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पता / कहानी / किरन सिंह / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1

किरन सिंह

पता

वह सहमा हुआ सा आता। मुझसे कहता कि मेरी मामूली सी लगने वाली हरकतें भी गौरतलब हैं। वह मुझे सुनता है और मेरी बातों के पीछे के मनोविज्ञान को बता सकता है। कभी वह कहता- ‘‘तुम कहीं अधिकारी बन जाना तो मुझे अपने साथ छोटे-मोटे काम के लिए रख लेना।” मैं बहुत संकोच में पड़ जाता था। धीरे-धीरे मैं उसे अपने साथ ले कर चलने लगा। वह साथ रहता तो मैं खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करता। कुछ महीनों बाद वह अक्सर चोटिल हो कर आने लगा। बहुत पूछने पर मुँह खोलता कि कॉलेज के वे लडक़े जो मेरे नोट्स पढ़ कर पास होते हैं वे ही पीठ पीछे मेरा मजाक उड़ाते हैं, वह यह सहन नहीं कर सकता, उनसे भिड़ जाता है।

मैंने तय किया कि कॉलेज के बाकी लडक़ों से बस दुआ-सलाम का नाता रखूँगा। मैं अपने पढऩे के समय से समय निकाल कर उसे पढ़ाने लगा। बी.ए. का पहला और दूसरा साल बीत गया। हम दोनों बराबर हो रहे थे और मुझे अच्छा लग रहा था। गर्मी की छुट्टियों के बाद कॉलेज खुला था। मैं बोर्ड पर चस्पाँ एक नोटिस ध्यान से पढ़ रहा था। लिखा था कि इस अंतिम वर्ष में जो कॉलेज टॉप करेगा उस एक छात्र को सबसे अच्छा पैकेज देने वाली कम्पनी ले जाएगी। तभी उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा-‘‘प्रतिभाशाली लोगों का जन्म बड़े काम करने के लिए होता है।” शाम तक लाइब्रेरी से निकलवा कर उसने दुनिया को बदल कर रख देने वाली किताबें मुझे दीं।

मैं पिछली बेंच पर बैठ कर उन किताबों को पढऩे और सोचने में मुब्तिला रहने लगा। उसने मेरे नोट्स सँभालने के लिए रखे और कहा-‘‘अच्छे धावक अन्तिम चक्कर में गति पकड़ते हैं और जीत जाते हैं। तुम कोर्स की किताबें, इम्तहान से दो महीना पहले उठाओ, तो भी ठीक है।”

इम्तहान से दो महीना पहले मैं अपने इस दोस्त से भी कटा-कटा सा रहने लगा।

और वह रात...वह बी.ए. अंतिम वर्श की परीक्षा शुरू होने की पूर्व-रात थी। मुझसे अर्थशास्त्र की स़ैद्धांतिकी याद ही नहीं हो रही थी। मेरा दिमाग रट रहा था-‘‘मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम!!” दिल में बसी बूढ़ी विधवा माँ की सूरत मेरी राह का बाधा बन रही थी। मैंने जर्नल में पेपर छपने से मिले पैसे गिने। अपने कमरे का चम्मच तक बेचा। सब जोड़ कर माँ को मनीआर्डर भेजा। एक चिट्ठी लिखी-‘‘माँ, मेरा इंतजार मत करना। माँ से बढ़ कर मातृभूमि!” और उस जगह रह कर काम करने के लिए निकल गया जहाँ का पता किसी को नहीं बताना था।

बस्तर के जंगल से ‘मुक्ति मोर्चा’ के मुखिया राहिला का जवाब आ चुका था-‘‘आ जाओ। यहाँ जरूरत है।”

‘‘तुम क्या काम ठीक से अंजाम दे सकते हो ?” राहिला मुझसे पूछ रहा था।

‘‘दोस्ती”

‘‘बच्चों से करोगे ?”

‘‘हाँ!”

मैं दिन में बच्चों को पढ़ाता। चाँदनी रात में तेजी से साइकिल की पैडल मारते हुए जंगल में फेरी देता, लापता साथियों को ढूंढऩे कँटीली झाडिय़ों में जाता, जंगल सीमांत पर पुरानी बारूदी सुरंगे हटाते और नई बिछाते हुए, आठ साल बीत चले थे। इन आठ सालों में बूढ़ी माँ मर चुकी थी। ‘यह तो एक दिन होना ही था। कौन अमर है।’ मैं एक दिन भर बांस-वन में बैठा अपने को समझाता रहा। अगले ही दिन उठ खड़ा हुआ।

बीच-बीच में इस तरह की खबर यह मिलती रही कि मेरे कॉलेज का वह दोस्त अजित, जो अब सबसे अच्छा पैकेज देने वाली कम्पनी में अधिकारी है, उन दिनों में मेरी प्रशंसिका रही गजाला अमीन को लेकर मुझे ढूंढ़ता रहता है। और आजकल आस-पास के किसी गेस्ट हाउस में ठहरा है। खोजने में कोई कमी तो छावनी वाले भी नहीं रखते हैं। सुना है आज फिर दबिश के लिए निकलने वाले हैं। मैं उनके लिए सबसे बड़ा खतरा जो बनता जा रहा हूँ। जंगल के बाशिन्दे मुझे दिलो जान से चाहते हैं। मैं राहिला का दाहिना हाथ हूँ। मैंने अपने संगठन ‘मुक्ति मोर्चा’ का विस्तार किया है। सभी साथियों का मैंने इतना भरोसा जीत लिया है कि वे संगठन में चुनाव कराने और मुझे मुखिया बनाने की माँग कर रहे हैं। राहिला, साथियों की इस जागरूकता पर खुश है। वह नए हाथों में संगठन का जिम्मा सौंप कर स्वयं दूसरे इलाकों में विस्तार के लिए जाना चाह रहा है। इसी सिलसिले में बात करने के लिए उसने मुझे अभी बुलाया है- अकेले, सावधानी इतनी कि यहाँ आने के बारे में किसी को बताना नहीं है, सूने बांस-वन में, नए इलाकों की पहचान से जुड़ी अति संवेदनशील मंत्रणा के लिए।

आसमान से गिरते पत्थर बराबर ओले, मेरी रीढ़ की हड्डी पर चोट कर रहे थे। मैं अपनी ताकत भर दाँत पर दाँत बैठाए हुए था। तब भी मुँह खुल जा रहा था और चीख निकली चली जा रही थी। चीखते ही हड्डी झनझना जाती। रीढ़ में करैत के डँसते हुए चढ़ऩे जैसा दर्द लहर जाता। तेज हवा़, क्रेशर मशीन की तरह चल रही थी। अपनी धडक़न से मैं बहरा हो रहा था।

हथेली खिसकाता हुआ मैं आँख के पास ले गया। धुली हुई उँगलियों से एक आँख किसी तरह फैला सका। रात सुर्ख काली है! चारों तरफ बदबू भी। मैं थोड़ा भी हिलता तो धँसने लगता। इसलिए चुपचाप पड़ा रहा। सोचने के सिवाय इस समय कुछ नहीं किया जा सकता था।

क्या हुआ था ? मैं इस हालत में कैसे हूँ ? कहाँ हूँ? बहुत जोर डालने पर दिमाग में अनगिनत बूट चरमर बजने लगे...सूखी पत्तियाँ दब रही थीं...मैं घिर गया हूँ...वे बूट से, बट से मुझे कुचल रहे थे...मुझे पेट के बल लिटा कर मेरी पीठ...गर्दन पर उछल रहे हैं...दूसरे स्टेट में ले जाओ...पानी में नहीं फेंकना न जमीन में गाडऩा...इसके संगठन वाले खोज निकालेंगे...ह्यूमन राइट वाले बवाल करेंगे...इस कचरे को वहाँ फेंकना जहाँ मलबा फेंका जाता है...दो ट्राली मलबा ऊपर से डाल के दबा देना...हड्डियाँ कीड़े खा जाएँगे...डीएनए तक नहीं हो पाएगा। सावधान! आज रात से इनका लीडर था...कहीं कोई सुराग न मिले... इस एक की जगह बीस खड़े हो जाएँगे।

मेरी अकुलाहट बढ़ गई। मैं उन आवाजों से बाहर निकल आया। और अपनी पूरी इच्छा शक्ति से किसी अनजान का इंतजार करने लगा। कोई सहृदय इधर से गुजरे।

‘फेंको...खींचो!’ मेरी चेतना लौटी तो कई बच्चे हँसते हुए ऐसा ही कुछ चिल्ला रहे थे। उम्मीद के जगते ही, ध्यान के बँटते ही, मेरा दर्द घटने लगा। ये बच्चे, आँधी-पानी में बाहर कैसे हैं ? इतनी अँधेरी रात में मैं इन्हें दिखाई दे गया!

वे शायद मछली फँसाने वाला कांटा मेरी ओर फेंके हैं। मेरी बुश्शर्ट में कांटा उलझ गया। वे मुझे खींच रहे हैं। डोरी कट् से टूट गई। अब उन्होंने मजबूत लकड़ी, मेरी बुश्शर्ट में नीचे से डाल कर कॉलर के पास निकाला है। लकड़ी के दोनों सिरों को पकड़ कर मुझे झटके से बाहर निकाल लिया। भयानक दर्द के बावजूद मैं चीख नहीं रहा था। ये बच्चे डर गए तो कहीं मुझे छोड़-पटक कर चल न दें।

जमीन पर पेट के बल लेटे हुए मैंने लंबी साँस ली। मेरी नाक के पास कीचड़ के बुलबुले उठने की आवाज हुई। वे ताली बजा कर उछल रहे हैं। मेरे शान्त हो जाने पर वे चुप हो गए। ‘हे...ओ!’ जाँचने के लिए उन्होंने मेरे बाल खींचे। मैं गुर्राया, नाक के पास का कीचड़ बूँद-बूँद फिर उड़ा। अब यह उनका खेल बनता जा रहा था। तभी-

‘‘छोड़ो, हटो!” एक औरत बोली। मुझे भान हुआ कि आवाज, मिजाज का थर्मामीटर होता है। स्त्री की आवाज में दीनता से पैदा हुई कर्कशता थी।

ये लोग कछवाहे हैं क्या? चोरों की वह घुमक्कड़ जाति, जिन्हें खास तरह की जड़ी-बूटियों की जानकारी रहती है। जिसे खाते रहने से इनके बच्चों तक को रात में उल्लू जितना साफ दिखाई देता है। बस्तर के जंगलों में इनके दौरे की जानकारी हमें मिली थी। वहाँ ये जड़ी-बूटियाँ... ‘‘हटो, देखने दो!” ऐसा कहते हुए मेरी तरफ बढ़ती उस स्त्री के तलवे लम्बे और चपटे थे। वह एक निश्चित अन्तराल के बाद, जितनी देर में मैं एक दो तीन तक गिन सकूँ, एक डग भर रही थी। उसने मेरा मुआइना किया होगा। वह रीढ़ की हड्डी पर गीली मिट्टी छाप रही है। मिट्टी पर छोटी डंडिया फिर चौड़े पत्ते रख कर बरगद की जड़ से बाँध रही है। एक घनी पत्तेदार शाख पर मुझे लिटा दिया और शाख खींचती हुई कहीं ले चल रही है। मेरे अगल-बगल ताली बजा कर दौड़ते हुए चलने वाले बच्चे हैं।

उसने मुझे एक बोरी की तरह किसी दीवार से टिका कर बैठा दिया। एक बच्चे को मेरी ओर ढकेला। उस बच्चे का कपड़ा मेरे कंधे से छू रहा था। यह फ्राक की घेर है। मेरी कमर और दीवार के बीच बहुत जगह छूटी थी और मैं पीछे खिसकना चाह रहा था। दीवार पर हाथ रखा, शायद लखौरी ईंटें थीं, मुगलों के समय की। मैं पीछे नहीं जा सका, मेरे हाथों में अपना बदन खींचने की ताकत नहीं बची थी।

बिजली कडक़ी लेकिन चमकी नहीं। दीवार से आधा-तियाँ टिका मेरा सिर कभी बाएँ, कभी दाएँ घूम जा रहा था। तेज हवा मुझे तडातड़ झपडिय़ा रही थी। भीगे पत्ते भँवर बनाते हुए उठ-गिर रहे थे। दीवार के पीछे चिंचियाती आवाजें आ रही थीं। उन आवाजों से मेरे दिमाग में जाली में ठुँसी मुर्गियों का चित्र बन रहा था। जो जानती हैं कि मरना है, फिर भी चिकवे के हाथ से बचने के लिए एक कोने से दूसरे कोने भागती हुई चिंचियाती, फडफ़ड़ाती हैं-

‘‘सिर फूटने से बचाओ। बरसाती दबाने वास्ते जो ईंटे रखी थीं...गिर रही हैं।”

‘‘सिर पर पतीली...थाली कुछ भी रखो। लरिको-बच्चों को खींचो, पेट में दबा के झुक जाओ उन पर...”

‘‘बाहर भागो सब लोग!”

‘‘तखत के नीचे घुसो।”

‘‘सारा सामान बोरे में भरो...सब उड़ा जा रहा है।”

‘‘कोई के पास खाली बोरा बचा...नहीं मिलेगा...अच्छा हम अपना सामान बटोर कर उस पर बैठ गए हैं...बाहर कैसे भागें।”

‘‘अरे वो जो पेड़ पर चढ़ के ओल्हा-पाती खेलता है क्या नाम...सनी...हाँ उसे चढ़ाओ, बरसाती पर कई-कई ईंटे रख दे...सब गृहस्थी बह गई!”

‘‘अरे! सनी फिसल रहा है...सनी गिर गया...दीवारों पर काई है।”

‘‘मेरे कंधे पर ईंट गिरी...मुझे चोट काहे नहीं लगी...ठंड से मेरा कंधा सुन्न हो गया..!”

एक औरत लगातार पानी हींड़ रही है...हिलक कर रो रही है...अब बहते पानी को हथेलियों में उठा कर धार गिरा रही है। आटे की सुगन्ध हवा में है। आटा नहीं, सारा प्राण बहा जा रहा हो।

मेरे पास बैठी लडक़ी मेरी कमर और दीवार के बीच की बची जगह में घुस गई। शायद वह समझती है कि सामने पड़ गई तो अम्मा उसे बेवजह मारने लगेगी।

वह चपटे और लम्बे तलवों वाली स्त्री इधर आ रही है। मेरे बगल आकर वह लड़खड़ाई है। गिरने से बचने के लिए मेरे कंधे का सहारा लिया। उसके बदन से आटा महक रहा है। कीचड़ में पाँव रगड़ कर चलती एक बेतरतीब आवाज दूर जा रही है।

मेरे कंधे पर उसके आटा लगी हथेली की छाप पड़ चुकी होगी।

बारह-चौदह जोड़े पाँव होंगे, पानी काटते हुए वे मेरे बगल से गुजर रहे थे। वे मुझ पर जो कुछ फेंकते-ढकेलते जा रहे थे। उन्हें टटोलने पर पता चला कि वे एक...दो...तीन...सात, एक मेरी कमर के पीछे की, आठ बच्चे हैं। मैंने उन्हें अपने में समेटते हुए पूछा-

‘‘सब कहाँ गए ? सूरज कब निकलेगा ?”

अर्राता हुआ एक बड़ा पेड़ गिर रहा था।

‘‘क्या उस पेड़ की कीमती लकड़ी दीमकों ने खाकर खोखल में अपनी टट्टी-मिट्टी भर दी है ?”

‘‘हाँ!”

‘‘सूरज कब निकलेगा...तुम सब एक साथ मुझ पर निगाह गड़ाए हो...तुम्हें अँधेरे में दिखता है! उस पेड़ की जड़ में बसी चींटियाँ मेरे सिर में चढ़ रही हैं...देखो!” मैं सिर झटक रहा था जिसमें से बूँदें उड़ रही होंगी।

वह लडक़ी थी। समझ गई कि मैं पागल हो रहा हूँ। मेरे पीछे से निकली। अपनी सात-आठ साल की हथेलियों से मेरी आँखें खोल कर कहा-‘‘ये देखो, दिन है। बादल वाला दिन। तुम्हारे आँख नहीं है क्या ?”

मैं सन्न रह गया। जरा ही देर बाद मैंने अपने को समझाना शुरू कर दिया-‘‘मुझ एक अकेले को घेरने के लिए बटालियन के कितने लोगों को कूच करना पड़ा था। मैं इतना सा, कितना भारी हूँ।”

मैं देख नहीं सकता। मैं चल नहीं सकता। इसका यह मतलब न निकाला जाए कि मैं कुछ कर नहीं सकता। मैंने अपने दिमाग को संतुलित किया और बच्चों से पूछा- ‘‘क्या उस पेड़ की जड़ के पास उसी नस्ल के बहुत से पौधे हैं।”

‘‘हाँ हैं। और वे सब नए पेड़ हो जाएँगे।”

‘‘क्या पेड़ जिस तरफ लेटा है उस तरफ की एक तिहाई जड़ें भी जमीन में हैं ?”

‘‘हाँ, हैं।”

‘‘तुम लोग देखना, उतने से ही वो पेड़ मरेगा नहीं, अपने को हरा करता रहेगा। आसमान की ओर नहीं तो जमीन की ओर बढ़ता रहेगा। उसकी हजारों पत्तियाँ अपने हिस्से की रोशनी खींच लेंगी। हाँ, अब बताओ तुम्हारे नाम क्या हैं? और बात क्या है ?”

‘‘भूख लगी है।” उनकी आवाज में संकोच नहीं, शंका थी।

‘‘जहाँ खाना मिले, वो जगह यहाँ से कितनी दूर है।”

एक शहर बहुत पीछे छूट जाता है। एक शहर बहुत आगे जाकर शुरू होता है। बच्चों को उनकी अम्माओं ने बताया है कि कई साल पहले इस जगह पर नदी बहती थी। तब यहाँ बहुत लोग रहते थे। यहाँ राजा-प्रजा बैठते थे, गीत-संगीत होता था। एक सुबह सब सोकर उठे तो देखा कि नदी, अपना पाट छोड़ कर मुड़ गई है। यह जगह उजड़ गई।

नदी वाली गहरी जगह पर दोनों बड़े शहरों का मलबा फेंका जाने लगा। लंबे दायरे में फैला यह रेतीला-ढलुवा मैदान, सरकारी कूड़ा घर है। यहाँ बदबू और पानी भर जाने की वजह से दूर तक कोई दुकान-मकान नहीं है। इस चहारदीवारी के भीतर बड़ा चबूतरा और मूर्तियों वाले खम्भे हैं। छत टूट चुकी है। ये लोग यहाँ इसलिए रहते हैं क्योंकि जगह-जगह से भगा दिए गए। यहाँ कोई जाँचने-पूछने वाला नहीं। वे रद्दी की नदी से काम लायक सामान निकालते हैं। सुबह-शाम दो बार नगर निगम का ट्रक यहाँ आता है। सुबह, उसी ट्रक पर बैठ कर ये शहर जाते हैं, कबाड़ बेचते हैं, मजूरी मिल जाए तो ईंटा-गारा कर लेते हैं और शाम वाले ट्रक से लौट आते हैं।

अभी, बहुत दिन से हरदम बारिश हो रही है। नदी पाट का सब सामान बह गया। शहर में कोई नया बनता कई मंजिला मकान गिर गया था। दो मजूर मर गए। तब से सरकार ने कहा है बारिश भर काम नहीं होगा। यहाँ से दाहिने, एक ऊँची सडक़ है जिस पर पानी कम है। पर इस इलाके में पानी भर जाने की खबर से कोई गाड़ी इधर नहीं आ रही है। नगर निगम के ट्रक भी नहीं आ रहे क्योंकि मलबा नालियों के रास्ते बह कर इस नीची जगह अपने आप चला आ रहा है।

वे शहर तक पैदल नहीं चल पाएँगे...वे कई रोज से कुछ नहीं खाए हैं।

‘‘हम बहुत अच्छा खाना खाते थे। काली पौलीथीन भर के बड़े-बड़े होटल का खाना आता था।”

‘‘अब वो खाना... बह कर इधर तो नहीं आया होगा? वही खोजने हम गए थे तभी तुम हमें मिले।”

‘‘तुम तो हमसे अच्छा कपड़ा पहने हो.. कूड़े वाली नदी में तुम्हें क्यों फेंक गए ?”

‘‘तुम मिले तो हमने ताली बजाई। लेकिन अम्मा तुम्हारी जेबें देख चुकी हैं...क्या सचमुच कुछ नहीं है तुम्हारे पास?”

मैं पिछली बेंच पर बैठ कर पढ़ी गई किताबें याद कर रहा था। किसी पैराग्राफ में इन सवालों का जवाब हो। कुछ याद नहीं आ रहा था। एक बार को मन में आया कि कह दूँ- ‘जिसका चलना उन्हें खतरनाक लगता है, उसकी पीठ पर वार करके, उसकी रीढ़ तोड़ दी जाती है। जो उनकी चालें भेद सकता है उसे घेर कर अंधा बना दिया जाता है।’ नहीं, मुझे बच्चों से इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए। कैसे, क्या रास्ता निकालूँ? छुटपन में माँ की सिखाई बात बेसाख्ता याद आई...हारिए न हिम्मत बिसारिए न राम। राम? पर मैं तो नास्तिक हूँ। ये बच्चे तो नहीं होंगे। हे इनके देवताओ!...

ऊँची ढाल से उतरते पाँवों से ठहरा हुआ पानी हिला। ‘‘अम्मा! बाबा!” बच्चे उस दिशा में धीमी गति से पानी पर पाँव रखते हुए बढ़ रहे हैं।

वही स्त्री बोल रही थी-‘‘एक ढाबे वाला जल्दी बन्द करके भाग गया। बचा एक...उसने रोटी बहुत महँगी कर दी। कहता है बिजली नहीं है...चक्की नहीं चल रही। ये ले, यही सबसे सस्ता था। पीले सिम्नी! भूख मर जाएगी। पिछली बार जइसा निमोनिया नहीं पकड़ेगा...।”

‘‘उल्टी आती है, कहा न!” सिम्नी दाँत किटकिटा कर बोल रही थी। पानी में धप् से कुछ गिरा।

मैं बोतलों की आवाजें खूब पहचानता हूँ। जंगल में हम रोहिणी नदी के ऊपर उछाल कर निशाना साधते थे। निशाना चूक जाए तो बोतल ऐसे ही नदी में गिरती थी।

‘‘चुड़ैल! पानी में गिरा दिया। ऐ रमादीन खोज...मेरी बोतल...खोज दे रे!” वह कराह रही थी और पानी मथ रही थी। ‘नहीं मिला...क्या रमादीन? अच्छा! बताती हूँ तुझे!’

‘‘छोड़ दे...नहीं अम्मा! मत मार!”

‘‘ऐ औरत! छोड़ बच्ची को, भूखी है...ऊपर से मारती है।” मैं यहीं से चिल्लाया।

मेरी अंधी पुतलियों पर बच्ची के आने और मेरी गोद में बैठने की छाया उभर रही होगी। वह लंबे तलवों वाली स्त्री एक...दो...तीन मेरे पास आकर लड़खडाई थी। उसने सहारे के लिए मेरा कंधा पकड़ लिया। मैं बच्ची को मारने पर नाराज था और चेहरा नहीं उठाया। वह झुकी खड़ी रही। अब गई है।

बारिश फिर शुरू हो गई थी। वे आठों, मेरे ऊपर एक पर एक ऐसे लदे थे जैसे माघ के आसमान तले, पिल्ले अपनी माँ के पेट में घुसे रहते हैं। मैं हथेलियाँ फिराकर उन्हें ढकने की कोशिश कर रहा था। वे रह-रह कर थरथरा रहे थे। भूखे पेट उनके बदन का तापमान तेजी से गिर रहा था।

और कोई उपाय न देख मैं मुँह ऊपर करके चिल्ला रहा था-‘‘कोई हैऽऽ! हम सोलह आदमी-औरत और आठ बच्चे यहाँ फँसे हैं। कई दिन के भूखे हैं। पानी चढ़ रहा है...हमारी मदद करो!” मेरे मुँह में बारिश का पानी जा रहा था। मैं उसे घोंटता जा रहा था। मेरी देखा-देखी आठों बच्चे मुँह ऊपर करके चिल्ला रहे थे और बारिश का पानी घोंट रहे थे। हमें प्रति उत्तर मिला। पाट की तरफ की ढाल पर सियार हुँआ...हुँआ करने लगे।

‘‘बेटी सिम्नी! जरा उठ तो। तेरे पास कागज है क्या?

‘‘पौलीथीन में एक अखबार है।”

‘‘दो कदम चल ले, अखबार ले आ रानी!”

मैंने पॉलीथिन में रखे उस अखबार को छुआ- ‘‘हे अलादीन के चिराग! कुछ करो।’ सिम्नी ! तुम्हारे फ्राक की झालर में सेफ्टी पिन लगी है, निकाल के दो बेटी। इस जगह का पता क्या लिखेंगे? बोलती जाओ।” मैंने सेफ्टी पिन से अखबार को गोदना शुरू किया।

‘‘देश!”

‘‘देश! देश क्यों कहते हो ?”

‘‘अम्मा कहती हैं कि अब लौट कर हम नहीं जाएँगे। बांगला हटा दिया तो बचा देश...ये देश हुआ वो परदेश। अम्मा ने शुरु किया तो साथ के जो पूरबिहा-पछाहें हैं, सब यही कहने लगे। हाँ तो लिखो...।”

मैंने लिखा-‘‘रोहिला! अजित! तुम मुझे ढूढ़ रहे होगे। मेरा पता है-देश, जहाँ से नदी पाट छोड़ कर मुड़ गई है, जो अब सरकारी कूड़ाघर है। यहाँ सोलह आदमी-औरत, आठ बच्चे हैं। हम मुसीबत में हैं। तुरन्त आओ।”

मैंने अखबार का वह टुकड़ा पॉलीथिन में रख कर बाँधा। बिना डोर की पतंग की तरह हवा में उड़ा दिया। झटका लगने से या दोस्तों की याद से...दर्द चिलक गया।

चहारदीवारी के भीतर इनके माँ-बाप लुढक़े होंगे। उनका आधा जिस्म खम्भों पर टेक लिए होगा और आधा चबूतरे पर, पानी में होगा। हम जहाँ बैठे थे वह घास से भरी थोड़ी ऊँची जगह थी। मैंने उनके पाँव समेट कर अपने ऊपर रख रहा था। साँप, रात में घूमने निकलते हैं। फूँफकारों के लिए मैंने सारा ध्यान, कान पर लगा दिया।

अचानक दाहिनी ओर से खिलखिलाने की कई अधेड़ आवाजें आई। मुझे लगा कि मैं लगातार इंसानी मदद की सोच रहा था, ये मेरी उसी कल्पना के लोग हैं। लेकिन मुझ पर लदे, सिकुड़ी त्वचा के नीम बेहोश बच्चे भी उधर देखे हैं, वापस मुँह गिरा लिए हैं।

‘‘गाड़ी रोकिए...रोकिए! तौबा, कितना खूबसूरत नजारा है। अच्छा हुआ जो लांग ड्राइव पर हम इधर निकल आए। मैं कह रही थी न कि इधर सडक़ ऊँची है, पानी नहीं भरा होगा।

‘‘रीनी! भीग जाओगी। मत निकलो!”

‘‘तुम तीनों भी बाहर आओ। ये बूँदें...जैसे किसी आदिवासी दूल्हे का झलर-मलर सेहरा हो, या किसान की साँवली बेटी सूप से धान ओसा रही हो, चावल और भूसी अलग-अगल गिरा रही हो।”

‘‘वाकई! दूर तक पसरे नीरव-निर्जन में हम बूँदों का संगीत सुन पा रहे हैं।”

‘‘वो दूर, ऊँची ढाल से गिरता पानी झरना बन गया है। सूखी नदी कैसी हरी हो गई है।”

‘‘यहाँ कचरे का दलदल था। सब साफ हो गया। प्रकृति अपनी व्यवस्था स्वयं करती है।”

‘‘तुम तीनों ने कभी गौर किया है...बारिश में पत्तों से रोशनी निकलती है। पत्तों का वैसा चमकता हरा रंग फिर किसी मौसम में नहीं आता।”

‘‘देखो न! पानी ही ऐसे चमक रहा है जैसे सैकड़ों मछलियाँ बेखौफ चली जा रही हैं।”

‘‘मछली से याद आया, रास्ते में मत्स्य विभाग का वैन था। मैंने वैन पर लिखा फोन नंबर नोट किया है।”

‘‘सुन जयनंद! वैन वाले से कह दे...विदेशी माल की दुकान रस्ते में है। दो चार तबीयत की बोतलें उठा लेगा।”

‘‘भाई! मुझ पर तो मौसम का सुरूर चढ़ रहा है। मुझे आज अहसास हो रहा है कि रोटी-कपड़ा-मकान के फेर में कविता, संगीत, बारिश, फूल... जीवन का असली आनन्द तो मैं भूल ही गया था।”

‘‘चलो, मैं ताल देती हूँ...डिंगडि़ंगा...तेरी दो टकिया दी नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए...।”

‘‘यार सोमेन्द्र! मुझे तो गरीबों से रश्क होता है। प्रकृति के नजदीक रहते हैं और गहरी नींद में सोते हैं।”

‘‘हाँ, वो देखो न! वो बूढ़ा इत्मीनान से आँखें मूँदे दीवार से सिर टिकाए है। उसके बदन पर बच्चे कैसा रिमझिम में खुले आसमान तले लेटे हैं। इन्हें खाने का स्वाद तो मिलता है। कुछ भी खा के पचा तो लेते हैं। यहाँ तो ये न खाओ, वो न खाओ...गैस...शुगर...कोलेस्ट्राल...।”

‘‘छोड़ो ये बातें। मैं बहुत खुश हूँ। वर्षों से मैं कोई कविता नहीं लिख पाई थी-‘‘बूँद-बूँद पिघला वजूद/माटी सा गीला वजूद। बंद रहा जो डिब्बियों में/ तीली सा सीला वजूद।” जयनंद प्लीज! मुझे कल भी यहाँ ले कर आना। मेरी कविता पूरी हो जाए।”

‘‘तय रहा। आठ-दस दिन तक बारिश नहीं रुकने वाली। पक्की, सेटेलाइट की खबर है। मुझे तो खुद ही कुछ न लिख पाने का फ्रस्टेशन हो रहा था। यहाँ के साँवले...जादुई...रहस्यमय माहौल में मेरी कल्पना जाग रही है।”

‘‘गुरु लोग तो लिखने के लिए पहाड़ों पर जाकर रहते थे। हम कम से कम यहाँ तो आ ही सकते हैं। सुनो, कई दिन से कहानी का एक प्लाट डिस्कस करना चाह रहा था। सोलह आने सच्ची घटना है। मेरे गाँव में एक दलित परिवार था। गाँव में जो कुम्हार था उसके मरे बैल को, दलित परिवार ने उठाने से मना कर दिया। तुम्हें मालूम! ये पहले खूब दारू चढ़ाते है तब जानवर उठाने चलते हैं। शौक तो पाल लिया पर पैसा है नहीं। कुम्हार भी नाराज हो गया। अलाव से निकाल कर कच्चे खपरैल और रेत मिली मिट्टी, घर बनाने के लिए, उस दलित परिवार को दे दिया। उस साल भी ठीक ऐसी ही बारिश थी...एक सुबह हम सोकर उठे तो उसके बच्चे, कच्चे खपरैल और बालू मिट्टी की दीवार ढहने से बुरी तरह घायल थे...वह आसमान की ओर मुँह करके ऐसे चिल्ला रहा था मानो आसमान में छेद कर देगा-”ओ बाबू लोगों के भगवान! तुम्हें प्रान ही चाहिए न! मैं तुमसे सौदा करता हूँ, मेरे प्रान ले लो मेरे बच्चों को छोड़ दो!”

"हिट प्लाट है। थोड़ा मेलोड्रामा डाल देना, थोड़ा विमर्श।”

"आब्जेक्शन मीलार्ड! अगर भगवान ने उस दलित की सुन ली और बच्चे बच गए तो कहानी फिल्मी हो जाएगी...साहित्य दुख का होता है...सुख की कोई कहानी नहीं बनती।”

"प्राब्लम है यार! जब से नौकरी लगी, रीनी का साथ हुआ, दुख की फीलिंग ही नहीं आती।”

"पुराने अपमान के दिन याद कर...दो चार दिन डिप्रेशन में रह! कबिरा घर साहित्य का...खाला का घर नाहिं।”

"लेकिन संघर्ष की...उम्मीद की जीत भी तो...”

"अबे साले! सत्यनारायण की कथा लिखोगे? क्लासिक कहानी चाहिए तो बच्चों को मरना होगा। बच्चों का मरना संवेदना को सबसे ज्यादा झकझोरेगा। कहानी पीछा करेगी, भूलाए न भूलेगी।”

उनके गाए सावन-गीत, उस दिशा से उड़ कर आती हवा पर चढ़ कर, इधर आ रहे थे। मैंने उन्हें जैसे-तैसे पुकारा था। मेरे नाले (दर्द भरी पुकार) उन तक नहीं पहुँच पा रहे थे। पछुवा हवा हमारी विपरीत दिशा में बह रही थी।

मैं अपने फेफड़े पर बच्चों की पसलियों का चलना महसूस कर रहा था। मैंने उन्हें हिलाया-"मेरी बाँह खाली करो। मैं एक और चिट्ठी लिखना चाहता हूँ।” वे हिले नहीं। एकाएक अपने को खींचते हुए उठने लगे। जिस दिशा से तली जाती मछली की तेज गंध आई थी। बारिश का झकोरा उनके सीने पर, जैसे तलवार से जर्जर ढाल पर चोट की जा रही हो, बार-बार उन्हें पीछे खदेड़ दे रहा था।

"अरे! वो भूत-प्रेत चले आ रहे हैं क्या ?”

"तुम भी रीनी...बच्चे हैं। पर अजीब हैं। आधी आँख खोले, दोनों हाथ सीधे फैलाए, काले-अधनंगे-भीगे, कतार में खड़े।”

"ये ऐसे क्यों हैं ?”

"ये मुफ्त के पैसे से नशे के आदी हो जाते हैं। कबाड़ का पैसा मुफ्त का पैसा ही तो हुआ। इधर कोई आता नहीं न! अवैध शराब भट्ठियाँ भी हैं। देख रहे हो इनकी आँखें कैसी अधखुली हैं, डगमगा रहे हैं। मैं इस पर आर्टिकिल लिखूँगा।”

"जल्दी, फोटो लो इनकी। फेसबुक पर डालेंगे। या फोटाग्राफी प्रतियोगिता में भेज देंगे।”

"अब चैन से कोई खा भी नहीं सकता। देखो कैसा ललचाए घूर रहे हैं। ऐ! हटो यहाँ से तुम लोग!”

"ऐसे मत कहो संगीता, बेचारे! मुझे इन पर बहुत दया आ रही है लेकिन भीख देना गलत प्रवृत्ति को बढ़ावा देना है। आदत पड़ गई तो ये मेहनत नहीं करेंगे। तुम लोग पढऩे जाते हो बेटा ? क्यों ? तुम्हें पढऩा चाहिए।”

"हमारे बच्चों का तो बचपन ही नहीं रहा... किताबें, कम्पटीशन ऊपर से रिजर्वेशन। याद है, रेनी डे हो जाता था...हम भीगते-खेलते घर लौटते थे।”

"रीनी! तुम छींक रही हो। इधर आओ, वैन वाले से मैंने ब्रांडी मँगवाई थी। दो घूँट पी लो। फिर हम निकले यहाँ से।”

"मैं तो लिखने बैठता हूँ तो जरूर थोड़़ी ले लेता हूँ। क्या बात निकलती है।”

"जाने की जल्दी क्यों कर रहे हो यार जयनंद! सावन फिर अगले साल आएगा।”

बच्चों के मुँह चलाने और च्चट्-पच्ज्, कुछ इसी तरह आवाजें आ रही थीं। मैं सोच रहा था कि वे ऐसा क्या खा रहे हैं? मछलियों के कांटे में चिपका मांस नोचने के लिए ये कांटे तो नहीं कूच-थूक रहे हैं। तभी हवा में कुछ उछाले जाने...तेजी से हवा कटने की साय...साय ध्वनि सुनाई दी। यह तो जाना-पहचाना सा दृश्य लग रहा है...याद आया, जैसे उस दिन रज्जब की कोठरी से पेट्रोल भरी बोतलें वे छावनी वाले फेंक रहे थे। रज्जब गिड़गिड़ा रहा था...साहब, मैंने ये पेट्रोल बम नहीं बनाया है। वे उसे ले जाते हुए कह रहे थे...सारा सच बाहर आएगा जब तेरा ही पेट्रोल तेरे हलक में जाएगा...।”

"वैन वाले भइया जी ! ये खाली बोतल ले लीजिए और इसके बदले मछली दे दीजिए।” सिम्नी कह रही थी। सिम्नी को सुनने के लिए मैंने पुरानी बातों को सोचना बन्द किया।

"बिजनेस करने लगे तुम लोग...चलो भागो।”

"वैन वाले भइया जी!”

"अच्छा चल, देख! बोतल में नीचे थोड़ी रह गई है। खाली करके दे। अरे रे...ये सबसे महँगी शराब है...नीचे गिरा के बेइज्जती कर रही है...पी जाओ। मिलिट्री कैन्टीन की है...टानिक का काम करेगी...पीओ जल्दी...शाबाश! ये लो दो पीस, अब खुश!”

एक के बाद एक बोतलें हवा में कलाबाजी कर रही ंहैं। बोतलों के पीछे, पानी में गिरते-घिसटते नन्हे कदम थे। हँसते-उछलते लंबे डग थे-

"दौड़़ो! देखें पहले कौन पकड़ता है...अरे तुम बच्चे हो कर नहीं दौड़ पा रहे हो...वाह, हम अभी बूढ़े नहीं हुए...हम जीत गए। नहीं...नहीं रोओ नहीं। ये लो बोतल...अब हँसो...नहीं पहले हँसो तब देंगे।”

"अब मैं दूसरी बोतल फेंकने जा रही हूँ। तैयार ? रेडी...स्टडी...गो।”

"लो! ये पेड़ पर चली गई। नहीं छूटकू, रोना मना है। जयनंद! डाली झहरा दो। बच्चे हैं।

"यार! हम लोगों ने ये खोल तो लीं लेकिन पूरी नहीं पी पाएँगे। कोई नहीं, ऐसे ही इन्हें दे देते हैं। चलो, अब लौटा जाए।”

"वैन वाले भाई साब! कल से छ:सात दिन तक इसी समय, यहीं आना है आपको। दोनों चीज बढ़ा कर लाइएगा। हमारे और चार-छ: साथी रहेंगे।”

"बाए बच्चो!”

वे फर्राटे से निकल गए हैं। इन आठों के पेट जरुर थोड़े भरे होंगे। तब भी वे लड़खड़ाते कदमों से क्यों लौट रहे हैं। मुझ पर गिर कर वे सो चुके हैं। मैं उन्हें टटोल रहा हूँ। उनके मुँह बन्द नहीं हो पा रहे हैं, खुले पड़े हैं।

मैं उनके तालू और मसूढ़ों में धँसी, बड़ी मछलियों के कांटे निकाल रहा हूँ।

उन आठों के मुँह से मिलिट्री कैन्टीन से ब्लैक में खरीदे गए कूड़े की बदबू आ रही है।

मैंने अखबार के आखिरी बचे टुकड़े को छेदते हुए लिखा-"रज्जब! छावनी के पूछताछ-कैम्प में सात दिन रहने के बाद, तुम जब लौट कर आए थे, तुम्हारी पेट्रोल पीने की आदत पड़ चुकी थी। ये जो अभी गए हैं, ये सात दिन और आएँगे। तुम्हें उसके पहले आ जाना है। मैंने माँ को लिखा कि मेरा इंतजार मत करना। माँ पर क्या बीती होगी यह मैं आज जान पा रहा हूँ। मैं तुम्हारा पल-पल इंतजार कर रहा हूँ।

मेरा पता बहुत आसान है- देश, जहाँ से नदी पाट छोड़ कर मुड़ गई है।

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गोमती नगर, लखनऊ-226010

फोन-9415800397

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