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संपादकीय / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

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यह अंक
‘रचना समय’ का यह अंक कहानी विशेषांक के रूप में प्रस्तुत है।
इस विशेषांक की प्रस्तुति के पीछे समकालीन कथा-लेखन के वर्तमान स्वरूप का जायज़ा लेने का सोच था। वह किस दशा-दिशा की ओर अग्रसर है। उसमें यथार्थवादी लेखन के खुरदुरे यथार्थ को विभिन्न गद्य-विधाओं में व्यंजित करने की शक्ति-सामर्थ्य शेष है जो हमारे जातीय गद्य लेखन की ठोस परम्परा की पहचान रही है। हम समय को किस नज़रिये से देख रहे हैं- रोमानी नज़र से या अपनी जातीय लेखन की पैनी नज़र से आगे जाकर दिख रहे यथार्थ के पीछे छिपे सत्य को रूपायित कर देने वाली दृष्टि से। आज के कथा-लेखन के समक्ष एक बड़ी चुनौती इस तथ्य की है कि प्रस्तुत परम्परा में हमारा रचनात्मक योग क्या और कितना है? कहीं हम पीछे तो नहीं जा रहे या क़दमताल की मुद्रा में तो नहीं- इन्हीं सारे मुद्दों के मद्देनज़र इस विशेषांक की योजना बनी थी और हमारे मित्र युवा रचनाकार राकेश बिहारी ने इस दिशा में अतिथि सम्पादक के रूप में जो प्रस्तुत किया है- इसकी जाँच-परख तो पाठकों-लेखकों-आलोचकों की है। हमारा कार्य यहीं तक रहा, अब इन विद्वानों का काम शुरू होता है। बहरहाल, पृष्ठों की संख्या पूर्व निधार्रित थी लेकिन यह सीमा टूट गई तो पठनीयता को ध्यान में रखते हुए कहानी विशेषांक को हमने दो भागों में विभक्त किया है। उम्मीद ही नहीं, विश्वास है, हमारी यह प्रस्तुति आप सभी रचनाकारों- पाठकों को पसंद आएगी। हम तो इसे ताज़ भोपाली की नज़र से देख रहे हैंः

जितना खिलता है उतना खुलता है
यह सरापा गुलाब जैसा है।


‘रचना समय’ का यह विशेषांक उन लेखकों के नाम जिन्होंने अपने सामाजिक सरोकारों से लैस होकर हमें सामाजिक चेतना से सतत् सम्पन्न किया।
-हरि भटनागर

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संपादकीय

समाज और कहानी के लोकतंत्रीकरण की गवाहियाँ

कहानियाँ अपने समय से संवाद करती हुईं सभ्यता की समीक्षा का इतिहास दर्ज करती हैं। कहानी और सभ्यता की समीक्षा की चर्चा के क्रम में कहानी की विकास यात्रा पर बात करना स्वाभाविक है। एक रचनात्मक विधा के रूप में कहानी का विकास कहानियों के जनतंत्रीकरण का इतिहास है। मैं जब भी कहानी के जनतंत्रीकरण की बात सोचता हूँ, मुझे हमेशा दो कविताओं की पंक्तियाँ याद आती हैं। एक मैथिलीशरण गुप्त की- ‘माँ कह एक कहानी, राजा था या रानी?’ और दूसरी नंदलाल पाठक की जिसे जगजीत सिंह की आवाज़ में खूब प्रसिद्धि मिली- ‘माँ सुनाओ मुझे वह कहानी, जिसमें राजा न हो न हो रानी। ‘राजा था या रानी’ से ‘राजा न हो न हो रानी’ तक का यह सफर सभ्यता, समाज और कहानी तीनों के लोकतांत्रीकरण का गवाह है। यहाँ राजा-रानी को उसके स्थूल अर्थों तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिए। राजा-रानी के न जाने कितने प्रारूप और संस्करण देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह से मौजूद रहे हैं। कहानी के विकास की यात्रा राजा-रानी की उन तमाम बहुपरतीय और विविधरूपीय अवधारणाओं से मुक्ति का अनवरत इतिहास है। कहानी की इस विकास यात्रा में सामाजिक संरचना में होने वाली टूट-फूट और विकासोन्मुख नवनिर्माण के साथ एक विधा के रूप में कहानी के अंतःपुर में घटित हो रहे रूप और कथ्य के बदलाव की अनुगूंजों को भी रेखांकित किया जा सकता है। रचना समय का यह विशेष आयोजन हिन्दी कहानी की इसी विकास यात्रा के अद्यतन पड़ाव को रेखांकित करने का एक विनम्र प्रयास या उपक्रम है।

पिछले दस-पंद्रह वर्षों में कहानी को विधागत केन्द्रीयता की स्थिति-सी प्राप्त हुई है। इस दौरान मुख्य धारा की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं ने अलग-अलग विशेषांकों के माध्यम से न सिर्फ कहानी की विधागत केन्द्रीयता को रेखांकित किया है बल्कि इस बीच कहानीकारों की एक नई पीढ़ी जिसे बहुधा ‘युवा पीढ़ी’ कहा गया और मैं जिसे ‘भूमंडलोत्तर कथा पीढ़ी’ कहता हूँ की स्थापना को भी स्वीकृति दी है। इस दौरान प्रकाशित हुये विभिन्न पत्रिकाओं के कहानी केन्दि्रत विशेषांक अमूमन पीढ़ी, विमर्श या विषय विशेष पर केन्दि्रत रहे हैं। पीढ़ी, विमर्श या विषय की चर्चा जरूरी है, लेकिन सिर्फ इन्हीं को केंद्र में रख कर विचार करने की प्रविधि की एक बड़ी सीमा यह होती है कि रचनात्मक विधा के तौर पर किसी कला पर समग्रता में विचार नहीं हो पाता है। इसलिए आज जब एक साथ चार से पाँच पीढ़ियाँ कथा-लेखन के क्षेत्र में अपनी सक्रिय भागीदारियाँ निभा रही हैं, समय, समाज और कहानी के अंतर्संबंधों को समझने के लिए इसे पीढ़ी, विमर्श और विषय विशेष के त्रिभुज से बाहर निकाल कर हर पीढ़ी और हर तरह की कहानियों पर एक साथ और समग्रता में बात किए जाने की जरूरत है। इस विशेषांक के समायोजन-प्रकाशन की योजना के मूल में यही अवधारणा थी।

गोकि नई कहानी आंदोलन के पूर्व प्रेमचंद और जैनेन्द्र के रूप में कहानी की दो अलग-अलग प्रवृत्तियों और आस्वादमूलकताओं को पाठकीय स्वीकृति मिल चुकी थी, लेकिन एक संगठित आंदोलन के रूप में नई कहानी हिन्दी कहानी का पहला सुचिन्तित आंदोलन है, जिसके अग्रणी कथाकारों ने न सिर्फ अपनी कहानियों को पूर्व की कहानियों से अलग कर के रेखांकित करने का प्रयास किया बल्कि अपनी कहानियों के लिए आलोचना की अलग कसौटियों की मांग भी की और खुद कथालोचनाएं भी लिखीं। बाद में जनवादी कथाकारों ने भी अपनी कहानियों को समझने के लिए एक नई समीक्षा-दृष्टि और सौन्दर्यशास्त्र की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार ‘नई कहानी’ और ‘अकहानी’ वाली दृष्टि उनकी कहानियों को खोलने के लिए अपर्याप्त थी। आज जब सूचना और सम्प्रेषण की क्रान्ति ने समय और समाज को नए सिरे से बदल डाला है, आज के कहानीकार भी कथालोचना के नए टूल्स विकसित किए जाने की जरूरत पर बात कर रहे हैं। कहानी के बदलते स्वरूप और आलोचना के नए उपकरण की मांग के बीच कभी तेज तो कभी मद्घम चाल में रुक-रुक कर चलती कथालोचना अपनी शक्ति और सीमाओं के साथ कहानियों को खोलने-खँगालने का काम कर रही है। कुछ कथालोचकों ने कहानियों के अंबार में से सचमुच की अच्छी कहानियों को चुन-परख और खोज-बीन कर रेखांकित करने की बजाय कहानी विधा के लड़खड़ा कर गिर जाने की स्वयंभू घोषणाएँ तक कर डाली है। इस तरह बड़ी चतुराई से रचना के संकट को आलोचना में और आलोचना के संकट को रचना में खोजने का यह आसान-सा खेल लगातार चल रहा है। इस बीच बहुत ही दिलचस्प तरीके से पीढ़ी, परंपरा और कहानी की समझ से ‘युत कुछ ऐसे बाज़ार-पोषित समीक्षक भी खर-पतवार की तरह उग आए हैं जो पाठकों की मांग और अभिरुचि की आड़ में गंभीर, बोधगम्य और ‘पल्प’ के बीच की दूरी को न सिर्फ पाट देना चाहते हैं बल्कि ‘पल्प’ को ही सर्वाधिक अनिवार्य और सशक्त की तरह रेखांकित करने की कोशिश कर रहे हैं। यदि बाज़ार की शब्दावली में भी बात करें तो उन्हें यह नहीं मालूम कि ‘सेल्स’ और ‘मार्केटिंग’ के बीच एक बुनियादी और दृष्टिगत अंतर होता है। ‘सेल्स’ जहां उपभोक्ताओं की माँग के अनुरूप अपने उत्पादों की बिक्री को अपना लक्ष्य मानता है, वहीं ‘मार्केटिंग’ का काम अपने उत्पाद के लिए नए उपभोक्ता समूह का निर्माण भी होता है। ‘सेल्स’ को ‘मार्केटिंग’ में परिसीमित करना व्यावसायिक दृष्टि से भी तंगनिगाही का ही सूचक है। साहित्य या साहित्यिक विधा का काम तथाकथित पाठकीय भूख के हिसाब से खुद को ढालना नहीं, बल्कि अपनी बृहत्तर मानवीय दृष्टि और बड़े रचनात्मक मूल्यों और स्वप्नों के अनुरूप पाठकीय संस्कारों का निर्माण करना है। कहने की जरूरत नहीं कि यह तबतक संभव नहीं, जबतक लेखक अभिव्यक्ति से कहीं आगे सम्प्रेषण को अपना लक्ष्य माने। निश्चित तौर पर बोधगम्य होना उसकी पहली शर्त है। बोधगम्य रचनात्मकता की भूमिका इस अर्थ में दुहरी होती है कि जटिल अभिव्यक्ति की ‘डिकोडिंग’ के लिए भी पाठकों को तैयार करने का काम इसे ही करना होता है। यह वही विंदु है जहाँ, आलोचना भी रचना के रूप में उपस्थित होती है। मतलब यह कि कहानी को लेकर लेखक, पाठक, संपादक और आलोचकों की अलग-अलग कसौटियाँ हो सकती हैं, होती हैं। लेखक से किसी खास तरह की कहानियों की मांग हो या आलोचक से नए टूल्स आविष्कृत किए जाने की माँग या फिर पाठकों से उनके विकसित होने की अपेक्षाएँ ये सब उन्हीं अलग-अलग कसौटियों के द्वन्द्वों का परिणाम हैं। अच्छी कहानी किसे कहें, या कहानी को विश्लेषित करने के नए टूल्स विकसित किए जाएँ के संश्लिष्ट सूत्रों को आज खोलने की जरूरत है। इसी जरूरत को महसूस करते हुए प्रस्तुत अंक में लेखक, पाठक, आलोचक और संपादक की अलग-अलग कसौटियों पर विस्तार से बात करने की कोशिश की गई है। कथा-कसौटी पर इस बहुकोणीय विमर्श को और विस्तार देने की जरूरत है। शायद इस तरह कहानियों का एक मुकम्मल आलोचना-शास्त्र भी विकसित हो पाये।

अपनी भयावहता और खूबसूरती दोनों ही अर्थों में अभूतपूर्व होने के कारण पिछले दो दशकों के बीच फैले समय का भूगोल खासा जटिल है। तेज़ रफ्तार चलते समय के विविधवर्णी और बहुपरतीय यथार्थ और उसकी विडंबनाओं को दर्ज करती आज की कहानियों से कहानी विधा लगातार समृद्ध हो रही है। लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ कर, कहानी में बदलते समय की इस धमक को समवेत रूप में आलोचना ठीक-ठीक पकड़ने मे सफल रही है यह उसी आश्वस्ति के साथ नहीं कहा जा सकता। उदारीकरण के पहले तक का समय जहां एक खास तरह के मूल्यों और मानदंडों की स्थापना का समय था वहीं उसके बाद का कालखंड उन मूल्यों और मान्यताओं के अतिक्रमण और विखंडन का काल है। नए दौर के इस विखंडन और अतिक्रमण में बहुत तरह की पुनर्संरचना के बीज भी छिपे हैं जिसका सबसे बड़ा असर आज जाति, विवाह और परिवार की संस्था पर पड़ा है। अतिक्रमण और पुनर्गठन के इन्हीं द्वन्द्वों से टकराकर आलोचना के नए टूल्स विकसित होंगे। कई समर्थ कथाकार कथालोचना को कहानीकार का क्षेत्र बिलकुल ही नहीं मानते न हीं इस सूत्र को खोलना चाहते हैं कि आज की कहानियों को समझने के लिए कथालोचना के क्या प्रतिमान और उपकरण होने चाहिए। रचना और आलोचना के बीच ऐसी दूरी कविता के क्षेत्र में नहीं है। हमेशा से कवियों के द्वारा आलोचना लिखी जाती रही है और वह आज भी जारी है। क्या कथालोचना के क्षेत्र में व्याप्त सुदीर्घ सन्नाटे को तोड़ कर कहानी के नए प्रतिमान गढ़ने के लिए आज आलोचकों के साथ कहानीकारों को भी आगे नहीं आना चाहिए? आज इस प्रश्न पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है।

इधर की कई कहानियों को पढ़ते हुये रूप और शिल्प के स्तर पर कहानी के ढांचे में बहुत बड़े बदलाव दृष्टिगोचर होते हैं। कहानी में कविता और कविता में कहानी की बात जैसे बहुत पीछे छूट गई है। अब तो कई बार कहानी, संस्मरण, रिपोर्ताज, खबर, सूचना, इतिहास, दर्शन आदि के बीच की लकीरें भी मिटती-टूटती दिखाई देने लगी हैं। आखिर यह क्या है- किस्सागोई की कोई नई प्रविधि या फिर कहानी की पकड़ से कथातत्व का छूटते जाना? आधुनिक समय के बहुकोणीय और जटिलतम यथार्थों के निरूपण का नया तरीका या फिर विधाओं की हदबंदी से मुक्ति की शुरुआत? प्रश्न यह भी उठता है कि क्या आज के जीवन की सूक्ष्म और बहुपरतीय संश्लिष्टताओं को किसी एक विधा के फ़ॉर्म में अभिव्यक्त करना मुश्किल या असंभव हुआ जा रहा है? ‘कहानीपन’ के ठाट को जिंदा रखने की जरूरतों के बीच इन सवालों से जूझना भी आज इतना ही जरूरी है। प्रस्तुत अंक के दूसरे खंड में दी गई अर्चना वर्मा की रचना ‘व्योम में वास है विचारों का’ को इसी बहस की भूमिका की पूर्वपीठिका के रूप में देखा जाना चाहिए।

तकनीकी आविष्कारों और सूचना-सम्प्रेषण की क्रान्ति के बीच बनी हुई कहानी के कागज पर उतरने की प्रक्रिया (रचना-प्रक्रिया नहीं) की एक अपनी दास्तान है। रचनात्मक लेखन के लिए जहां कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ हाथ से लिखे जाने के ही आग्रही रहे हैं तो लेखकों का एक बड़ा समूह अब सीधे कंप्यूटर पर लिखने लगा है। रचनात्मक लेखन, खास कर कहानी-लेखन के संदर्भ में इन बदलावों की क्या भूमिका रही है या आगे इस क्षेत्र में और कैसी संभावनाओं के बीज छुपे हैं, इसे जानना एक दिलचस्प अनुभव हो सकता है, जिसे टटोलने की एक शुरुआती कोशिश भी हमने यहाँ की है।

हमारी कोशिश है कि इस अंक के बहाने समकालीन कथा-परिदृश्य का एक समग्र और बृहत्तर चेहरा आपके सामने रख सकें। चंद्रकिशोर जायसवाल जैसे सिद्धहस्त और वरिष्ठ कथाकार से लेकर ममता सिंह जैसे नए कथाकारों और रोहिणी अग्रवाल जैसी प्रतिष्ठित आलोचक से लेकर अमिय विंदु जैसे अल्पज्ञात आलोचक तक की समान रूप से महत्वपूर्ण उपस्थिति के बीच यदि आप यहाँ सभ्यता, समाज और कहानी के जनतंत्रीकरण की कुछ प्रामाणिक छवियों से रूबरू हो पायें, जिनकी चर्चा मैंने इस टिप्पणी की शुरुआत में की है, तो मैं अपने इस लघु प्रयास को सार्थक समझूँगा। पत्रिका के नियमित संपादक होने के नाते हरि भटनागर अपनी कहानी नहीं देना चाहते थे। लेकिन, मेरे विशेष आग्रह पर इस खास आयोजन में, बतौर कथाकार वे भी शामिल हैं। बहरहाल, जैसा भी बन पड़ा है, रचना-समय का यह विशेष अंक एक चैतन्य उत्तरदायित्व-बोध के साथ आपको सौंप रहा हूँ। आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा। रचनात्मक सहयोग देने के लिए अंक में शामिल सभी लेखकों और भरोसे के साथ अंक के सम्पादन का अवसर देने के लिए अग्रज कथाकार हरि भटनागर और रचना समय के प्रति मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ।

- राकेश बिहारी

 

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इस अंक की रचनाएँ -

 

कहानी

संजीव / 08

जया जादवानी / 12

तेजेंद्र शर्मा / 19

तरुण भटनागर / 25

राकेश दुबे / 37

उपासना / 46

शेखर मल्लिक / 54

पंकज सुबीर / 66

मुकेश वर्मा / 78

प्रज्ञा / 82

सौमित्र / 91

ज़कीया जुबैरी / 95

 

बहसतलब

अर्चना वर्मा / 100

 

सफरनामा

मृदुला गर्ग / 111

सूरज प्रकाश / 115

प्रियदर्शन / 120

 

आलोचना

विनोद तिवारी / 123

प्रांजल धर / 140

नीरज खरे / 149

सुभाष चंद्र कुशवाहा / 156

टेकचंद / 166

चन्द्रकला त्रिपाठी / 171

 

(क्रमशः अगले पृष्ठों में जारी…)

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