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कहानी / आँच / हरि भटनागर / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1

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हरि भटनागर आँच उसका नाम जगदीश था। सामने की पहाड़ी पर, ढाल की तरफ़, नाले से सटी, कई सारी झुग्गियों के बीच उसकी झुग्गी थी। मेरा स्विचबोर्ड ख़रा...

हरि भटनागर

आँच

उसका नाम जगदीश था। सामने की पहाड़ी पर, ढाल की तरफ़, नाले से सटी, कई सारी झुग्गियों के बीच उसकी झुग्गी थी।

मेरा स्विचबोर्ड ख़राब हो रहा था, लैम्प किसी तरह जलता न था। क्षण भर को जलता फिर बुझ जाता। ट्यूबलाइट की रौशनी मेरे लिए नाकाफ़ी थी। लैम्प की रौशनी में ही मैं लिखता-पढ़ता था। कमज़ोर नज़र भी इसका एक कारण था। ख़ैर, लैम्प अब जल ही नहीं रहा था तो लिखूँगा क्या? ख़ाक़!!! जबकि अख़बार का कॉलम मुझे देर रात या ज़्यादा से ज़्यादा नौ-दस बजे सुबह तक लिखकर, हर हाल में, मेल करना होगा। समय-सीमा का मामला है। और जीविका का आधार! कॉलम के अलावा दूसरा कोई हीला भी अपने पास नहीं है। सो, परेशान हो उठा था मैं! तभी जगदीश का ध्यान आया। क्यों न उसे बुला लाऊँ? है तो वह दुष्ट, भारी नशैला, बावजूद इसके काम जानता है। मिनटों में स्विचबोर्ड ठीक कर देगा। पहले भी कई सारे काम वह कर चुका था। अभी दस दिन पहले मीटर के ख़राब हुए बोर्ड को उसने ठीक किया था और जो भी पैसा दिया था, झुककर सलाम करता चला गया था...

इस वक़्त मैं उसकी झुग्गी को खोजता-धीरे-धीरे चल रहा था कि उसने मुझे जैसे दूर से देख लिया हो, क़रारी आवाज़ जिसमें नशे का डाँवा-डोलपन था, लगाता टटरा हटाता, हाथ लहराने लगा जैसे बतलाना चाह रहा हो कि साब! मैं यहाँ, इस झुग्गी में रहता हूँ। कोई काम हो तो बताएँ। मिनटों में चुटकी बजा के निपटा दूँगा।- टटरा हटाकर वह बाहर निकल आया था। ठिठककर रुक गया जैसे

आगे बोल रहा हो- लेकिन साब! काम मैं कर दूँगा, मगर पिछली दफ़ा की तरह पैसे झंख के मत देता। उस दिन तो मैं पता नहीं क्या सोच के, लौट आया था, पैसे जेब में डाल लिए थे, मग़र दिमाग़ भारी गरम था। शराब की दूकान पर तो और गरम हो गया था जिसे मैं किसी तरह क़ाबू नहीं कर पा रहा था। बार-बार आपकी मैया-बहन कर रहा था। दो सौ का काम और पचास रुपये! हद थी! उसमें एक पाउच भी ढंग का नहीं मिल रहा था...

मैं जगदीश को देख रहा था। सोचने लगा, कमीन लगी में है, काम क्या करेगा! मैं अटकी में था, दूसरा कोई मिस्त्री इस वक़्त मिलते से रहा, सो उसकी तरफ़ बढ़ा।

इस बीच जगदीश ने आगे बढ़कर, मेरा हाथ पकड़ लिया। कँटीला, लोहे की संड़सी जैसा हाथ! क्या खाता है साला!!!

यकायक मुझे एहसास हुआ कि हाथों पर उसकी पकड़ सख़्त हो गई है। पूरी ताक़त लगाकर भी हाथ छुड़ाना संभव नहीं। वह मुझे अपने तख़ते पर बैठालना चाह रहा था, चाय पिलाने की ख़ातिर। उसने मुझे अपनी तरफ़ खींचा। बचाव में मैं फिर कभी फुर्सत से बैठने की कहके उसकी लौह पकड़ से छूट पाया। और सुकून-सा महसूस कर रहा था...

और उस वक़्त तो मैं और सुकून-सा महसूस करने लगा जब उसने अपने इन्हीं संड़सी जैसे पंजों से स्विचबोर्ड ठीक करके लैम्प जला दिया।

इसके पहले मेरा सुकून ग़ायब था। जगदीश स्विचबोर्ड को पूरा खोल चुका था और लैम्प किसी तरह जल नहीं रहा था। करंट ही नहीं था। कॉफ़ी देर तक वह स्विचबोर्ड से उलझता रहा। उसने सारे प्वाइंट खोल डाले थे। टेस्टर से बार-बार करंट की जाँच करता और करंट था कि पूरी तरह नदारद! इस चक्कर में वह कई बार मीटर के बोर्ड को देख आया था। मामला सुलझता न था। आख़िर में उसने एक नया स्विचबोर्ड फिट किया, जो उसके छोटे से अगड़म-बगड़म सामानों से भरे झोले में ठँसा था। उनके तारों को अदला-बदला कि करंट आ गया- लैम्प जल उठा था।

मैंने राहत की साँस ली और जैसा कि पहले कहा, सुकून-सा महसूस किया लेकिन यह सुकून पूरी तरह ग़ायब हो गया जब उसने पैसे लेने से इंकार कर दिया। पचास के नोट को वह चूतिया बनाना कह रहा था। और बड़बड़ाने लगा था कि एक तो काम कर दिया, उस पर पैसे दे रहे हैं जैसे मैं भीख माँग रहा होऊँ! कहीं दूसरी जगह काम किया होता तो सौ-डेढ़ सौ तो मिल ही जाते- यहाँ पचास रुपट्टी!!! जैसे मैं कोई चूतिया हूँ! चूतिया!!! काम की कोई वैलू नहीं। अभी लैपटॉप ख़राब हो जाता तो आपरेटर पाँच सौ खैंच लेता और आप ख़ुश हो के देते-लेकिन मुझे देते...

उसने नोट सामने फेंक दिया जैसे गाली देता कह रहा हो कि नहीं चहिए!

-कितना गंदा आदमी है। बेअदबी पर उतर आया है। बाबजूद इसके मैं सहज रहा, शांत भाव से पूछा- कित्ते चहिए भैया?

-कित्ते चहिए भैया? जैसे कुछ जानते-समझते नहीं- उसने मुझे कठोर निगाहों से देखा। आँखों में नशे की लालिमा थी। बाल लटों की शक्ल में धूल-पसीने से भरे। नाक लम्बी और मस्सों से भरी थी। मूँछें गीली, टूटी छतरी जैसी जिसमें मिचमिची आँखों का पानी रिस-रिस कर ठहर गया हो। कमीज़ के बटन नदराद। छाती चौपट खुली हुई। छाती के सफ़ेद-काले बाल कंटीली झाड़ी की तरह गुत्थम-गुत्थ थे।

उसकी यह धज देख मैं दंग था।

- कित्ते चहिये भैया!!! अपने को ग़ौर से देखे जाने पर मेरी नकल-सी बनाता, दोनों हाथों को मत्थे पर मारता वह तकरीबन बिफर-सा पड़ा- पचास रुपट्टी होते हैं इस काम के?

- और कित्ते होते हैं?- मैं सख़्त आवाज़ में अकड़कर बोला।

- सौ तो दीजिए! थोड़ा ढीला होता वह बोला।

- सौ! नागवार-सी गुज़रती उसकी बात पर मैं ज़ोरों से बोल पड़ा- सौ रुपये तो किसी कीमत पर नहीं दे सकता। यह तो बेईमानी है!

- बेईमानी! काम सुलटा देना बेईमानी होता है!- वह गर्दन हिलाता बोला- अगर मैं काम करने से पहले पैसा बता देता तो आप न चाहते हुए भी देते। जब सौदा तय नहीं हुआ तो सही मेहनताना देने से कतरा रहे हो- यही बात तो बुरी लगती है, आप लोगों की!!!

- क्या? हम सब लोग बेईमान हैं, तुम लोगों का पैसा मार लेते हैं?- मैं आग-बबूला होता गरजा।

- इसमें गरम होने की क्या बात है, साब? जो बात सच है, उसे मंजूर क्यों नहीं करते?

- हम लोग तुम लोगों का हक़ मारते हैं?- मैं उसके मन की पूरी बात जान लेना चाहता था।

- जी! आप लोग, हम लोगों का हक मारते हैं। अभी-अभी आप मेरा मेहनताना मार रहे हैं, उस पर आँखें दिखला रहे हैं!!!

- मैं आँख दिखला रहा हूँ कि तू?- मेरी शालीनता अब जवाब देती जा रही थी।

- पूरे पैसे नहीं मिलेंगे तो आँख दिखाना कहाँ का जुर्म हुआ?

- सौ रुपये तो मैं नहीं दे सकता, तुझे लेना हो तो ले, नहीं, फुट यहाँ से।

- ठीक है साब! जाता हूँ; लेकिन जान लीजिए...

- हाँ-हाँ, जान लिया! तेरी भभकी से मैं डरने वाला नहीं। किसी से भी पूछ ले, इस झटल्ली काम के कित्ते पैसे होते हैं?

- झटल्ली! झटल्ली है मेरा काम?- आग की तरह जलता वह मेरे सामने तनकर खड़ा हो गया।

न चाहते हुए भी मुँह से गाली निकल गई थी, पीछे हटने पर हेठी होती, इसलिए मैं भी तनता हुआ ज़ोरों से बोला- झटल्ली काम नहीं, तो क्या है? कौन सा ट्रांसफार्मर ठीककर दिया।

वह तड़ककर गर्दन हिलाता बोला- काम, काम होता है, साब! लैंप हो या ट्रांसफार्मर! काम को गाली देना बहुत ही गंदी बात है! फिर, काम झटल्ली था तो क्यों आए मेरे पास झुग्गी में, बैठे रहते अपने घर में! तब तो दौड़े चले आए....

-ठीक है यार!- जब मैं शर्मिन्दगी के लहजे में थोड़ा नरम हुआ तो वह अफसोस में सिर हिलाता बोला- चालीस साल हो गए काम करते- मेरे काम की, हुनर की सभी तारीफ़ करते हैं। आज तक किसी ने ऐसा कचरा नहीं डाला जैसा आपने!

अपनी ग़लती मानने पर भी यह कमीन सिर पर चढ़ा जा रहा है, मेरा पारा यकायक फिर चढ़ गया, बोला- कौन सा कचरा डाल दिया? जब मैं मान रहा हूँ कि ग़लती हो गई, फिर काहे को तूल दे रहा है?- थोड़ा रुककर हाथ हिलाता आगे बोला- हाँ, झटल्ली ही काम है तेरा! जो करना है, कर ले! मैं हज़ार बार यही कहूँगा।

उसके बदन पर जैसे आग डल गई हो छौछिया-सा गया, फिर विस्फारित आँखों से मुझे एकटक देखते हुए सिर हिलाने लगा, जैसे सोच रहा हो कि तेरा सोच बहुत ही गलीज है! समझाइश से कोई बात बनने वाली नहीं और तू उससे सुधरने वाला भी नहीं! तेरे साथ ऐसा कुछ करना होगा जिससे तेरी सारी हेकड़ी निकल जाए। थोड़ी देर के लिए वह कहीं खोया-सा गया। यकायक उसने कुछ दृढ़ निश्चय-सा किया। उसी बहाव में सहसा उसने सिर झटका, अपने को सँभाला और सीधा खड़ा हो गया। छोटे-मोटे औज़ारों से भरा थैला उसने बाएँ हाथ से पीठ पर लादा और मेरी ओर ऐसे देखा जैसे गेट खोलने के लिए कह रहा हो। उसका लहजा अब एकदम शांत था। जब मैंने गेट नहीं खोला तो झुककर उसने खटका हटाया और बाएँ कंधे से हल्के से उसे ठेलता बाहर निकला और मिनटों में नज़र से ओझल हो गया।

मैं भयंकर ग़ुस्से में था, बुदबुदाया-ठीक है, भग जा और उसे जलती निगाहों से जाता देखता रहा। बावजूद इसके अंदर ही अंदर अफ़सोस ने करवट ली कि दुष्ट काम तो कर गया, पैसे के लिए ऐंठ दिखला रहा था। दस-पाँच और ले लेता! मगर नहीं। जैसे मैं पीछे-पीछे आऊँगा, रिरियाऊँगा।

काफ़ी देर तक मैं गेट के सहारे खड़ा रहा और उसके लौटने का इंतज़ार करता रहा। आख़िर में हारकर अपनी मेज़ पर आ गया। लैम्प जलाया। रूलदार काग़ज़ को देखता हूँ। विषय का ख़याल करता हूँ। पेन उठाता हूँ।

तीन घण्टे बीत गए, एक शब्द नहीं लिख पाया हूँ। कुछ सूझ ही नहीं रहा है।

*

रात है, सर्दी की रात। सब ओर ख़ामोशी। गहरी ख़ामोशी। पेड़ भी ख़ामोशी की साया में डूबे। दूर कहीं कोई माचिस जलाये तो उसकी आवाज़ सुनाई दे।

मैं पेन लिए बैठा हूँ। रूलदार काग़ज़ पर निगाह डालता हूँ। दिमाग़ जगदीश में लगा है।

- साला! दुष्ट! नीच! कमीन!- ये मन के भाव हैं- गजब है! पैसे फेक के चला गया। जाते-जाते कैसा मुँह बना रहा था- जैसे खा जाएगा! मैंने पेन रखा तो बाहर किसी के चलने की आवाज़ आई। चप्पलों को घिसटाता जैसे कोई चलता आ रहा हो। ज़ाहिर था कि जगदीश लौटने वाला नहीं। तीन घण्टे बाद भला वह नशैला क्या लौटेगा? देखा तो जगदीश था। झाँककर देखने पर ही जगदीश ने मुझे देख दिया था और बीच सड़क पर, मेरे घर के सामने झुककर टेढ़ा खड़ा हो गया।

मैं कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। घबराया। यह इतनी रात में क्यों आया? पैसा चाहता है क्या? लेकिन पैसे के लिए उसे आवाज़ देनी चाहिए? गेट पर खट-खट करना चाहिए? यह तो ऐसा कुछ भी नहीं कर रहा है? ज़रूर इसकी कोई नई चाल है? इतनी रात गए यह कोई ऐसा नाटक करेगा जिससे मुहल्ले के लोग इकट्ठा हो जाएँ और फिर यह उनके सामने अपनी बात रखे। चिल्लाकर कहे कि साब, कॉलोनी के एक रसूखदार आदमी की हरकत तो देखो, पहले किसी भी तरह से झुग्गी से मुझे बुलाकर ले आते हैं, काम करवाते हैं- पैसे के वक़्त गाली देते हैं- यह कहाँ का न्याय है?

उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया। शांत भाव से खड़ा रहा। रह-रह वह गर्दन उठाकर आसमान की ओर देख लेता जैसे कँपकँपाते तारों से अपने साथ हुए अपमान की शिकायत कर रहा हो!

थोड़ी देर बाद वह सीवरलाइन के बड़े से पत्थर पर बैठ गया, पाल्थी मारकर। शांत भाव से बैठकर, अपनी आमद भर से जैसे वह मुझे बेचैन करना चाह रहा हो।

मैंने सोचा कि गेट खोलूँ और जो भी रुपये माँगे, उसकी तरफ़ फेक दूँ- मैंने आलमारी से रुपये भी निकाल लिए लेकिन फिर यह सोचकर रुक गया कि इससे तो इसका हौसला बढ़ जाएगा। सोचेगा कि मैं डर की वजह से पैसे दे रहा हूँ। मैंने आलमारी बंद कर दी और गेट पर आ खड़ा हुआ। संध से देखा- वह शांत बैठा है- मेरे घर की ओर देखता हुआ।

यकायक उसने चप्पलें उतार दीं और एक चप्पल को ज़मीन पर हन-हन कर कई बार पटका।

कमीन चप्पलें बजा रहा है- मैं बुदबुदाया।

चप्पल पटकर वह फिर शांत बैठ गया। अनशन की मुद्रा में। घुटनों पर उसने दोनों हाथ टिका लिए और मेरे घर की तरफ़ एकटक देखने लगा।

मैंने सोच रखा था कि नंगई के चलते मैं इसे एक पैसा न दूँगा, चाहे जो हो जाए; लेकिन उसकी इस नंगई ने मुझे बेचैन कर दिया है। सर्दी में शांत क्यों बैठा है? पैसा माँग ले तो मैं दे-दा के किसी तरह मामला ख़त्म करूँ, मगर यह कमीन ऐसा कुछ भी नहीं कर रहा है।

मैं हत्प्रभ हूँ और उस पर निगाह रखे हूँ।

मेरा पूरा ध्यान लिखने पर नहीं, जगदीश पर है।

थोड़ी देर बाद मुझसे रहा नहीं गया। मैंने दरवाज़ा खोला, लोहे के गेट का खटका सरकाकर उसके सामने आ खड़ा हुआ। पूछा- क्या बात है जगदीश? इत्ती रात में यहाँ क्यों बैठे हो?

वह चुप। पत्थर की मानिंद।

-मैं रुपये देने को तैयार हूँ- यह लो- जेब से मैंने सौ रुपये का नोट निकला और उसकी तरफ़ बढ़ाता बोला- ले! सौ रुपये! और चुपचाप यहाँ से रफा हो जा।

वह पूर्ववत रहा।

-ले ना भाई!- मैं झल्ला उठा- क्या चाहता है तू? पुलिस बुलवाऊँ?

वह उसी तरह निश्चल।

हारकर मैं घर के अन्दर आ गया, बुदबुदाता- भाड़ में जा तू। जो करना है कर!!!

*

जगदीश ने कोई गड़बड़ न की। पूर्व की तरह शांत बैठा रहा, घुटनों पर दोनों हाथ रखे उस पर सिर टिकाये- मेरे घर की तरफ़ एकटक देखता हुआ।

काफ़ी रात गुज़र चुकी है। ठण्ड बढ़ रही है। मैंने हीटर जला लिया है। बाहर जगदीश जैसे ठण्ड से बेपरवाह है।

- क्या करूँ? कॉलम तो गया अब!!!- गहरी साँस छोड़ता मैं माथे पर हाथ रखे सोचता हूँ, ऐसा कब तक चलेगा? जगदीश कोई नया नाटक करेगा क्या? जिसकी खातिर वह अभी तक शांत- बेपरवाह बैठा है।

जगदीश ने कोई नया नाटक नहीं किया। ठण्ड बढ़ने पर उसने आसमान की ओर देखा जैसा तारों से कह रहा हो कि तुम तो शायद नहीं, लेकिन मैं ज़रूर ठण्ड को टक्कर दे सकता हूँ- इस ख़याल के चलते कूड़े के ढेर से काग़ज़-पन्नियों को इकट्ठा किया। उसमें माचिस की काड़ी दिखलाई। थोड़ी देर में लपट उठने लगी जो तारों तक जाती लग रही थी जिसे वह बहुत ही प्यारी नज़रों से देख रहा था।

अब वह उसकी आँच में और भी बेपरवाह हो गया था। और मेरे घर की तरफ़ लगातार, बिना पलक झपकाए देखे जा रहा था।

मैं हीटर की गरमाहट में भी काँप रहा था।

***

संपर्क:

197, सेक्टर बी, सर्वधर्म कॉलोनी

कोलार रोड, भोपाल 462042

मो. 9424418567

E-mail : haribhatnagar@gmail.com

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गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: कहानी / आँच / हरि भटनागर / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1
कहानी / आँच / हरि भटनागर / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1
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रचनाकार
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