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अगिन असनान / कहानी / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1

आशुतोष

अगिन असनान

हमेशा से चुहुलगुल बहावलपुर में अब सन्नाटा था। आस्था, भय और रहस्य में लिपटी एक अजीब किस्म की खामोशी पूरे गाँव में फैली हुई थी। दिन तो जैसे तैसे कट जा रहे थे पर रातें इतनी भयावह हो रहीं थी कि जैसे सब कुछ को निगल कर ही मानेंगी। ऐसे में तीन दिन और तीन रात बीत गए, पर कुछ हो नहीं रहा था। कुछ नहीं होने से गाँव वाले और अधिक डरे हुए थे। लोरिक का पूरा परिवार फरार था, कहाँ? ये किसी को मालूम नहीं। उनके दरवाजे पर बंधी गाय भूखी-प्यासी रम्भाती रही, पर रात में किसी ने गाय का पगहा काट दिया, वो भी पता नहीं कहाँ चली गयी। अब लोरिक के परिवार के बारे में बताने वाला कोई नहीं था। वैसे गाय होती भी तो क्या बताती।

चौथे दिन एक बड़े अखबार का एक क्षेत्रीय पत्रकार बहावलपुर में पहुँचा। और पाँचवें दिन पूरे जनपद की सुबह इस खबर से हुई कि 'बहावलपुर में हुआ सती कांड।' पहली बार उस अखबार में उस क्षेत्रीय पत्रकार के नाम से कोई खबर छपी थी इसीलिए उसने उस खबर को लिखने में अपनी कलम तोड़ दी थी। कलम तोडऩा मुहावरे में नहीं है, उसने सचमुच में तोड़ दी थी। खैर! खबर का सार यह था कि 'बहावलपुर के लोरिक पुत्र जियावन के बड़े बेटे मगरु की तबियत काफी दिनों से दिक् थी। घर वाले उनका दवा-दारू करा कर आजिज आ चुके थे। पर रोग ठीक नहीं हुआ। उसी रोग के कारण चार दिन पहले वे शांत हो गए। मगरु की मृत्यु से दुखी उनकी पत्नी सुनैना देवी ने सती होने की घोषणा के साथ कि अपने पति मगरु की लाश को अपने गोद में लेकर अग्नि स्नान कर लिया।

फिर क्या था, एक साथ पूरा जनपद जाग गया। कुछ आस्था में, कुछ आक्रोश में तो कुछ नौकरी की महज औपचारिकता में।

दोपहर होते-होते पूरा बहावलपुर गर्दा-गर्दा हो गया। बहावलपुर में सबसे पहले पहुँचने वालों में थाने के दारोगा और सिपाही थे। दारोगा जी केस से जुड़े हुए सभी मामलों की जाँच-पड़ताल कर चुके थे। उनकी जाँच रिपोर्ट और अखबार में छपी खबर में कहन के लहजे के अलावा कोई विशेष फर्क नहीं था। सती कांड के अपने बारह मिनट के ब्यौरे में दारोगा जी ने चौदह बार यह कहा कि 'साहिब इते पैले नम्बर हम आये ते।' बहावलपुर में सबसे पहले पहुँचने वाली बात पर दारोगा जी को इतना जोर देते देख कप्तान साहब चिढ़ गए। नौकरी होती ही ऐसी है बड़ा से बड़ा ओहदेदार अपने मातहतों को कभी किसी बात का श्रेय नहीं लेने देता। मातहत श्रेय लेने की नहीं, नाकामियों की जिम्मेदारी लेने की नौकरी करते हैं। देश की सबसे बड़ी परीक्षा पास कर पुलिस अधीक्षक बने साहब को उस दिन दारोगा ही सबसे बड़ा प्रतियोगी नजर आने लगा। कप्तान ने दारोगा को पुलिस की आवाज में घुड़क़ा 'ये क्या लगा रखा है, सबसे पहले पहुँचे?' दरोगा जी ऐसे ही नहीं कई वर्षों से दरोगा थे, वे तुरन्त समझ गए 'मनो आप आये, पाछे से हम पहुँचे।' कप्तान साहब अभी थोड़ा आश्वस्त होते कि कलेक्टर साहब भड़क़ गए 'तुम लोगों ने ये क्या ड्रामा फैला रखा है? आयं, सारी खबर तुम्हीं लोगों की थी, मुझे तो जैसे कुछ पता ही नहीं। मैं कल रात को ही गृह सचिव साहब के साथ एक पार्टी में था, मुझे तभी पता लग गया था।' कलेक्टर साहब को रात में ही इस घटना की खबर हो गयी थी, इस बात का तो नहीं पर गृह सचिव साहब के जिक्र का पर्याप्त असर कप्तान साहब पर हुआ। वे लपक कर बोले 'एस एस सर! पहले आप आये और उसके तुरन्त बाद मैं पहुँचा।' दरोगा जी को लगा कि कहीं उनकी आमद की बात दब न जाय, उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी 'और आप के पिछारे से हम पौंचे।' सिपाहियों ने भीड़ को हटाने की गरज से डंडा फटकारा, उन लोगों ने शब्दों में तो नहीं पर डंडे की भाषा में बता दिया कि 'हमौरे सोई आये ते।'

सारे हाकिम-हुक्काम आ तो गए थे, पर एक मुश्किल यह आ रही थी कि बहावलपुर का कोई आदमी सुनैना देवी के सती होने पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था। जिससे पूछते वो खुद को मासूम और अंजान बता भीड़ में जाकर खड़ा हो जाता। आस-पास के गाँवों से ट्रैक्टर-ट्राली, जीप, बलेरो, मोटर साइकिलों से भर-भर कर लोग आते जा रहे थे। दोपहर से शाम हो गयी। पर सुनैना देवी सती कांड के बारे में सही वस्तु स्थिति का कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था। जहाँ सुनैना देवी सती हुई थीं, उस जगह को पुलिस ने बाँस की बल्लियों से घेर दिया था। वहाँ पुलिस के दो जवान तैनात थे। किसी को भी वहाँ जाने की अनुमति नहीं थी। प्रशासन को डर था कि सती स्थान पर कोई पूजा आदि न करने लगे। भीड़ बढ़ती जा रही थी। जैसे पूरे जिले की सडक़ों का रूख बहावलपुर की ओर हो गया था। सुरक्षा के मद्देनजर कलेक्टर साहब ने मुख्यालय से एक बड़ा जनरेटर मगवा लिया। मामला इतना संवेदनशील था कि दोनों अधिकारियों को बहावलपुर में ही कैम्प करने का निर्णय लेना पड़ा। साहबों का यह कार्यक्रम ए.डी.एम., एस.डी.एम. पटवारी से होते हुए पंचायत सचिव तक संक्रमित हुआ। सरकारी वाहन बहावलपुर से जिला मुख्यालय तक चीखते हुए दौड़ रहे थे। सरकारी धन के गबन में निलम्बित पंचायत सचिव के तो जैसे चार जोड़े हाथ-पैर उग आये। उसने मन ही मन सुनैना देवी सती मैया से मन्नत माँगी कि 'बहाली करा दो मैया, तुमाओ बलिदान व्यर्थ ने जान देहें।' इस तरह सुनैना देवी से माँगी गयी वह पहली मन्नत थी। वो भी एक निलम्बित सरकारी कर्मचारी द्वारा। उसने आनन-फानन में अधिकारियों के लिए दो शानदार टेंट लगवा दिए। तय हुआ कि दिशा फरागत के लिए साहब लोग सरपंच जी का शौचालय इस्तेमाल करेंगे। इतना सुनते ही सरपंच और सरपंचाइन जो खाने-धोने के अलावा कभी कोई काम अपने हाथ से नहीं करते थे, शाम से ही बाल्टी झाड़ू लेकर शौचालय चमकाने लगे। कलेक्टर और कप्तान बरसों बाद किसी गाँव में आये थे। टेंट में बैठते ही उनकी ए.सी. पालित देह त्राहि-त्राहि करने लगी। कलेक्टर-कप्तान देहों की वह आर्त पुकार मुख्यालय शहर के सबसे बड़े बिल्डर ने सुनी। आये होंगे कभी भगवान गजराज की आर्त पुकार सुनकर, पर उस दिन तो घंटे भर के भीतर शहर का नामी बिल्डर कम्पनी का कसा हुआ दो ए.सी. लेकर बहावलपुर में अवतरित हुआ। कोई और समय रहा होता तो वह हर बार की तरह अपने साथ जयकारा लगाने वालों को भी लाया होता। पर बहावलपुर की हालात में ये संभव नहीं था। कलेक्टर-कप्तान देहें ए.सी. देखते ही इठलाने लगीं। ठेकेदार की श्रद्धा पर मुदित कलेक्टर साहब ने कहा 'इसकी क्या जरूरत थी।' बिल्डर मन ही मन अधिकारियों के चरण कमलों में लोट-पोट होते हुए बोला 'कैसी बात कर रहे हैं साहब, आपका यह स्वर्ण तन...।' तब तक कप्तान साहब ने संकेत कर उसे चुप करा दिया। बिल्डर अपनी चिचचिप भाषा में बहुत कुछ बहुत देर तक बोल सकता था, इसकी पूरी संभावना थी। क्योंकि बिल्डर-जीवन के इतिहास के कुछ हर्फ आसाराम बापू की भक्ति में रंगे हुए थे, ऐसा वो कई बार कप्तान साहब की महफिल में विलायती पेय के आचमन के बाद बता चुका था। बिल्डर के चुप होते ही कलेक्टर साहब आराम करने का संकेत कर टेंट में चले गए।

रात आधी ही गयी थी और आधी ही नीद में गए थे कलेक्टर-कप्तान कि बहावलपुर के उस नवोदित सती चौरा पर कई सारी विचित्र प्रकार की गाडिय़ाँ आ धमकीं। थोड़ी ही देर में स्थिति साफ हो गयी। सती कांड को कवर करने आठ सौ सरसठ किलोमीटर दूर देश की राजधानी से चैनलों के बड़े-बड़े पत्रकार बड़ी-बड़ी ओ.वी. वैन के साथ आ धमके थे। फिर तो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ शेष तीनों स्तम्भों को बिना पानी पिये कोसने लगा। पत्रकार सती कांड को लेकर अपने-अपने दावे कर रहे थे। बहावलपुर की वादियों में स्त्री-विमर्श, पितृसत्ता, विमेन्स वायलेंस, लार्ड विलियम बैंटिंग, राजाराम मोहन राय जैसे बिल्कुल अपरिचित शब्द गूँजने लगे। इस पूरे हो हल्ले में लोरिक और उनके परिवार की गुमशुदगी और सुनैना देवी के सती होने का सच सिरे से गायब था। बात सिर्फ इतनी थी कि बहावलपुर के सती चौरा से लाइव प्रसारण शुरू हो चुका था।

छठवें दिन की सुबह सती स्थान पर आरती-भजन के साथ हुई। प्रशासन की तमाम पहरेदारी के बावजूद किसी ने सती स्थान पर सिन्दूर, चूड़ी और श्रृंगार के अन्य सामान चढ़ा दिया था। दूसरी ओर भजन, कीर्तन और भंडारा भी शुरू हो चुका था। कुछ लोगों का मानना था कि इलेक्ट्रानिक चैनलों के लिए ऐसे कैमरा प्रिय दृश्य रचना कोई बड़ी बात नहीं थी। कुछ एक चैनल और अखबारों के पत्रकार उस घटना के तह में जाने की नाकाम कोशिश कर चुके थे। कहीं से कुछ सुराग नहीं मिल रहा था। सातवें दिन देश की संसद में बहावलपुर कांड पर विपक्षी दल की ओर से सवाल भी पूछे गए। पर वहाँ हो रहे हो हल्ले में सब कुछ ऊब डूब जा रहा था।

आठवें दिन तो बहावलपुर में दूसरे जिलों और पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु आने लगे। कलेक्टर-कप्तान ने अपनी सरकारी भाषा और लहजे में कहना शरू कर दिया था 'जाँच चल रही है, दोषियों को किसी भी सूरत में बक्शा नहीं जायेगा। धैर्य रखिए कानून अपना काम कर रहा है।' बहावलपुर के लोग खुश थे 'सब सती मैया की कृपा है, उनके आने से ही गाँव में पहली बार कानून आया है, वह भी काम करने।'

नवें से तेरहवें दिन के बीच में बहावलपुर के मानचित्र में व्यापक परिवर्तन हुए। सती स्थान पर मेला लग गया। होटल खुल गए। एक छोटा सा सर्कस आ गया था। शहर से आये पाकेटमारों ने भी अपना काम संभाल लिया था। सती चौरा के बगल वाले खेत के मालिक ने अपना खेत प्रोजेक्टर पर फिल्म दिखाने वाले को दे दिया। किसान को किराये में लगभग तीन सालों की फसल के बराबर का धन मिल चुका था। बहावलपुर वालों को विकास का यह नया अर्थशास्त्र जंच रहा था। मंत्रियों, नेताओं और अधिकारियों के लगातार दौरे हो रहे थे। जिला प्रशासन ने जिला मुख्यालय से बहावलपुर तक पक्की सडक़ बनवा दिया। गाँव में पहली बार बिजली के खम्भे गड़े और तेइस घंटे की बिजली आपूर्ति शुरू हो गयी। शहर के सबसे बड़े बिल्डर ने अपने दादा के नाम पर बहावलपुर में धर्मशाला बनवाने की न सिर्फ घोषणा की बल्कि काम भी शुरू करा दिया। बहावलपुर वालों के लिए ये सब किसी सपने के साकार होने जैसी था। वे इन सबको सती मैया का आशीर्वाद मान रहे थे।

चौदहवें दिन दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हुईं। पहली-सरकार ने एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक समिति बनाकर बहावलपुर की पूरी घटना की न्याययिक जाँच के आदेश दे दिए। और दूसरी, लोरिक अपनी पत्नी, दोनों बेटों-बहुओं और बेटी के साथ डरे सहमें से बहावलपुर में प्रकट हुए। टी.आर.पी. के लिहाज से दूसरी घटना पहली घटना पर भारी पड़ गयी। सती मैया के परिवार वालों के आने की खबर मिलते ही भक्तों की श्रद्धा और उत्साह चरम पर पहुँच गया। खबरिया चैनलों ने लोरिक परिवार को घेर लिया। सारे चैनल यही पूछ रहे थे कि इतने दिन तक आप लोग कहाँ थे? सामने क्यों नहीं आ रहे थे? पहले लोरिक परिवार कुछ घबराया किन्तु चारों ओर गूँजते जयकारे और चढ़ावे ने उन्हें रास्ता दिया, और लोरिक ने धीरे से कहा 'जो कछु भओ, ओ में सती माई की ही मंशा थी।' मझले बेटे ने जोड़ा 'हमाओ पूरा परिवार सती माता की इच्छा अनुसार एकांत में तपस्या करने गओ तो।' मझली बहू ने बताया कि 'हमें अपने देवर मगरू कीं तेरईं (श्राद्ध) भी करनी थी, येई लिए हम तेरह दिन तक गांव से दूर रहे।' एक स्त्रीवादी पत्रकार ने मझली बहू से प्रति प्रश्न किया कि 'केवल मगरू का ही क्यों, श्राद्ध तो सुनैना देवी का भी होना चाहिए था।' इस प्रश्न पर मझली बहू अचकचा गई। उसको तुरन्त कुछ सूझ नहीं रहा था। तब उसके देवर ने पूरे भक्ति भाव से कहा 'तेरईं केवल मनुष्यों को होत है, देवताओं को नहीं। सुनैना देवी तो माता रानी थीं, ऐसी देवियाँ जन्म नहीं अवतार लेत हैं और उनको मरन नहीं होत, वे तो बस चोला बदल लेत हैं। सती माता ने अगिन असनान से पहले हमें यही बताया था, और तेरईं करने से मना करी थी।' अभी कुछ और सवाल होते तब तक भक्तों के एक जत्थे ने पूरे परिवार की आरती, पूजा करने की घोषणा कर दी।

जाँच समिति ने अपना काम प्रारम्भ कर दिया था। हजारों लोगों के बयान लिए गए। बहावलपुर के सरपंच और लगभग सभी ग्रामीणों ने अपना बयान दर्ज कराया। जाँच समिति के सदस्यों ने लोरिक उनकी पत्नी, दोनों बेटे, बहुएँ और बेटी सभी से कई-कई बार पूछ-ताछ की। लोरिक से जांच समिति के सदस्यों ने कई तरह से पूछ-ताछ की। पर लोरिक ने हर बार एक ही बयान दिया। लोरिक ही नहीं उनके पूरे परिवार ने भी एक भाषा और एक शब्दावली में बिल्कुल एक सा बयान दर्ज कराया। 'च्मगरू की तबियत काफी दिनों से खराब थी। सुनैना के साथ पूरे घर वाले तन मन धन से उनकी सेवा कर रहे थे। लेकिन कुछ दिन पहले सुनैना ने घर वालों को बताया कि मगरू को छूत का रोग है, इसलिए वह उनको लेकर सबसे अलग खेत पर बने घर में रहेगी। मगरू की भी यही इच्छा थी। रोगी की इच्छा जान कर लोरिक और उनके परिवार वाले भारी मन से सुनैना और मगरू के अलग रहने पर तैयार हो गए। खेत वाले घर पर जाकर मगरू धीरे-धीरे ठीक हो रहे थे। घटना के एक दिन पहले मगरू और सुनैना गाँव वाले घर पर आये थे और सबके साथ रात का खाना भी खाया था। खाने के बाद थोड़ी देर तक सबके साथ बातचीत कर मगरू और सुनैना खेत वाले घर पर चले गए। लगभग तीन से चार के बीच लोरिक लघुशंका के लिए उठे तो देखा कि खेत वाले घर की ओर कुछ हलचल हो रही है। लोरिक के मन में कुछ शंका हुई उन्होंने आनन-फानन में अपने बेटों का जगाया, और मगरू के घर की ओर चल पड़े। पीछे-पीछे घर की महिलाएँ भी आ गई। वहाँ का दृश्य देख सब सन्न रह गए। सुनैना खेत में चिता साज कर चिता के बीच में बैठी है। सुनैना की गोद में मगरू की मृत देह थी। उसके एक हाथ में मगरू का सिर और दूसरे हाथ में रखे मटके में अग्नि जल रही है। घर वाले यह दृश्य देखकर घबड़ा गए। महिलाएँ तो चीख-पुकार मचाने लगीं। सुनैना ने बताया कि 'मगरू ने तो उसको विधवा बना दिया पर वह अपने तप से मगरू का परलोक सुधारने के लिए अगिन असनान करने जा रही है।' लोरिक और उनके घर की स्त्रियाँ रोने लगीं। सबने हजार मन्नते कीं पर वह नहीं मानी। पास जाने की कोशिश करने पर वह सबको अगिन असनान कराने की धमकी देने लगी। वह केवल यही कहती रही कि 'हम अपने पति के साथ अगिन असनान करेंगे। यहीं तक हमारी इस दुनिया की यात्रा रही है। हमारा देह नहीं रहेगा पर हम रहेंगे इसी स्थान पर, इसी गाँव में। हमारे बाद इसी स्थान पर हमारा मंदिर बनवाना और हमारी पूजा करना। इससे पूरे गाँव का समय बदलेगा।' इतना कह कर सुनैना ने हाथ में लिया हुआ आग का मटका अपने सिर पर पलट लिया। किसी को कुछ सोचने-विचारने का मौका मिलता तब तक चिता भभक उठी। घटना के समय वहाँ उपस्थिति लोरिक और उनके परिवार के दूसरे सदस्य सुनैना द्वारा निर्मित दैवी वातावरण में सम्मोहित हो गए थे। सुबह होते-होते सुनैना देवी ने अपने पति की लाश के साथ अगिन असनान कर लिया था।'

गाँव के दूसरे लोग चीख-पुकार सुन कर वहाँ पहुँचे थे, तब तक चिता की आग विकराल हो चुकी थी। वह पूरी घटना जिस तरह से घटित हुई थी, उसको लेकर गाँव वालों के मन में पहले कुछ संदेह भी था, किन्तु लोरिक और उनके परिवार वालों के बयान का नाटकीय रूपान्तरण चैनलों ने इतनी बार दिखाया कि सबके मन का संदेह धुल गया। अब उस घटना के सन्दर्भ में सबके पास मीडिया द्वारा रचित रंग-बिरंगे नाटकीय दृश्य ही सबसे बड़े सच थे। गाँव वालों ने उस घटना के सन्दर्भ में जाँच समिति के समक्ष जो अपने बयान दर्ज कराये वह सब चैनलों में दिखाये गए उस नाटकीय रूपान्तरण की भाषायी प्रस्तुति मात्र थी। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ ने उस घटना को जिस तरह से प्रसारित किया, उसका गहरा प्रभाव लोक और तंत्र दोनों पर पड़ा। बहावलपुर वाले अपने ही गांव में घटी घटना के बारें में अब मीडिया को ही सबसे विश्वसनीय माने लगे थे। अब सती कांड के बारे में सब कुछ मीडिया से तय हो रहा था। उसका स्वर भले आलोचनात्मक था पर बहावलपुर से सीधा प्रसारण के नाम पर उसने सती कांड को इतने तरह से दिखाया कि उसका देश भर में खूब प्रचार हुआ। दीन बदलते गए, मजमा लगता गया। मीडिया किस तरह जनरुचियों को बनाता है इसका बेजोड़ नमूना लोरिक का परिवार था। इधर के दो-एक दिनों में लोरिक के परिवार को भी यह विश्वास हो गया कि सुनैना सचमुच की सती थी और सब कुछ सती मैया की ही इच्छा से हुआ है।

वैसे तो लोरिक के घर वाले और दूसरे गाँव वालों ने बहुत सारी बातें भी बतायी थी, लेकिन जाँच समिति और सरकारी काम-काज की मर्यादा के कारण वह सब सरकारी रिकार्ड में तो नहीं, पर गाँव के प्रत्येक व्यक्ति के जुबान पर वह सब दर्ज था। मसलन कि 'जलते वक्त सुनैना देवी मुस्कुरा रहीं थीं।', 'चिता के ऊपर धुआँ गोल-गोल घूम रहा था', 'ऊपर आसमान में एक तेज रोशनी हो रही थी', 'चारों ओर से ढोल, मजीरे और शहनाई की आवाज आ रही थी', 'सब कुछ सती मैया की ही इच्छा से हुआ।' कुछ ने तो यहाँ तक कहा कि 'रोशनी से बना हुआ एक रथ ऊपर आसमान से में बहुत देर तक खड़ा था, सबका ध्यान उधर जाता तब तक वह गायब हो गया।'

जाँच समिति द्वारा तमाम बयानों, अखबारों के कतरन, चैनलों के कुछ विजुअल्स आदि सब एकत्रित किये जा रहे थे। पर सारे गवाह, सारे सबूत यही कह रहे थे कि 'सब कुछ सती मैया की इच्छा से ही हुआ है। उसमें किसी जीवित मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है।' जाँच समिति कानून से बंधी थी। तथ्य और सबूत ही उसके नाक, कान और मुँह थे। समिति ऐसे ही किसी निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले उस पत्रकार का बयान लेना चाहती थी, जिसने सबसे पहले इस घटना को प्रकाशित किया था। चैनलों के हो हल्ले के बीच उसने अखबार में बहावलपुर कांड से संबंधित दो और खोज रिपोर्ट प्रकाशित किया। उन दोनों खबरों में सुनैना देवी सती कांड पर कुछ बुनियादी सवाल उठाये गये थे। उन खबरों को बहुत ही कम लोगों ने पढ़ा। जिनने पढ़ा उनमें शहर का मशहूर बिल्डर भी था। जो अपने दादा के नाम पर बहावलपुर में धर्मशाला बनवा रहा था। वह उस अखबार को कभी अपने तो कभी अपने बच्चों के जन्मदिन के बहाने बड़े-बड़े शुभकामना विज्ञापन देता था। उन विज्ञापनों से अखबार को ठीक-ठाक पैसा मिलता था। बिल्डर के वे सारे विज्ञापन वह पत्रकार ही ले आता था। उसके एवज में पत्रकार को मिलने वाली कमीशन की रकम बहुत ज्यादे थी। लेकिन सती कांड को हत्या साबित करने वाली खबर पढ़ कर बिल्डर नाराज हो गया। क्योंकि बहावलपुर में उभरते धार्मिक पर्यटन का भविष्य देखकर तो उसने वहाँ इतना अधिक इन्वेस्टमेंट किया था। यदि बहावलपुर में हुए सती कांड को लेकर किसी तरह का कोई किन्तु-परन्तु का माहौल बना तो सबसे ज्यादा उस बिल्डर का नुकसान होता।

इसी के चलते बिल्डर ने अखबार के संपादक को और फिर संपादक ने अखबार के मालिक को फोन किया। दूसरे दिन पत्रकार जब दफ्तर आया, तो संपादक ने उसे उसके अब तक के कार्य का अनुभव प्रमाण-पत्र और सेलरी के हिसाब-किताब के साथ कुल सात हजार चार सौ पैंतीस रुपये का लिफाफा देकर माफी मांग ली। पत्रकार हैरान था। उसने संपादक से पूछा 'यह क्या है सर?' संपादक ने अपना सिर बिना उठाये अंगुली से ऊपर की ओर इशारा किया। पत्रकार समझ नहीं पा रहा था कि ऊपर वाला कौन मालिक, भगवान या कि वही सती मैया? वह धीरे से उठा और चुपचाप अखबार के दफ्तर से चला आया। पहली बार उसे खुद के एक पुर्जा मात्र होने का एहसास हुआ।

जाँच समिति ने पत्रकार को पूछ-ताछ के लिए हाजिर होने के लिए पत्र भेजा। नियत समय पर पत्रकार हाजिर हो गया। एक सदस्य ने पत्रकार से यह जानना चाहा कि वह इतने दिनों तक कहाँ गायब था। पत्रकार ने बताया कि वह गायब नहीं हुआ था, बल्कि वह चुपचाप इस मामले की छानबीन कर रहा था। छानबीन का नाम सुनकर समिति के सदस्य थोड़े से खीझेच्तो महान पत्रकार साहेब, क्या छान और क्या बीन कर लाये हैं आप?' उनके इस व्यंग्यात्मक लहजे से पत्रकार को थोड़ा गुस्सा आया, पर उसने संयम बरता 'छान-बीन तो आप लोग कर हैं साहेब, हम तो सिर्फ यह पता लगा रहे थे कि सच क्या है?' इस पर जज साहब झल्लाते हुए बोले 'हां तो बताइए कि सच क्या है? समिति के समक्ष पत्रकार ने जो कुछ बताया वह गुस्सा, आक्रोश, भय, संवेदना, भावुकता और तथ्यों से भरी हुई एक लम्बी कहानी थी। जिसका सारांश यह था कि 'सुनैना देवी सती नहीं हुई हैं बल्कि उनकी हत्या की गयी थी।'

बहावलपुर के लोरिक का भरा-पुरा परिवार था। परिवार के पास बारह एकड़ जमीन थी। लोरिक गाँव में महतो का दर्जा रखते थे। वे अपने माँ-बाप के एकल संतान थे। इसीलिए बच्चों के जन्म के मामले में काफी उदार रहे। उनकी पत्नी के कुल आठ बच्चों में पाँच पुत्रियाँ और तीन पुत्र थे। चार पुत्रियाँ बड़ी थीं, जो जन्म के एकाध साल में चल बसी थीं। जब चौथी बच्ची की मृत्यु हुई तब तक लोरिक अपने अगातम को लेकर उदास हो चुके थे। उनको बार-बार यह लगता कि वे लावारिस मरेंगे, और कोई आग देने वाला भी नहीं रहेगा। तमाम देवी-देवताओं के समक्ष अरदास लगा चुके थे। पूजा-प्रार्थना के बीच उनकी पत्नी को पाँचवीं बार गर्भ ठहरा। पूरा गर्भकाल सकुशल बिताने के बाद लोरिक की पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया। मंगलवार के दिन बच्चे का जन्म हुआ था इसलिए उसका नाम मंगरू रखा गया। वारिस मिलने की खुशी में लोरिक का तन-मन सब उछाह में था। उसी उछाह में उनकी पत्नी को तीन बार और गर्भ ठहरा। दो बार बेटे और तीसरी बार लड़क़ी हुई। अब लोरिक बाहर से भीतर तक आबाद हो गए थे। धीरे-धीरे बच्चे बड़े होने लगे और उनके साथ ही बढऩे लगा लोरिक का रुतबा भी। मगरू सबसे बड़े थे, कुल दीपक। उनका ख्याल सबसे ज्यादा रखा जाता था। लेकिन मगरू जैसे-जैसे बड़े होते गए, उनके हाव-भाव में एक भिन्न प्रकार का परिवर्तन आने लगा। घर-गाँव के लिए मगरू में आ रहा वह परिवर्तन भय और उत्सुकता का सबब बनता जा रहा था। मगरू को बाहर लड़क़ों के साथ खेलने में कम, घर में रहना ज्यादा अच्छा लगता था। उनकी रुचियाँ भी अपने हम उम्र लडक़ों से भिन्न थीं। उनसे छोटे दोनों भाइयों की देह समय के साथ गठीला होती गयी। पर मगरू का देह-मन नाजुक और कमनीय बना रहा। घरवाले पहले तो लोगों से मगरू में हो रहे इन परिवर्तनों को छुपाते रहे। पर मन ही मन मगरू को अपने खानदान पर एक धब्बा मानने लगे थे। गाँव में मगरू अब चर्चा का विषय बन रहे थे। लोरिक के डर से कोई खुले आम कुछ नहीं कहता। किन्तु मगरू को देखकर लोगों की ईशारेबाजी लोरिक से छुपी न थी। मगरू अब गैर मर्द ही नहीं, अपने बाप-भाइयों के सामने भी असहज हो जाते थे। पर अपनी माँ के साथ उनकी खूब छनती थी। दौड़-दौड़ कर अपनी माँ के काम-काज में हाथ बटाते, पर अपने पिता और भाइयों को देख कर सहम जाते। मगरू को देखते ही लोरिक जल-भुन जाते। उनको और कुछ नहीं सूझता तो अपनी पत्नी के हाथ-पैर बाँध कर मारते।

लोगों की जुबान कब तक कोई रोक सकता है। बहावलपुर में धीरे-धीरे दबी जुबान से ही सही यह चर्चा आम हो गयी थी कि मगरू नपुसंक हैं। यह बात मगरू को कैसी लगती थी इसके ठीक-ठीक साक्ष्य नहीं मिलते, पर मगरू की नपुंसकता की चर्चा लोरिक के लिए बोझ बनती जा रही थी। पर महतो का रुतबा, सच्चाई को स्वीकारने की जगह लोरिक ने मगरू के विवाह का मन बना लिया। मगरू के विवाह करने के पीछे दो कारण थे, पहला यह कि इससे मगरू की नपुंसकता को लेकर फैला लोकोपवाद खत्म होगा और दूसरा कि औरत के संसर्ग से मगरू का सुप्त पड़ा पौरुष लहलहा उठेगा। इसी योजना के तहत लोरिक ने एक दिन बगल गाँव से अपने पुरोहित जी को बुलवाया और उनके प्रति अपना आदर निवेदित कर कहाच्मराज! हमाई इच्छा है कि, हम पन्द्रह दिनों के भीतर तुमाअे और पंडिताइन के लानें दो सेट कपड़ा, घर के लानें जरूरत के सबरे बर्तन और ऊपर से एक्कइस सौ रुपैया रख के प्रणाम करहें।' दक्षिणा की सामग्री और रकम सुनकर पंडित जी के रोम-रोम से लार चूने लगा।

पंडित जी विवाह जोड़ुआ की अपनी महान भूमिका में जुट गए। जल्दी ही उन्होंने दूर के एक गाँव की एक निर्धन किन्तु लोरिक की स्वजातीय कन्या सुनैना से मगरू का विवाह पक्का करा दिया। लोरिक नहीं चाहते थे कि विवाह के पहले सुनैना के घर वालों को मगरू की सच्चाई का पता चले। इसलिए विवाह पूर्व तक सुनैना के गाँव-घर के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया गया। सुनैना ने अपने माता-पिता को नहीं देखा था, होश सम्भालते ही उसने अपने भइया-भाभी को ही सब कुछ माना। सुनैना के भाई भूमिहीन दिहाड़ी मजदूर थे। बहन का विवाह उनके लिए पहाड़ सरकाने जैसा था। ऐसे में लोरिक के पुत्र मगरू का विवाह प्र्रस्ताव उनको किसी ईश्वरीय कृपा जैसा लगा।

बहुत धूम-धाम से मगरू-सुनैना का विवाह हुआ। लोरिक ने मगरू के तन की कमी को अपने मन के उछाह से ढंक दिया। गाजा-बाजा, खाना-पीना और खातिरदारी के जोर पर मगरू-प्रसंग कुछ दिनों के लिए दब गया।

पर विवाह के तीन साल के बाद भी सुनैना और मगरू के दरमियान कुछ नया नहीं हुआ। वैसे तो मगरू की सच्चाई को सुनैना ने विवाह के पहले हफ्ते में ही जान लिया था। किन्तु औरत का धैर्य धरती की तरह होता है। सुनैना ने मगरू के पौरुष का बहुत दिनों तक इन्तजार किया। पर मगरू का मन-मेघ रह-रह कर उमड़-घुमड़ आता पर तन की अनासक्ति के कारण बिना बरसे लौट जाता। सुनैना का मन मगरू की इस पराजय से खिन्न रहने लगा था। धीरे-धीरे उसके मन की खिन्नता पहले आक्रोश और बाद में दु:ख में बदल गयी। सुनैना अपने ससुराल में मौजूद खाने-पहनने के सुख और अपने पति के दु:ख में कैद थी। स्त्रियों के सुख अजब होते हैं और दु:ख उससे अजीब। सुनैना न तो अपने सुख को लेकर इतरा सकती थी और न अपने दु:ख को किसी से कह पा रही थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि अपने दु:ख के बारे में किसी से कैसे कहे, और क्या कहे। वह सदेह एक आतुर पुकार बन गयी थी और मगरू पलटे हुए गवाह। सुनैना अपने साथ हुए इस धोखे से हार गयी थी। नैहर में भी भाई-भौजाई के पास उसके लिए क्या रखा था कि वहाँ चली जाती। दूसरे वहाँ जाकर कहती भी क्या? एक बार संकोच के साथ आपनी भौजाई से कुछ-कुछ इशारे में कहा भी तो, भौजाई ने यह कहते हुए बात खत्म कर दी कि 'उते कौन बात की कमी है, अच्छो खावे और पहरवे ओढवे खों तो मिलतई है।' अब इसके बाद भाई से कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं था।

बाद के दिनों में मगरू को देखते ही सुनैना का मन घृणा और आक्रोश से भर उठता। वह मगरू की छाया से भी बचना चाहती थी। पर मगरू किसी कोने-अतरे से चुपचाप सुनैना को देखते रहते। सुनैना को अपनी सखी सहेलियों के साथ का वो हँसी-मजाक भी खूब याद आता है। सभी सखियां अपने विवाह और अपने भावी दुल्हें के बारे छुप-छुप कितनी बातें करती थीं। सुनैना ने अपनी शादी और दूल्हे के बारे में जैसा सोचा था वैसा नहीं मिला तो कोई बात नहीं पर मगरू मिले इसकी कल्पना भी सुनैना तो क्या कोई भी लडक़ी नहीं करना चाहेगी। आज उन सारी बातों को याद कर सुनैना रात-रात भर रोती है। जैसाकि स्त्रियों का होता है, वैसे ही सुनैना का भी रात और रूलाई से बचपन का नाता था। अब तो उसकी रूलाई में और उसकी रातों में कोई फर्क नहीं बचा था। उसकी रूलाई रात की तरह अंधेरी और गहरी होती और रातें उसकी रूलाई की तरह तन्हा और उदास। मर्द अपनी जिस प्यास के बूते पर मर्द माना जाता है, औरत अपनी उसी प्यास को जाहिर करते ही चरित्रहीन ठहरा दी जाती है। सुनैना इसी लोकलाज के डर से अपना दु:ख किसी से कह नहीं पाती। नियति, समाज और मगरू द्वारा प्रदत्त दु:ख से खुद को बरी करने के लिए वह स्वयं को घर के कार्यों में उलझाये रहती। इससे भीतर के टूट-फूट को ज़माने की नजरों से बचाये रखने का उसे सुभीता मिल जाता था।

कुछ दिन बीतते लोरिक के दोनों छोटे बेटों का भी ब्याह हुआ। सुनैना ने अपनी सास और ननद के साथ दो-दो देवरानी उतारा। पहले तो देवरानियों का बात-व्यवहार उसके प्रति ठीक था, किन्तु धीरे-धीरे वे देवरानियों की परपंरागत भूमिका में उतर आयीं। सुनैना मुँहअंधेरे उठती और सबके सोने के बाद काम से फुर्सत पाती। फुर्सत काम से पाती दु:ख से नहीं। दिन यदि बक्श देते तो उसे उदास और तन्हा रातें डस लेतीं, और रात से बचती तो उसे दिन निगल लेते।

सास-ससुर, देवर-देवरानी और ननद के लिए सुनैना लौड़ी बन गयी थी। कहीं थोड़ी सी भी चूक होने पर सास, ननद, देवरानी की गालियां सुनती। किसी को उसकी कोई परवाह नहीं थी, शिवाय मगरू के। मगरू उसे देखते और सब समझते। पर कर कुछ नहीं पाते। उन्होंने कई बार चाहा कि सुनैना को इतना काम करने और सबकी सेवा करने से बरज दें, पर..., पर सुनैना ने तो तीन बरस से अबोला ठान रखा था। जब वे सुनैना को मुक्ति नहीं दिला सके तो खुद को बाहर के कार्यों में लगा लिया। अब वे भी मुँहअंधेरे उठ कर मवेशियों के लिए दाना-पानी लाते, और मिल जाने पर कुछ कलेवा कर खेतों की ओर चले जाते। दिन भर खेतों में खटते। लोरिक के परिवार में अब सबकी मौज ही मौज थी। घर का सब कुछ सुनैना के और बाहर का सब कुछ मगरू के भरोसे चल पड़ा।

एक दिन सुनैना आँगन में बैठ कर सिल-बट्टे पर मसाला पीस रही थी कि दरवाजे पर कुछ शोर सुनाई पड़ा। बाहर आकर देखा तो मगरू को कुछ लोग चारपाई पर लिटाए चले आ रहे हैं। मगरू को इस हालत में देखकर गाँव के कई सारे लोग जुट गए। उनकी बातों से पता चला कि मगरू खेत में पड़े कराह रहे थे, उनका पूरा शरीर बुखार में तप रहा था। उधर से गुजरने वाले चरवाहों ने देखा और उठा कर ले आये। उनका शरीर चारपाई पर पड़ा काँप रहा था। मगरू को उस हालत में देखकर सुनैना का मन पता नहीं कैसा तो हो गया। मगरू को खाना-पानी उनकी माँ ही देती थीं। माँ के अलावा वे न किसी से कुछ माँगते थे और न कोई उन्हें कुछ देता था। मगरू की माँ यानी सुनैना की सास को तो अपने मायके गए दो दिन हो गए। तो क्या मगरू दो दिन से....। यह ख्याल आते ही सुनैना भीतर तक हिल गयी। उसको लग रहा था कि वह सबके सामने चोरी करते हुए रंगे हाथ पकड़ ली गयी है। मगरू की कराह से उसकी आत्मा छिल रही थी। जाने वो कौन सा आवेग था कि उसके हाथ अपने आप जुड़ते चले गए 'हे दुर्गा माई! हे माता बाई! रच्क्षा करिओ।'

वो सुनैना की दुख भरी पुरानी रात्रि का तीसरा पहर था, जब वह दबे पाँव सहमते हुए अपनी कोठरी से बाहर निकली। दरवाजे पर बाहर की ओर बने खपरैल के बैठक में दवा खिलाकर मगरू को सुलाया गया था। सुनैना मगरू के चारपाई के पास पहुँच तो गयी पर समझ नहीं पा रही थी कि आगे क्या करे। क्या कह मगरू को बुलाये। मगरू को सम्बोधित करने के लिए कोई संज्ञा-सर्वनाम उसका साथ नहीं दे रहे थे। उसे यह भी ध्यान आया कि तीन बरस से ऊपर हुआ उसने मगरू को पुकारा नहीं है। पल भर को उसका मन अपनी इस बेरूखी से आहत हुआ, पर तुरन्त ही वह मान कर बैठी कि इतने दिन बीते मगरू ने भी तो उसे आवाज नहीं दी। सुनैना को लग रहा था कि उसके पाँवों के नीचे कोई दलदल है और वह उसमें धंसी जा रही है। मन अपने उस प्राचीन अंधेरे में लौटने को कह रहा था तो तन मगरू की कराह से ंिखंचा जा रहा था। अजीब चिकने पल थे कि हर भाव फिसल कर गुम हुए जा रहे थे। उसने मन कड़ा किया। उसे अपने साथ हुए सारे छल याद आने लगे। उसमें मगरू की खामोश सहभागिता का ख्याल आते ही उसके भीतर का अंधेरा और बढ़ गया। वह बिना देरी किए उस अंधेरे का छोर पकड़ वापस अपने कोठरी की ओर मुड़ी ही थी कि मगरू ने करवट लिया और किसी सहरा में भटके बेबस राही की तरह आर्त स्वर में पुकारा 'को आये?' पता नहीं उस आवाज में कितनी आतुरता, कितनी बेधकता और कितनी निरीहता थी कि एक झटके के साथ सुनैना पलटी और मगरू के बिलखते शब्दों को अपनी अंजुरी में संभाल लिया। औरतें होती ही ऐसी हैं कि वे चाह कर भी आतुर और निरीह आवाजों को अनसुना नहीं कर पातीं।

रात के एक परिंदे ने अपने प्रेम की खुशबू में सुवासित एक शब्द उचारा 'मगरू', तो दूसरे परिंदे ने उसे अपनी आँसुओं का अघ्र्य दिया 'सुनैना।' फिर तो गहरे आवेग वाली उस रात्रि के तीसरे पहर में जब चिरई-चुरुंग, रोगी, भोगी और योगी सब सो चुके थे, तब खपरैल के उस पुराने छाजन के तले दो परिंदे, एक अनलिखी प्रार्थना की इबारत मुकम्मल कर रहे थे।

बाद के दिनों में लोरिक के परिवार में बहुत कुछ बदल गया था। उनका मझला बेटा दो बच्चों का पिता बनने के बाद पंचायत के चुनाव में भाग्य आजमाने की फिराक में लगा रहता और छोटा बेटा एक बच्ची के जन्म के बाद लडक़ी होने के गम में शराब के ठेके पर बैठा रहता था। इन सबके बावजूद लोरिक के महतोपन में कहीं कुछ कमी नहीं आयी थी। घर में सबसे बड़ा बदलाव तो सुनैना में हुआ था। हमेशा गुमसुम रह कर काम में उलझी रहने वाली सुनैना अब साज-श्रृंगार करने लगी थी। रोटियां सेंकते हुए या कपड़े धोते हुए अक्सर कुछ न कुछ गुनगुनाती रहती। वह सबके सामने पूरे अधिकार पूर्वक मगरू से बात ही नहीं हँसी ठिठोली भी करने लगी थी। वह खाना बनाती तो मगरू को चौके में बैठा कर उन्हें गर्म-गर्म रोटियां सेंक कर खिलाती। सुबह के समय में वह खाना बनाती और शाम का खाना उसकी देवरानियां बनाती। पहले दोनों समय सुनैना को ही खटना पड़ता था। पर इधर कि दिनों में सुनैना ने ही खाना बनाने को लेकर यह नई व्यवस्था बना दिया था। पहले तो देवरानियों ने इस नई व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया, किन्तु मगरू ने कड़े शब्दों में कहा कि 'सुनैना तो बस भिन्सारे को कलेवा बनेहें।' देवरानियों ने पहली बार अपने जेठ को किसी मामले में इतने निष्कर्षात्मक लहजे में बोलते सुना था, सो वे कुछ अपने जेठ का लिहाज और कुछ उनकी उस आवाज के ताप से उस नई व्यवस्था को स्वीकार कर लिया। जिस दिन मगरू ने सुनैना के हक में बोला था, उस दिन सुनैना खुशी के पंख लगाए उड़ती रही। इस नई व्यवस्था के तहत सुनैना सुबह उठ कर चौका-बर्तन करती, खाना बनाती, मगरू को खिलाती, कुछ अपने खाती और कपड़े के टुकड़े में चार रोटियां अचार के साथ बाँध कर मगरू के साथ खेतों की ओर चल देती। मगरू के साथ वाले सुनैना के वे सुहाने दिन थे। मगरू और सुनैना खेतों में काम करते, खेतों में आराम करते, खेतों में बड़े बन जाते और खेतों में ही बच्चे बन खेलने लगते। सुनैना गेहूँ की बालियां बन जाती और मगरू उजास बन उन बालियों से लिपट जाते। दोनों खेतों से मुँहअंधेरे उजले हो लौटते। अब सुनैना के हिस्से में गुनगुने दिन ज्यादे थे। रातें भी थीं, पर पहले की तरह उदास और तन्हां नहीं; बल्कि महकती और बोलती हुईं।

लोरिक के दोनों छोटे बेटों ने घर के काम-काज से खुद को पूरी तरह से अलग कर लिया। मझले को अपनी नेतागिरी से और छोटे को अपनी शराबखोरी से फुर्सत नहीं थी। खेती-खलिहानी का काम मगरू और सुनैना के भरोसे पहले से बेहतर चल रहा था। इससे मगरू का आत्मविश्वास भी बढ़ता जा रहा था। अब वे घर के मुआमले में अपनी राय भी देने लगे थे। घर वाले मन मार कर उनकी बातों को सुनने भी लगे थे। धीरे-धीरे मगरू-सुनैना की अहमियत और उनके छोटे भाइयों और उनकी पत्नियों की कुंठा बढऩे लगी थी। इसी कुंठा में देवरानियाँ घर के बर्तन फोड़ती और पति उनका सिर। सुनैना के देवर-देवरानियों की कुंठा से उपजा कलह अब रोज की बात थी। अपनी पत्नियों को उनकी छोटी सी भी गलती पर मैली धोती की तरह कचारना लोरिक के परिवार का आनुवंशिक गुण था। इसमें कोई पीछे नहीं था। दाल में नमक कम हो जाने पर बूढ़े लोरिक कुछ कहते नहीं, अपने कांपते हाथों से पूरी गर्म दाल अपनी बुढिय़ा के ऊपर फेंक देते। उनकी मर्दानगी ऐसे कई सारे अभिलेख उनकी पत्नी की बूढ़ी पीठ और पर अंकित है। आज भी। बुढ़ापे में लोरिक का शरीर उस तरह साथ नहीं देता, इसलिए वे अपने पुरुषत्व का इजहार अपनी पत्नी के मुँह पर थूक कर करते हैं। अब लोरिक का मझला और छोटा बेटा अपनी पत्नियों की देह पर पिता की ही भाषा में मर्दानगी की रोज नई कहानियाँ लिखने लगे थे। यह सब करते हुए वे खुद को लोरिक महतो की मर्दानगी के असली उत्तराधिकारी सिद्ध कर रहे थे। पर पारिवारिक उत्तराधिकार के हर मुआमले में मगरू ने तो जैसे पंक्ति भेद करने की कसम खा रखी थी। बच्चे पैदा कर नहीं सकते थे तो नहीं किया पर पत्नी को तो पीट तो सकते थे। पर नहीं, मगरू ने कभी अपनी पत्नी को अपने पिता और भाइयों की तरह पीटा नहीं; बस प्यार किया। तीन बरस के अबोले के बाद जब मगरू और सुनैना के तार जुड़े तबसे जितना प्यार और सम्मान सुनैना मगरू को देती, उसमें कुछ न कुछ मिला कर मगरू उसे लौटा देते। मगरू के उसी स्नेह की छाँव में सुनैना को यह विश्वास हो गया था कि 'मर्द वह नहीं है जो अपनी मर्दानगी से औरत की कोख हरा कर दे, बल्कि वह है जिसके प्यार और सम्मान से समूचा औरतपन अपने आप हरा हो जाय।' इसीलिए इन 'दुधो नहाई, पूतों फलीं' स्त्रियों की देह पर हाथ-लात और डंडे से अपने पौरुष की गाथा लिखते देवर सुनैना को पूरे नामर्द लगते।

उस दिन लोरिक का मझला बेटा अपने पिता के साथ किसान क्रेडिट कार्ड बनवाने बैंक गया था। मगरू गाय के दाना-पानी में जुटे हुए थे। अचानक आँगन से चीखने की आवाज आयी। सब भागे हुए घर में दाखिल हुए। वहाँ वही पुरानी कहानी नये सिरे से दुहरायी जा रही थी। लोरिक का छोटा बेटा दारू के लिए पैसा नहीं देने पर अपनी पत्नी को आँगन में घसीट-घसीट कर मार रहा था। वह बेतहाशा चिल्ला रही थी। उसकी बच्ची डरी सहमी सी कोने में खड़ी थी। जेठानी के बच्चे डर के मारे बाहर भाग गए और जेठानी चारपाई पर बैठी पैर हिला रही थी। सास-ननद छुड़ाने की असफल कोशिश कर रही थी। भावज से देह न छुआने के लोकाचार से बँधे होने के कारण मगरू दूर से ही भाई को बरज रहे थे। पर उस दिन छोटका पर जैसे भूत सवार था। उसके हाथ में जो कुछ आ रहा था, उसी से अपनी पत्नी को मार रहा था। देवरानी की आवाज बैठती जा रही थी। मगरू को जब और कुछ नहीं सूझा उन्होंने सुनैना को हांक लगाई। मगरू की आवाज सुन सुनैना भागी हुई आयी और देवर का हाथ पकड़ कर रोक दिया। देवर गुस्से से फटा जा रहा था 'तू माँयें भग भौजाई, आज हम इखों जिंदा ना छोड़ हैं।'सुनैना ने उसे डपटा 'अरे, कैसे मार दे हो, तुमाअे बाप को राज है का के जो मन में आये वो करहो?' देवर और भडक़ गया 'हओ, हमाअे बापई को राज है इते, जा हमाई घरवारी आये और हम ईके मरद। सुनैना ने उसको ललकारा 'हूँ, लुगाई जनी पे हाथ चलात तोय लाज नईं आत और बड़ो आओ है मर्द बनवे।' देवर बौखला गया था 'तू का बतै हे मरद का होत, तोय तो मिलोई नईयां।' छोटे भाई से अपने बारे में ऐसा सुन कर मगरू पर तो जैसे घड़ो पानी पड़ गया। वे अपना माथा पकड़ कर वहीं भहरा कर बैठ गए। पति का ऐसा अपमान देखकर सुनैना पार्वती की तरह क्षुब्ध हो गयी। उसने सीधे हाथ से देवर का बाल पकड़ कर खिंचा और उल्टे हाथ से एक भरपूर तमाचा उसके मूँह पर जड़ दिया। सुनैना से इस प्रतिक्रिया की उम्मीद देवर तो क्या किसी को नहीं थी। गुस्से में उसने भी सुनैना पर हाथ छोड़ा पर सुनैना तो सिंहनी में बदल गयी थी। बड़ी मुश्किल से सास-ननद, जेठानी ने सुनैना को पकड़ा। सुनैना गुस्से और अपमान में चीख रही थी 'हओ, सुन ले नासमिटे, तुमाई ठठरी बंधे, नईं मिलो हमे मरद, मनों तोरे जैसे नीच मरद से हमाओ नामरद अच्छो है।' इतना सुनते ही देवर दौड़ा आया और सुनैना को पकड़ उसका सिर दीवार में टकरा दिया। सुनैना का माथा फूट गया। वह वहीं आँगन में गिर पड़ी। सुनैना की चीख सुन कर मगरू को जैसे होश आया, वे अपने छोटे भाई को पकड़ते तब तक वह कूद कर बाहर भाग गया। भाई का पीछा करना छोड़ मगरू ने सुनैना को उठाया और उसका सिर गोद में रखकर बिलख-बिलख कर रोते रहे। रोती रही सुनैना भी।

थोड़ी रात गये छोटे बेटे के अलावा लोरिक का पूरा परिवार आँगन में बैठा था। छोटा बेटा दोपहर का भागा अभी भी नहीं लौटा था। सब कुछ सुन कर लोरिक ने गम्भीर आवाज में कहा 'आन दे ऊखों, हम समझात हैं।'

'तुम समझात रहिओ, हमें हमाओ हिस्सा दे दो; हम सुनैना के संगे अलग रैहैं।' मगरू का स्वर एकदम स्थिर था। लोरिक को तो काटो खून नहीं। पहले वाले मगरू होते तो अब तक लोरिक उनको डपट कर चुप करा चुके होते किन्तु ये वाले मगरू लोरिक के बेटे ही नहीं सुनैना के पति भी हैं। इसलिए वे बेबस आवाज में बोले 'अइसों नईं सोचत बेटा, तुम हमौरों से अलग हो जेहो तो गाँव के का कैहें ? खानदान की तो नाकई कट जे है।'

'तुमाओ खानदान तो हमसें आगे बढऩे नइयां, ईसें तुम और तुमाअे मोड़ा रओ संगे, और बढ़ात रओ खानदान, जित्तो बढ़ाने होय।' मगरू ने तो जैसे फैसला कर लिया था।

यह सुन लोरिक मौन हो गए, लेकिन उनके मझले बेटे ने मगरू को घुड़क़ते हुए कहा 'जो अच्छो नईं कर रअे बड्डे! कहे देत हैं, तुमाअे संगे बहौत गलत हो जेहै।'

मगरू ने मझले भाई की बात को अनसुना कर लोरिक से कहा 'सोच लो दद्दा, हमाओ हिस्सा हमें दे दो, नईं तो कल हम पंचात बुलाहैं। फिर तुम बचइयो अपने खानदान की इज्जत।'

मझला बेटा कुछ कहने को हुआ किन्तु लोरिक ने उसे रोक कर हारे हुए जुआरी के स्वर में कहा 'ठीक है बेटा, जैंसी तुमाअी इच्छा।'

बाद के दिनों में एक नई व्यवस्था के तहत सुनैना और मगरू खेत पर बने घर में रहने चले गए। लोरिक के तीन बेटों के बीच बारह एकड़ की खेती थी। लोरिक अपने हिस्से के चार एकड़ लेकर अलग जोतने-बोने लगे। सुनैना और लोरिक की जिंदगी के वो सबसे उर्वर दिन थे। खेत में घर था और घर में खेत था। दोनों दिन रात घर से खेत तक उमड़ते रहते। मगरू और सुनैना अपने निश्छल श्रम से सुख की नई कथा लिख रहे थे। मगरू ने खेत के एक ओर जमीन से पाँच हाथ ऊपर एक मचान बना लिया था। जो लकड़ी के चार खंभों पर चारों ओर से खुला हुआ एक ढाँचा था। वही उन दोनों का नया रिहाइश बना। चारों ओर से दरवाजे, दीवारों और छतों में कैद घर का इस्तेमाल वे खेती के औंजार, बर्तन और अनाज रखने के लिए करते थे। दिन भर खेतों में काम करते और संध्या के समय मचान के नीचे दोनों मिल कर गाकड़ पकाते, खाते और मचान के ऊपर, आसमान के नीचे एक दूसरे को ओढ़ कर सो जाते। वे दोनों अपने परिश्रम से चार एकड़ में जितना अनाज उपजा रहे थे उतना लोरिक के आठ एकड़ में कभी नहीं हो पाया। लोरिक के बेटों और उनकी पत्नियों में आपसी कलह बढ़ता जा रहा था। पुराने घर से इस नए घर पर अब कोई नहीं आता। मगरू की माँ भी नहीं। लोरिक ने उसे अपनी कसम दे रखी थी कि 'मगरू से मिलहौ तो हमाऔ मरो मुंह देख हो।' मगरू जब कभी अपनी माँ के बारे में सोच कर उदास हो जाते, तब सुनैना उनका सिर अपने गोद में लेकर उनकी माँ बन जाती। मगरू और सुनैना का सुख देखकर मगरू का पूरा परिवार जला-भूना हुआ था। लोरिक इन सबकी जड़ सुनैना को मानते कि 'उसी ने उनके गऊ समान बेटे को बागी बना दिया।' पर कर कुछ नहीं पा रहे थे। सुनैना के प्रति बदले की भावना से भरा हुआ लोरिक-परिवार उसको अपमानित कराने के लिए योजनाबद्ध ढंग से बाँझ कह कर प्रचारित करने लगा। इन वर्षों में सुनैना ने बहुत सारा छल-प्रपंच देखा-सहा था, किन्तु बाँझ वाली बात पर वह बिफर पड़ती 'कमी हममें नइयां, तुमईंरे खून में आहे, जा तुमौरें सोई खूब जानत हौ, और हम भी। सब कछु जानत भए हमने कबहूं मगरू में कछु कमी नईं निकारी। मनो तुमौरे हो के अपनी कमी हमाअे माथे मुड़ रअे। हमनें तो बस प्यार-इज्जत चाही है और कछु नहीं। हम जानत हैं कि मगरू मरद भले नइयां, मनो मानुष सबसे बड़े आयें।' मगरू मर्द भले नहीं हैं पर मनुष्य सबसे बड़े हैं, यह सुनैना की अपनी निजी कमायी थी। पर लोरिक के खून में कमी है, सुनैना की इस सार्वजनिक घोषणा से लोरिक की बूढ़ी और उनके बेटों की जवान हड्डियों का ताप बढऩे लगा था। सुनैना तो ऐसी ही थी, एक का जवाब चार से देती। लोरिक-परिवार का मन सुनैना के प्रति खट्टा तो पहले से ही था पर उनको इस बात का दु:ख सबसे ज्यादा था कि मगरू भी सुनैना का ही साथ दे रहा है। दोनों परिवारों के बीच का खट्टापन उस दिन से ज़हर में बदलने लगा, जबसे सुनैना ने अपने भाई के बच्चे को अपने पास बुला लिया। भतीजे को साथ रखने का तात्कालिक कारण तो सिर्फ इतना था कि सुनैना की भौजाई एक बार फिर पेट से थी। भाई के यहाँ खाने-पहनने की दिक्कत तो पहले से थी, ऊपर से भौजाई का चढ़े हुए दिन। इसलिए सुनैना ने मगरू को भेज भतीजे को अपने पास बुलवा लिया। भतीजे के आने के बाद सुनैना और मगरू के दिन रात थोड़े और सुहाने हो चले थे। मगरू बच्चे को जब अपने कंधे पर बैठाकर घूमते तब उन्हें देख सुनैना निहाल हो जाती और लोरिक-परिवार बेहाल।

ऐसे ही एक दिन मगरू बच्चे को कंधे पर बिठाये खेत से आ रहे थे कि सामने उनका मझला भाई पड़ गया। मझले ने गुस्से में मगरू को टोका 'काय दद्दा! सुनैनिया खों मूड़ पर चढ़ाकें जी नईं भरो, सो अब वा की भतीजे खों...।' मगरू ने पलट कर जबाब दिया 'हओ, हम एखों भी मूड़ पे चढ़ैहें, और सुनो! जोई हमाओ मोड़ा आये, हम हमाओ सब कछु एई खों देहें।'यह सुन महरू का मझला भाई सन्न रह गया। मगरू ने जो कुछ अपने भाई से कहा, उस पर न तो वे और न ही सुनैना ने कभी विचार किया था। बस उस दिन क्रोध में या यूँ ही वह सब उनके मूँह से निकल गया।

मगरू की उस बात ने लोरिक-परिवार को सकते में डाल दिया। मगरू के हिस्से में चार एकड़ की खूब लगनहार खेती थी। जो लोरिक के बाप-दादा की कमाई थी। अपनी पुस्तैनी जमीन को सुनैना के भतीजे के पास चले जाने की कल्पना मात्र से लोरिक-परिवार नफरत और हिंसा की आग में जल उठा। जमीन की भूख होती ही ऐसी है। लोग-बाग उसकी एवज में कुछ भी कुर्बान करने से नहीं हिचकते। मगरू और सुनैना की बिसात ही क्या थी। एक दिन लोरीक का छोटा बेटा शराब के नशे में खेत पर चढ़ आया। सुनैना और मगरू के सामने ही सुनैना के भतीजे को जान से मार देने की धमकी देता रहा। सुनैना भतीजे को गोद में लेकर सोयाबीन के खेतों की तरफ भाग गयी। थोड़ी देर तक वह गाली-गलौज कर वापस चला गया। उसकी बातें सुन कर सुनैना को पहली बार डर लगा। रात में मचान पर दोनों के बीच भतीजा सोया हुआ था, और वे उदास बैठे भतीजे को एकटक देख रहे थे। मगरू ने सुनैना को गुमसुम देख पूछा 'काय सुनैना, का सोचत हौ।' सुनैना ने बहुत धीरे से कहा 'चलो कल, इखों भइया के इते छोड़ आयें। दूसरे को धन; हम कबलौं रखवारी करहैं।' दूसरे ही दिन सुनैना मगरू के साथ भतीजे को लेकर अपने मायके चली गयी। जैसे ही सुनैना मायके की चौखट पर पहुँची, उसी समय भौजाई ने एक गोल-मटोल बच्ची को जन्म दिया। उसके भइया बेटी और बहन को एक साथ पाकर निहाल हुए। भतीजी को देख कर सुनैना अपना सारा दु:ख भूल गयी। उसने पूरे उत्साह से बधाई के गीत गाया और भौजाई की सेवा की। इसी राजी-खुशी में तीन दिन बीत गए। न चाहते हुए भी उन्हें वापस अपने खेतों के बीच लौटना पड़ रहा था। भाई-भौजाई ने बहुत मनुहार किया पर मगरू-सुनैना ने अगले सावन में आने का वादा कर लौट आये।

इन तीनों की गैर हाजिरी के बाद जब मगरू-सुनैना घर लौटे तब वहाँ की फिजा बदली हुई थी। लोरिक के परिवार से जुड़ा हर आदमी उन्हें बहुत ही सशंकित नजरों से देख रहा था। इन्हीं सब बातों को सोचते हुए वे दोनों मचान पर लेटे थे। बहुत सारी पुरानी बातें याद आ ही थीं। उन्हीं बातों के बीच दोनों रो रहे थे, दोनों जाग रहे थे, कि अचानक मगरू के सिर पर एक मोटा डंडा आकर लगा। मगरू उछल कर मचान से नीचे आ गिरे। सुनैना कुछ समझ पाती तब तक उसके दोनों देवर मगरू के घायल देह पर चढ़ बैठे। सुनैना मगरू को छुड़ाने के लिए लपकी किन्तु ससुर ने उसे बीच में ही पकड़ कर उसका मुँह दबा दिया। मगरू के सिर से खून बहकर उनकी आँखों में समा रहा था। जिससे अनकी आँखों के सामने का अंधेरा और अधिक गाढा हो गया था। क्रोध से बिलबिलाता हुआ मझला बोला 'काय बड्डे, लिख दऔ खेत भतीजे खों। अब हमाअे मोंड़ा-मोंड़ी का खैहैं।' छोटे भाई ने मगरू की गर्दन को डंडे से दबा रखा था। मगरू छटपटा रहे थे। उनके गले से गो.ं.गों की आवाज निकली। मझले चीखा 'मजाल तो देखो इस पींदा की, हाँ, कै रओ है।' सुनैना लोरिक के हाथों में छटपटाती रही। उनके छोटे बेटे ने मगरू के गर्दन पर रखे डंडे को अपने पैर से दबा दिया। लोरिक के देह में हल्की सी जुम्बिश हुई, और सब कुछ ठहर सा गया। कोई कुछ समझ पाता इससे पहले लोरिक का छोटा बेटा भागते हुए अंधेरे में गुम हो गया। लोरिक और उनका मझला बेटा हक्के-बक्के रह गए। शायद यह करने की उनकी योजना नही थी। पर जो होना था, वह हो चुका था। लोरिक का मझला बेटा धीरे से उठा और उनके छोटे बेटे की तरह ही अंधेरे में गुम हो गया। दोनों बेटों को इस तरह साथ छोड़ते देख लोरिक क्रोध से उबल पड़े। उसी बीच उनके के हाथों से छूट कर सुनैना मगरू की मृत देह पर गिर पड़ी।

इसके बात की कथा ठीक-ठीक लोरिक को मालूम है। वे अपना बयान दर्ज करा चुके थे। इसके बाद की घटना को एक समकालीन कथाकार कई तरह से दर्ज कर सकता है। जैसे जब लोरिक के दोनों बेटे उनको छोड़ कर भाग गए। तब इस वारदात में खुद को फंसा देख वे घबरा गए हों। उसी घबराहट में उन्होंने हर सबूत मिटाने की गरज से सुनैना की हत्या कर दी हो। यहाँ एक सवाल यह है कि लोरिक जैसा बूढ़ा आदमी क्या सुनैना की हत्या कर सकता है? क्या सुनैना ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की होगी? इसके बारे में कथाकार कह सकता हैं कि सुनैना मगरू की मृत देह पर गिर कर अचेत हो गयी होगी, जिससे लोरिक ने आसानी से उसकी हत्या कर दी होगी। अगर यही हुआ होगा जैसा कथाकार कह रहा है तो इसका अर्थ है कि अचेत रहने के कारण स्वयं सुनैना भी नहीं जान पायी होगी कि उसकी हत्या किसने की है। दूसरा कथाकार इस घटना को इस रूप में भी बता सकता है कि मझले बेटे के बाद लोरिक भी वहाँ से भाग कर घर आये होगें, दोनों बेटों को खोज कर साथ लिया होगा। वापस खेत पर पहुँच कर सुनैना को सबने मिल कर मारा होगा। फिर एक साथ मिल कर दोनों की एक ही चिता पर रख जला दिया होगा। यहाँ एक और सवाल है कि यदि ऐसा हुआ होगा तो सुनैना के सती होने वाली कथा का जन्म कैसे हुआ? इस सम्बन्ध में पहले वाला कथाकार कह सकता है कि सुनैना को सती बनाने वाला आइडिया निश्चित ही लोरिक के मझले बेटे ने दिया होगा। क्योंकि चार-पाँच वर्षों से वह कई सारे नेताओं के साथ दिल्ली, भोपाल, लखनऊ आदि राजधानियों की यात्रा कर रहा है। इस बात पर दूसरा कथाकार पहले वाले से सहमत हो सकता है। क्योंकि कथाकारों का समकालीन राजनीति के सन्दर्भ में लगभग एक सा दृष्टिकोण हो सकता है। दूसरा वाला कथाकार इस प्रसंग को थोड़ा और आगे तक ले जा सकता है, जैसे कि लोरिक और उनके पुत्रों को मगरू के मृत्यु के बाद सुनैना से डर लगने लगा हो, कि वह इन लोगों के खिलाफ थाने भी जा सकती है। लोरिक के छोटे बेटे को तो पूरा विश्वास था कि, वह थाने जायेगी ही, और उसको ही नामजद करेगी। या फिर सुनैना अचेत न हुई हो, उसने खुद ही उन लोगों से कहा कि वह मगरू की लाश को लेकर जिले के कप्तान के यहाँ धरना देगी या हाइवे जाम करेगी। जितना वे लोग सुनैना को जानते थे, उस हिसाब से सुनैना वो सब करती है, जो वो कहती है। इसलिए उसकी हत्या जरूरी हो गयी हो। हत्या के बाद उसे सती कांड में बदल दिया गया होगा। सती कांड को आस्था का रंग देने के लिए सिकटार से बाजा वालों को बुला लिया गया होगा।

कथाकारों की बातें कथाकार जाने। मैं तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि आदमी अपनी अज्ञानता में एक गलती करता है, चतुराई में उसे छिपाता है और अहंकार में उस गलती को अपराध में बदल देता है। हो सकता है कि लोरिक-परिवार ने भी इसी तरह गलती से अपराध तक का सफर पूरा किया हो। दूसरे यह कि सुनैना-लोरिक की मौत एक असामान्य घटना थी। और असामान्य घटनाओं का अंत अक्सर रहस्य, राजनीति या फिर आस्था में होता है।

पत्रकार का सच जाँच समिति के रिपोर्ट से बिल्कुल भिन्न था। चार हजार रूपए की नौकरी वाले पत्रकार का सच लाख रूपए वाले सरकारी अधिकारी के सच से बड़ा कैसे हो सकता है। जाँच समिति के सदस्यों के मुँह का स्वाद बिगड़ गया। एक सदस्य ने पत्रकार से पूछा 'आप पत्रकारिता के साथ कहानी ओहानी भी लिखते हो क्या?' पत्रकार ने प्रतिप्रश्न किया 'क्यों, आपको ऐसा क्यों लगा?' सदस्य ने कहा 'लगना क्या है, आप जिस तरह इस घटना को कहानी बना कर पेश कर रहें है, उसी से यह विचार आया।' पत्रकार ने प्रतिवाद किया 'किन्तु यह कहानी सच्ची है।' दूसरे सदस्य ने घुडक़ते हुए टोका 'क्या इन्होंने यह कहा कि कहानियाँ झूठी होती हैं, कहा क्या?' पत्रकार ने सहमते हुए कहा 'नहीं।' 'तो, जितना पूछा जाय उतना ही बोलिए।' पत्रकार कुछ और कहता तब तक जज साहब ने पूछा 'ये सारी बातें आपको पता कैसे चलीं, हम इतने दिनों से जाँच कर रहे हैं, हमें तो ये सारी बातें यहाँ किसी ने नहीं बताया।' पत्रकार ने सफाई दी 'ये सारी बातें मुझे सुनैना देवी की भाभी ने बताया, वो यहाँ नहीं सुनैना देवी के मायके में रहती हैं, उन्हीं का बच्चा सुनैना के पास रहता था। पर लोरिक और उनके बेटे की नियति देख कर सुनैना को अपनी या भतीजे की हत्या की आशंका हो गयी थी। इसीलिए वे भतीजे को जब अपने मायको पहुँचाने गयी थीं, तब ये सब उन्होने अपनी भाभी से बताया था।'

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद जज साहब ने पूछा 'चलो मान लेते हैं कि जो कुछ आप कह रहे हैं वो सब सच है, पर इससे यह कैसे साबित होता है कि मगरू और सुनैना की हत्या हुई थी, सुनैना स्वयं सती नहीं हुई थी। कोई सबूत कोई गवाह हैं आप के पास?' पत्रकार ने थोड़ी देर सोचा और कहा 'आप चाहें तो बशरूदीन, लियाकत, रमई और झड़ेला से पूछ सकते हैं।' एक अन्य सदस्य ने टोका 'अब ये सब कौन हैं?' 'ये बगल के गांव के लोग हैं जो चिता जलाने के समय बाजा बजा रहे थे।' 'बाजा बजा रहे थे,' जज साहब ने आश्चर्य व्यक्त किया। फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने पत्रकार को विदा कर बशरूदीन, लियाकत, रमई और झड़ेला को हाजिर करने का हुक्म दिया।

बशरूदीन, लियाकत, रमई और झड़ेला बहावलपुर के पड़ोसी गाँव सिकटार में रहते थे। वैसे तो सिकटार के मूल निवासी बशरूदीन और झड़ेला ही थे। रमई और लियाकत बहुत पहले छिन्दवाड़ा एक कार्यक्रम में मिले थे। बशरूदीन और झड़ेला बैंड लेकर छिन्दवाड़ा गए थे। लियाकत और रमई बारात में रोड लाइट लेकर चल रहे थे। दूसरे दिन सुबह बारात की विदाई के समय रात की रोशनी के स्रोत बने लियाकत और रमई, बशरूदीन के पास आये और उनके साथ चलने का आग्रह करने लगे। वे दोनों खानाबदोश थे। जब जैसा काम मिलता उसी से अपना जीवन चला रहे थे। कभी स्टेशन पर तो कभी किसी पुलिया में सोकर रात बिता लेते। उस रात बशरूदीन और झड़ेला का करतब देख इन दोनों ने अपना भविष्य तय कर लिया था। अपने घर परिवार के बारे में न उन दोनों ने बताया और न ही किसी ने पूछा कि वे रहने वाले कहाँ के हैं? फिर तो वापसी के समय सिकटार में दो जन और लौटे थे। सिकटार में बशरूदीन की एक टूटी-फूटी झोपड़ी थी, पत्नी काफी पहले गुजर गयी थी। दूसरी शादी नहीं की, बैंड को ही अपनी जीवन संगिनी बना लिया था। रमई और लियाकत का भी बशरूदीन की झोपड़ी में गृह प्रवेश हो गया। झड़ेला परिवार वाले थे किन्तु उनका परिवार उनकी लुगाई रामदेई से ही शुरू और रामदेई पर ही खत्म होता था। बाल-बच्चे नहीं हुए। ढोल-मजीरे को ही अपनी औलाद की तरह स्नेह करते रहे। कुछ दिनों के संगत के बाद रमई और लियाकत भी बजाने में पक्के हो गए। अपने समय में इन चारों ने खूब बैंड बजाया और खूब नाम कमाया।

लोग बताते हैं कि बशरूदीन, झड़ेला, लियाकत और रमई एक समय था जब इनके बैंड की बड़ी प्रतिष्ठा थी। पर समय की मार इनकी कला पर तो नहीं इनके बैंड पर खूब पड़ी। समय के साथ लोगों के मनोरंजन के मजहब बदलने लगे थे। अब डी.जे. पर तूफानी फिल्मी गानों पर कमरतोड़ू नृत्य करती अधनंगी लड़कियाँ सबको भाने लगी थीं। धीरे-धीरे बशरूदीन के बैंड को काम मिलना बंद हो गया। उनके बैंड के दूसरे साथी भुखमरी से बचने के लिए लुधियाना, पंजाब, दिल्ली आदि शहरों में जाकर मजदूर बन गए। बशरूदीन, लियाकत, रमई और झड़ेला कहाँ जाते। ये चारों भूमिहीन थे। इनके पास न तो बी.पी.एल कार्ड बनवाने की संसारिक सामथ्र्य थी और न ही कहीं बाहर जाने का किराया। इसलिए ये गाँव में रहकर कभी मिल जाने पर मजदूरी आदि कर अपना जीवन चलाते रहे। एक बात इनमें खास थी। वह यह कि ये चारों जब भी खाली रहते गाँव के बाहर वाले तालाब के किनारे बैठ कर अपने टूटे-फूटे बाजों के साथ रियाज करते रहते। शादी-ब्याह जैसे मांगलिक अवसरों पर इनकी की कोई उपयोगिता नहीं थी, बस अब कभी-कभी कोई इन्हें गमी में बाजा बजाने के लिए बुला लेता था। इसमें भी वे लोग खुश थे। ऐसे में कोई इनके पुराने दिनों की याद दिलाता तो ये कहते 'बहौत ब्याओ करा लअै मालक! अब गमी में बजा रये हैं, ब्याओ हो या गमी, हमें तो बस बाजो बजाने हैं।'

स्थानीय पुलिस ने फौरन से पेश्तर बशरूदीन, लियाकत, रमई और झड़ेला को जज साहब के सामने हाजिर कर दिया। इन कलाकारों की उम्र पैंतालीस से पचास के बीच की थी। पर ये अपनी उम्र से दस-पन्द्रह साल ज्यादे दिख रहे थे। पहली बार इतने बड़े साहब को सामने आकर वे लोग भय से दुहरे हुए जा रहे थे।

जज साहब ने पूछा 'तुममें सरगना कौन है।'

बशरूदीन ने कहा 'हम कलाकार हैं मालक, कोऊ राज-पाठ को काम हम नई जानत, हमौरों में सरगना कोई नई होत। जौन खों जो कला आवत है, ओयी ओमें आगे रेत है।'

'अच्छा ठीक है, तुम लोगों का नाम क्या है, और कौन सा बाजा बजाते हो?' जज साहब ने प्रश्न किया। एक सदस्य ने उन्हे हिदायत दी 'एक-एक कर बताना।'

सबसे पहले लियाकत ने जबाब दिया 'हमाओ नाम लियाकत है, हम मृदंगिया आयें।'

'हम झड़ेला डोम हैं साब, हम अलगोजा खूबई बजा लेत हैं।'

'रमई हुजूर! ऊँसें तो हम नगडिय़ा बजात हैं, मनो सेनाई बजावे में खूब मजा आत है।'

आखिर में बशरूदीन ने अपना परिचय दिया 'हम बशरूदीन आयें मालक!, हम झूला और मजीरा बजात हैं।

जज साहब को संदेह हुआ 'क्या ये सब वाद्य-यंत्रों के नाम हैं?'

झड़ेला बोले 'नई साब, जे बाजे आयें।'

जज : 'मैंने तो कभी इनका नाम नहीं सुना?'

बशरूदीन ने कारण बताया 'सुन हो कैसे साब, आप तो जूड़े कोठा में रेत हो, जे सब हमाये गाँव देहात के बाजे आयें। जे इतईं मिलत हैं।'

जज ने समिति के एक सदस्य से पूछा 'जूड़े कोठा?'

सदस्य ने जज साहब को बताया 'जूड़े कोठा मिन्स ए.सी. कूल्ड रूम'

जज : 'ओ एस।'

जज साहब ने आगे पूछा 'तुम लोग लोरिक को जानते हो?'

बशरूदीन ने बताया 'हओ साब! इतईं बहौलपुर के आयें, जौन की बहू अभईं सती भईं।'

सदस्य ने डांटा 'जितना पूछा जाय, उतना ही बताओ।'

'गलती हो गई मालक! माफी दे दो।' लियाकत मियां बोले।

जज साहब ने आगे पूछा 'तुम लोग उस दिन कहां थे,?'

रमई ने कहा 'हमौरें तो उतईं बाजे बजा रए ते।'

दूसरे सदस्य ने पूछा 'वहां तुम लोगों ने क्या-क्या देखा?'

बशरूदीन ने बताया कि 'साब हमौरें हते तो उतईं, मनो मुतके दिनों में बाजे बजावे को मौका मिलो तो, एई सें हमौरों को धियान बाजों की धुन में हतो। सांची कएँ तो हमौरों ने इत्तोई देखों की चिता श्रृंगारी गयी और बा में मगरू और वा की घरवारी सुनैना की लाश खों लिटा के दाग दौ गओ तो। हमौरें मरघटा पे दूर खों बैठे 'वैष्णव जन जेते कहिए, पीर पराई जान रे'की धुन निकार रये ते।'

कुछ देर तक वहां खामोशी फैली रही। फिर कुछ सोचते हुए जज साहब ने बशरूदीन, रमई, झड़ेला और लियाकत को जाने की अनुमति दे दी, पर इस हिदायत के साथ कि वे लोग अपना गाँव छोडक़र कहीं नहीं जायेंगे।

सुनैना देवी सती कांड में पत्रकार के सच ने संदेह उत्पन्न कर दिया था। दूसरे बशरूदीन, नौबत और लियाकत ने अपने बयान में कहा कि चिता सजाने के बाद मगरू और सुनैना की लाश का चिता में लिटाया गया। जबकि लोरिक परिवार और दूसरे बहावलपुर वाले कह रहे थे कि मगरू की मृत्यु के बाद सुनैना देवी ने अपने सती होने की घोषणा की और पति की लाश को गोद में लेकर अगिन असनान कर लिया। बहुत उम्मीद से जांच समिति ने सुनैना के भाभी को बुला कर उसका भी बयान दर्ज कराया। पर पता नहीं वह डर गयी कि किसी ने उसको कुछ समझा दिया था कि वह उस पत्रकार को ही पहचानने से मुकर गयी। सुनैना देवी के मायके की ओर से भी लोरिक-परिवार के प्रति कोई शिकायत नहीं दर्ज करायी गयी थी। इस पूरे घटनाक्रम में अपराध भी था सुनैना देवी की हत्या, मोटिफ भी था मगरू-सुनैना की जमीन का लालच, पर सबूत कुछ भी नहीं था। किन्तु न्याय होते तो दिखना ही चाहिए। इसी गरज से जांच समिति ने रिपोर्ट पेश कर दी।

सुनैना देवी सती कांड के ठीक पन्द्रहवें दिन की बहुत सुबह बशरूदीन, रमई, झड़ेला और लियाकत गाँव के बाहर तालाब के किनारे बैठकर अपने-अपने साज के साथ रियाज कर रहे थे। ये उनका रोज का कार्यक्रम था। उनके लिए सारे दिन एक समान थे, उदास, बेरंग और बेजान। हवा में हल्की सी ठंड थी। गांव अभी ठीक से जगा नहीं था। ये चारों कलाकार गांधी जी का प्रिय भजन, जो अब उनकी जीविका का बचा-खुचा साधन था, 'वैष्णव जन जेते कहिए, पीर पराई जान रे' बजा रहे थे।

उस सुबह आखिरी बार वे चारों गाँधी जी के प्रिय भजन के साथ सिकटार में देखे गए थे।

घटना के सोलहवें दिन तक आते-आते सती स्थान एक सिद्ध पीठ में बदल चुका था। हजार से ज्यादा लोग रोज दर्शन कर रहे थे। लोरिक उस पीठ के महंत बन गए थे। वे अब सचमुच के भक्त हो गए थे। जन आस्था, व्यावसायिक आवश्यकता और मीडिया के प्रभाव वश वे घंटो सती स्थान के समक्ष साष्टांग पड़े रहते। उसी भक्ति के सहारे उन्होंने खुद को माफ कर दिया था और यह मान लिया था कि उन्होंने जो कुछ किया-कराया, वो सब सती मइया की लीला थी। वे तो बस उसकी लीला के निमित्त मात्र थे। सुनैना सचमुच की सती थी, जो कुछ हुआ वह सब सती मइया की इच्छा से ही हुआ। उनके परिवार के अन्य लोग यथायोग्य उसी पीठ से जुड़े गए थे। सिद्ध पीठ के कोठार का देख रेख सुनैना के भाई-भाभी के पास था।

बहावलपुर एक तीर्थ में और बहावलपुर की प्रत्येक चीज बिक्रय की वस्तु में बदल गयी थी। निलम्बित पंचायत सचिव को उस पर लगे गबन के सारे आरोपों से मुक्त कर बहाल कर दिया गया था। अखबार के बाहर के बेरोजगार दिनों में पत्रकार को नौकरी में बने रहने का महान ज्ञान प्राप्त हो चुका था। अब वह इस कोशिश में था कि अखबार किसी तरह उसको एक मौका दे दे तो वह उस सती सिद्ध पीठ के बारे में एक शानदार झूठ लिखेगा।

सुनैना देवी सती कांड के ठीक अठरहवें दिन की सुबह से ही अखबारों, चैनलों में हंगामा मचा हुआ था कि 'अब तक का सबसे बड़ा खुलासा।', 'सुनैना देवी सती कांड की जांच रिपोर्ट पेश।', 'सती हुईं थी सुनैना देवी।', 'सुनैना देवी को अगिन असनान के लिए प्रेरित करने और घटना के समय बाजा बजा कर उनको उत्साहित करने वाले चार लोग गिरफ्तार। 'मौके से वारदात में इस्तेमाल बैंडबाजा बरामद।', 'आरोपियों को ताजिराते हिन्द की धारा 107, 299, 300, 305, 307, 308 के तहत जेल भेज दिया गया।'

उस गिरफ्तारी और आज के बीच बहुत लम्बा समय गुजर चुका है। सिकटार में बाजा बजाना तो दूर, अब कोई किसी बाजा का नाम तक नहीं लेता। तब से आज तक बेगुनाहों की गिरफ्तारी का सिलसिला जारी है। गिरफ्तार लोगों के बारे में बोलने-सोचने पर भी एक अघोषित-अदृश्य पहरा है। बहुत दिन हो गए बेगुनाही के पक्ष में कोई बयान दर्ज नहीं हुआ है।

हाँ, कुछ दिन पहले एक बुढिय़ा के बारे में सुना था, जो सिकटार के आस-पास घूम-घूम कर लोगों से पूछती रहती थी 'काय मालक, 'वैष्णव जन....' गावे बारो हमाओ डोकरा कबे आ है।'

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संपर्क:

हिंदी विभाग,

डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,

सागर-470003 (म.प्र.)

मो. 09479398591

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