रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

काशीनाथ सिंह / पाठक मेरे लिए अमूर्त कभी नहीं रहा / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1

कथा-कसौटी (लेखक)

काशीनाथ सिंह
पाठक मेरे लिए अमूर्त कभी नहीं रहा


मेरे लिए कुछ भी पूर्वनिश्चित, निर्धारित और स्थिर नहीं रहा-चाहे वह कहानी हो या पाठक। जैसे जैसे समय बदला, उसके साथ मैं बदला, नतीजतन कहानी भी बदली और मेरे पाठक भी। पाठक मेरे लिए अमूर्त कभी नहीं रहा। आज वे मेरे पाठक नहीं हैं जो पहले कहानी संग्रह के दिनों में थे!


मैंने जब शुरूआत की थी तो सिर्फ इतना जानता था कि कोई भी 'क्राइसिस' या 'आइडिया' या घटना कहानी का विषय हो सकती है- और यह भी नामवर जी की 'कहानी : नयी कहानी' पढक़र; पुरानी और नयी कहानियों का अध्ययन कर के। चूँकि कहानी कविता या आलोचना नहीं है इसलिए उसमें कहानीपन या किस्सागोई भी होना चाहिए।.. और मैंने शुरू कर दिया था ब$गैर इस बात की चिन्ता किये कि क्यों लिखना है? मैं लेखक होना चाहता था- कि लोग जानें कि मैं भी लेखक हूँ? कौन लोग? लेखक, पत्रिकाओं में रुचि रखने वाले! पढ़े-लिखे साहित्यप्रेमी लोग।


इसके सिवा कोई बात थी तो वह यह कि जीवन की घुटन, एकरसता और ऊब के बारे में भी लिखूँ तो कहानी नीरस और निर्जीव न हो। उसमें जीवन की गंध बनी रहे।


सन् 67 में राज्यों में संविद सरकारें बनीं और पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी विद्रोह हुआ। उस आन्दोलन के कुछ ग्रुप्स बनारस में भी सक्रिय हुए। मैं भी उनसे जा टकराया। उनमें से एक ग्रुप का कहना था कि साहित्य-वाहित्य एकदम फालतू चीज है। मोटमर्दी और ऐशो-आराम की चीज है। आन्दोलन से उसका क्या लेना-देना? दूसरे ग्रुप का कहना था- नहीं, इसकी भूमिका है हिरावल दस्ते की। बुर्जुआ जनतंत्र के अन्तर्विरोधों को उजागर करने की, सामन्तों-पूँजीपतियों से लडऩे वालों की बड़ी तादाद है, उनके संघर्ष की आवाज उठाने की, अपनी कलम उन्हें ताकत, विश्वास और समर्थन देने की; उन्हें लगे कि उनके साथ देश के बुद्धिजीवी और कलमकार भी हैं... आदि! तो हम क्यों लिखें? किसके लिए लिखें? ये सवाल जो मेरे भीतर उठ रहे थे उनके उत्तर जैसे मुझे मिल गए और मैं आपातकाल तक उसी मिज़ाज की कहानियाँ लिखता रहा। उनमें से कोई कहानियों की प्रशंसाएं भी हुईं।


ये कहानियाँ लघु पत्रिकाओं में छपी थीं और इनको पढऩे वाले ज्यादातर प्रगतिशील और जनवादी थे। इनके सिवा थे तो राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाले किसी-न-किसी संगठन के कार्यकर्ता या जे.पी. आन्दोलन के भागीदार। किसी कहानी को समझने में उन्हें कोई दुविधा नहीं हुई थी। ये ही मेरे प्रबुद्ध पाठक थे और मुझे संतोष था।


लेकिन यह संतोष बहुत दिनों तक कायम नहीं रहा 78 में 'आदमीनामा' के बावजूद। 'सुधीर घोषाल' 'मुसइचा' 'लाल किले के बाज' की चर्चा के बावजूद। मुझे लग रहा था कि ये पाठक पढ़े-लिखे हैं, विशिष्ट हैं, सामान्य नहीं। जैसा मैं, वैसे वे। जैसे मैं ही लिख रहा हूँ, मैं ही पढ़ रहा हूँ, मैं ही अपनी पीठ भी थपथपा रहा हूँ। सामान्य से मेरी मुराद भी उस पाठक से जिसका कर्मक्षेत्र साहित्य न हो। जो पढऩा तो चाहता हो लेकिन समय काटने के लिए नहीं, मनोरंजन के लिए नहीं, पढऩा चाहता हो कहानी या उपन्यास लेकिन खुद को पाने के लिए, अपनी पास-पड़ोस की छवि देखने के लिए, जाने-अनजाने लोगों की छवियाँ, जीवन की छवियाँ। और जिस कहानी- उपन्यास में अपनी जैसी छवि की झलक मिल जाती है, वह उसके साथ हो लेता है।... उन दिनों पूरे देश में प्रेमचंद की जन्म शताब्दी मनाई जा रही थी! मेरे दिमाग में बार-बार आ रहा था कि जहाँ बहुत-से कथाकर इतिहास बन चुके हैं, वहीं प्रेमचंद हमारे वर्तमान ही नहीं, भविष्य भी बने हुए हैं- जबकि न हल-बैल रह गए हैं, न वे खेत-खलिहान। आखिर क्यों?


बहरहाल, अपनी इसी समझ के साथ मैंने कुछ कहानियाँ लिखीं 'अपना रास्ता लो बाबा' 'कहानी सराय मोहन की' 'सदी का सबसे बड़ा आदमी।' ये कहानियाँ मैंने मौज में लिखीं! कोई तनाव नहीं। स्वाभाविक रंग में! लिखने में भी म$जा आया! जैसे बहुत दिनों की जद्दोजहद के बाद मुझे अपना 'फार्म' मिला हो। हर लेखक के साथ यह होता होगा।


पाठकों का दायरा कुछ बढ़ा। इन कहानियों ने रंगमंच का भी मुँह देखा मुझे लगने लगा कि छोटी कहानियों की तुलना में लंबी कहानियों या उपन्यासों में मैं ज्यादा खुलकर खेल सकता हूँ। छोटी कहानियाँ मुझे अपने नियंत्रण में ले लेती हैं और मैं जीवन की जैसी छवि उकेरना चाहता हूँ, संभव नहीं हो पाता।


रही बात पाठकों की तो उन्हें भले शिकायत हो, मुझे उनसे कभी किसी तरह की शिकायत नहीं है। वे मुझे स्वीकार करें या ठुकरा दें- यह उनका संवैधानिक हक है।
---.
संपर्क:
बी- 61, ब्रज इन्क्लेव कॉलोनी,
सुंदरपुर, वाराणसी
221005
मो . 9235851597

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget