे होते हैं, मगर बाद का किस्सा क्या होता है? आज बेटे माँ-बाप को बाजार में बेच लेने से भी बाज नहीं आते। मैं तो कहता हूँ कि अब अपने बेटे का भी विश्वास नहीं करो। वह भी अगर कोई गठरी लाकर रखे घर में, तो पूछो कि उसमें क्या है और फिर देख भी लो कि उसमें क्या है।"

"ठीक है, जाइये, देख लूँगी कि गठरी में क्या है।" बोलकर लक्ष्मी जी कोई मर्तबान खोलने लगीं।

अवध बाबू एक क्षण रुककर वहाँ से चले, तो उनके कानों में पत्नी की बुदबुदाहट पड़ी, "हुँह, अब बेटों से भी डरूँ!" वे पत्नी के पास लौट गये और सुनाया, "हाँ, डरो, डरना चाहिये। बेटे से भी डरो। मैं डरूँगा।"

"आप डरते रहिये," पत्नी ने जवाब दिया, "उतने से ही मेरा काम चल जायेगा।"

अवध बाबू को गुस्सा आया कि उनकी बातों का इस अदर््धांगिनी पर कोई असर ही नहीं पड़ रहा। वहाँ से हटने के पहले उन्हें पत्नी को इतना सुना देना अच्छा लगा, "मत डरो। मेरे मरने के बाद सडक़ पर भीख माँगना।" और फिर बड़बड़ाते हुए चले, "औरत साली जात ही ऐसी होती है कि जब तक चोट ना खा जाये, तब तक कुछ सीखने-समझने को तैयार ही नहीं।"

जब अवध बाबू अपने कमरे में लौट आये, तो उन्हें यह सवाल मथने लगा, या कहिये कि इस सवाल को वे मथने लगे, कि क्या उन्हें डरना नहीं चाहिये?

ऐसा कितनी ही बार हुआ है कि किसी आशंका से वे घबरा उठे हैं, उनका दिल जोर-जोर से धडक़ने लगा है, देह में झुरझुरी पैदा हो गयी है, पैर काँपने लगे हैं, मगर बाद में वह आशंका गलत साबित हुई है और उन्होंने अपने आप को खूब धिक्कारा है कि उन्हें इस तरह एक मर्द होकर, एक बुजुर्ग होकर, बच्चों और औरतों की तरह घबराना या डरना नहीं चाहिये। कुछ होता भी तो क्या होता! कोई शूली-फाँसी पर तो नहीं चढ़ा दिया जाता उन्हें।

क्या अभी भी ऐसा कुछ नहीं हो सकता है कि एक बार फिर अपने को धिक्कारने का मौका मिल जाये? हाँ, हो सकता है कि पुलिस किसी और 'अवध' को ढूँढ़ रही हो... अवध सिंह, अवध मंडल, अवध बेलदार, अवध बहरदार, अवध...। यह सोचकर वे कुछ फूले, मगर तभी उनहें अमन का कहा याद आ गया। पुलिस ने स्पष्ट रूप से उनका नाम लिया था; अमन से पूछा था, 'अवध भगत का घर किधर है?' वे अच्छी तरह जानते हैं कि 'अवध भगत' नाम का कोई दूसरा आदमी इस मोहल्ले में नहीं है। अब ऐसा तो नहीं हो सकता कि किसी भगत के घर में हाल-फिलहाल कोई बच्चा पैदा हुआ हो और उनका नाम 'अवध' रखा गया हो, और उसे ही पकडऩे पुलिस आ रही हो, इस दूसरे 'अवध भगत' को पकडऩे।

वे जितना फूले थे, उससे अधिक सिकुड़ गये। पत्नी से यह कह देना तो बहुत आसान था, "तुम किसी को एक पैसा भी घूस नहीं देना। मुकदमा लड़ लूँगा मैं; दो-चार दिन जेल में रहना भी पड़ गया, तो रह लूँगा।" उतना आसान चार दिन जेल में काट लेना है क्या? चार दिनों के बाद तो जेल से उनकी लाश ही निकलेगी।

उन्हें अपने एक मारवाड़ी मित्र के बहनोई का किस्सा याद आ गया। वह गल्ला व्यवसायी था। किसी हेर-फेर के कारण उसे जेल हो गयी थी और जल्दी जमानत पर छूटने की उम्मीद नहीं थी। उनके बेटों को यह जानकारी मिल गयी थी कि जेल में दबंग कैदी सेठ-साहूकार कैदियों की पैसे के लिए मुक्का-थप्पड़ से पिटाई करते रहते हैं। उन्होंने पूरा पता लगाकर दबंग कैदियों को हर महीने पाँच सौ रुपये देने का वादा किया और उनसे वचन लेकर आये कि वे उनके बाप को हल्की-सी चपत भी नहीं लगायेंगे।

उनका अपना बेटा कुछ पता भी लगायेगा, कुछ करना भी चाहेगा, तो लक्ष्मी रोक देगी, "खबरदार, तुम्हारा बाप बोलकर गया है कि हम किसी को एक पैसा भी घूस नहीं देंगे; हम मुकदमा लड़ेंगे।"

उन्हें एक बार फिर इस बात का अफसोस हुआ कि उन्होंने साहू जी से पूछ नहीं लिया था कि थानेदार के साथ घूस की बातचीत कैसे शुरू की थी उन्होंने। पुलिस को घूस चटाने का इल्म हर किसी को होना चाहिये; सुखी, विपदारहित जीवन जीने के लिए इसे आवश्यक मान लिया उन्होंने।

कमरे में बैठकर उन्होंने दिमाग दौड़ाना शुरू किया कि किन कारणों से पुलिस आ सकती है उनके पास। उन्होंने अच्छी तरह याद किया कि हाल-फिलहाल उनका किसी से झगड़ा तो नहीं हुआ है; किसी का दिल तो नहीं दुखाया है उन्होंने। किसी से क्या झगड़ा होगा? वे तो घर से बाहर इतना कम निकलते ही हैं कि किसी से उनकी टक्कर होने से रही। ऐसे भी वे मोहल्ले में एक भला और शांतिप्रिय व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। कभी किसी ने उन्हें ऊँची आवाज में बोलते हुए नहीं देखा होगा। झगड़ा होता है उनका, मगर घर से बाहर नहीं; घर के अन्दर ही पत्नी से। ऐसा झगड़ा कभी नहीं हुआ कि उसे पुलिस के पास जाने की नौबत आये। पुलिस के पास जा तो सकती है वह। एक बार दिपुआ अपनी पत्नी को बेरहमी से लतिया-मुकिया रहा था और उसकी औरत केवल चीख-चिल्ला रही थी, तब लक्ष्मी ने फनफनाते हुए मुझसे कहा था, "कैसी औरत है कि चुपचाप मार सह रही है! मैं रहती तो तुरंत पुलिस के पास चली जाती।"

वह मेरे विरुद्ध शिकायत लेकर पुलिस के पास नहीं जा सकती, मगर उसके विरुद्ध शिकायत लेकर तो दूसरे जा ही सकते हैं पुलिस के पास। वह किसी से भी झगड़ सकती है, किसी भी बात पर झगड़ सकती है। उन्हें तो कभी-कभी पता भी नहीं चलता कि किसी के साथ झगड़ा हुआ है उसका।

वे उठे और पत्नी के पास जा पहुँचे, "इधर हाल-फिलहाल किसी के साथ तुम्हारा झगड़ा भी हुआ है?"

"नहीं," पत्नी ने झट जवाब दे दिया, "नहीं हुआ है झगड़ा।"

"इस तरह मत बोलो," अवध बाबू ने पूरी गम्भीरता बरती, "सोचकर बोलो, याद करो, किसी के साथ...।"

"अच्छी तरह याद है, नहीं हुआ है किसी से झगड़ा। मैं क्या झगड़ालू औरत हूँ कि झगड़ती फिरती हूँ?"

"झगड़ालू तो हो।"

"कैसे?"

"आज तक मुझे जितनी परेशानियाँ हुई हैं, अधिकांश तुम्हारे झगड़ों के कारण हुई हैं।"

"पुलिस भी मेरे कारण आ रही है?"

"हो सकता है।"

"किसी के साथ झगड़ा नहीं हुआ है, तब भी?"

अवध बाबू गुस्से में आ गये, "हाल-फिलहाल नहीं हुआ है, मगर कभी नहीं हुआ है क्या? पिछले चालीस सालों में बीता है कोई ऐसा साल जिसमें तुम्हारा किसी के साथ झगड़ा नहीं हुआ हो?"

"चालीस साल पीछे तक चले गये?"

"हाँ, हर साल दो-चार बार तुम दहाडक़र आयी हो और मुझे मिमियाकर क्षमा माँगनी पड़ी है। तुम्हें किसी के दो बोल बरदाश्त ही नहीं होते। कोई एक सुनाता है, तुम चार सुनाकर ही चुप होती हो। झगड़ते हुए तुम्हें जरा भी होश नहीं रहता कि उसका क्या परिणाम हो सकता है। जरूरी नहीं है कि हर बार मेरे मिमियाने का असर हो ही गया हो। क्या पता, कब किसने क्या कसम खायी, कब किसने मुझे नेस्तनाबूद करने का प्रण ठान लिया और उसे आज अपना प्रण पूरा करने का अवसर मिल गया हो। कोई भाँजा-भतीजा ही पुलिस की नौकरी में आ गया हो और फिर उसकी मदद में। पुलिस के पास तो सौ उपाय होते हैं किसी को भी फँसाने के। भाँजा-भतीजा ने जवाब दिया होगा, 'यह तो मेरे बायें हाथ का खेल है, मामा या चाचा।"ज्

"आपका मतलब है कि चालीस साल पहले मैं दहाड़ी थी और चालीस साल बाद आज आपको पुलिस पकडऩे आ रही है?"

"हो सकता है, हो सकता है ऐसा।"

"नहीं हो सकता।"

"तुम टोले-महल्ले की खबर तो रखती हो, मगर देश-दुनिया की खबर तुम्हारे पल्ले नहीं पड़ती," अवध बाबू बेलूरी पत्नी को होशियार बनाने बनाने की मुद्रा में आ गये, "मैंने एक कहानी पढ़ी थी, पचीस साल से अपने पति के साथ रह रही एक औरत ने घर में पड़ी तलवार से अपने पति को ही काट डाला था जब उसके पति ने उसे सुनाया कि पचीस साल पहले उसने ही उसके प्रेमी लौंडे की हत्या कर डाली थी। यह तो कहानी की बात हुई, अब एक इस इलाके की घटना सुना दूँ। रामनगर मेला में कुश्ती देख रहे लक्ष्मीपुर के एक बच्चे को युवा आयोजक ने थप्पड़ मार दिया था। पूरे बाईस साल बाद जवान हो चुके उस बच्चे ने बूढ़े हो चुके उस आयोजक को अपने गाँव लक्ष्मीपुर में घोड़े से जाते हुए देखा और घोड़ा रोक लिया। घोड़े से उसे उतारकर एक थप्पड़ मारा और बोला, 'अब जाओ।' अब बोलो, ऐसा क्यों हुआ, पचीस साल बाद, बाईस साल बाद? आदमी का दबा हुआ गुस्सा कब फूट पड़े, इसका कोई ठीक नहीं। तुम्हारा ध्यान किसी के गुस्से पर कभी नहीं जाता होगा, मगर मेरा ध्यान इस बात पर जाता है कि कौन कितने गुस्से में है और कब तक वह इस गुस्से की आग में जलता रह सकता है। केवल ध्यान ही नहीं जाता, बहुत सावधान भी रहता हूँ मैं। तुम्हें याद होगा कि उसके साथ मेरी कैसी लड़ाई हुई थी। मेरा प्रिय छात्र था वह और मेरे ही विरुद्ध उठ खड़ा हुआ, पिस्तौल तान दी थी मेरे ऊपर। अपनी गन्दी हरकतों के कारण उसे कितना $जलील होना पड़ा था। मैंने उसके विरुद्ध पुलिस तक को रिपोर्ट कर दी और फिर उसके बाप को खबर भेज दी। क्या तुम समझती हो कि उसके दिल में बदला लेने का खयाल नहीं आया होगा? समझती हो कि बदले की आग भडक़ी होगी और महीने-दो महीने में बुझ गयी होगी? हो सकता है आग बुझ गयी हो और यह भी हो सकता है कि वह आग कभी बुझे ही नहीं। वह दो बार मुझसे क्षमा माँगकर गया था, मगर तीन साल बाद ही अपनी शादी में शरीक होने के लिए निमंत्रण देने आ गया और मैंने हाँ तो भर दी, मगर गया नहीं लगभग बीस वर्षों के बाद वह मुझे पटना में मिला था। अच्छी नौकरी और अच्छी कमाई कर रहा था वह। जिद कर बैठा कि मैं उसके आवास पर चलूँ। मैं बहाना बनाकर निकल गया। मैं उसके घर जाता भला! मुझसे बदला लेने के लिए उसे उससे अच्छी जगह मिलती क्या? हाथ-गोड़ तोडक़र ही छोड़ देने का खतरा उठाता क्या? मेरा अन्त कर ही मानता। तुम किसी दुश्मन के दिल में नहीं झाँक सकती, मगर मैं झाँककर देख सकता हूँ कि उसके दिल में आग सुलग रही है या नहीं और कभी सुलगी थी तो कब तक धधकती रहेगी। इसीलिए तुमसे कहता हूँ कि सदा सावधान रहा करो। संकट घंटी बजाकर नहीं आता।"

"मैं घर के अन्दर रहती हूँ और बहुत सावधान रहती हूँ कि कोई बिल्ली आकर दूध न पी जाये, दाल में गिरगिट न गिर जाये, तरकारी जल न जाये। इससे अधिक सावधान रहने की मुझे जरूरत नहीं है। आप रहा कीजिये सावधान, चौबीसों घंटे सावधान।"

"मगर मेरी तरह तुम सावधान नहीं रहोगी?"

"नहीं रह सकती," पत्नी ने जवाब दिया, "मेरे लिए सम्भव नहीं है कि बीते चालीस साल के एक-एक झगड़े की पड़ताल करूं कि कब किसमें कैसा और कितना गुस्सा पैदा हुआ होगा और मैं किस पुराने चेहरे को देखते ही झट घर में बन्द हो जाऊँ।"

"एक बात जान लो," जाते-जाते बूढ़े अवध भगत ने पत्नी को सुनाया, "जो विशुद्ध मेरा दुश्मन होगा वह भी पहले तुम पर ही वार करेगा यह सोचकर कि अगर बुढिय़ा मर गयी तब तो बूढ़ा साल भर के अन्दर 'हर्ट अटैक' से आप ही मर जायेगा, और अगर साल भर बाद भी जिन्दा रह गया तो शेष सारी उमर चूल्हा-चौका करेगा और बुढिय़ा को गालियाँ देते हुए घुट-घुटकर मरेगा।"

"ठीक है, मैं मरने के लिए तैयार हूँ, आप अभी से गालियाँ सुनाने के लिए तैयारी कर लीजिये।" बुढिय़ा ने भी सुना दिया।

अपने कमरे में घुसने से पहले अवध बाबू कुछ इस तरह बुदबुदाये कि उनका कहा पत्नी के कानों में भी घुस जाये, "साली औरत जात होती ही है ऐसी कि जब तक चोट नहीं खा जाये तब तक चौकस-चौकन्नी हो ही नहीं सकती।"

पत्नी ने बुदबुदाकर भी कोई जवाब नहीं दिया, तो अवध बाबू अपनी इस हेठी से अत्यन्त आहत हो गये।

कहीं पढ़ा था या किसी से सुना था कि हर व्यक्ति के जीवन में कम-से-कम एक बार कोई एक महासंकट आता है जो, अगर बचने की राह नहीं निकाल पाये तो, उसे मटियामेट तक कर सकता है। अवध बाबू सिहर उठे।

ऐसा नहीं कि पहली बार महासंकट का खयाल आया था उनके मन में। पहले भी कितनी ही बार कोई संकट आया जिसे वे महासंकट मान बैठे, और बाद में वही संकट ऐसा फुसफुसा निकला कि उस पर हँसा ही जा सकता था, जैसे कि जिसे धोखे से 'साँप' समझ रहा था वह 'रस्सी' निकल गयी। मगर इस बार का मामला तो कुछ और है। इस बार कहीं कोई रस्सी नहीं, साँप ही है। अभी तक के हर मामले में पुलिस नहीं थी; इस बार पुलिस गैरहाजिर नहीं है, हाजिर है।

पुलिस को पटाने का... अचानक उन्हें याद आया पुलिस का दलाल। सौभाग्य से इस मोहल्ले में भी पुलिस का एक दलाल है, राजू, मगर है साला कमीना। पुलिस को पटाता तो है, मगर असामी को डरा-धमकाकर दुह भी लेता है। कभी-कभी तो पुलिस जितना नहीं खाती, उससे अधिक यह साला दलाल ही खा जाता है। साहू जी दलाल के चक्कर में नहीं पड़े थे, सीधे थानेदार से बात कर ली। तभी तो सात हजार पर मामला निपट गया। कोई दलाल आ घुसता तो थानेदार को पचीस हजार पर अटल-अडिग रखे रहता। उन्हें एक बार फिर कसक हुई कि उन्होंने साहू जी से पुलिस को पटाने का गुर नहीं सीखा। जिन्दगी में क्या-क्या सीखकर रहना चाहिये! वे अपने ऊपर ही बौखला उठे।

वे एक बार फिर पत्नी के पास पहुँचे; बोले, "पुलिस अभी तक आयी नहीं है!" पत्नी ने झनककर जवाब दिया, "तो मैं बुला लाऊँ?"

बेहद आहत हुए अवध बाबू, बेहद गुस्सा आया। कुछ देर तक मौन खड़े रहे और फिर बोले गये, "तुम समझ नहीं रही हो कि मामला कितना संगीन है।"

"आपको," पत्नी का जवाब तैयार था, "हर मामला येां ही संगीन लगता है।" और कुछ बोलना-बताना बेकार लगा अवध बाबू को; वे अपने कमरे में आ गये।

जब देर तक किसी खुर-खार खटर-पटर की आवाज बूढ़ी के कानों में नहीं पड़ी, तो उसे शक हुआ कि बूढ़ा बिना बताये ही तो घर से बाहर निकल नहीं गया। घर में तो इतनी देर तक बिना बकबक या झगड़ा किये यह प्राणी रह नहीं सकता है, यह सोचकर वह पति का हाल जानने रसोई से बाहर निकल आयी। किसी कमरे में बकबकिया को नहीं पाकर वह बरामदे पर निकल आयी और 'हाय राम' के साथ कुछ बुदबुदाने को ही थी कि उसने बूढ़े को बाँस की सीढ़ी से छत से उतरते देखा। "हाय राम!" उसके मुँह से बेसाख्ता आवाज फूटी, "यह क्या किया आपने!" इतने भर के लिए ही मुँह खुल पाया था उसका। उसके बाद वह सीढ़ी के पास दम साधे खड़ी रही और बूढ़े को बिना किसी बाधा के सावधानीपूर्वक नीचे उतरने दिया।

च्हाय राम!' बूढ़ी के मुँह से निकली घोर अकृत्रिम आवाज थी। छत पर जाने के लिए पक्की सीढ़ी नहीं थी, बाँस की सीढ़ी थी। बाँस तीन-चार साल पुराने थे; बल्लियों की रस्सियाँ लगभग सड़ चुकी थीं। सीढ़ी खतरनाक थी। पन्द्रह दिन पहले ही एक लडक़ा अपनी कटी पतंग ले आने चुपके से छत पर चढ़ा था और उतरते समय फिसलकर गिरा था एक बल्ली को साथ लिये। सर फूटा था, इलाज कराना पड़ गया था।

बूढ़े के नीचे उतरते ही बूढ़ी बरस पीड़ी, "यह क्या सूझा आपको कि छत पर चढ़ गये? मुझे तो दिन-रात भाषण पिलाते हैं कि सँभलकर चलूँ, गिरूँ नहीं, फिसलूँ नहीं, और खुद लूला-लँगड़ा बन जाने के लिए इस खतरनाक सीढ़ी से छत पर चढ़ जाते हैं! क्या जरूरत थी छत पर जाने की? पुलिस को जब आना होगा, आयेगी; कोई हाँक लगाकर बुलाने के लिए तो छत पर नहीं चढ़ जाता है।"

बूढ़े ने हाथ के इशारे से बूढ़ी को चुप रहने के लिए कहा और टहलते हुए अपने कमरे में आ गये। बूढ़ी का दिल अभी भी धक्-धक् कर रहा था, कुछ इस डर से भी कि कहीं बूढ़ा हाथ-गोड़ तुड़ाने का कुछ और प्रयास न करे। उसने मन में तय कर लिया कि कल से बाँस की यह सीढ़ी घर में नहीं रहेगी। अब बने पक्की सीढ़ी।

कुरसी पर आसन जमाकर बोला बूढ़ा, "मुझे अपनी जान की बहुत फिक्र है, लक्ष्मी। मैं बहुत सँभलकर चढ़ा था छत पर और तुमने देखा ही होगा कि मैं कितनी सावधानी से उतर रहा था।"

"मगर छत पर चढऩे का जरूरत ही क्या थी? सँभलकर चलने के बावजूद आदमी फिसलता है या नहीं? गिर तो सकते ही थे। पुलिस को जब आना होगा आयेगी; छत पर चढक़र क्या देखना कि पुलिस मोहल्ले में घुसी है या नहीं!"

"पुलिस अभी तक नहीं आयी है," बूढ़ा बोला, "तो अब दिन में आयेगी भी नहीं; पुलिस आयेगी रात में, रात के बारह बजे। घर को चारों ओर से घेर लेगी और फिर दरवाजा खटखटायेगी, 'खोलो दरवाजा।"ज्

"च्खोलो दरवाजा' बोलने भर से हम दरवाजा नहीं खोल देंगे," बूढ़ी झट बोल गयी, "आपने कितनी ही बार मुझे चेताया है कि आजकल पुलिस के वेष में डाकू भी आया करते हैं।"

"मुझे बहुत खुशी हो रही है, लक्ष्मी, कि मैंने तुम्हें चेताया और तुम चेती हुई हो। मुझे इस बात की खुशी है कि तुम बहुत बातें भूलती तो हो, मगर यह बात तुम्हें याद है।"

"मुझे यह भी याद है," बूढ़ी ने कुछ हुलसकर कहा, "कि रात के बारह बजे आप भी दरवाजा खटखटायें तो मैं तब तक नहीं खोलूँ जब तक आप 'चकाचक' नहीं बोलते हैं।"

बूढ़ा मुस्कुराया, "चकाचक?"

"हाँ, चकाचक।"

बूढ़ा अचानक कुछ गम्भीर हुआ, कुछ सोच में पड़ा और फिर बोला, "लक्ष्मी, मुझे एक शक हो रहा है।"

"क्या?"

"यह 'चकाचक' कम-से-कम पाँच साल पुराना तो जरूर हो गया है। अब तक किसी के कान में यह जरूर चला गया होगा। अब हम इसे बदल दें।"

"किसी के कान में 'चकाचक' नहीं गया है, मैं जानती हूँ।"

"तुम नहीं जानती," बूढ़े ने जोर देकर कहा, "चोर सारी जानकारी लेकर आते हैं। विपिन पाल के घर में चोर घुसा और पाँच मिनट के अन्दर चोरी करके चला गया। कमरे में बारह अटैचियाँ थीं। चोर ने एक उसी अटैची को उठाया जिसमें सारे गहने-जेवर थे। घर के सारे लोग सोये रह गये। चोरी का पता सुबह चला। यह एक रहस्य ही बना रह गया कि चोरों को उस अटैची के बारे में जानकारी कैसे मिली। दीवार के भी कान होते हैं; मैं यह नहीं मान सकता कि किसी कान में 'चकाचक' अभी तक गया ही नहीं होगा। जब हमें शक हो गया है, तो अब हम कोई खतरा क्यों उठायें? इसमें क्या हर्ज है कि आज से 'चकाचक' नहीं बोलकर हम कुछ और ही बोलेंगे?"

"कोई हर्ज नहीं है," बूढ़ी ने जवाब दिया, "क्या बोलेंगे आज से?"

बूढ़े ने सोचने में कुछ समय लगाया और फिर बोला, "डाकू... डाकू।"

बूढ़ी ने गौर से बूढ़े के चेहरे को निहारा और फिर बोली, "ठीक है, आज से 'डाकूज्; अभी बतायेंगे कि पुलिस क्यों आयेगी रात के बारह बजे और घर को चारों ओर से घेर क्यों लेगी?"

"पुलिस आयेगी घर की तलाशी लेने।"

"आये तलाशी लेने; दिन में आये, रात आये," बूढ़ी ने झिडक़ती आवाज में कहा, "आप छत पर क्यों चढ़े अभी? जगह देखने गये थे? पुलिस के आने पर क्या आप छत पर जा छिपेंगे? मैं भी कहीं छिपूँगी क्या!"

"ओह, जगह देखने नहीं गया था," बूढ़ा बोला, "एक शक हो गया था मुझे, वाजिब शक।"

"क्या?"

"घर मेरा देखा हुआ था," बूढ़े ने बताया, "पर छत तो मैंने नहीं देखी थी। पुलिस आयेगी, तो क्या छत पर भी नहीं चढ़ेगी? मान लो, वहाँ उन्हें कोई ऐसी-वैसी चीज मिल जाये..."

"कैसी चीज?"

"मान लो, किसी आदमी का कटा हुआ सिर।"

"कटा हुआ सिर!" बूढ़ी ने नाक-भौं सिकोड़ी, "यह क्या-क्या सोचते रहते हैं आप? कोई आदमी पहले तो किसी आदमी का सिर काटेगा और फिर हमारे घर की छत पर रख जायेगा! ऐसा हो सकता है क्या?"

"हो सकता है; ऐसा हुआ है," बूढ़ा चालू रहा, "मैंने एक कहानी पढ़ी थी जिसमें एक आदमी ने किसी डाकू का कटा हुआ सिर अपने दुश्मन के आँगन में फेंक दिया था।"

"उस आदमी को मिल गया होगा डाकू का कटा हुआ सिर। हमारा कोई ऐसा दुश्मन नहीं है जो हमें फँसाने के लिए किसी आदमी का सिर काटने जायेगा। बोलिये तो, कौन है हमारा ऐसा दुश्मन?"

"यह तो मैं नहीं बता सकता," बूढ़े ने जवाब दिया, "मगर जान लो कि संसार में ऐसा एक भी आदमी नहीं है- कितना भी भला हो वह आदमी- जिसका कोई एक भी दुश्मन नहीं है। हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, लक्ष्मी, वहाँ तो कोई चैन से जी रहा हो तो इस कारण भी बहुतों को बेचैनी होने लगती है। यह मानकर चलो कि हमारे भी कुछ दुश्मन होंगे ही।"

बूढ़ी ने कोई जवाब नहीं दिया, केवल गहरी निगाहों से बूढ़े को घूरती रह गयी।

बूढ़े ने अपनी बात जारी रखी, "हम यह भी नहीं जानते कि कौन हमारा कितना बड़ा दुश्मन है। नहीं जायेगा सिर काटने, मगर वर्षों से इन्तजार कर रहा होगा हमारा सबसे बड़ा दुश्मन हमसे भारी प्रतिशोध का। कटा सिर मिल गया तो टिका दिया हमारे घर की छत पर और पुलिस को खबर कर दी। गाँव-देहात के खेत-बहियार में लाशों के मिलने की खबरें तो अखबार में छपती ही रहती हैं। लाश देखी होगी और सिर काटकर निकल गया होगा। ऐसा तो हो ही सकता है।"

"कैसी-कैसी शंका उपजती है आपके मन में! उम्र तो मेरी भी हुई है, मगर मैं आपकी तरह सठियायी नहीं हूँ। इतनी दूर तक सोचते हैं आप! कैसा-कैसा डर पालते हैं? आदमी को इतना डरना नहीं चाहिये।"

"आदमी को डरना तो चाहिये, लक्ष्मी, और किसी भले आदमी को तो अवश्य डरना चाहिये, नहीं तो वह सुरक्षित नहीं है। आलम साहब कितना डरे हुए थे जब बाढ़ के पानी में बहकर एक लाश उनके मकान से आ लगी थी। उसी वक्त शाम में दौड़े-दौड़े आये थे मेरे पास कि अब क्या करें वे। भला हो उस बाढ़ का ही जो सुबह होने तक लाश को कहीं और बहा ले गयी। अगर किसी पुलिस वाले की नजर उस लाश पर पड़ गयी होती तो, पता नहीं, आलम साहब कितनी बड़ी मुसीबत में फँस जाते। उनका डरना वाजिब था।"

बूढ़ी को कुछ सूझा नहीं कि अब वह क्या बोले; बूढ़े को बहुत बातें सूझ रही थीं बोलने के लिए, "और सुनो, मैं सोचता हूँ, दूर तक सोचता हूँ, तभी तो अभी तक बचाता आ रहा हूँ अपने आपको। सोचो, अगर कोई कटा सिर होता छत पर, तो पुलिस हमारा क्या हाल कर देती! ईश्वर की दया से ऐसा कुछ भी नहीं है छत पर, मगर हमें अपनी शंका तो दूर कर ही लेनी थी।"

"विक्लव।" बूढ़ी बुदबुदायी।

"क्या बोली?"

"कुछ नहीं।"

बूढ़ी के पास बकबक करने का समय नहीं था; वह कुछ और बोले बगैर चली गयी।

कोई और समय होता तो बूढ़ा आदतवश बूढ़ी का पीछा करता और यह जानकर ही दम लेता कि वह क्या बोली, पर अभी उसके पास समय नहीं था; पुलिस किसी भी समय आ सकती थी। दूर-दूर तक सोचने में व्यस्त हो गया।

क्या उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है? इस खयाल से सिहर उठे वे। अगर पुलिस को उनके विरुद्ध कोई अपराध लग जाता है, तब तो... मगर, कुछ ठमककर सोचा उन्होंने, अपने जैसे सफेदपोशों को तो उन्होंने जेल जाते देखा नहीं है। जेल में तो मरभुक्खों और अधमरुओं की भीड़ होती है। वे खुद सफेदपोश तो कहे जा सकते हैं, मगर अपराधी तो बिलकुल नहीं हैं। उन्होंने खुद को धिक्कारा, क्यों मैं डरता हूँ इतना? मेरे जैसे लोग तो नहीं हैं जेल में; मैं कैसे पहुँच जाऊँगा?

धिक्कारने के बाद भी अन्दर का डर कम नहीं हुआ। अगर पुलिस आ रही है, तो कोई अपराध तो उसके दिमाग में होगा ही। कौन-सा अपराध सिद्ध कर देगी, राम जाने! सफेदपोश अपराधी कैसे बच निकलते हैं जेल जाने से? इस सवाल का जवाब तो... जवाब तो हर किसी के पास है- पैसे के बल पर।

यह तो जानी हुई बात है कि कोर्ट-कचहरी में न्याय नहीं जीतता, अच्छा वकील जीतता है। बड़ा-से-बड़ा अपराधी अच्छा-से-अच्छा वकील रखकर बाइज्जत बरी हो जाता है। उनकी न$जर में नहीं आता कोई संगीन मामला, मगर पुलिस तो किसी भी मामले को संगीन बना सकती है। तब क्या उनका काम इस विपिन बाबू वकील से चलेगा। नहीं, उन्हें कोई अच्छा वकील चाहिये। यह विपिन कुमार तो नाम का वकील है। उसके आस-पास तो कभी किसी मुवक्किल को आज तक नहीं देखा है। कचहरी में कुछ दस्तखत करता होगा और कुछ पैसे झाड़ लाता होगा।

अच्छा वकील?

इसी समय पत्नी कमरे में हाजिर हुई और सुनाया, "मेरे नाना भी बिलकुल आपकी तरह थे। उनके पुरोहित उन्हें 'विक्लव' कहा करते थे। विक्लव उसे कहते हैं जो हर वक्त डरा-डरा हो, बेचैन हो, घबराया हुआ हो, शंकाओं से घिरा हो, बिलकुल आपकी तरह।"

"मेरी तरह?" बूढ़ा मुस्कुराया।

"हाँ, आपकी तरह," पत्नी बोली, "आप बचपन से ऐसे ही हैं। आपने ही मुझे बताया था बचपन में एक बन्दर आपके कन्धे पर आ बैठा था और फिर उतर ही नहीं रहा था; तब आपको लगा था कि अब वह बन्दर आपके कन्धे से कभी उतरेगा ही नहीं, आप बूढ़े हो जायेंगे तब तक भी नहीं। एक दिन आपके घर की बिजली गुल हो जाती है, तो आप सिर धुनने लगते हैं कि अवश्य कोई षड्यन्त्र चल रहा है आपके विरुद्ध और अब कभी आपके घर में बिजली आने वाली नहीं है। इस मकान पर एक सरकारी नोटिस आ गयी, तो आप लगे इस चिन्ता में मरने कि अब यह मकान हाथ से गया, कि अब कहाँ टिकान होगा आपका, कि बेटा अपने घर में रहने देगा या नहीं। यह खबर भर आयी कि पुलिस आ रही है और आप लगे घर की छत पर आदमी का कटा सिर ढूँढऩे। आप तो ऐसे हैं कि अपने पिछले चालीस सालों को अपने साथ लिये चलते हैं। इस तरह दुनिया नहीं चलती है..."

"तुम घर की घरनी क्या जानो कि घर के बाहर क्या हो रहा है। मैं जानता हूँ कि दुनिया कैसे चलती है," बूढ़े ने पत्नी को रोका, "मैं बहुत पैनी निगाहों से इस दुनिया को देख रहा हूँ। अब हर किसी को विक्लव हो जाना होगा, हो जाना चाहिये। अब निश्चिंत जिन्दगी कहाँ! जो निश्चिंत हुआ, डरा नहीं, घबराया नहीं, मेरी तरह दूर-दूर तक नहीं सोच लिया, उसका जीना कठिन होगा। मैं शंकाओं से घिरा हूँ, वह कष्टों से घिरा रहेगा। अब तुम जा सकती हो; मैं अभी भी कुछ सोच रहा था।"

पत्नी के जाते ही उनके सामने 'अच्छा वकील' उछलकर आ गया।

उन्हें इस बात का मलाल हुआ कि इतने वर्षों से इस शहर में रह रहे हैं और उन्हें किसी अच्छे वकील से परिचय नहीं है। परिचय तो दूर, अच्छे वकीलों के नाम तक उन्हें नहीं मालूम। उन्हें हर हाल में अच्छा वकील चाहिये। अभी ही सम्पर्क कर लेना जरूरी होगा। क्या करें वे?

उनके दिमाग में कौंध गया एक नाम, बजुर्ग समाज के अध्यक्ष भोलानाथ आलोक का। हर मुसीबत में उनकी मदद मिली है। उन्होंने भोला बाबू को फोन लगाया।

भोला बाबू 'हैलो' के साथ ही पूछ बैठे, "आपके यहाँ पुलिस गयी थी?"

अवध बाबू विकल हो उठे, भोला बाबू को खबर थी कि उनके घर पुलिस आयेगी, मगर अभी तक उन्हें खबर नहीं की। मामला कोई संगीन ही है, और अब, लगता है, भोला बाबू भी मदद में आने से रहे। उन्होंने फोन पर भोला बाबू को बताया, "पुलिस अभी तक तो नहीं आयी है," और फिर डरी हुई आवाज में पूछा, "मगर क्यों आयेगी पुलिस?"

भोला बाबू ने जो कुछ बताया उसे साँस रोककर सुना अवध बाबू ने और उनका कमल खिल गया। देर तक वे राहत की साँसें लेते रहे और फिर देर तक खुशी की साँसें छोड़ते रह गये।

फिर वे उठे, पत्नी के पास जा पहुँचे और उससे बहुत ही उदास स्वर में कहा, "लक्ष्मी, अब पुलिस, समझ लो, हर हफ्ते आयेगी।"

"हर हफ्ते?" पत्नी चमक उठी, "हाय राम, यह क्या बला ले आये? क्या-क्या करते रहते हैं आप?"

जवाब में पति ने सुनाया, "पुलिस आया करेगी हमारा हाल-चाल पूछने; यह पूछने कि हम भले-चंगे तो हैं, किसी कष्ट में तो नहीं हैं, कोई सता तो नहीं रहा है। सरकार को अब इस बात की चिन्ता है कि किसी बुजुर्ग को कोई तकलीफ तो नहीं है।"

बोलते हुए उनके होंठों पर मुस्कुराहट उतर आयी। मुस्कुराकर वे वहाँ रुके नहीं कि अब पत्नी के मुँह से किसी विक्लव की निराधार शंकाओं के ढेर सारे किस्से सुनने को मिलेंगे। वे अपने कमरे में आ गये और तुरंत अमन के दादा शंभुशरण को फोन लगाया। 'हैलो'की आवाज सुनते ही उन्होंने हँस-हँसकर पूछा, "कहिये, शंभु बाबू, क्या हाल-चाल है? आपके पास पुलिस भी आयी थी?"

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संपर्क:

गुरुद्वारा रोड, महबूब खाँ टोला,

पूर्णिया-854301

मो. 9931018938

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रचनाकार: रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1-2 / विक्लव / चन्द्रकिशोर जायसवाल
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