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कहानी / उलझन के दिन / महेश कटारे / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1-5

महेश कटारे

उलझन के दिन

अषाढ़ का दिन अषाढ़ की तरह ही आया था। पढ़े लिखों की भाषा में जिसे प्री मानसून कहा जाता है, उसमें पानी की पहली आमद हो चुकी थी और तपती धरती की साँसों से ऊपर उठती हवा आसमान की पोल में पहुँच ठहर गई थी। मौसम थोड़ा चिंतित और उमसभरा था, जिसमें चुहचुहाता पसीना उमगकर बूदों के रूप में ढुलकता, चिपचिपाता रहता है। बीमारी की गिरफ्त में आई मटमैली सी धूप छतों खपरैलों से होकर पश्चिम वाली पहाड़ी के सिरे पर सिकुड़ती हुई बैठने लगी तो मास्टर, वेदराम ने अपनी खटिया बैठकी से निकाल बाहर चबूतरे पर बिछा ली।

यह उनका रोज का नियम है कि आसमान साफ हो, लू लपट मंद हो जाय तो खटिया के सिरहाने तकिया जमा आसपास दो कुर्सियाँ डाल लेते हैं कि आने वाले सुविधा से बैठ सकें। वह खुद खटिया पर बैठे अथवा तकिया के सहारे अधलेटे होकर अपनी छाती के आसपास सीकों या खजूर से बना पंखा डुलाते हुए पसीना सुखाते रहते हैं। सिरहाने की ओर बीड़ी का बंडल और माचिस रखी होती है। मास्टर साहब स्वयं धूम्रपान नहीं करते पर आंगतुकों के बैठने का आसरा और स्वागत का साधन धुँआ ही तो बचा है। फागुन के बाद नई साल के साढ़े तीन महीनों में गाँव आधे से अधिक खाली हो गया है। कुछ लोग अकेले-दुकेले तो कुछ बालबच्चों की पोटली के साथ शहर या उससे भी आगे दिल्ली, पंजाब की मजूरी पर निकल गये हैं। वैसे तो बैशाख जेठ में फसल उगाहने के साथ ही शादी ब्याह के सहालग की भी भागदौड़ रहती है पर आसमान से आई ओले पानी की आफ़त ने ब्याह की भाँवरें स्थगित करा दीं। गाँव के इक्का-दुक्का संपन्न अथवा किसी मजबूर के घर में ही लगुन, मण्डप की ढोलक बजी है। पैसे वाले तो यूँ भी शहर जाकर ब्याह बरौना निपटाते हैं। गाँव लगातार मरभुक्खा बनता जा रहा है। एक का न्यौता दो तो बालबच्चों को समेट चार आकर पत्तल डाल बैठ जायेंगे और इतना ठूँस लेंगे कि दो दिन तक पेट पर हाथ फेर-फेरकर डकारें लेते रहें।

औरों की तरह फसल मास्टर जी की भी चौपट हुई है पर जैसे झलका पंडित पर इसका असर नहीं वैसे ही यहाँ भी हाय-हाय वाली कोई बात नहीं। पच्चीस हजार महीने की पेंशन है और एक लड़का फौज में। अतः इनके यहाँ गाय भेंस के लिए चारा और परिवार के राशन की समुचित व्यवस्था है। जीवन में कोई ऐब पाला नहीं सो पूरी पेंशन खाते में ही

जमा होती रहती है। हाँ, चुनाव के समय से पंचायत के पचुआ-फेर में आ पड़े तो बीस-तीस रुपये बीड़ी बंडल के धुआँ धर्रे और चार छह कप चाय का खर्चा जरूर होने लगा है। चार छह लोग घण्टे दो घण्टे के लिए पास आ बैठते हैं तो चुनाव में हार की कचोट ज्यादा नहीं सालती। अखबार भी अब गाँव तक पहुँचने लगा है तो कुछ उसकी प्रतीक्षा और बाद में पूरी खबरें पढ़ने में आधा दिन कट जाता है। किसानों की आत्महत्या वाली खबर को वह स्याही से घेर देते हैं।

किसानों का मरना भी धीरे-धीरे कम हो चला है। लगातार एक ही काम से ऊब भी होने लगती है। मरने की खबरें वैसे भी कम दी जाती हैं... अब तो इतने किसान मर चुके हैं कि कोई उत्सुकता, उत्तेजना भी नहीं बनती। वैसे भी राजनीति, क्रिकेट, करप्शन, कार्पोरेट और सिनेमा से ही जगह नहीं बचती। इधर रोज-रोज ऐसे रोचक-स्कैण्डल हैं कि दिन भर दिल गुदगुदाता रहे... दिमाग सनसनाता रहे।

भई, सीधी सी बात है अख़बार या चैनल में पैसा लगाया है तो मुनाफ़ा भी चाहिए। ख़बरों वाले कोई धर्मखाता तो चला नहीं रहे। किसान के पास न बिकने का हुनर न खरीदने की औकात। एक वोट जरूर है सो जाति या धर्म के नाम पर किसी न किसी देना ही है।

इस बार भी जातियों के गोलबंद वोट पड़े थे। बहुत हवाला दिया मास्टर जी ने भलमन साहत और ईमानदारी का। ग़रीब-गुरबा ने गुपचुप समर्थन भी दिया पर दारू, लठैती और जोड़तोड़ की तिकड़म के आगे हारना पड़ा। अब गाँव से बिजली गायब है। दोपाये चौपाये दाना पानी के लिए भटक रहे हैं... मर रहे हैं तो मास्टर साब क्या करें। उसकी नाक पकड़ो जिसे चुना है। करने धरने का बजट तो उसके हाथ में है- खुद खाये चाहे अपनों में बाँटे।

मास्टर साब इसी तरह बड़बड़ाकर भड़ास निकालते, खीझते रहते हैं। इस समय भी ऐसी ही तैयारी थी कि गली के मोड़ पर राजाराम आता दिखा। वह प्रायः ही शाम को यहाँ घण्टे दो घण्टे बैठ मास्टर साब का खाली और खिजलाया समय बाँटता है।

‘गुरु जी! जै राम जी की।’- राजाराम मास्टर जी को गुरु जी कहता है।

‘जै सियाराम, आज जल्दी निकल पड़े राजाराम..।’

राजाराम ने बैठने के लिए कुर्सी ठीक की, फिर बैठते हुए बोला- ‘हाँ, गुरु जी! क्या है कि गाँव में अब चुप्पी सी फैली है। अन्याय, अनीति के विरोध की कोई बात ही नहीं करता। हद तो यह है कि कोई-कोई बात भी करता है तो वही बीमारी, मौत और नये मुखिया के समर्थकों के हुड़दंग की... सो भी ऐसी तटस्थता से जैसे ये सब मौसम जैसी स्वाभाविक स्थितियाँ हों। पड़ोस में कोई मौत भी हो जाय तो आदमी बस थोड़ी देर के लिए गंभीर हो लेता है। दुखी होने का जैसे चलन ही चला गया। अजीब बदलाव है जिसे देखो, अपनी पड़ी है।

वैसे मरना झुरना अब कम हो गया है पर हमारे मुहल्ले की तरफ आ निकलो तो रास्ते से ही लगने लगेगा जैसे लोग कहीं मुर्दा जलाने गये हों।

‘अरे भई, हम भी इसी गाँव में रहते हैं। तुम्हारे मुहल्ले की तरफ भी तीन चार बार धूम आये हैं...।’

राजाराम ने बीच में ही टोका- ‘कितने लोग मिले आपको मुहल्ले में?... आधे तो आफ़त के दिन काटने बाहर चले गये। अब तो मरने वाले के लिए रोने वालों का भी टोटा है। राने से कुछ चहल-पहल तो लगती थी। लड़ने झगड़ने का हल्ला-गुल्ला भी बंद सा है। चुनाव के बाद एकदम इतना भिड़ लिए कि सोलह फौजदारी कायम हो गईं। जेब में पैसा नहीं तो आगे का रास्ता बंद...। थाना कचहरी में क्या दाँत दिखायेंगे?... साले कुत्ते तक बस आपस में घुर्राकर रह जाते हैं। हद है।

सलाटे भरी ऐसी शांति से जी घबराने लगता है। अ?षाढ़ की बूँदों से राहत सी मिठा ली तो उमस बढ़ गई। जी अकुलाने लगा... फिर जाने क्यों मन में आया कि आत्महत्या कर डालूँ यह सही समय है।... थोड़ी देर बाद लगा कि कहीं से बंदूक हाथ में लूँ और जो भी सामने पड़े, उसे मारना शु?रू कर दूँ।

मैं बदहवास सा था कि पत्नी सामने आ पहुँची। शायद वह सहम गई थी मुझे देखकर।... हाँ ऐसा ही लगा मुझे। पत्नी के साथ मेरे बच्चों के चेहरे थे। एक आठ दिन से बीमार है... एक के स्कूल खुल गए हैं... लड़की जो अब बड़ी दिखने लगी है। पत्नी तो है ही जो जाने कौन-कौन सी चिंता में घुलती जा रही है। मैं सोच में पड़ गया और लगा कि मैं न मर सकता हूँ न मार सकता हूँ। ये ज़िन्दगी कायर की तरह भोगनी पड़ेगी।... तो मैं पत्नी और परिवार से पीठ फेर खड़ा हुआ और पाँव इधर ले आये राजाराम भक्कू सा होकर मास्टर जी का चेहरा ताकने लगा।

उसकी बातें सुनकर मास्टर जी तय न कर पा रहे थे कि इसे साँत्वना दें या उत्साह की बातें करें। गाँव में एक यही आदमी है जो खरा बोलता है। थोड़े से लाभ की प्रत्याशा अथवा किसी भय से बड़ों की चापलूसी करने वाले अपने भाइयों को भी सुनाने में वह संकोच नहीं करता। झलका पंडित भी राजाराम से कभी काटता है। एक जगह शेखी बघारते झलका पंडित से उसने कह ही दिया था- ‘शास्त्री जी, ज्यादा ऊँचे मत उड़ो। तुम कथा भागवत में रस ले लेकर रासलीला प्रसंग सुनाते हो। मुझे कुल पोपलीला मालूम है कि घर की जलभरी गगरी का आचमन छोड़कर जूठी हड़िया में जनेऊ कौन डुबोता है और कहाँ बाप मेरे एक ही घाट पर.?

झलका पण्डित अपनी तमतमाहट को खी खी जैसी हँसी में छिपाते हुए यह कहकर खिसक लिए थे कि - ‘तें तो पागल है रे... तेरे मुँह कौन लगे। तेरे भाइयों से ही कहूँगा तुझे उल्टी सीधी ज़बान चलाने से बरज लें, नहीं तो ठीक न होगा।’

राजाराम इन दिनों मास्टर साब के हारे का हरिनाम है। गाँव में उसे थोड़ा सरका हुआ तो सभी मानते हैं तथा मास्टर भी उसे व्यावहारिक बनने की नसीहत देते रहते हैं। प्रिय सत्य बोलने के लाभ और अप्रिय सत्य से हानि उदाहरण सहित बातते हैं। राजाराम सुनता है। कभी चुप रहकर गर्दन हिला उनकी बात को मान देता है तो कभी तिनककर मास्टर जी के लुजलुजेपन पर फटकार बरसा देता है-

‘माफ करें गुरु जी! मास्टरी की शांत, सुरक्षित, सरकारी नौकरी करते-करते आप लड़ने की कूबत खो बैठे हैं। चोर को चोर कहना चाहते हैं, पर इशारों में। गोया घूँघट के भीतर से आँख मारते हैं। श्रीमान, कुछ हासिल करने की कीमत भी चुकानी पड़ती है-’ ऐसे में उत्तेजना से राजाराम की नाक के नथुने फूलने पिचकने लगते हैं। आँखों की बरौनियाँ भोहों को छू उठती हैं... होंठ तिर्थक दिखते हैं। तब मास्टर जी चुप होकर उसके भीतर भरे गुस्से को खाली होने देते हैं। आज भी चुप हुए और राजाराम के चुप होने पर पूछा- ‘चाय बनवाऊँ?’

‘चलिए, पी लेंगे। वैसे चाय का टैम नहीं हुआ।’

‘बच्चा बीमार है तो शहर ले जाकर किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाओ।... बहू इसीलिए और परेशान होगी। उसे तुमसे उम्मीद है, तुम्हें खेती से। खेती तुम्हें फल नहीं रही है तो बहू पर चिड़चिड़ा जाते होगे। बहू अपनी खीझ किस पर उतारे?... ख़ैर, पहले बच्चे का इलाज कराओ। जाते समय पैसे लेते जाना। बहू के हाथ में धर दोगे तो उसे आश्वस्ति और हिम्मत मिलेगी। इस पैसे को कर्जा नहीं उधारी मानना... बिना ब्याज का। पहला पानी ठीक समय पर बरसा है। आद्रा नक्षत्र में एक पानी और हो गया तो ज्वार बाजरा की बुआई हो जायगी।’ मास्टर जी ने उम्मीद का लेप बगाया।

‘पर गुरु जी, कर्ज तो उस जुताई-बुवाई के लिए भी चाहिए... बीज भी... फिर खाद...। माना कि मुझे आप दे देंगे पर सैकड़ों हैं गाँव में जिनकी खेती का पहिया कर्ज के सहारे ही ढरकेगा। पिछला चुकाया नहीं तो बैंक से कैसे मिले? और झलका पण्डित जैसे साहूकारों के यहाँ खेत हड़पने और ब्याज में लुगाई से सेवा पाने की नियत है।’

‘अब जो होना है सो होता आया है, होता रहेगा। आकाश की चील को छीनकर और आंगन की चिड़िया को चुगकर पेट भरना होता है। वन जाने वाली गाय चरकर पेट भरती है। पूंछ सूँघते साँड़ों को वह कैसे रोके?

‘साँड़ को नाथ लो या... या... या बधिया कर दो।’- राजाराम ने मास्टर जी का प्रतिवाद किया ‘हाँ...। कोशिश की थी ना हमने। कैसे भी सही, लड़ाई तो हारे। उसके बाद भी जो बन रहा है करने को तैयार हैं। अपने ही गाँव में चौदह मौतें हो गईं- तीन महीने में। कोई फाँसी पर झूला तो कोई कीटनाशक पीकर मर गए। कुछ रात को सोये तो सुबह जगे ही नहीं। हम तुम उनसे तो ठीक ही हैं...। बुरा समय है तो अच्छा भी आएगा ही। तुम तो कल बच्चे को शहर ले जाओ।’

‘ले तो जाना ही है पर शायद डाक्टरों ने गुपचुप मीटिंग में प्रस्ताव ही पास कर लिया है कि जिसके पास पैसा नहीं उसे बिना इलाज मरने दो। ठीकठाक या थोड़ा जमा हुआ डाक्टर चार सौ पाँच सौ फीस में लेता है।... फिर तीन चार जाँच लिखता है दो, डेढ़ हजार की। जानते हैं? जाँच में डाक्टर का कमीशन होता है तीस-चालीस परसेंट। ऐसे डाक्टर आप जैसों के लिए तो ठीक हैं पर मेरे जैसा क्या करे जिसकी जमीन सर्दी जुकाम जैसी मामूली बीमारी में ही झलका पण्डित जैसों के यहाँ गिरवी हो जाती है। फिर भी मैं कर्ज लेकर इलाज तो करवाऊँगा ही पर कल पंचायत की मीटिंग है। पंच होने के नाते मेरा उसमें होना जरूरी है।’

‘क्या कर लोगे तुम? बहुमत तो उसी का है। मुखिया चुना है लोगों ने उसे। वो किसी भी प्रस्ताव पर पंचों से मुहर लगवा लेगा। सेक्रेटरी उसके मुँह की ओर देखता है। और तो और जो पंच उसके विरोध में रहे और जीते हैं, उनमें से भी कुछ उससे सेटिंग के चक्कर में हैं। जानते हो तुम भी।... क्या कर लोगे तुम?’ मास्टर साब की हार वाली निराशा शब्दों में भर आई। ‘मैं भी तो चुना ही गया हूँ ना। आप हार गये पर वोट आपको भी मिले हैं। उनका मान रखने के लिए आप उनके हक के लिए नहीं लड़ेंगे? मरने वालों में से केवल चार के परिवारों को राहत का पैसा मिला है। छह की मौत स्वाभाविक लिखवा दी गई है और दो बीमारी के खाते में डाल दिये... गुपचुप। क्यों?... इसलिए कि उनपर विरोधी वोटर होने का संदेह था।

अब देखिये कि पंचायत के सदस्य अपना भत्ता बढ़ाने लगभग सहमत और एकजुट हैं। क्या मैं भी चुप रहकर ऐसों की बेशर्मी में शामिल हो जाऊँ? इन्हें अपने किसान भाइयों के मरने की चिंता नहीं, अपनी जेब की चिंता है। मैंने तो सुना है कि किसी बड़े अधिकारी ने सरपंच को डपट दिया है कि इतने बड़़े गाँव में कुछ लोग मरें भी तो क्या फर्क पड़ता है, साल भर में उससे दुगुने पैदा हो जायेंगे। विकास के लिए जनसंख्या जितनी कम रहे उतना ही लाभदायक होता है। तो उल्टी बातों का मुँह मोड़ने के लिए बैठक में रहना ज?रूरी है।’ ‘सरपंच लौट आया बाहर से?’

‘लौट ही आयेगा। अभी तो वह जगह-जगह घूमकर लोगों को अपना भाग्यविधाता होना बता रहा है कि ‘मैं’ हूँ।’ राजाराम चेहरे पर उपेक्षा ले आया।

बीड़ी के शौकीन, बतरस के इच्छुक तथा छोंक-बघार के साथ इधर की उधर करने वाले रामजुहार करते हुए चबूतरे की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे तो बातचीत का रुख बदल गया। दूसरे दिन सकारे-सकारे मुखिया के मुहल्ले की ओर घमरौल सुनाई पड़ा। लगा कि या तो कोई मर गया या किसी से फौजदारी हो गई। कान लगाने पर गजर के बीच-बीच किसी औरत के रो-रोकर चीखने चिल्लाने के स्वर सुनाई पड़ते। लोग धीरे-धीरे टोह सी लेते आवाजों की ओर बढ़ने लगे। आफ़त की इस साल में लोग हादसे को भी तमाशे की तरह लेने लगे हैं।

सरपंच सुबह की सैरवाली पौशाक में बाहुबली की भाँति कुर्सी पर था। भाई भतीजे आसपास थे। मुहल्ले वाले अपने-अपने घरों से निकलकर द्वारों पर जमा हो रहे थे और चौक में कैलाश की घरवाली नाक तक घूँघट लिए छाती पीट थी- ‘ओ, जा हत्यारे पण्डितजी देह में कीड़ा परेंगे। पोर-पोर में कोढ़ फूटेगा। हे राम हम तो लूट लये... प्रभू! अब का करें।’- कैलाश की घरवाली अंगूरी ठीक उसी तर्ज पर बैन करती रोने लगी जैसे द्वार से लाश उठने पर रोया जाता है। मौहल्ले में ब्राम्हणों के घर थे और कोने पर दो ठाकुरों के। स्वाभाविक है कि उसका इस ढंग से रोना सभी को द्वार पर असगुन सा महसूस हो रहा था।

‘भौजी, तो से कह तो दिया कि समझायेंगे पंडित चच्चू को। अब खेत उनके नाम होय गया तो जोतने से कौन रोक सकता है उन्हें। तुम्हारे अपने जेठ ने रजिस्ट्री करी है। अपना सिक्का खोटा है तो परखने वाले का कौन दोष। तुम्हें पहले तो रजिस्ट्री रुकवानी थी।’- सरपंच बोला।

‘रजिस्ट्री ऊ तुमही ने करवाई हती भैया...। हमें तो बहुत बाद में पतौ चलौ।’

‘चलो, वो हो भी गई तो तुम्हें नामांतरण पर आपत्ति करनी थी। अब सब हो चुका तो समझाने के सिवा मेरे हाथ में क्या है?’- सरपंच ने सफाई दी।

‘तुमने ही तो कही हती महाराज कै चुनाव होय जाने दो। तुम्हारा हिस्सा लौटवाय देंगे।’- घिघियाते स्वर में कैलाश ने कहा।

इस वार्तालाप के मध्य अंगूरी का रोना थोड़ा थम गया था ताकि वह चर्चा सुन सके। पति की बात समाप्त होते ही वह फिर से माथा ठोकने लगी- ‘हाय-हाय, हमें भरमाय के वोट ले लिये। अब आँखें काहे फेर रहे हो। जेठ ने रजस्टरी करी है तो जेठ का हिस्सा जोते। हमारी छाती काहे रोंद रहे तुम्हारे कक्का...।’

‘तू नेंक चुप होयगी कै...।’ - कैलाश ने पत्नी को डांटा फिर सरपंच की ओर उन्मुख हुआ- ‘महराज, झलके महाराज ने पिछली साल तो कायदे का आधा हिस्सा ही जोता। चलो ठीक है। पर अब पूरा जोत रये जे तो अन्याय है तुम्हारी सरपंची में। राजा है चोरी करे तो न्याय कौन से होय...?’ कैलाश ने अपना पक्ष रखा।

‘देख दादा! वे अलग हैं और मैं अलग। मेरी सरपंची से पहले जो हुआ उसका दोष मुझपर मत धरो। मैं तो न गलत करूँगा न गलत होने दूँगा।’- आसपास जमा हुई भीड़ को सरपंच ने सुनाया। मुझे पचड़ों से अलग रहकर गाँव का विकास करना है। फिर भी मैं अपने चच्चू से कहूँगा कि तुम्हारा हिस्सा लौटा दें। क्यों भाइयो, मैं ठीक कह रहा हूँ ना!’- सरपंच ने भीड़ से स्वीकृति मांगने की मुद्रा में पूछा।

कुछ चुप रहे, कुछ ने समर्थन में हाथ उठाकर हुंकारा भरा...। इस तरह कि सरपंच की निगाह उन पर पड़ जाये। वैसे अधिकांश को इस प्रकरण की पेचीदगी ही समझ में नहीं आ रही थी। इतना सभी को पता था कि कैलाश के भाई ने झलका पंडित को अपना हिस्सा बेच दिया है पर आधे का पूरा कैसे हो गया यह कानूनी करामात सबके समझ में आने की बात नहीं। अब जो भी हुआ हो, गाँव का मुखिया कोई रास्ता निकालने की सोच तो रहा है।

कुछ जानते हुए भी यों चुप रहे कि साँची कहकर झलका पंडित से बिगार कौन करे? सरपंच की चौकड़ी का सर्वेसर्वा तो वही है। चोरों से रार गरीब पर मार की तरह पड़ती है। अगले चुनाव तक इन्हीं की सरपरस्ती में समय गुजारना है। जो काला-पीला कैलाश के साथ हुआ वैसा ही किसी के साथ भी संभव है। ऐसे में स्वयं को सुरक्षित करना जरूरी है।... हाँ जी, हाँ जी कहना और इसी गाँव में रहना।

पर अंगूरी के कानों में धरती चीख रही थी। झलका पंडित कमर से पिस्तौल लटकाये बेटे द्वारा अंगूरी कैलाश का खेत जुतवा रहा था। यूँ खेती में कौन सुख का मेह बरसता है पर बाप दादों के ज़माने से परिवार का आसरा और प्रतिष्ठा का कारण रही है ज़मीन। सरपंच से उम्मीद टूटती दिखी तो अंगूरी बिफर गई-

‘पिवना सांप मत बन सरपंच; गरीब की हाय मत ले। मेरे बालबच्चे भूखों मरेंगे तो तेरे हू चैन का कौर न चबा पायेंगे।’- कह वह पागल की तरह गाँव के बाहर की ओर चल दी।

कैलाश अपनी बदहवास पत्नी के पीछे दौड़ा। उसके साथ-साथ दौड़ने लगे अधनंग, अधपेट बच्चे। कुछ अन्य लोग भी बरजने समझाने दौड़ पड़े कि औरत जात का क्या-कहो तो कुआ बावड़ी ही कर डाले... फाँसी लगा लटक जाय। कैलाश ने तेजी से आगे बढ़ पत्नी का हाथ पकड़ा पर अंगूरी ने मिसमिसाकर हाथ उमेठ छुड़ा लिया और तेज कदमों से अपने खेत की ओर चली- ‘आज मैं अपनी मेंड़ पर ही जान देऊँगी।’

खेत गाँव के गेंउड़े से ही लगा है। पंडित के लिए आंय बांय बकती, रोकने वालों को धकेलती झटकती अस्तव्यस्त अंगूरी झलका पंडित की ओर थूककर जोत के बीच जाकर लेट गई- ‘असल बाप का बीज है तो चला मेरे ऊपर से टरैक्टर!’

बेशक चुनौती बहुत बड़ी थी। असल नकल की ऐसी बात पर गाँव में गोलियाँ चल जाती हैं पर सैकड़ों आँखों के सामने अब एक औरत को कुचला भी नहीं जा सकता। झलका पंडित का ऐंठ से भरा बेटा भी जानता है कि जवानी जेल में काटनी पड़ेगी। ट्रैक्टर थमकर घुर्रघुर्र करता धुआँ छोड़ने लगा।

बेटे ने पहली नज़र बाप पर और दूसरी भीड़ पर फेंकी। पाया कि पचास कदम की दूरी पर मुँह से मोबाइल सटाए सरपंच भी आ रहा है। विरोधी पार्टी का भीड़ में भी कोई न था। अधिकतर सरपंच समर्थक थे या बेपेंदी के लोटे जो किसी भी तरफ लुढ़क सकते हैं। चुनाव में ये पक्ष विपक्ष दोनों को अपनी दीनता या धूर्तता में भरमाए रहते हैं। एक प्रकार की उत्सुक चुप्पी थी भीड़ में। कैलाश और उसके बच्चे खेत में पसरी अंगूरी के पास जा बैठे थे। अंगूरी की चुनौती और रोना साथ-साथ चल रहा था।

‘राघव! चुटिया तो पकड़ इस लुच्ची की और फेंक दे खेत से बाहर। हम चुप हैं और ये हरामजादी कतरनी सी जुबान चलाय रही है। मैंने सेंतमेंत नहीं लिया है खेत... खरखरे नोट गिने हैं झोली भर। देखें कौन हिमायती दिलाता है इसकों खेत। मादर... पीठ पीछे चाबी भरते हैं।... गूदा है तो सामने आयें। चुनाव में कुछ उखाड़ न पाये, अब ऐसे तूपेंगे जे मेरा...।’ - झलका पंडित ने लोगों के बीच आवाज फेंकने हुए बायें हाथ से अपने गुप्तांग की ओर संकेत किया।

लोग देख सुन और जान रहे थे कि लहक-लहक कर भागवत-कथा बाँचने वाला, लाल, पीले, श्वेत तिलक से कपाल रचाने वाला पंडित बल और गालियों के स्तर पर भी प्रबल है। सरपंच पंडित की बगल में जा पहुँचा और कंधे पर हाथ रख कुछ समझाने लगा। झलका पंडित कभी इन्कार में सिर हिलाता, नथुनेफुला आँखें निकालता, पिस्तौल पर हाथ ले जाता लहराता जाने क्या कुछ कहता सुनता रहा। फिर बेटे की ओर मुँह उठाकर बोला- ‘निकाल ला रे ट्रैक्टर बाहर। कल फिर देखेंगे। भेंड़ी के सींग से होय के एक बेर तो निकलना ही है...।’

तमाशबीनों पर विजयी दृष्टि फेंकते हुए झलका पंडित सरपंच के साथ अपनी स्कार्पिओ में जा बैठा और गाड़ी स्टार्ट की। सकार्पिओ के पीछे ही ट्रैक्टर खेत से निकल आया। अंगूरी खड़ी हो एक बार फिर से चिल्लाई- ‘पिवना साँप! तोकूँ तो भगवान ई समझैगा...।’

दृश्य में कुछ और नया जुड़ते न पा भीड़ भी लौट पड़ी। भीड़ प्रबल की पक्षधर थी और अन्याय को जोर के बल पर जीतता देखती रही। अंगूरी मेंड़ पर खड़ी आँसू बहा रही थी। कैलाश उसे घर चलने को खींच रहा था... बच्चे भी बार-बार आँसू बहा लेते थे। छोटा सा तमाशा हुआ जरूर पर लोगों के मन और चेहरों पर कोई खुशी न थी। शायद हर कोई स्वयं को हारा सा महसूस कर रहा था इसलिए सब अपने आप में गुम हो गये दिखते थे। चुपचुप लौटने लगे थे कि एक ने भारी पड़ती चुप्पी तोड़ी-

‘भाई साँप तो ठीक... सब जानते हैं। पर ये पिवना साँप की नस्ल क्या है... कहाँ पाई जाती है? प्रश्न सुनने वालों ने एक दूसरे की आँखों में झाँका। सरपंच के द्वार पर अंगूरी उदाहरण दे चुकी है पर दोहराने कोई तैयार नहीं। उसके तो सिर पै आ पड़ी है- जैसे सत्तानाश वैसे अट्ठानाश पर दूसरा कौन अपना सिर ओखली में दे? इसलिए सभी लगभग उसी तरह लौट रहे थे जैसे श्मशान में लाश फूँककर लौटते हैं- गुमसुम... उदासी ओढ़े हुए।

घटना की आँखों देखी खबरें अनुमान और कानों सुनी के साथ मास्टर साब् तक पहुँचीं और राजाराम के पास भी। मास्टर जी ने इस समय बड़ी संतुलित प्रतिक्रिया प्रकट की- ‘ये तो होना ही था। कैलाश ने वोट उसे दिया है तो भुगते। उनका मामला है ये। बेईमान तो अपना फायदा सोचता है।

राजराम का कहना था- ‘अभी तो शुरुआत है। पाँच साल में देखना क्या-क्या होता है...।’ इसके अधिक न बोल वह बारह बजे की बैठक के लिए तैयार होने उठ गया। भवन में आज पूरी उपस्थिति थी- उप सरपंच, पंच, पटवारी, ग्राम सहायक जो भी विकास के नियंता थे... सभी थे। एजेंडे में खर्चे के लिए स्वीकृति के विषय को छोड़कर शेष मुद्दों के लिए ‘अध्यक्ष महोदय की अनुमति से’ लिख दिया गया था। खर्चे वाला प्रस्ताव हाथ उठाकर एक ही झटके में बहुमत से पास हो गया। राजाराम ने इसमें आत्महत्या करने वालों के परिवार को सहायता जुड़वानी चाही तो सचिव ने बता दिया कि इस मद के लिए कोई प्रावधान ही नहीं है। राजाराम का साथ देने वाले सदस्य भी गिनती में काफ़ी कम थे।... फिर अनौपचारिक स्तर पर आज वाली तात्कलिक घटना पर चर्चा होने लगी। सच यही था कि सभी का ध्यान नहीं तो ज्यादातर का ध्यान अपने दायित्वों के प्रति न होकर इस घटना की ओर था। सरपंच से बिगाड़ का भय सदस्यों में भी था। राजाराम इस पर खुलकर कहना चाहता था कि यह सरासर धोखाधड़ी तथा ‘जिसकी लाठी उसकी भेंस’ वाला मामला है और जीत का लाभ लिया जा रहा है पर वह सोच-सोचकर रह जाता। कोई साथ खड़ा हो तो सच कहा जाये और लड़ा भी जाये पर जो निर्णायक मौके पर प्रतिद्वंद्वी का साथी बने उसके लिए कैसे लड़ा जाये?

मीटिंग वालों के लिए भोजन की व्यवस्था थी... पंचायत-फण्ड से- पूड़ी, कचौड़ी, खीर, रायता आदि की भरी-पूरी थाली। जाति पांत से परे सरपंच द्वारा सामूहिक भोज। सदस्यों का ध्यान चर्चा की बजाय खाने पीने की ओर मुड़ गया। राजाराम ने भोज का बहिष्कार किया तो उसके साथवालों ने भी समझाया- परसी हुई थाली छोड़ने से अन्न का अपमान होता है। हर बात पर सनकपना ठीक नहीं।

ऊपरे मन तथा औपचारिकता में सरपंच ने भी सहभोज में साथ देने का आग्रह किया। मन थोड़ा डगमगाया भी कि पत्नी बीमार बेटे को लेकर शहर निकल गई है। बेटी ने ही कुछ रूखा-सूखा पकाया होगा तो एक दिन अच्छा-अच्छा स्वाद लेने से क्या फर्क पड़ता है पर भीतर से आती धिक्कार ने राजाराम को रोक ही दिया।

भोजन की तैयारी में थोड़ा बिलंव था। सोचा यह गया था कि मीटिंग कुछ समय लेगी पर वह तुरंत प्रस्ताव और तत्काल समर्थन के साथ ही समाप्त हो गई। खाली समय में फिर से सुबह की घटना का जिक्र होने लगा-

‘ये कैलाश की औरत बड़ी मुँहजोर निकली... सरपंच को पिवना साँप कह दिया।’

‘वो औरत होने से बच गई। सरपंच पी गया गुस्से को, वर्ना इतनी लातें पड़तीं कि होश ठिकाने आ जाते।’

‘सरपंच मारता?’

‘अरे यार! ऐसे काम अब भी उसे खुद करने पड़ेंगे? लीडर का तो इशारा होता है बस...।’

‘वैसे, ये कैलाश सैडूल भी है, इसलिए भी...।’

‘सैडूल नहीं, ओबीसी है... पिछड़ा। कुम्हार है ना!- एक पंच ने जाति चिन्हित की।

‘तभी...। नईं तो बिसकी घरवाली बिलाउज फाड़ के थाने पहुँच जाती कि पंडित ने मेरी बेज्जती (बेइज्जती) कर डारी। लेवे के दैबे पर जाते झलका पंडित को।’- दूसरे पंच ने अपना सोच और अनुमान प्रकट किया।

‘सो का? बेज्जती के मामले में चाहे जौन सी औरत थाने जाय सकती है। बस बलात्कार की राहत पच्चीस हजार रुपया सैडूल को ही मिलती है। खैर अपने को का करना पर वो पिवना साँप कहाँ से खोज ले आई, हमने तो न देखा न सुना।’- पंच महोदय ने चुपके से दिलचस्प विषय सरका दिया।

एक सदस्य (पंच) मुसकराकर बोले- ‘जे तो वो ई बताय सकती है या कोई सँपेरा बताय पावेगा। पर इतना तो हई है कि कैलाश के संग घपला भया है और ये पूरी जानकारी सरपंच को भी है। झलका पंडित ने पैसा खवाया होयगा, नीचे से ऊपर लों सैटिंग सरपंच ने करी होयगी। सरपंच भले ई अब बना पर तेज वो पहले से ई है। किरपा तेली ने झूंठा बँटवारा करवाया वा में भी सहजोग इनका रहा।’

‘अब जो भयौ सो भयौ पर साँप कहवौ ठीक नईं है।’

शाम होने तक पिवना साँप गली-गली घर-घर रेंग गया। औरतों तक बात पहुँची। कुछ ने अपने मर्दों से जानकारी भी ली। किसी-किसी औरत को मर्द की डाँट भी पड़ी-

‘तेरे कान मैं कौन छोड़ गया जे साँप...?’

‘सब दूर बात होय रई है। हों का बहरी हूँ। तुमने नईं सुनी कै झलका पंडित के मुँह पै थूक दियौ अंगूरी कुम्हारिन ने...।’ स्त्री ने सूचना की पुष्टि चाही।

‘ओ हो, जे तो और ऊपर की बात होय गई। बेमानी बात का तूमार बाँधनों तो कोई तुम औरतों से सीखे। पर के परेबा बनाय के उड़ाय देती हो।’

‘कछू होय... एक जनी बड़े मुँह वालों के आगे डटी तो है। आदमी तो मुँह दुबकायें बैठे हैं या बिनके आगें पूँछ हिलाय रहे हैं।... हें हें करत भये।’ किसी-किसी मर्द को घर में ऐसे तुनक भरे उत्तर भी सुनने को मिले।

सकारे की हचलच शाम तक फैली रही। बैठक, हो हल्ला, कारिंदों का आना-जाना जैसी सरगर्मी में लोग कुछ समय के लिए भूल गए कि घर में अनाज नहीं है- भूसा नहीं। दवा दूर की चीज है और तीन महीने में मौत ताबड़तोड़ चौदह फेरे गाँव में लगा चुकी है। कई घरों में ताले पड़े हैं, अषाढ़ सिरपर है। धरती मुँह खोलेगी तो बीज बोने की सूरत दूर-दूर तक नहीं दिखती। यही सूरज जो अच्छे दिनों में छैल भँवर बना उजला-उजला दिखता है वही इस बरस दिन में उकताया हुआ और शाम के बाद ऐसी सूनी रात छोड़ जाता है जैसे कोई ग्रहस्थ संन्यासी बन धूनी रमाने किसी गुफा में जा छिपा हो।

चिंताओं का बोझ सिरपर लाद ज़िन्दगी तिल-तिल घिसट भले रही हो इसके बावजूद मास्टर जी के द्वार पर और दिनों से दुगुना मजमा जुड़ा था। मास्टर साब अपनी सनातन खटिया पर तथा पांयते की ओर कुर्सी डाले राजाराम। मास्टर जी को अपनी हार की टीस के अलावा कोई अभाव नहीं और राजाराम को इससे राहत है कि उधार के हजार में से नौ सौ खर्च करने के बाद बेटे का बुखार कम हुआ है। सब कोई इन दोनों में से किसी एक का (भी) मुँह खुलने की प्रतीक्षा का मुँह जोह रहे थे ताकि बात निकले, बढ़े और यहाँ वहाँ कहने-सुनने, जोड़ने-घटाने का सिलसिला शुरू हो। कैलाश व अंगूरी गाँव से बाहर कहाँ हैं? किसी को ज्ञात नहीं, बस इतना सुराग भर है कि दोपहर के समय थाने के बाहर हनुमान जी के चबूतरे पर बैठे दिखे थे। झलका पंडित भी स्कार्पिओ में सरपंच को बैठाकर ले गया। थानेदार वैसे तो सरपंची के प्रभाव में है पर उसे बार-बार साधना पड़ता है। राजनीति में लाठी डंडे का सहयोग जरूरी है। अन्याय और अपमान के विरोध में कुम्हारों के छहों एकजुट हो कैलाश के बड़े भाई को साथ ले मास्टर जी के द्वार पर आ गए।

‘मास्टर साहब! जे अरेआम अन्याय है कि नहीं। जे बिरमा कह रया है कि मैंने दो बीघा की रकम बई है, पंडित ने पूरो खेत कैसें लिखवाय लियौ, नईं मालूम। ठीक है कि या का छोटे भैया कैलास से घरेलू झगरा है पर या मामले में जे भाई का साथ देने कूँ तैयार है।’ - एक कुम्हार ने बात रखी। इसने चुनाव में मास्टर जी के पक्ष में वोट किया था।

मास्टर जी ने ओठों पर हाथ फेरा फिर माथामला और जरा आगे झुककर बोले ‘हरजीत भाई! तुम्हारे साथ तो हम हर बनी बिगड़ी में हैं पर ये दोनों भाई हमारे विरोधियों के संग रहे। इन्होंने पहले ही सोचना चाहिए था कि डंक मारना उसकी फ़ितरत में है। तुम्हीं सोचो, इनके रट्टे में हम क्यों पड़ें ख़ामखा।’ - मास्टर जी ने हरजीत के कंधे पर हाथ रखा।

‘पर महाराज, साँची तो कहौगे...?’

‘इन्नें झूठे बेईमानों का साथ दिया तो भुगतना पड़ेगा ना! हाँ, तुम्हारी बात होती तो तुम हमें अपने संग खड़ा देखते। वैसे भी हमारे बीच में कूदने पर लड़ाई आरपार वाली हो जायेगी। कहो, मौके पर गोलीबारी की नौबत बन जाये। समझ रहे हो ना हरजीत...। झलका इस टैम पावर में है सो बुरी ठन जायगी इसलिए हमें झमेले से दूर ही रखो।’-मास्टर जी ने तटस्थता का प्रस्ताव रखा।

‘पर जब राजनीति में उतरे हैं आप, तो झमेले झेलने पड़ेंगे गुरु जी। जनता को जब भरोसा हो जाता है कि कोई सचाई के लिए लड़नेवाला है तो वह झूठ के खिलाफ खड़ी हो जाती है। ये एकदम नहीं होता...।’- राजाराम ने हस्तक्षेप किया।

‘एकदम तो नहीं होता पर मेरे भाई, खून पेट में खुराक पहुँचने से बनता है बातों से नहीं। खेत अब झलका के नाम है। कब्जा भी उसने लिखा लिया होगा पटवारी के कागजों में। अदालत में भी लड़ो तो, को स्टे होगा यानी यथास्थिति, तो भी फायदा झलका को। पुलिस और पंचायत उसके कब्जे में हैं ही। दीवानी दावा करो तो अदालत में जाने कितने साल में फैसला आये। मतलब यही कि कैलाश की बची खुची जमीन भी बिक जावेगी।... फिर कहीं किसी लालच या भय में सरपंच ने कैलाश को ही अपने पक्ष में कर लिया तो क्या करोगे? इसलिए हरजीत भाई, तुम सोच लो। हम तो कैलाश को नहीं तुम्हें आगे रखेंगे... तुम्हारे साथ रहेंगे-गाँव से अदालत तक और फौजदारी में चाहे गोली काहे न चले।’’

मास्टर जी पाये की बात कर रहे थे। यहाँ कैलाश है नहीं... उसके बारे में दूसरा कौन जिम्मेदारी ले? कहीं वही दूर गया तो...। आजकल बड़े-बड़े पलटी मार रहे हैं। सुबह एक दूसरे को कोसते हैं तो शाम को गलबहियाँ डाले दिखते हैं।

देर रात तक ऐसी ही बातें होती रहीं। बीच-बीच में रात और बात कच्चे धागे की तरह टूटती तो गाँठ लगाकर जोड़ ली जाती। अगली सुबह से लोग फिर से अपने-अपने धतकरम में लग गए। साधन संपन्न किसानों ट्रेक्टर जुताई के लिए डीजल की टंकियाँ भरवाने लगे तो हल बैल वाले भी मरने या बिकने से बचे, चारे की किल्लत में दाँत किर्राते, सूखे भूखे बैलों के साथ खेत जोतने की जुगाड़ बिठाने लगे। दो पानी और हो जाँय तो चौपाये उगी हुर्ठ हरियाली जीभ के सहारे कुतरकर पेट भरने लगेंगे। सदियों से चला आ रहा है कि थका हुआ बैल जुए पर सिर टिका विश्राम पाने की कोशिश करता है तो हारा किसान भी खेती का ही आसरा लेता है।

कैलाश अपनी बीवी के साथ गाँव लौट आया। वातावरण में भयानक उमस आ समाई है। कभी-कभी पत्ता तक नहीं हिलता। हवा ऐसे दुबककर बैठी है कि कहीं साँस लेने में खरच न हो जाये। दोपहरी में ऐसा भभका कि कलेजा उबलकर हलक में आ जाये। लगता है जैसे गाँव में ऑक्सीजन कम हो गई हो। गाँव का राज शहर से चलने का चलन हो गया है। सरपंच, पटवारी, सचिव, सेवक, शिक्षक, चिकित्सक आदि फिलहाल शहर से ही गाँव की निगहबानी कर रहे हैं। जरूरत पर आना जाना हो ही जाता है। दुर्दिन जैसे पहले थे, वही अब भी हैं पर सांसों की डोर इस उम्मीद में अटकी है कि ऊपर वाला कुछ न कुछ तो सुनेगा।

इसी भारी समय के विकाल में अषाढ़ आगे की कार्यवाही श्रावण को सोंप विदा हो गया। मास्टर साब अपनी खटिया पर थे और राजाराम कुर्सी पर। दोनों शायद किसी के आने की प्रतीक्षा में थे। अभी तक नहीं आया तो कुछ देर में आ जाये शायद। आशंका यह भी होगी कि शायद वह आए ही नहीं फिर भी उम्मीद का मौन दोनों के बीच बड़ी देर से खड़ा था। मौन को परे धकेला राजाराम ने- गुरु जी... आपने सुना है पिवना साँप के बारे में?’

मास्टर जी सोचकर बोले- सुना तो है...।

‘कहीं पढ़ा भी है क्या?’

‘शायद पढ़ा ही हो। पहले ध्यान नहीं दिया था। कैलाश की घरवाली ने ध्यान दिलाया उसका।

‘किसी ने देखा भी होगा, उस साँप को...।’

‘शायद किसी ने देख भी लिया हो। मुझे याद आता है कि यह साँप काटता नहीं है। बस जिसे मारना होता है, सोते समय उसकी छाती पर चढ़ फुंकार के साथ अपना जहर छोड़ता है। वही जहर आदमी की साँस में अंदर जाता है। फिर पिवना अपनी पूंछ पटकक उसे जगाता है। आदमी की आँख खुलती है तबतक जहर साँस में घुल चुका होता है। कोई कुछ करे इसके पहले ही आदमी मर जाता है और साँप सरक जाता है अगले शिकर के लिए...।’

राजाराम ने सिर हिलाया- ‘हूँ ऊँ...। अब समझ में आया कि अंगूरी भौजी गाँव के चुने हुए मुखिया को ऐसा क्यों बोल रही थी। झलका पंडित ने तो पूरा खेत दोबारा जोत दिया है। वह थाने से महिला पुलिस लेकर आया था कि अंगूरी भाभी ऊधम न करे। कैलाश राजीनामा को तैयार हो गया है पर घरवाली को राजी नहीं कर पा रहा है। वह तो झलका पंडित का नाम सुनते ही थूक देती है। औरतें तो झलका के बारे में बड़ा उल्टा सीधा बोलने लगी हैं कुछ पता है आपको?’

‘ठीक है भाई! साँप निकल गया, अब पीटते रहो लकीर...।’ मास्टर साब् ने साँस खींचकर कहा। ‘अच्छा छोड़िए। गाँव के गोरखधंधे तो लगे ही रहेंगे। आप ये बताइये कि सुंदवन कहाँ है?

‘क्यों, उसकी क्या जरूरत पड़ गई?’

‘अरे इसलिए पूछ रहा हूँ कि एक तो वन ऊपर से सुंदर तीसरे वहाँ बाघ रहते हैं...।’

मास्टर साब् हँसने लगे- ‘भाई तभी लोग तुम्हें थोड़ा...।’

‘पागल समझते हैं, यही कहना चाहते हैं ना आप! बेशक पागल ही था जो बी.ए. पास होकर भी क्लर्की मास्टरी की नौकरी नहीं तलाशी। आज से बीस साल पहले मुझे आसानी से सरकारी नौकरी मिल जाती। आरक्षण के अंतर्गत प्रमोशन भी पाता और कहीं आफिस सुपरिन्टेन्डेंट अथवा हैड मास्टर, प्राचार्य बनकर बैठा निश्चिंत होता और संपन्न भी। पर मैंने गाँव में रहकर गाँव को बदलने का सपना देखा। आज बैठे-बैठे लगा कि इस गाँव में रहने से तो अच्छा है कहीं जंगल में रहना। इसी पर सुंदरवन का स्मरण हो आया।’

‘वहाँ क्या बाघों का चरित्र बदलने का सपना है?’- मास्टर जी और जोर से हँसे।

‘आइडिया ये भी बहुत शानदार है पर न सरकार करने देगी न मेरी हैसियत और स्थिति ही है। आप तो बताएँ कि है कहाँ?’

‘‘शायद पश्चिम बंगाल में है...’’

‘ओ हो, बंगाल में भी पूरब पश्चिम! तो ये पश्चिम बंगाल कहाँ है?’

‘मेरे भाई, पश्चिम बंगाल अपने भारत में ही है। अब ये न पूछना कि भारत कहाँ है?’

राजाराम भी हँसने लगा ‘नहीं नहीं, वो तो मुझे पता है कि ‘इंडिया’ में ही कहीं है।’

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