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विनोद मल्ल / व्यक्तिगत स्वतंत्रता की खोज / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1

कथा कसौटी (पाठक)

विनोद मल्ल

व्यक्तिगत स्वतंत्रता की खोज

पिछले तीन दशक से कहानियां पढ़ रहा हूँ। विश्वविद्यालय के दिनों में नियमित सारिका पढ़ता था और उसके बाद हंस। कहानियाँ कथ्य के माध्यम से व्यक्ति की अनुभूति और संवेदना को समाज से जोड़ती हैं। इस सामाजिक परिप्रेक्ष्य में मानवीय संबंधों का चित्रण, व्यक्ति का व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर संघर्ष आधुनिक कहानियों का विषय रहा है। वैश्वीकरण, टेक्नोलॉजी और संचार माध्यमों में आई क्रांति ने भी व्यक्ति, समाज और साहित्य को प्रभावित किया है। वर्तमान सामाजिक व्यवस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह लगे हैं और यह बार-बार आज की कहानियों में दिखता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता की खोज भी आज की कहानियों में अक्सर देखने को मिलती है और साथ साथ स्वतंत्रता और सामाजिक मूल्यों के बीच असंतुलन द्वारा निर्मित भावनात्मक और सामाजिक उथल पुथल भी दिखती है।

भारत के सन्दर्भ में धर्म, जाति, राजनीति और भ्रष्टाचार ने लेखन को प्रभावित किया है। एक तरफ राजनीति कमजोर और पिछड़े तबकों के सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम बनी वहीं दूसरी तरफ इन्हीं तबकों के शोषण का कारण भी। 1960 -70 के अरसे में भारत एक नया देश था जिसने औपनिवेशिक सत्ता से आजादी प्राप्त की थी। लेकिन उसी अरसे में सामंतवाद और जातिगत शोषण से भी जूझ रहा था। भुखमरी और गरीबी से देश लड़ रहा था और उन दिनों की कहानियों में यह विषय अक्सर दिखता था। स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य समाज में विद्यमान थे। मजदूर और किसान अपने अधिकारों के लिये लड़ रहे थे। साम्यवादी आंदोलन देश के कई इलाकों में जोर पकड़ रहा था. 1980 में सारिका में संजीव द्वारा लिखी कहानी “अपराध” प्रकाशित हुई थी जिसने कहानी के पाठक को झकझोर दिया था। यह कहानी नक्सलवाद पर लिखी गई थी। इस कहानी में सामाजिक द्वन्द्व और प्रखर व्यक्तिगत संवेदना लम्बे समय तक चर्चा में रही।

हिंदी कहानियों की सबसे अच्छी बात ये रही कि वह समय के साथ evolve होती रही. लेखकों ने कंटेंट और फॉर्मेट दोनों में प्रयोग करना जारी रखा। उन्होंने समाज के स्थापित मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाने की प्रक्रिया जारी रखी। जाति, धर्म, व्यक्तिगत सम्बन्ध, सेक्स, विवाह और अनेक संवेदनशील विषयों पर लिखते रहे। महिलाओं के संघर्ष और सशक्तिकरण से जुड़े विषयों पर भी लगातार लिखा जाता रहा। सबसे अच्छी बात ये रही कि सामाजिक परिवर्तन महिला लेखिकाओं के लेखन में भी दिखा और उन्होंने संवेदनशील विषयों पर लिखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जब मैं ये लिख रहा हूँ तब 2012 में हंस में किरण सिंह की प्रकाशित कहानी “ संझा” बरबस याद आ जाती है जो “ट्रांस जेंडर” विषय को बड़ी संवेदना और मानवीय भावनाओं के ताने बाने में बांधती है. लेखिका ने कहानी का अंत अत्यंत साहसिक तरीके से किया है जहाँ नायिका अंत में पूरी सामाजिक मूल्यों और सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देती हुई दिखती है। किरण सिंह की हंस में प्रकाशित एक अन्य कहानी “यीशु के शूलें” राजनीतिक दांव पेंच और मानवीय संबंधों के बीच का समीकरण है। सम्प्रदायवाद, जातिवाद और स्वार्थों के तत्व पर पनपती राजनीति किस तरह से इंसान को इंसान का दुश्मन बना देती है, इस कहानी के ताने बाने को किरण सिंह ने बहुत बारीकी से बुना है।

मैंने यहाँ पर कुछ कहानियों का जिक्र किया है हालाँकि पिछले वर्षों में उपरोक्त विषयों पर बहुत लेखकों ने लगातार लिखा है। एक बात स्पष्ट होकर उभरती है कि लेखक कथ्य और फॉर्मेट दोनों में प्रयोग करने में झिझक नहीं रहे। इसके अलावा जो महत्त्वपूर्ण बात रही कि लेखक आज सिर्फ शहरों या बड़े शहरों से ही नहीं बल्कि दूर दराज के ग्रामीण इलाकों से भी बहुतायत लिख रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल के छोटे कस्बों और गावों से लगातार कहानियाँ लिखी जाती रही हैं. स्वाभाविक है कि हिंदी कहानी लेखन में विस्तृत सामाजिक संचेतना मौजूद होगी।

पिछले दिनों लगातार लिखने वालों में जयश्री रॉय और स्नोवा बार्नो ने काफी प्रभावित किया। कविता कहानियाँ स्त्री को चयन की स्वतंत्रता जैसे विषयों को प्रभावशाली तरीके से दर्ज करती हैं। जयश्री रॉय रोज मर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर लिखती रही हैं जिसने पाठकों को बहुत आकर्षित किया. स्नोवा बार्नो की 2010 -12 के अरसे में लिखी कहानियां काफी चर्चा में रहीं। इनकी कहानियां खुद लेखक के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हैं और सम्बन्धों की आध्यात्मिक बारीकियों को छूती हुई नजर आती हैं। हिंदी लेखन की सबसे बड़ी उपलब्धि युवा लेखक रहे हैं। इन लेखकों ने आम आदमी की जिंदगी से जुड़े विषयों पर कहानियाँ लिखीं हैं जिन्होंने पाठकों को गहनता से हिंदी साहित्य से जोड़े रखा। छोटे शहरों से निकलने वाली कई कहानी पत्रिकाओं ने इन नए लेखकों को प्रोत्साहित किया है और साथ साथ हिंदी कहानी लेखन को ग्रामीण परिवेश, खेतों, मजदूरों से भी जोड़ रखा है।

वैसे तो मेरे द्वारा पढ़ी कहानियों में 5 या 10 सबसे अच्छी कहानियों की सूची बनाना बहुत मुश्किल काम है क्योंकि लम्बे समय के बाद पत्रिकाओं में पढ़ी कहानियों का नाम और लेखक याद रखना बहुत मुश्किल है। फिर भी कुछ का नाम लेना चाहूंगा जो खासकर विद्यार्थी जीवन में मैंने पढ़ी थीं। प्रेमचंद की ईदगाह, नमक का दरोगा, कफ़न, निर्मल वर्मा की परिंदे, अज्ञेय की जयदोल, जयशंकर प्रसाद की आकाशदीप, अमृता प्रीतम की चक नंबर 36, गुलेरी की उसने कहा था, मुक्तिबोध की सतह से उठता आदमी,मन्नू भंडारी की यही सच है, इस्मत चुगताई की लिहाफ दिमाग के कोने में कही बस गईं हैं।

पिछले तीन-चार दशक में सारिका, कादम्बिनी, हंस, नया ज्ञानोदय, इंद्रप्रस्थ भारती और परिकथा जैसी अन्य कहानी पत्रिकाओं ने अत्यंत बहुमूल्य हिंदी कहानियां दी हैं जो जिंदगी और समाज के विभिन्न पहलुओं से हमें जोड़ती हैं। अच्छी, सामान्य और खराब कहानियाँ मिलती रही हैं और उम्मीद है मिलती रहेंगी। एक कमी जो खलती रही है वह बढ़ते सम्प्रदायवाद की तरफ शायद लेखकों का कम ध्यान गया है। देश औए समाज के लिये इस बढ़ते खतरे पर कहानी लेखन में हमें ध्यान देने की जरुरत लगती है।

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आई पी एस,

bungalow No.28,

Daffnala, Shahibaug,

Ahmedabad 380004

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