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रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

ज़कीया ज़ुबैरी

दस्तक....

दरख्तों के पत्तों ने जैसे सांस लेना रोक दिया था....

दरख्तों पर बैठी चिड़ियों का दम घुटा जा रहा था....बादल जो उड़ उड़कर हवा से अठखेलियां कर रहे थे वो भी एक जगह जमकर रह गए थे... दम-बखुद... बादलों का रंग सफ़ेद से सुरमई और सुरमई से गहरा सुरमई होता जा रहा था। उस स्तब्ध-चकित वातावरण में अचानक बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की कड़क आँखें और कान बंद कर लेने पर मजबूर कर रही थी। शायद पूरा माहौल क्रोधित था।

क्रोधित तो माएँ थीं पर चुप बैठीं अपने औरत होने का रोना घुट घुट कर अंदर ही अंदर रोए जा रही थीं। हिचकियाँ आती थीं पर उन हिचकियों का गला भी घोंट देती थीं...ये आदेश था कि घर की औरतों की रोने और हँसने की आवाज़ बाहर के मर्दों को सुनाई नहीं देनी चाहिए मज़हब के खिलाफ़ है।

आज सारा परिवार पंचों का फ़ैसला सुनने एक ही छत के नीचे जमा हो गया था। औरतें गरदनें सीने में धंसाए ज़मीन को एक टक घूरते, अन्जाने में चुपके-चुपके पैर के अँगूठे से ज़मीन कुरेदे जा रही थीं...विनती किए जा रही थीं.... हे मेरे मालिक दया कर, रहम कर, करम कर मेरे मौला.... क्या करे वो बेचारा ऊपर वाला भी मजबूर सा लगने लगा है। परवरदिगार तो वो माँ है जो हर ज़िद पूरी कर देता है और ग़लती भी माफ कर देता है इस आशा में कि शायद यह अंतिम ग़लती होगी। अंतिम तो उस समय होगी जब कोई यह माने कि इसको ग़लती कहते हैं...!

पंचों को पंचायत लगाना तो आता है पर ये भूल जाते हैं कि फ़ैसला इन्सानियत के दायरे में रहकर करना होता है - जहां हवस होती है, लालच का राज होता है, सख्ती और ज़ुल्म बड़ेपन की निशानी होती है वहाँ आज फिर पंचों ने औरतों को जानवर से भी बदतर और मर्दों को उनका मालिक का रुतबा देते हुए फ़ैसला सुना दिया था। ऐसा फ़ैसला सुनाते हुए जैसे उनकी अपनी राल टपक रही थी....काश! इस फ़ैसले का फ़ायदा हम उठा सकते। काश...! हमारे बेटे ने कोर्ट में विवाह किया होता....काश ये हो जाता और काश वो हो जाता... सोचते जाते और हाथ मलते जाते....कि ये अधखिली कलियां काश हमारे हिस्से में आ जातीं। चलो कोई बात नहीं एक बार की जूठी भी चलेंगी....

आज वो सरपंच बना बैठा उन अधखिली कलियों को हासिल करने की उधेड़बुन में लगा हुआ था जिसको गांव वाले अल्लाह का नुमाइन्दा मानते हैं... जिस पर पूरा भरोसा करके सरपंच की गद्दी पर विराजमान करवा कर अपनी ज़िन्दगी के फ़ैसले उसके हवाले कर देते हैं... उनकी लम्बी ज़िन्दगी के लिये अल्लाह से दुआ करते हैं और पूरे मान से अपने भाग्य को उनकी झोली में डाल देते हैं कि सरपंचजी तो हमारे माई बाप हैं हमारे लिए अपनी जान भी दे देंगे....पर हमको दुखी नहीं होने देंगे कभी भी ग़लत फ़ैसला नहीं सुनाएँगे.....

पर आज ये हो क्या गया...! ऐसा हो कैसे सकता है...!

एक कोने में घुसी बैठी दो मासूम प्यारी प्यारी बच्चियाँ भौंचक्की सी समझ नहीं पा रही हैं कि ‘‘वानी’’ किस बला को कहते हैं....बार बार सबके होंठों पर एक ही बात थी...इतनी छोटी बच्चियों पर वानी का कानून नहीं लागू किया जा सकता। हम ऐसा नहीं होने देंगी....पंचायत को अपना फ़ैसला बदलना होगा। बच्चियाँ बैठी अपने नाम भी बार बार सुन रही थीं। एक दूसरे को चुपके से देख लेतीं और खामोश बैठी रहतीं। उनको ये अंदाज़ा हो गया था कि बात है कोई गड़बड़ है जो उनको आज घर में रहने को कहा गया है...वरना वो तो तितली बनी तितलियों के पीछे अपने छोटे छोटे मुन्ने मुन्ने पैरों से भागती रहतीं..!

तुम्हारे परिवार के एक मर्द ने गलती की है तो सज़ा भी तुम सबको ही भुगतनी होगी....सरपंचजी ने पेशानी पर बल डालते हुए ग़ुस्से में रिदा के अब्बूजी से कहा। वो मरदूद तो ना जाने कहाँ जाकर मरे हैं कि पुलिस भी हार गई है ढूंढ ढूंढ कर। रिदा के अब्बू लम्बे चौड़े बड़ी बड़ी मूंछों समेत सरपंच जी के पैरों पर गिर पड़े....आंसुओं से मूंछें गीली होकर नीचे को झुक गईं...सरपंच को अपना पैर भी गीला होता महसूस हुआ....पर वो पत्थर की दीवार बना खड़ा रहा।

बाप ने रहम की भीख मांगी... दुहाई दी अपनी बच्ची और अपने मरे हुए भाई की बच्ची जो रिदा के साथ ही पली बढ़ी थी। उन पर ऐसा ज़ुल्म न किया जाए। अभी उनकी उम्र ही क्या है... उनका कुसूर क्या है...! कच्ची उमरें हैं, खेलने खाने के दिन हैं उनके.....दस-ग्यारह वर्ष की लड़कियां तो फूलों से लदी ऐसी डाली होती हैं जो कि हवा के एक हल्के से झोंके से लचक के झूम झूम जाती हैं...उनकी खुश्बू पूरे माहौल को सुगंधित कर देती है। ये नन्ही मुन्नी सी बच्चियाँ जब घर के बाहर आँख-मिचौली खेल रही होती हैं तो कभी कभी सरपंच जी को आता देख कर उनकी ओर तेज़ी से दौड़ कर पहुँच जातीं उनके पैर छू कर एक दूसरे पर रोब जमातीं कि पहले मैंने पैर छुआ दूसरी कहती मैं छूने वाली थी तूने मुझे धक्का दे दिया। फिर मामला सरपंच जी की कचहरी में जाता.....

‘‘सरपंच बाबा आप बताइए कि पहले कौन पहुंचा था?’’

‘‘किसने पहले पैर छूए थे...?’’ दूसरी भला क्यों पीछे रहती।

दोनों के सिरों पर हाथ फेरते हुए सरपंच जी कहते ‘‘मेरे दो पैर हैं तुम दोनों ने साथ ही छुआ था।’’

रिदा सोचती सरपंचजी बेईमानी कर रहे हैं रीमा तो मुझसे कितने पीछे थी तो उनको मेरे साथ क्यों दिखाई पड़ रही है...? वो सोचती रीमा तो मेरे जितना तेज़ भाग भी नहीं सकती मैं ग्यारह वर्ष की हूँ और रीमा केवल नौ वर्ष की... वो दोनों थोड़ी दूर तक सरपंच जी के हाथ पकड़े उनके साथ साथ चलतीं और फिर जैसे ही ढलान नज़र आती दोनों हाथ छोड़ कर ढाल पर लेटकर गोल गोल लुढ़कती हुई सरपंच जी से बहुत दूर निकल जातीं।

अगर कभी रास्ते में पत्थर या गढ़ा आ जाता तो चिल्लातीं सरपंच बाबा बचाइए...बचाइए कहती हुई किसी तरह अपने को आप ही बचा लेतीं और खिल खिलाती हुई खड़ी हो जातीं उलझे हुए बालों में घास के तिनके फंसे हुए, मुंह पर मिट्टी के धब्बे लगे हुए....उठतीं और एक दूसरे को दौड़ाती....पकड़ती...हँसती...गुनगुनाती उछलती कूदती हुई अपने घर की ओर भाग जातीं। सरपंच जी का जी भारी हो जाता उनको अपनी नवासी याद आने लगती वो भी आज इतनी ही बड़ी होती जैसे रीमा। कैसे डेंगू बुखार में देखते ही देखते चली गई। सरपंच जी का जी घबराने लगता इन बच्चियों को देखकर। अपनी नीली बहुत याद आती...कलेजा मसोसने लगता। सरपंचजी उन बच्चियों को दूर तक देखते रहते जब तक वे आँखों से ओझल ना हो जातीं।

घर में आज फिर वही मातम जैसा माहौल था। सभी सिर जोड़े बैठे थे। कोई उपाय समझ में नहीं आ रहा था। औरतें खाना पकाना भूल गई थीं मर्द खाना खाना भूले हुए थे। किसी को भी अपना होश नहीं था। बच्चे बेचारे बड़ों को परेशान देख कर चुप तो थे पर भूख से बेहाल भी थे। बासी तिवासी खाना, सूखी रोटियाँ खा खा कर पेट भर रहे थे।

आज सबको एहसास हो रहा था अगर लड़के लड़की ने अपनी पसंद से चुपके से शादी कर ली है तो इसमें हरज क्या है - आखिर वे बालिग हैं उनको इजाज़त है अपनी मरज़ी से शादी कर लेने की। मज़हब में तो नहीं मना है। जो दुःख खाए जा रहा था वो था खानदान से बाहर शादी कर लेने का। मुसलमान तो दोनों खानदान हैं पर ज़ातें अलग हैं। लड़की वालों को ये ग़म घुन की तरह चाटे जा रहा था कि हमारी लड़की ने नाक कटवा दी है। भला उसकी हिम्मत कैसे हुई अपने से नीची ज़ात वालों के यहाँ शादी कर लेने की। अवश्य लड़के ने भड़काया होगा। वरना हमारी लड़की तो समझदार थी।

कभी वो लोग सोचते उन्होंने बचपन ही में उसकी शादी कुरान-शरीफ़ ही से क्यों ना कर दी... ! अगर सिंधियों के यहाँ का ये रिवाज है तो हम भी तो सिंध के बॉर्डर पर ही रहते हैं। हमारा गाँव आधा पंजाब और आधा सिंध में है। कुरान-शरीफ़ से शादी करके अपनी लड़की अपने ही घर में बूढ़ी हो जाती है....और कोई झंझट भी नहीं होता। वो कुरान-शरीफ़ की सेवा करके जन्नत में जगह बना लेती है और उसके नाम की जायदाद भी घर की घर ही में रह जाती है।

हाय... हाय...! ये क्या हो गया अब हम इस मुसीबत से बाहर कैसे निकलेंगे....लड़के को कहाँ से पकड़ कर लाएँ....लड़की के घर वाले बार बार लड़के की दो बहनों की डिमांड किए जा रहे थे। पंचायत ने भी फ़ैसला उन्हीं के हक में कर दिया था। क्योंकि लड़के से छोटे चार भाई और थे... बहन एक ही थी ग्यारह वर्ष की रिदा.... भोली भाली गुड़िया जैसी...पास ही के स्कूल में पढ़ने जाती। उसको बड़े होकर टीचर बनने का शौक है। खुद भी पढ़ना चाहती है और पढ़ कर गाँव के हर बच्चे तक तालीम की रौशनी पहुंचाना चाहती है।

हालांकि रीमा से रिदा केवल दो वर्ष बड़ी है पर उसको बिलकुल छोटी सी बच्ची की तरह प्यार करती है। उसके सुनहरे बालों में कंघी कर कर के उसको सजाती बनाती रहती है। आज भी उसने रीमा को खूब अच्छे अच्छे कपड़े पहना कर तैयार किया। आप भी रेशमी शलवार-सूट पहन कर तैयार हुई। आज दोनों बहने पास वाले गाँव में छोटे चाचा के घर मिलने जा रही थीं। दोनों माँओं ने भी लंबे लंबे बुरके पहन लिए और निकलने को तैयार ही हुई थीं कि पंचों में से एक पंच भागते हुए चले आ रहे थे एक पत्र हाथ में लिए हुए।

माँएं घर में वापस भेज दी गईं बच्चियों के हाथ पकड़े झपाक से दहलीज़ लांघती पीछे के आँगन में पहुँच गईं। पति के हाथ में पत्र देकर सिर पकड़ कर एक झिलंगी सी खटिया पर बैठ गईं। दोनों के बोझ से खटिया कुछ और नीचे को झूल गई। देवरानी जेठानी दोनों एक दूसरे से सटी हुई बैठी थीं....एक दूसरे का सहारा बनी हुई। बुर्के में लिपटी हुई। ये समाचार तो हर ओर हवाओं के साथ साथ सूखे पत्तों की तरह उड़ता फिर रहा था कि पंचों ने ग़ज़ब का फ़ैसला सुना दिया है। कैसा ज़माना आ गया है भैय्या... बाप ने अपनी बेटियों के भाग्य का मानपत्र पढ़ा और चकराकर गिरते गिरते बचा। बैठ गया वो भी सामने ही पड़ी हुई चौकी पर। वो सोच रहा था इतनी मिन्नत समाजत करने पर पैर तक पकड़ लेने पर शायद सरपंच जी का दिल पिघल जाए। ये नन्ही मुन्नी कलियां सरपंच जी की गोद में खेली हैं। वो अवश्य ईमानदारी का फ़ैसला सुनाएंगे। पर ऐसा कैसे होता..!! सरपंचजी की तो व्याकुलता बढ़ती जा रही थी कि कितनी जल्दी ये लड़कियां अपने घर से निकलें और ये बूढ़ा कुत्ता नन्ही मुन्नी नाज़ुक सी बिल्लियों को भँभोड़ दे...

दोनों माएँ एक अंतिम आशा की किरण के सहारे चलती हुई सरपंच जी की पत्नी के यहाँ पहुंचीं कि उनसे सिफ़ारिश करवाएँ शायद कुछ काम बन जाए। सरपंच की पत्नी तो भरी बैठी थीं कि ‘‘अब ऐसा ज़माना आ गया है कि लड़का लड़की को लेकर भाग गया...अपनी मर्ज़ी का ब्याह रचा लिया....इसी दिन के लिए माँ बाप जन्म देते हैं...! उस हरामखोर को इसका दण्ड मिलना चाहिए। जैसे वो किसी की इज्ज़त ले गया है वैसे ही उसको अपनी इज्ज़त भी देनी पड़ेगी। जब उसकी अपनी बहनें दूसरों के बिस्तर को गरम करेंगी तब होगा एहसास उसे।’’

‘‘ऐसा ज़ुल्म न करें आपलोग हमारी छोटी छोटी गुड़ियों पर। उनका कुसूर क्या है? अभी तो उन्होंने अपने जीवन में कुछ देखा ही नहीं वो जीने से पहले ही मार डाली जाएंगी..!! रिदा को पढ़ने का शौक है टीचर बनना चाहती है..!! अपने ही गांव में पढ़ाना चाहती है....’’

‘‘और सुनो पढ़ा लिखाकर इसको भी आज़ाद खुल्ली छुट्टी दे देना कि भाग जाए किसी के साथ मर्ज़ी का ब्याह रचाकर...!’’

‘‘नहीं सरपंच अम्मा हम ऐसा नहीं होने देंगी। हम आपकी मर्ज़ी से उनका ब्याह करेंगे जब वो सयानी हो जाएंगी। अभी तो बहुत छोटी हैं वो दोनों। उनका तो कोई कसूर भी नहीं है। जुर्म तो भाई ने किया है....सज़ा इन बच्चियों को दी जा रही है...ये किस ज़माने का दस्तूर है...! आज तो हम पढ़े लिखे संसार में जी रहे हैं। इतनी छोटी बच्चियों को वानी की सूली पर क्यों चढ़ाया जा रहा है ? औरतें कब तक जानवरों की तरह हंकाई जाती रहेंगी। कब तक मर्दों के पैरों की जूतियाँ बनी रहेंगी। कब तक पैदा होने से पहले मार डाली जाएंगी। हमको इंसाफ़ चाहिए। आप हमारी माँ हैं। आप सरपंच जी से हमारे लिए विनती कीजिए। इन बच्चियों को अंधे कुएं में गिरने से बचाइए......’’

दोनों माँएँ सरपंच जी की पहली पत्नी के पैर पकड़े गिड़गिड़ा रही थीं और वह एक बेजान खम्बा बनी खड़ी अपने अहम की पूर्ति होने दे रही थीं। कुछ और तन गई थीं। आखिर सरपंच की पत्नी थीं... कोई मामूली बात तो नहीं है। उनको स्वयं भी तो इस घर में रहना है। अगर सरपंच जी की हाँ में हाँ ना मिलाएंगी तो कल को ये भी चुटिया पकड़कर कोई इल्ज़ाम लगाकर गाँव बदर कर दी जाएंगी। आखिर वो भी तो औरत ही हैं।

‘‘और हाँ, सुनो। इन लड़कियों को स्कूल से दूर ही रखना। पढ़ लिख कर ही हर बात में मीन मीख निकालना आ जाता है। सवाल उठने लगते हैं। जवाब मांगा जाता है। औरतों को मना है मर्दों से सवाल करना। पति तो परमात्मा होता है। परमेशवर होता है...वो जवाब नहीं देता...उससे जवाब तलब करना भी पाप है...’’

दोनों माँओं की हाथों की गिरफ़्त ढीली पड़ गई थी। वो पैर जिनपर वो पड़ी हुई थीं रहम और करम मांग रही थीं वो पैर कब के वहाँ से खिसक चुके थे। वो धरती के विशाल सीने पर पड़ी आँसू बहाए जा रही थीं। धरती माता भी सूखी थीं सारे आँसू जज्ब हुए जा रहे थे। धरती भी तो माँ ही होती है...मजबूर....खामोश....रौंदी जाती हुई...ज़ख्म खाती हुई...रिस्ते ज़ख्म...बहते ज़ख्म....सड़ते ज़ख्म...जवाब में केवल खमोशी सहते रहना और जीवित रहना....मरने की भी इजाज़त नहीं...!

तीसरे नंबर की पत्नी खड़ी सब कुछ सुन रही थीं। उन्हें इन कमज़ोर औरतों पर बेहद दया आ रही थी। वो थोड़ा बहुत पढ़ी लिखी भी थीं। क्योंकि वो आप भी सरपंच जी से चालीस वर्ष छोटी थीं तो समझती थीं मर्दों की सोच को। जब उन्होंने घूँघट से झांक कर सरपंच को देखा था तो कितना तड़पी थीं। रुई के गद्दे पर पड़ी लाल गुलाब की पत्तियाँ चुभने लगी थीं...और रुई का गद्दा पत्थर बनकर ज़ख्मी कर रहा था। जी चाह रहा था कि पंख लग जाएँ और चुपके से उड़ जाएँ इससे पहले कि सरपंच उनको हाथ लगाए। पर ऐसा ना हो सका। वही हुआ जो बेबस लड़कियों के साथ होता आया है। पहली दोनों पत्नियों से काफ़ी छोटी होने के नाते सरपंच से नखरे भी उठवा लेती थीं। आज भी सरपंच जब आधी रात को झूमते हुए घर में आए तो छोटी ने लपक कर बाज़ू से पकड़ कर अपने शरीर के स्पर्श से सरपंच को पागल कर दिया। वो भूखे कुत्ते की भांति हड्डी के पीछे पीछे चलता चला गया। मँझली बहुत झुलसीं...आज उनकी बारी थी।

छोटी ने सरपंच पर जादू चला दिया था आज...! उसको समझाया कि इतनी छोटी बच्चियों को क्यों मौत के कुएं में ढकेल रहे हैं। सरपंच का नशा उतर चुका था... जानवर से थोड़ा बहुत इन्सान बन चुका था। सोचने लगा था। छोटी को खींचकर गोद में लिटाकर उसके शरीर के हर हर कोने पर झाड़ू फेरता रहा...दुलार करता रहा...!

दोनों बेटियाँ परेशान अपनी माओं की राह तक रही थीं। अब्बूजान आँगन में टहले जा रहे थे। कभी कभी कमीज़ के दामन से आँसू खुश्क कर लेते। सब से मुंह फेरकर। छुपाकर। मर्द रोया नहीं करते। उनको तो रुलाना होता है। पर आज....ये क्या हो गया कि अब्बूजान भी रो रहे हैं....और वो भी लड़कियों के लिए...! मर्द औरतों के लिए रोया नहीं करते। उनको काबू में रखते हैं...दबाकर।

रिदा की मासूम सोच इतना सोच सकती थी क्योंकि वो स्कूल जाती थी टीचर बनना चाहती थी। ज़ेहन के खाने खुल रहे थे। पढ़ाई इसीलिए मना है कि जेहन खुलने ना पाए।

सारी रात सब जागते रहे थे...दोनों बच्चियाँ जहां बैठी थीं वहीं लुढ़क गई थीं.... बचपन की टूटकर आती हुई नींद...आँखें बंद थीं कंवल की मुलायम पत्तियों की मानिंद अधखिली पुरसुकून...होंठों पर हल्की सी मुस्कराहट....बाल बिखरे हुए मुंह पर हल्का सा जाल बुने हुए उसमें से दोनों का गुलाबी रंग झाँकता हुआ उनको कोई खबर नहीं कि अब्बूजान ने उनकी किस्मत का क्या फ़ैसला कर लिया है।

दूसरा दिन आने वाला था। सूर्य देवता धरती की गोद से उभर रहे थे...चारों ओर लाली फैली हुई थी। वो माँ की गोद से निकलकर ऊपर को चढ़ रहे थे। हाँ! माँ की गोद से...धरती उनकी भी माँ होती है। पर थोड़ी ही देर में सूर्यदेवता ऊपर को चढ़ते गए और माँ यहाँ भी पीछे रह गई। जिसको जन्म दिया उसी के नीचे रह गई।...दब गई। देखते ही देखते सूरज ने सारे जहां का कार्यक्रम अपने हाथों में ले लिया। कब दोपहर को शाम में परिवर्तित करना है और कब खुद छुपकर शाम को गहरी करते हुए रात में तब्दील कर देना है ये सारे कानून सूरज ही बनाता है। वो भी सरपंच होता है अपने जहां का। शायद इन सरपंचजी की भांति ज़ालिम नहीं...

रिदा और रीमा को स्कूल जाने की जल्दी पड़ी होती थी उनको पढ़ना और खेलना दोनों बहुत प्रिय थे। मगर आज बाप ने हुकुम दे दिया था कि बच्चियाँ घर से बाहर नहीं जाएंगी। मैं देखता हूँ मुझसे कौन मेरी बेटियों को छीन कर ले जा सकता है। जो भी आएगा उसको और बच्चियों को गोली से उड़ा कर अपने को भी मार लूँगा। दोनों माएँ काँप गईं। बच्चियों को अपनी गोदों में भींच लिया। छुपा लिया अपने झीरे दुपट्टे के आँचल में।

बाहर खटका हुआ। सब चौकन्ने हो गए। बाप भागा अपने कमरे की ओर जहां बंदूक रखी थी। माँएँ और दोनों बच्चियाँ भी उसी ओर को दौड़ पड़ीं।

बच्चियों का भाई भागा हुआ आया कि सरपंच जी का आदमी आया है...अब्बूजान आपको सरपंच जी ने बुलाया है।

पंचायत फिर से बैठ गई थी। बाप अपनी रात भर कि जागी आँखों बिखरे बालों मलगुजे कपड़ों में बंदूक लिए पागलों की तरह भागता हुआ पहुंचा। सरपंच जी के कुछ कहने से पहले हाँफती हुई आवाज़ में ज़ोर से चिल्लाया.....‘‘सरपंच जी सुन लीजिए मैं अपनी बेटियों को बलि नहीं चढ़ाने दूंगा। मैं अपने साथ बेटियों को भी मार डालूँगा पर अपने से जुदा नहीं होने दूँगा।’’

सरपंच जी ने उस से बैठ जाने को कहा।

आप लोग पापी हैं। आपके नज़दीक प्यार एक शरीर होता है। नारी केवल एक खिलौना होती है। वो जन्म लेती है पुरुषों की सेवा करने...उनके बिस्तर गरम करने....उनकी अय्याशी का साधन बनने... उनके जूते खाने... उनके दिये बच्चे पालने और फिर अगर लड़की है तो जैसे चाहे वैसे ही उसकी बलि दे देने। मैं आप लोगों के संग नहीं बैठूँगा। आप बताइये क्या कहना है आपको...?

सरपंचजी उठे और उसकी तरफ बढ़े...उसने बंदूक तान ली...

सरपंचजी ने आज जैसे फ़ैसला कर लिया था कि एक ही बार बोलेंगे। उन्होंने हाथ रखकर बंदूक की नाली को नीचे करते हुए कहा....‘‘तुम्हारी बेटियाँ हमारी भी बेटियाँ हैं।’’ सरपंच के मुंह से उसकी तीसरी पत्नी बोल रही थी, ‘‘सरपंच के नाते उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। इस बरसों पुरानी रीत के बारे में फिर से विचार किया जाएगा। हमें भी वक्त की करवट से साथ बदलना होगा।’’

बाप हैरान... बन्दूक नीची हो गई... सूरज की गुनगुनी धूप अचानक गीत गाने लगी... हल्की हल्की हवा सन्नाटे में छेद करने का प्रयास कर रही थी...कोई शब्द नहीं... कोई आवाज़ नहीं... बस बदलाव की दस्तक सुनाई दे रही थी।

संपर्क:

zakiaz@aol.com

Mob +447438236109

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