मंगलवार, 14 जून 2016

कलावंती सिंह / कैसी कहानी पढ़ना चाहते हैं पाठक? / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1

कथा कसौटी (पाठक)

कलावंती सिंह

कैसी कहानी पढ़ना चाहते हैं पाठक?

कहानी से क्या चाहते हैं पाठक? कहानी से मनोरंजन हो,कहानी शिक्षा दे, कहानी जीवन के अनसुलझे सवालों को सुलझा दे या सुलझाने के सूत्र दे। हमें ऐसी दुनिया में ले जाए कहानी, जहां हम यथार्थ से दूर एक आरामदेह कोना तलाश लें या ऐसे यथार्थ के दर्शन करा दे जहां तक हमारी नज़र पहुँचती ही न हो। कभी परेशानी या दुख भरे समय में कहानी हमें माँ की गोद की तरह थोड़े समय के लिए शरण देती है जहां हम अच्छा अनुभव करते हैं। कई बार कभी पढ़ी गई कहानी के सूत्र हमें अचानक ही जिंदगी में आई किसी उलझन का समाधान कर देते हैं। कहानी से कई बार हमें अपने भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने समझने में मदद मिलती है। वे हमारी नैतिकता को पोषित कर हमें मॉरल सपोर्ट भी देती हैं। वे अंतत हमें एक अच्छा इंसान बनने में मदद करे। यह मैं एक पाठक के नाते कहानी से जरूर चाहती हूँ। हिन्दी के पास कहानियों का विपुल साहित्य है। सरल सीधी जिंदगी से जुड़ी कहानियों से लेकर चमत्कारिक, रहस्मयी, ऐयारी वाली कहानियाँ। इस बीच कुछ हिन्दी पत्रिकाओं ने रहस्य रोमांच वाले विशेषांक भी निकाले हैं। जीवन से मिले अपने-अपने तरह के अनुभवों, परवरिश, परिवेश और लेखक की संवेदना से निकल कागज पर मुक्कमल होती है कहानी। फिर यह कहानी विभिन्न संचार माध्यमों से होकर पाठकों तक पहुँचती है। अलग अलग तरह की कहानियों का अलग अलग पाठक वर्ग भी है। बहुत सारी पत्रिकाओं, वेब पत्रिकाओं,ब्लॉग मिलकर आज के लेखकों को बड़ा मौका देते हैं बहुत सारे पाठकों तक पहुँचने का। पाठक चाहता है कि कहानियाँ उन्हें दूसरे मनुष्य और उसके परिवेश उसके संस्कारों को समझने में मदद करे। उसकी चेतना को विकसित करे। उसकी आत्मा को झकझोरे और उसे एक संवेदनशील मनुष्य बनाए। उसे राह दिखाये। महान कथाकार प्रेमचंद की वह बात आज भी प्रासंगिक है कि साहित्य का काम समाज के आगे आगे मशाल लेकर चलने का है। मैं खुद एक पाठक रही हूँ

करीब पिछले तीस बरसों से रोज कुछ न कुछ पढ़ना मेरी दिनचर्या है। कहानियाँ पढ़ने की उम्र से बहुत पहले, बचपन में रोज अपनी बड़ी माँ से कहानियाँ सुनने की आदत रही। कहानियों में सतत जिज्ञासा होनी चाहिए। कहानी ऐसी हो जो पाठक को बांधे रखे। उसके बाद ? फिर क्या होगा उसके बाद ? यह प्रश्न निरंतर बना रहे । एक पाठक के तौर पर मेरी अपेक्षा होती है कि मैं भिन्न भिन्न भाषाओं की हिन्दी में अनूदित कहानियाँ पढ़ सकूँ ताकि वहाँ के समाज और परिवेश को जानने में मुझे मदद मिले। मेरी जानकारी बढ़े। मैं अपने अनुभवों को उन कहानियों से रिलेट कर सकूँ । मुझे एक पाठक के रूप में तब बड़ा अच्छा लगता है जब मैं कहानियों में अपने आस पास की जीवनस्थितियों को शब्दों की शक्ल में देख पाती हूँ। कई बार कहानियाँ जीवन मूल्यों को बचाने का काम करती हैं। बचपन में विक्रम बैताल, पंचतंत्र ,की कहानियों से बहुत कुछ सीखा। चंदामामा, चम्पक, नन्दन पढ़कर हमारी पीढ़ी जवान हुई। रामायण को हम दोहा या कविता के रूप में जानते हैं पर वहाँ भी तो एक कहानी ही है। कहानी से मुझे अपेक्षा रहती है कि वह जीवन के क्रूरतम अनुभवों को चित्रित तो करे पर अंतत उसमें सकारात्मक जीवन संदेश हों। अंधेरा दिखाये पर उजाला बताए।

मुझे यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि समकालीन लेखन का एक बड़ा भाग स्त्रियों द्वारा रचा जा रहा है जिनमें बहुत बेबाक ढंग से वे अपनी बात कह पा रही हैं। इनमें से बहुत सी लेखिकाएँ आत्मनिर्भर हैं। यह एक बड़ी वजह हो सकती है कि वे अपनी बात खुलकर कहने का साहस कर रही हैं। अब तक पुरुष लेखकों द्वारा उनकी बात कही गई। आज वे खुद अपनी बात कह रही हैं। संवेदना के वे तमाम तन्तु उनकी कहानियों में दिखाई पड़ रहे हैं, जो अबतक अनदेखे रह गए। उनके खुद के जीवन अनुभव,उनकी पूर्ववर्ती पीढ़ियों के अनुभव, वे सब लिख रही हैं। उनके अनुभव से ज्यादा उनकी बेबाकी हमें चौंका रही है। उनका लेखन एक नई स्त्री से हमारा परिचय करवा रहा है। वे महानगर की स्त्रियों का जीवन लिख रही हैं वे छोटे शहरों के स्त्रियों को भी लिख रही हैं। वे गाँव में छूट आई बुआ , चाची, माँ का जीवन भी वे देख लिख रही हैं। बहुत बड़ी तादाद में महिलाएं मुखर हुई हैं। स्त्री सशक्तिकरण के नाम पर कुछ वे नैतिकता कि नई परिभाषाएँ गढ़ रही हैं। वे अपना संविधान खुद बना रही हैं। मैं इन्हें बहादुर स्त्रियाँ कहूँगी, जिन्हें अपनी बात कहने में किसी से डर नहीं लगता। ना इस पितृ सत्तात्मक समाज से, ना ही अनैतिकता का हल्ला मचानेवाले अनिद्य आलोचकों से। वे अपने कार्यजगत के अनुभव लिख रही हैं, परिवार में अपनी बदलती हुई स्थिति के अनुभव लिख रही हैं। समाज और परिवार से अपनी अपेक्षाओं की बात लिख रही हैं। वे एक नया समाज गढ़ रही हैं वे एक नया समाज रच रही हैं। उनमें और सब है, कातरता गायब है, जिसे हमारा समाज देखने का आदी रहा है। उनका परिवार उनका साथी पुरुष भी बदला है और बहुत हद तक उन्हें उनका स्पेस मिल रहा है। वे रच रही हैं और उनका रचा, नई पीढ़ी को रच रहा है उन्हें ज्यादा आज़ादी दे रहा है।

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संपर्क:

टी 32, बी नॉर्थ रेलवे कालोनी,

रांची 834001 झारखंड

मो 09771484961

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