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पैर / कहानी / मनोज कुमार पांडेय / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1

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मनोज कुमार पांडेय पैर तुमसे पहले मुझे सिर्फ अपनी छोटी बहन के पैर याद थे। वह भी अभी के नहीं, उसके बचपन के। जब वह छोटी सी थी और फुदकती हुई...

मनोज कुमार पांडेय

पैर

तुमसे पहले मुझे सिर्फ अपनी छोटी बहन के पैर याद थे। वह भी अभी के नहीं, उसके बचपन के। जब वह छोटी सी थी और फुदकती हुई सी चलती थी। मुझे उसके लाल नरम पैर छूने में बड़ा मजा आता था। और वह बार बार शिकायत करती हुई भागती थी। उसके वे छोटे छोटे पैर मैं जब चाहूँ मेरी आँखों के सामने आ जाते हैं। मेरे एक बार सोचने भर की देर होती है और वे मेरे इतने नजदीक होते हैं कि मैं उन्हें छू सकता हूँ।

और अब तुम्हारे पैर। मैं लाखों करोड़ों की भीड़ में तुम्हें तुम्हारे पैरों से पहचान सकता हूँ। गहरी से गहरी नींद या बेहोशी में भी तुम्हारे पैरों की एक छुवन मुझमें वह ताजा ताजा होश पैदा कर सकती है जैसे कि मैं तुम्हारी ही बाँहों में सो रहा था और अभी उठा हूँ तो तुम्हारा ही चेहरा सामने है। मैं कैसे बताऊँ तुम्हें कि तुम्हारे पैरों में क्या जादू है। कि उन्हें एक बार देखने भर से मेरे भीतर कैसी कैसी तरंगें उठने लगती हैं। छूने और चूमने के बाद तो मर ही जाता हूँ मैं।

तुम्हें पता नहीं याद है या नहीं कि पहली बार मैंने तुम्हें तुम्हारे पैरों से ही पहचाना था। कि तू वही है जो मुझे तबाह करने आई है।

इसके पहले हम रोज मिलते थे। हँसते बतियाते थे, गप्पें लड़ाते थे, साथ में कश खींचते थे। इस दरम्यान पता नहीं कितनी बार हमारे हाथ अनायास एक दूसरे से टकराए होंगे। पता नहीं कितनी बार जान-बूझकर हमने एक दूसरे के हाथों को छुवा होगा। पर कभी कुछ नहीं लगा। भीतर कोई तड़प या सनसनी महसूस नहीं हुई।

वह दिन आज भी मेरे भीतर खलबली मचाए रखता है जो मेरी तबाही की शुरुआत का दिन था। जो मेरी तकदीर को दोबारा लिखने जा रहा था। वह मेरे भीतर एक ऐसा कोना खोलने जा रहा था जहाँ फकत आँसू, उदासी, चीख और कभी न $खत्म होने

वाली वासना भरी हुई थी। और इस वासना का पागलपन इस रूप में दिखाई पडऩा था कि मुझे हमेशा तुम्हारे पैर चाहिए थे।

ऐसे दिन पहले से बताकर नहीं आते। उस दिन भी सुबह से कुछ भी अनघट नहीं घटा था। सुबह से वैसे ही सब कुछ चलता चला आया था जैसे रोज चलता था। यह कोई दोपहर और शाम के बीच चार बजे जैसा व$क्त रहा होगा जब मेरे हाथों की घड़ी रुक गई थी और मेरे भीतर एक नई घड़ी की टिक टिक शुरू हुई थी। और उसी क्षण मैं अपना होश खो बैठा था या कि मेरे भीतर एक नई बेहोशी ने होश सँभाला था।

ऐसा नहीं हो सकता कि किसी ने मुझे इससे बचाने की कोशिश न की हो। कोई इशारा न किया हो किसी ने, हवा के किसी झोंके ने मेरे बालों को न बिखेरा हो। कोई चिडिय़ा सिर को छूती हुई न निकल गई हो। या आफिस की तरफ जाते पैरों को किसी चींटी ने न काटा हो... कि कोई नुकीला कंकड़ पैर और तलवों के बीच न आया हो पर मैंने ही ध्यान न दिया हो... आखिर इस कोशिश में उनकी जान भी तो जा सकती थी। जो भी हो। मैं आफिस गया और यह दिन के उतार का कोई समय रहा होगा जब मैंने पाया कि मेरे पैरों पर जैसे आग रख दी गई हो (यही आग मैं ढूँढ़ रहा था)। इसी एक क्षण में मैं पूरी तरह से बदल गया।

मेरे भीतर एक पल को आया कि मैं अपना जलता हुआ पैर वापस खींच लूँ। उसी एक पल में मैं अपने पैर वापस खींच लेता तो शायद बच भी जाता पर यह पल मेरे जीवन में पहली बार आया था अच्छे या बुरे से परे और मैं उस पल में हमेशा के लिए खो गया। उसी पल वह पल निकल गया जब मैं अपने को बचा सकता था।

और यहीं से वे पल पैदा हुए जहाँ तुम्हारे होठों से पहले मुझे तुम्हारे पैर चूमने की तलब हुई। नहीं इसमें तुम्हीं मेरी देवी वाला पूजा भाव नहीं था। मेरे भीतर तब तक कोई सनसनाहट होती ही नहीं थी जब तक मैं तुम्हारा पैर नहीं चूमता था।

आग वाले दिन के अगले दिन मैंने तुम्हें तुम्हारे सामने बैठकर एसएमएस किया कि मुझे तेरे पैर खाने हैं। अभी। तुमने एसएमएस पढ़ा और सिर ऊपर उठाया। आँखों में एक बदमाश चमक थी। उन्हीं चमकती हुई बदमाश आँखों से तुमने पूछा कि अगर कोई तुम्हारे पास एसएमएस करे और कहे कि उसे तुम्हारे पैर खाने हैं तो तुम क्या जवाब दोगे?

मैं क्या कहता? मैंने कहा कि ये है भला कौन जो सब कुछ छोडक़र सिर्फ पैर खाना चाहता है?

कोई भी हो, तुमसे क्या मतलब। तुम तो बस मेरे सवाल का जवाब दो। तुमने कहा।

मैंने कहा कि इसका जवाब मैं कैसे दे सकता हूँ। यह तो इस पर निर्भर करता है कि जिससे यह पूछा गया है वह पूछने वाले के बारे में क्या सोचता है। जवाब इसी बात से तय होगा।

बदले में तुम मुस्कुराई और अपने नंगे पैरों को मेरे पैरों पर रख दिया और देर तक अपने तलवों से मेरे पैरों को सहलाती हुई कुछ सोचती रही।

मेरे भीतर जैसे एक प्यारा सा अंधड़ उमड़ घुमड़ रहा था। और मैं उसे एक दिशा देना चाहता था। कमरे में हमारे साथ दो लोग और बैठे थे और अपना काम कर रहे थे। मुझे अपनी कलम गिरानी थी। कलम गिराकर पहले मैंने इधर उधर देखा कि तुम्हारे पैर मेरे पैरों पर खिले रहें। बैठे बैठे ही धीरे से कुर्सी पीछे सरकाई। और इसके बाद $कलम खोजता हुआ नीचे झुका और धीरे से तुम्हारे पैरों को अपनी हथेली पर ले लिया। अभी तक जो आग के फूल मेरे पैरों पर खिले हुए थे वे मेरी हथेली पर खिल गए। दूसरे हाथ से तुम्हारे पैरों को सहलाते हुए मैं और झुका। मैंने तुम्हारे पैरों के ऊपरी हिस्से पर अपने होठ रख दिए।

तुमने अपने पैरों को पीछे खींचना चाहा तो मैंने तुम्हारे अँगूठे को मुँह में भर लिया। तुमने दूसरे पैर से मेरे गाल सहलाए और अँगूठे को छुड़ाना चाहा। मैंने दाँतों से हल्का सा दबाव बनाया। और तब तुमने एक हल्की सी सिसकारी के साथ अपने पैरों को ढीला छोड़ दिया। मैं बेसुध तल्लीनता के साथ बहुत देर तक अपनी $कलम खोजता रहा।

उस दिन के बाद से कभी मेरी पेन गुम हो जाती तो कभी कोई फाइल... कभी रूमाल तो कभी पर्स... और मुझे यह सब देर तक ढूँढ़ते रहना पड़ता। ये रोज होता। दिन में कई कई बार।

कमाल यह था कि उस एक एसएमएस के बाद से उस बारे में न कोई बात तुमने की न मैंने। तुम्हारे पैरों को जी भर खाने के बाद एक दिन मैंने ही तुमसे पूछा कि उस बेचारे पैर के आशिक का क्या किया तुमने? तुमने कहा कि पैर ही तो चाहिए था बेचारे को। कैसे मना करती... दे दिया।

दे दिया? मैंने आश्चर्य ज़ाहिर करते हुए पूछा।

हाँ। उसने मुसकराकर फिर से कहा। पैर ही तो चाहिए था बेचारे को, दे दिया।

पता नहीं कौन सी हिचक थी कि मैं इसके बाद कुछ नहीं बोला। तुमने भी कोई बात नहीं की। सब कुछ पहले की ही तरह चलता रहा। हम आपस में दुनिया भर के मसले पर बतियाते रहे पर इस मसले पर इसके बाद हमने कभी भी बात नहीं की।

एक दिन ऐसे ही तुमने अपने हाथ बढ़ाए जिन्हें मैंने अपने हाथों में कुछ इस तरह ले लिया जैसे कि बस इसी बात का इंतज़ार कर रहा था। मेरे भीतर कुछ भी नहीं दहका। मैं दिन भर लोहा लंगड़ $कलम कागज़ जो भी छूता रहता था उसमें और तुम्हारे हाथों में कोई भी खास अंतर नहीं जान पड़ा मुझे। तब मैंने अपने पैरों को तुम्हारे पैरों की तरफ सरकाया। मेरे पैरों ने तुम्हारे पैरों को छुआ भर होगा कि मेरे हाथों में भी सनसनी दौड़ गई। और मैंने पाया कि दुनिया के सबसे सुंदर हाथ मेरे हाथों में है। तुम्हारे हाथों की गुनगुनी आग में मैं पिघलने लगा। तुम्हारा चेहरा लाल हो रहा था। तुम्हारे बेताब होठ खुले थे और वे मेरे होठों को खा ही जाना चाहते थे।

उस दिन कमरे में कोई नहीं था। शाम का समय था और कोई भी कमरे के बाहर नहीं जाना चाहता था। न तुम न मैं। चाबी हमारे पास ही थी। मेरे पास पूरा मौका था कि मैं तुम्हें अपने होठ खाने देता और बदले में सिर्फ पैर ही नहीं बल्कि पूरा का पूरा तुम्हें खुद में समो लेता। मैंने तुम्हारी ढीठ आँखों को अपनी आँखों से देर तक चूमा। उनमें अजीब सी बेसुध चमक उतर आई थी। शायद तुम भी वही सोच रही थी जो मैं सोच रहा था।

तभी तो तुम उठी और तुमने कमरे की सिटकिनी चढ़ा दी। और वापस आकर मेरे ऊपर छा गई। तुम मेरी कुर्सी के पीछे से आई और तुमने मेरे होठों पर अपने होठ रख दिए। मेरे भीतर कोई सनसनी नहीं हुई। मुझे खुद को याद दिलाना पड़ा कि मैं एक जवान आदमी हूँ और जिस जवान लडक़ी के लिए पल पल मरता हूँ मेरे ओठ उसी की कैद में हैं। तुम मुझ पर छाई जा रही थी और मुझे पता ही नहीं था कि मैं तुम्हें कैसे जवाब दूँ।

तब मुझे तुम्हारे पैरों की याद आई। तुम मेरे पीछे थी। मैंने बहुत कोशिश की पर तुम्हारे पैर न मेरे पैरों की पहुँच में थे न हाथों की। मेरी यह अटपटी कोशिश तुमने कामयाब न होने दी। तुम्हें कैसे पता चलता कि मुझे क्या चाहिए था। मुझे बहुत अजीब लग रहा था। मुझे लग रहा था जैसे किसी अजनबी ने मेरे ओठ अपने मुँह में भर रखे हों और हालत ऐसी कि उठना मुश्किल हो रहा हो।

तुम लंबी गर्म साँसें ले रही थी और मैं ठंडा पड़ता जा रहा था। मेरे माथे पर ठंडे पसीने की बूँदें चुहचुहा आई थीं। तुम्हारी पागल कामनाएँ चरम पर थीं और मेरी कामनाएँ न जाने कहाँ खो गई थीं। मैं नपुंसक हो रहा था। मुझे तुम्हारे पैर चाहिए थे। तुरंत।

मैं झटके से उठा और तुम्हारे पैरों की तरफ झपटा। तुम्हारी आँखों में असीम आश्चर्य उभर आया। तुम्हारा चेहरा अजीब हो चला था। उधर तुम्हारे पैर मेरी पहुँच में आने भर को थे कि मेरी कामनाएँ लौट आईं। मैंने तुम्हारे पैरों में अपने पैरों को फँसाया और तुम्हारे ओठों की तरफ बढ़ा।

तुम अब तक सकते में थी जैसे। जैसे कि कुछ समझ ही न पाई होवो कि हुआ क्या आखिर। यह बोल के समझाने का समय नहीं था। मैं तुम्हारे होठों की तरफ बढ़ा ही था कि तुमने मुझे खुद से दूर ढकेल दिया। मैं फिर से तुम्हारे पैरों की तरफ बढ़ा और तब तुमने मुझे लात मारी और कमरे की सिटकिनी खोल दी।

दूसरे दिन तुम्हारी आँखों में एक पीड़ा भरा उपहास भरा था मेरे लिए। जो उस दिन के बाद से हमेशा बना रहा। उस दिन के बाद मेरे पैरों पर अपने पैर तुमने कभी नहीं रखे। कभी गलती से छू भी गए तो तुमने उन्हें ऐसे झटके से वापस खींचा जैसे तुम्हारे पैरों में कोई अंगारा छू गया हो।

मेरी हालत भी ऐसी ही होती है पर मैं इस अंगारे की आग में जल ही जाता हूँ। मेरी समूची चेतना सिहरकर रह जाती है। फिलहाल तो उस दिन के बाद से यही सब चल रहा है। जबकि मुझे पता है कि दुनिया में वही दो पैर हैं जो मेरे लिए बने हुए हैं।

तुमने उस दिन के बाद से मुझसे बात करनी बंद कर दी। मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ। मेरे भीतर जो कुछ भी घटा था उस दिन तुम्हें बताना चाहता हूँ। मैं इंतज़ार कर रहा हूँ उस दिन का कि तुम्हारे भीतर का वह उपहास भरा गुस्सा कम हो तो शायद तुम मेरी बात सुन सको।

मैं सोचता रहता हूँ हर पल कि तब मैं तुमको सब कुछ कैसे बताऊँगा। यह भी डर हमेशा सताता रहता है कि तुम मुझ पर भरोसा भी करोगी कि नहीं। और तो और जो कुछ भी उस दिन घटा अगर दोबारा सब कुछ वैसे ही घटा तो? जब भी यह बात मेरे मन में आती है वही उस दिन वाली ठंडे पसीने की बूँदें चुहचुहाने लगती हैं। हाथों पैरों में जैसे जान ही नहीं रहती है।

उनमें दोबारा जान तभी लौटती है जब तुम्हारी लाख सावधानी के बावजूद किसी पल के किसी बहुत छोटे हिस्से के लिए ही सही तुम्हारे पैर मेरे पैरों से छू जाते हैं। जब तक मैं तुम्हें अपनी बात समझा नहीं पाता तब तक उन्हीं दो पलों की जि़ंदगी के भीतर मरता रहता हूँ।

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संपर्क:

हिन्दी समय, महात्मा गांधी

अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वंविद्यालय,

वर्धा महाराष्ट्र

मो. 08275409685

ई-मेल : chanduksaath@gmail.com

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रचनाकार: पैर / कहानी / मनोज कुमार पांडेय / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1
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