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हिन्दी कहानी और किसान अनुभूति / सुभाष चन्द्र कुशवाहा / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

हिन्दी कहानी और किसान अनुभूति

आज खेती-किसानी के सवाल और सवालों की शक्ल बदल गई है। किसानी के जटिल प्रश्नों को आयातित विचारों और लम्पट कारपोरेटी आक्टोपसी भुजाओं ने फांस कर, खाद्यान्न, खाद, बीज और कीटनाशकों पर नियंत्रण कर, अपने व्यवसाय का संवदर्धन किया है । दुनिया का मठाधीश बनने वालों के पांव, किसानों की पीठ और पेट पर पड़ रहे हैं। गांव की जल, जमीन, जंगल का दोहन उनके एजेंडे में है। अपने माल को खपाने के लिए गांवों को उपभोक्ता बनाने की चाल, उनके एजेंडे में है। उनका अगला पड़ाव कारपोरेट खेती है । किसानों के पास खोने को जमीन के अलावा और कुछ बचा नहीं है। भूमि अधिग्रहण, विकास का मूलमंत्र बना दिया गया है। ताल्लुकदारों और ज़मींदारों द्वारा औपनिवेशिक काल के बेदखली की ही तरह, जमीन हड़पने का काम, कुछ भिन्न तरीके से शुरू हो चुका है। औपनिवेशिक काल में किसानों ने अपनी समस्याओं के लिए लम्बा संघर्ष किया था। दक्षिण का मोपला विद्रोह, गुजरात का खेड़ा और अवध के किसान विद्रोहों ने लगभग समान काल में ब्रिटिश सत्ता और सामंतों के बीच खौफ पैदा किए । आजादी के बाद भी तमाम किसान विद्रोह देखने को मिले मगर किसानों की दशा और दुर्दशा में कोई सुधार नहीं हुआ ।

हिन्दी साहित्य पर शुरू से कुलीनतावादियों का एकाधिकार रहा है। 1900 से लेकर 1960 तक के सरस्वती अंक में खेती-किसानी की त्रासदी पर एकाध कहानियां ही मिलती हैं । वर्ष 1934 में ‘गरीबों का स्वर्ग’ (श्रीनाथ सिंह) कहानी में कुछ हद तक गांव, गरीबी, किसानी का दर्द दिखाई देता है । बहुत पहले बेचन शर्मा उग्र की कहानी पढ़ी थी-ज्अभागा किसान’ । यह कहानी 1929 के आसपास लिखी गई थी। तब से अब तक गांवों में बहुत कुछ बदला है मगर उस कहानी में किसान त्रासदी की अभिव्यक्ति आज नब्बे साल बाद भी कमोबेश वैसी ही है। आज अगर कथा साहित्य में वह नहीं दिखाई दे रही तो उसका कारण, हिन्दी कहानीकारों की प्राथमिकताएं और उनका अभिजन का करीबी होना है। बहुत कम कथाकार हैं जो गांवों और खेती-किसानी की पृष्ठिभूमि पर कहानियां लिख रहे हैं । हिन्दी कथा साहित्य में गंवई पृष्ठभूमि, धूल धूसरित वितान, छीजते नदी-नाले, हरीतिमा से मुक्त होते बाग-बगीचे, बैलों के गले से गायब हो चुकी घुंघरुओं की टनटनाहट, चिड़ियों की टिहकारियां और टोले-जवार में पसरती धूर्तता या अमानवीयता की जब भी जांच पड़ताल की बात उठती है तो हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचंद, रेणु से बात शुरू होती है और हांफते-कांपते कुछ डग भरने के बाद कहने को अकाल पैदा होने लगता है। गांव बदल चुके हैं । गांव की संस्कृति और सामूहिकता में घुन लग चुका है। ऐसे में कुछ कहानीकार गांव-गिरांव की कहानी लिख रहे हैं तो कुछ पुराने आदर्शों को याद कर गांव और खेती-किसानी को ‘नॉस्टाल्जिया’ की तरह ले रहे हैं ।

ऐसा क्यों है कि देश की सत्तर प्रतिशत आबादी का यथार्थ, तीस प्रतिशत की खुशामदी और चाकरी के लिए बाध्य है। आजादी के बाद से अब तक, तीस प्रतिशत इण्डिया के हाथों में सारा संसार है । मगर सत्तर प्रतिशत भारत के हाथों में आत्महत्या, विस्थापन और घर-परिवार की बर्बादी है। ब्रिटिश काल में ज्यादातर किसान किराये पर खेती करते थे । ज़मींदारी खत्म होने के बाद पट्टे पर खेती करने वाले किसानों की जगह, भूमिहीन या भूस्वामित्व वाले किसानों का दर्जा मिला मगर किसान त्रासदी की कहानी खत्म नहीं हुई । बेचन शर्मा ‘उग्र’ की कहानी ‘अभागा किसान’ का ‘भिक्खनज्, तब बड़ी लड़की की शादी के लिए महाजन से कुछ रुपये कर्ज लिया था। फसल खराब हुई और कर्ज की भरपाई नहीं हो पाई। भिक्खन को जमींदार के कारिंदे पकड़ ले गये। उसकी पत्नी ने बच्चों व सास की दशा देख धैर्य खो दिया । वह दोनों छोटे बच्चों को खाना देने के बहाने एक तालाब के पास ले गई और बच्चों का गला ऐंठ कर तालाब में फेंकने के बाद स्वयं तालाब में कूद कर जीवन लीला समाप्त कर ली । किसान आत्महत्या की यह त्रासदी, खत्म नहीं हुई है। आज भी कर्ज से दबे किसान, फसल खराब होने या बेटी की शादी न कर पाने के तनाव में ऐसे ही कर रहे हैं। बिगड़ते पर्यावरण संतुलन के चलते, फसलचक्र का ताना-बाना बिगड़ने लगा है।

आज जमींदारी नहीं है मगर साहूकार या बैंक कर्ज से दबे किसानों की कुर्की और आत्महत्या, ठीक भिक्खन के परिवार की तरह जारी है। या यों कहें कि बढ़ी है, बढ़ती जा रही है । पूरे ब्रिटिशकाल में किसान आत्महत्या के बहुत कम मामले प्रकाश में आये थे । गोदान में एक होरी ने आत्महत्या की थी मगर विगत दो दशकों में साढ़े तीन लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली है। वह वक्त अंग्रेजी दासता का था, आज चांद पर कुलांचे भरने का दंभ भरने वाला आजाद भारत है । डिजिटल इण्डिया का ख्वाब पाले गाय और गोबर में उलझा हुआ ‘इण्डिया वाला भारत’ है। इस ‘इण्डिया वाले भारत’ में मनरेगा वाले गांव हैं जहां के सरकारी स्कूलों में ब्रिटिशकालीन भारत की तरह पढ़ाई-लिखाई और खेल-कूद नहीं होते । अब वहां बच्चे पहाड़ा भी याद नहीं करते । केवल मिड-डे-मील का इंतजार करते हैं । आज बच्चों को किताबें, वजीफा, स्कूली कपड़े, साइकिल या लैपटॉप तो मिल रहे हैं, मगर शिक्षा नहीं मिल रही। अन्नदाताओं के प्रति व्यवस्था का क्रूर व्यवहार स्थाई स्वरूप ग्रहण कर चुका है जो विकास, सभ्यता और मानवीय सोच को मुंह चिढ़ाता बढ़ रहा है। आखिर इन बदलते गांवों का यथार्थ, कहानियों में आना चाहिए या नहीं? आना चाहिए तो किस रूप में, हमारी चिंता का विषय यही है।

आज प्रेमचंद के गांव नहीं है। पंच परमेश्वर से सैकड़ों गुना छल-कपट, धूर्तता और द्वेष का जन्म हो चुका है। देश और वैश्विक स्तर पर हुए परिवर्तन बता रहे हैं कि सब कुछ बदल गया है । डंकल, पेटेंट, मुक्त व्यापार, केबल संस्कृति, इंटरनेट, ई-मेल, चैटिंग, एस0एम0एस0, डिजिटल कैमरे और स्मार्ट फोन की नई चहकती, चमकती दुनिया में गाँवों की सुध-बुध नहीं रही किसी को । बेशक आज भी हमारे गांव लाठी टेकते बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं मगर मुट्ठी भर धनाढ्य, मर्सिडीज लिए एक्सप्रेस हाई-वे पर दौड़ रहे हैं। संबंधों की नई परिभाषा गढ़ी जा चुकी है। नई तकनीकी के साथ जो आत्मकेन्दि्रत लम्पट संस्कृति आयी है, उसने आस-पड़ोस, हित-मित्र, भाई-भौजाई और यहाँ तक कि भाईचारा, सब कुछ निगल लिया है। युवा दिग्भ्रमित और हताश हुए हैं । किसानों ने भूख मिटाने के लिए या कर्ज से मुक्ति के लिए सल्फास खाया है या कीटनाशकों को पी लिया है।

किसानों और उनके बाल-बच्चों का भविष्य भी अंधेरे में है। विगत दो दशकों में सरकारी नौकरियों की समाप्ति, उजड़ते कल-कारखाने, कम्प्यूटरीकृत दुनिया से गँवई युवाओं की बेदखली और ‘मेक इन इण्डिया’ की लफ्फाजी के सिवा कुछ हाथ नहीं आया है । बेरोजगार युवाओं की दिग्भ्रमित ऊर्जा गलत कामों में इस्तेमाल की जा रही है । चाहे वह आतंकवाद का क्षेत्र हो या अंधराष्ट्रवाद का। ये बेरोजगार युवक गाय, गाय का मांस, धर्म विशेष का अपमान करने के बहाने, नफरत की दीवार खड़ी करने में इस्तेमाल किए जा रहे हैं । गांव की महिलाएं तो हमेशा से हाशिए पर थीं हीं, अब जातीय हिंसा की कबीलाई संस्कृति के फैलाव से, सड़कों पर नंगी घुमाई जा रही हैं ।

एक-दो दशकों में संचार माध्यमों के फैलाव के बावजूद गांवों की त्रासदियों को बहुत कम स्थान मिल रहा है। प्रशासन की सोच में गांव महज खैरात बांटने से सन्तुष्ट हो जाने वाला है। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था किसान और किसानी विरोधी बन चुकी है। शिक्षित होने का मतलब, शहरी होना समझा जा रहा है। पढ़ा लिखा युवक खेती नहीं करना चाहता। कृष्णकांत की कहानी ‘मुआवजा’ का अनुज, शहर से गांव खेती करने आता है तो गांव हैरान हो जाता है। यह हैरान होने की संस्कृति हमारी शिक्षा व्यवस्था की कोख से पैदा हुई है। ‘अनुज जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एम.ए. करके लौटा तो गांव की चौपालों में बतकूटन के एक नए मुद्दे के बतौर शामिल हो गया। उसे लेकर गांव में एक जुमला चल पड़ा था- पढ़े फारसी बेचौं तेल, यह देखौ किस्मत कै खेल.....। बुजुर्गवार कहते-अरे भाई, हम पढ़े लिखे नहीं थे तो भी तो हमने खेती की। उसने तीस बरस की उम्र पढ़ाई में लगा कर क्या उखाड़ लिया? अब वह भी खेती ही करेगा। मूर्खों का कहीं गांव बसता है क्या? इतनी उम्र में तो हम पांच बच्चों के बाप थे। जब खेती ही करनी थी तो दिल्ली-पिल्ली जाकर लाखों रुपया क्यों फूंक आया?’

हमारी शिक्षा व्यवस्था ने जिस शहरी संभ्रांत वर्ग का निर्माण किया है, वह गाँव से कटा हुआ है। शहरी संभ्रांत वर्ग को गांव की गंदगी और धूल-मिट्टी पसंद नहीं। बिजली, पानी और सड़क की समस्या तो है ही, मीडिया की प्राथमिकता में गांव नहीं है। व्यावसायिक दृष्टि से इसे गैरजरूरी समझ लिया गया है। इसलिए मीडिया में भी गँवई क्रंदन दिखाई-सुनाई नहीं देता । भूख से होने वाली मौतों पर चर्चा से ज्यादा सेक्स स्कैंडलों की चर्चा व्यावसायिक दृष्टि से जरूरी हो गई है । दृश्य मीडिया में माथे की लकीरें और पैरों की बेवाइयाँ, खूबसूरत जिस्मों की नुमाइश के बरक्स, टी.आर.पी. नहीं बढ़ातीं ।

तो सवाल उठता है कि ऐसे समय में साहित्य की उपादेयता क्या होनी चाहिए ? प्रेमचंद के बाद, साहित्य की दुनिया में गाँव किस रूप में मौजूद है, कितनी ईमानदारी से मौजूद है, इस पर विचार किया जाना चाहिए । मधुकर सिंह, पुन्नी सिंह, विवेकी राय, गुरदयाल सिंह, विजयदान देथा और रामस्वरूप अणखी, जिन्होंने गांवों की कथा-व्यथा से हिन्दी पाठकों को जोड़ा था, और जिनमें से अधिकांश हमारे बीच से विदा ले चुके हैं, उनकी जगह लेने को कौन मौजूद है? गुरदयाल सिंह 85 के करीब पहुंच चुके हैं । शिवमूर्ति ने लम्बे समय से कोई धारदार कहानी नहीं दी है। इस बीच संजीव का एक उपन्यास जरूर आया है, इस मुद्दे पर, मगर शेष सन्नाटा है। अग्रज पीढ़ी में महेश कटारे जरूर गांवों से लगातार जुड़े रहे हैं और एक हद तक अपना योगदान दिया है । नई पीढ़ी के साहित्यकारों की सोच और समझ में किसान मुद्दे के होने या न होने का प्रश्न ज्यादा ज्वलंत है। सत्यनारायण पटेल, कृष्णकांत, चरण सिंह पथिक, सत्यनारायण, सुरेश कांटक और श्री धरम जैसे कुछ नाम दिखाई दे रहे हैं।

ज्यादातर हिन्दी साहित्य शहर केन्दि्रत हो गया है। ऐसा इसलिए भी हुआ है कि पढ़ा-लिखा समाज और कहानीकारों का गाँव से रिश्ता टूटता जा रहा है। अगर कुछ रिश्ता है भी तो वह मात्र पुराने अनुभवों और समाचारपत्रों से आ रहा है। इससे वर्तमान के तमाम टटके यथार्थ छूट रहे हैं। कुछ कहानीकार अगर टटके यथार्थ को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं तो उन्हें उपेक्षित करने और हतोत्साहित करने का काम किया जा रहा है। इस कारण उनकी चाल इतनी सुस्त है कि तेजी से बदलते गांवों के यथार्थ में से बहुत कुछ पकड़ में नहीं आ रहा है। कहा जा सकता है कि जितनी तेजी से उसे आत्मसात करने की जरूरत है, उतनी तेजी से कहानीकार आत्मसात नहीं कर पा रहे हैं। उनके लिए अभी भी सामंती उत्पीड़न और जातिवाद ही मुख्य मुद्दा है । जबकि सच यह है कि तथाकथित विकास की नई दुनिया ने शोषण के नए-नए तरीके इजाद किए हैं। शहरों से कहीं ज्यादा वहां वेदना का क्षरण हुआ है। साइबर दुनिया से कहीं अधिक गांव का आदमी अपनी कोठरी में सिमटने लगा है। चौपाल, किस्से-कहानियाँ, नाच-गाने, खेल-कूद समाप्त हो गए हैं । डाह, कूटनीति, पहले से ज्यादा मुखर हुई है।

खेती को अलाभप्रद बना देने से गांवों से पलायन तेज हुआ है। एकाध घरों में ताले भी लटकने लगे हैं। गांवों से किसानों के पलायन से पहले ही लेखकों का पलायन शुरू हो गया था । यह पलायन, शिक्षित वर्ग द्वारा जीविका की तलाश में हुआ है। जीवन-यापन के लिए इसके अलावा उनके पास और कोई विकल्प नहीं है । अब हल-जुआठ पकड़े, ट्रैक्टर या कम्बाइन के पीछे भागने वाले कलम नहीं पकड़ते । तब देखना यह है कि आने वाले दिनों में कथा साहित्य का गांवों से जो रिश्ता बनेगा, वह सरकारी तस्वीरों से किस रूप में भिन्न होगा ।

गांवों में ट्रैक्टर, कम्बाइन और स्मार्ट फोन की सुलभता के बावजूद किसान लाचार हैं । चीनी मिलों के मालिक किसानों के गन्ना मूल्य का भ्ुागतान नहीं कर रहे हैं और सरकारें, किसानों के बजाय, मिल मालिकों को अनुदान पर अनुदान दिए जा रही हैं । बकाया गन्ना मूल्य भुगतान के लिए न्यायालयों की सख्ती काम नहीं आ रही । किसानों के पकुसाये चेहरों पर वेदना की मोटी परत, कर्ज के पहाड़ से लेकर बेटी के ब्याह तक, आत्महत्या में तब्दील हो रहा है। वे कम उम्र में बुढ़ा रहे हैं। वहीं मुट्ठी भर धनाढ्यों के चेहरों पर पुता महंगा ‘सन क्रीम’ उनकी सुन्दरता की हिफाजत कर, तरोताजा रखे हुए हैं । आंकड़े बता रहे हैं कि समाज का साठ प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा खेती-किसानी को मजबूरी वश ढो रहा है । हाईब्रीड बीजों की अप्राकृतिक दशाओं ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा है । ज्यादा खाद, ज्यादा पानी, ज्यादा कीटनाशक और महंगे बीज, मौसम की प्रतिकूलता में लागत मूल्य भी नहीं पैदा कर पा रहे हैं । मोसांटो जैसी कंपनियों का लाभ दिन-रात बढ़ रहा है । जहां हमारा किसान समुदाय अभी भी आदिम समाज सा जीने को अभिशप्त है, वहीं दूसरी ओर ‘मेक इन इण्डिया’ और ‘डिजिटल इण्डिया’ के सवाल को केन्द्र में ला खड़ा किया गया है गोया सबसे बुनियादी सवाल यही हो। आज पूरा का पूरा देश सूखे की चपेट में है और किसान आत्महत्याओं के समाचार दृश्य मीडिया से गायब हैं । जहां एक ओर तमाम छद्म राष्ट्रभक्त अपना क्रांतिकारी इतिहास स्वयं लिखने में जुटे हुए हैं, तो दूसरी ओर नाना पाटेकर जैसे समाजसेवी अपने बल-बूते 5000 ऐसे किसान परिवारों को आर्थिक सहायता बांट रहे हैं, जिनके मुखिया ने सूखे से आहत हो आत्महत्या कर ली है।

ऐसे समय और समाज में, हिन्दी कहानी में किसानों के दर्द की उपेक्षा, गैर वाजिब नहीं कहा जा सकता । हम किसान आत्महत्याओं के सामाजिक संदर्भों की रचनात्मक व्याख्या, कहानियों में तलाशना चाहते हैं । हम चाहते हैं कि कमजोर समाज के साथ हिन्दी साहित्य खड़ा हो और अपनी सामंती मनोवृत्तियों को त्यागे। अगर साहित्य सामाजिक विडंबनाओं को स्वर देने का काम करता है तो उससे पूछा ही जायेगा कि क्या वह गांवों की विडंबनाओं से टकरा रहा है या बाहर बैठ तमाशा देख रहा है ? क्या हमारी कहानी हाईब्रीड कपास की खेती की त्रासदियों तक गई है? या क्या उसने हाईब्रीड बीजों से बुने हसीन ख्वाब पर मौसम की मार को अभिव्यक्ति दी है? क्या भूमि अधिग्रहण के नाम पर औने-पौने में किसानों की जमीनों को हड़प कर रीयलस्टेट कारोबारियों को देकर करोड़ों कमाने के धंधे को संज्ञान में लिया जा रहा है ? और अगर नहीं, तो कहा जा सकता है कि हिन्दी कहानी अभी भी अभिजात्यवर्गीय मानसिकता से उबर नहीं पाई है । या इस नई चहकती दुनिया में उसने भी अपना नाता हाशिये के समाज के बजाय मध्यम वर्ग से जोड़ने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई है ।

किसानों की त्रासदी से बड़ी कोई सामाजिक त्रासदी आज दिखाई नहीं दे रही । इस त्रासदी से टकराये बिना, कल के भारत का भविष्य चमकने वाला नहीं है । वर्तमान के द्वंद से मुठभेड़ ही भविष्य के यथार्थ का पूर्वानुमान है। कथा साहित्य ऐसे ही मुठभेड़ की वैचारिकी है। तो सवाल यह है कि हिन्दी कहानी में सामाजिक यथार्थ से मुठभेड़ की वैचारिकी क्या है ? या वह वैचारिकी अभी भी कुलीनतावादी मनोदशाओं से उबर पायी है?

निश्चय ही उपरोक्त सारे सवालों का जवाब कहानीकारों की वैचारिकी में मिलेगा। किसी भी वैचारिकी का निर्माण, लेखकीय पृष्ठभूमि, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और जातीय या नस्लीय मनोवृत्तियां शामिल होती हैं, से होकर निर्मित होता है और जनान्दोलनों, जनउभारों या जनभागीदारी द्वारा परिष्कृत होता है। आज हिन्दी कहानी की बिडंबना यह है कि वह जनान्दोलनों से दूर है। हिन्दी कहानीकार किसानों, मजदूरों या यों कहें कि सामान्यजन का सामान्यीकरण कर रहा है और कारपोरेट, कुलीनता को कला और अलंकारों की क्लिष्टता पर कस कर वरेण्य बना रहा है । इसके लिए हिन्दी कहानीकारों की मध्यमवर्गीय दृष्टि, गांव से दूरी, खेती-किसानी का किताबी ज्ञान, उनके कथा साहित्य के छद्म के लिए जिम्मेदार है। यही कारण है कि हिन्दी कहानी में बेवफाई विशेषांक निकाले जाते हैं । स्त्री देह और समलैंगिकता, भूख से बड़े सवाल बन, केन्द्र में दिखाई देते हैं ।

यह जीवन के उपभोग की सदी है। इसकी शुरुआत ही संबंधों को विस्तार देने के बजाय, सीमित करने से हुई । यह बाजार की भी सदी है । बाजार की सदी में समाज, सभ्यता, संबंध, सबको बाजारू बनाया जा रहा है। आर्थिक संबंध, नितांत निजी जीवन को ही सामाजिक जीवन बताने को आतुर हैं। यह सदी सीमाओं और वर्जनाओं की नई परिभाषा गढ़ रही है । आत्मघाती हमलावरों की संस्कृति में मनुष्योचित व्यवहार की ठीक-ठीक व्याख्या कर पाना कठिन होने लगा है। हिन्दी कहानी का मूल्यांकन, इन्हीं बनते-बिगड़ते संबंधों, आर्थिक संरचनाओं और वर्जनाओं की उच्छृंखलता की व्याख्या को ध्यान में रख कर किया जाना चाहिए । देखा जाना चाहिए कि जो कथ्य या विषय हमारी सोच में है, क्या वह व्यापक समाज का हिस्सा है या उसे प्रभावित कर रहा है ? इस नई सदी में हाशिये के समाज को, तथाकथित विकास के बावजूद, पहले से भिन्न प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है । गांवों की उपेक्षा, किसानों, आदिवासियों के जर-जमीन की लूट और उनका विस्थापन, संघर्ष के स्वरूप को आतंक के स्वरूप में बदला जाना, ज्वलंत मुद्दा बन चुका है । अंधराष्ट्रवादी रुझानों ने धार्मिक पाखंड़ों, अंधविश्वासों, ठगी और हिंसा को संस्थाबद्ध कर लूट और सत्ता का नया हथियार गढ़ लिया है । स्ति्रयां उपभोग की चीज बताई जा रही हैं । ये सब विडंबनाएं कहानी का विषय होनी ही चाहिए और कहानी के मूल्यांकन में ध्यान देने योग्य भी।

बिना वैचारिकी के, हिन्दी कहानी का वर्तमान, समाज के एकांगी रूपांतरण की ही तरह, खुद को एकांगी बनाते चल रहा है । वैचारिक विचलन ही वह कारण बनता गया, जिससे कहानीकारों ने किसान मुद्दों को गैर जरूरी मान लिया । इसके लिए उनका वर्गाधार भी जिम्मेदार कहा जा सकता है। निश्चय ही कहानी और कहानीकार का भी एक वर्गाधार होता है। वर्गाधार की एक निश्चित विचारधारा होती है। विचारधारा बिन कोई कहानी लिखी ही नहीं जा सकती। आजकल विचारधारा को मजाक का विषय बना लिया गया है । किसान परिवार से जुड़ा कहानीकार ही किसान विचारधारा का प्रतिनिधित्व करेगा। खास विचारधारा से मुक्ति की बात करने वालों से पूछिये कि आज जो लोग सत्ता-सिंहासन पर आरूढ़ हैं, क्या किसी खास विचारधारा से नहीं जुड़े हैं ? विचार शून्य कोई चीज तो जड़ ही हो सकती है। इसलिए प्रतिबद्धता या पक्षधरता तब तक हेय नहीं होती, जब तक कि वह आरोपित न हो। वह नारा न बन रही हो। जब तक कि वह स्वयं का पक्ष पोषण न कर रही हो। सामाजिक होने के नाते सामाजिकता या खेती-किसानी से जुड़े होने के कारण किसानों के प्रति प्रतिबद्धता या पक्षधरता तो होगी ही। अगर बाजारवाद की आंधी में गांव तबाह हुए हैं, किसान आत्महत्या को मजबूर हुए हैं तो संवेदनशील रचनाकार उस पर जश्न तो मनायेगा नहीं? गांव या किसानों का पक्ष तो लेगा ही ? क्या यह पक्षधरता नहीं है कि देश का पेट पालने वाले करोड़ों किसानों में से किसी महान किसान की शहरों या गांवों में, कहीं कोई मूर्ति नहीं लगी है। सड़क, तालाब या मैदान के नाम नहीं रखे गये हैं। कहीं कोई स्मारक नहीं बने हैं।

किसानी समाज के दुख-दर्द सघन हैं। वह जीवन संघर्षों से जूझ रहा है। ऐसे में अंबानी और टाटा की ओर खड़े होकर किसान की कहानी नहीं लिखी जा सकती। इसलिए मुझे तो सदा किसान समाज के प्रति प्रतिबद्ध कहानीकार ही भाते हैं जैसे कि गुरदयाल सिंह, महेश कटारे, पुन्नी सिंह, शिवमूर्ति, संजीव, मदन मोहन, सत्यनारायण पटेल, चरण सिंह पथिक, कैलाश बनवासी, सुरेश कांटक, जयनंदन आदि। खेद का विषय है कि इधर हाल फिलहाल कुछ शातिर संपादकों ने जमीनी समाज से कटे कहानीकारों को ही उछालने का प्रयास किया है, जैसा कि बाजारवाद की आंधी में शहरों की तुलना में जर-जमीन, गांव उपेक्षित होते गये हैं। कलावादियों की जमात की सीमा तक, कलावादी कहानीकार रहें तो क्या गुरेज? गुरेज उनके मुख्यधारा में आ जाने का है।

मई 2012 में कथादेश का एक अंक मैंने संपादित किया था-‘किसान जीवन का यथार्थः एक फोकस।’ उस अंक में किसान मुद्दों को उठाने वाली कुछ कहानियों को प्रकाशित किया गया था। मदन मोहन की कहानी-‘जहरीली रोशनियों के बीचज्, जिसमें बदलता गांव और गांव में चलाई जाने वाली योजनाओं की लूट, नेताओं का झूठ और किसान आत्महत्या की तस्वीर हमारे सामने उभरती है। पराग मांदले की कहानी-‘जमीन से रिश्ता’ गांव से किसानों के पलायन के दर्द को व्यक्त करती है। इस अंक के संपादकीय में मैंने एक सवाल उठाया था कि भारत की तरह भू-भाग और कृषि संरचना वाले दक्षिण अफ्रीकी देशों के लेखकों ने न केवल किसान आंदोलनों में अपनी भागीदारी निभाई है अपितु साहित्य के केन्द्र में उन्होंने किसान समस्याओं को ही रखा है। हिन्दी साहित्य में ऐसा क्या है जो किसान समस्या को केन्द्र में नहीं आने देता ? क्या यह इस साहित्य के विकास और संवदर््धन से जुड़े लोगों की मानसिकता को नहीं व्यक्त करता ? इसी अंक में एक साक्षात्कार में सुप्रसिद्ध साहित्यकार गुरदयाल सिंह ने कहा था-‘साहित्य में किसानी जीवन की समस्याओं को उचित स्थान नहीं मिल पाया। अधिकांश लेखक, विकसित हो रहे नगरीकरण तथा मण्डीकरण के कारण मध्यवर्ग के जीवन की ओर अधिक ध्यान इस कारण भी देते आये हैं कि भारत में आधुनिक साहित्य अंग्रेजी साहित्य से प्रभावित रहा है। ‘पढ़े-लिखे’ वर्ग के लेखकों को शहरी मध्यवर्ग की (मसनूई) जटिलता अधिक आकर्षित करती आई है। किसानी जीवन पर पड़ने वाले दबावों की ओर उनका ध्यान अधिक नहीं रहा। जबकि गांवों के जीवन की समस्याओं का संबंध मानव समाज की जड़ों से है। मानव के शरीर तथा आत्मा की जटिलता किसानी जीवन में अधिक महत्त्वपूर्ण है।’

मेरे द्वारा संपादित, ‘कथा में गांवज्, की भूमिका में 2006 में प्रमुख आलोचक, प्रो. मैनेजर पांडेय ने लिखा था ‘गांवों और किसानों के जीवन पर केंद्रित इस कहानी संग्रह में किसान-आंदोलन की अनुपस्थिति आश्चर्यजनक है ।’

वर्तमान समय में कुछ कहानीकार जरूर हैं जो अपनी प्रतिबद्धता किसानों से बनाये हुए हैं । सबसे पहले महेश कटारे की कहानी- ‘फागुन की मौतः बतर्ज किस्सा’ की चर्चा करना चाहूंगा, जो हाल ही में ‘नया ज्ञानोदय’ में प्रकाशित हुई है। हमारी खेती-किसानी आज भी मौसम की मेहरबानी पर निर्भर है। मौसम कभी रूठ जाता है तो कभी किसानों का साथ दे जाता है। अनिश्चितता के इस क्षेत्र में जोखिम ही जोखिम है और लाभ बहुत कम। किसान अपनी जमीन से लगाव के कारण ही ंउससे चिपका हुआ है। महेश कटारे, किसानों पर मौसम की मार के बावजूद जिजीविषा की उम्मीद को कहानी में व्यक्त करते हुए कहते हैं कि, ‘इस साल रूठा है तो अगले बरस दया दिखायेगा।” उम्मीद जिंदा रख कर किसान जूझता रहता है। मगर उसके हाथ नाउम्मीदी फिर आती है। अगले साल भी ओलावृष्टि की मार पड़ती है। किसानों की कमर टूट जाती है। सरकार के पास ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के जख्म पर, लगाने को कुछ मरहम हैं, कुछ झाड़-फूंक है। राहत के नाम पर, लिए गए कर्ज की अवधि को बढ़ाना, वसूली को कुछ समय के लिए स्थगित कर देना, आत्महत्या करने वाले किसानों को कुछ आर्थिक मदद देकर अपने को जन हितैषी बताने का प्रमाण है। फसल बर्बाद होती है तो मंत्री, अफसर बर्बाद हुई फसल का जायजा लेने निकलते हैं। फसलमारी तैयार की जाती है। मगर कभी पाला, कभी बूड़, कभी सूखा रोग का रोना चलता रहता है। किसानों की समस्याओं का कोई स्थाई इलाज नहीं किसी के पास । बस उनकी सोच इतनी है कि ‘किसानों को लगते रहना चाहिए कि सरकार उनकी चिंता कर रही है।’ कहानीकार स्पष्ट करता है कि ‘खेती बन्द कमरों, छतों के नीचे की जोड़-तोड़ की व्यवस्था नहीं, खुले आसमान के नीचे जिन्दा बीज बोने, उगाने का सिलसिला है। यहां न तयशुदा तरीके से तयशुदा उत्पादन है, न लाभ-हानि के सारे समीकरणों के साथ निर्धारित मूल्य किसान के हाथ में ।’ खेती-किसानी पर कई आपदाएं गिरती हैं। कभी बाजार धोखा दे देता है। कभी फसल खेत में सड़ जाती है, कभी कीड़े नुकसान पहुंचाते हैं। कभी बाढ़, कभी सूखा रुलाता है। कहानीकार कहता है कि, ‘मौसम जब छल कर रहा हो किसानों से तो गांव के नये महाजन भी हो जाते हैं-बेईमान। सरकार का तो कहना क्या? वह ऋण देकर चमड़ी उधेड़ने का काम करती है। भारी वर्षा से फसल नष्ट और ऊपर से कर्ज की मार। कैसे मनाएं होली और कैसे भाये फागुन का राग।‘

ऐसे प्रतिकूल मौसम में रामरतन सल्फास खा कर मर जाता है। रामरतन की मौत पर बखेड़ा न बने अतः कलैक्टर साहब ने दस हजार का चेक तुरन्त भिजवा दिया है। किसानों की तेरहवीं के लिए भी सरकार योगदान दे रही है। जब किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रुकता नहीं ंतो दूसरे ठग सक्रिय हो जाते हैं । कहा जाता है कि ‘गांव से प्रेतछाया दूर करने के लिए सरपंच सात दिवसीय संगीतमय कथा का आयोजन करने का विचार करता है। अवैध खनन करने वाला ठेकेदार सातों दिन के सन्त भोजन का दायित्व निभाता है।’ महेश कटारे की कहानी, ‘फागुन की मौतः बतर्ज किस्सा’, एक साथ किसानों की तमाम समस्याओं से टकराती है।

च्मनरेगा’ और ‘मिड-डे-मील’ रोज चर्चा में रहते हैं। इन दोनों का बजट कई छोटे देशों के राष्ट्रीय बजट से भी ज्यादा है। पूरा ग्रामीण समाज फर्जी जॉब कार्ड से संतप्त है। जॉब कार्ड प्रधानों के लिए कामधेनु है। भले ही बैंक खाते में पैसा जाता हो, मगर प्रधान के गुर्गे मजदूरों को घेरे रहते हैं। वे उनके साथ बैंक तक जाते हैं। जैसे ही मजदूर, खाते से पैसा निकालता है, गुर्गे वहीं, प्रधान का आधा हिस्सा वसूल लेते हैं । गांव वाले प्रधानों से बैर मोल नहीं लेते क्योंकि उन्हें तमाम खैरात बांटू योजनाओं का लाभ प्रधान के माध्यम से ही लेना है। इन विडंबनाओं की अभिव्यक्ति मेरी कुछ कहानियों, यथा-‘रमा चंचल हो गई हैज्, ‘तिलेसरी’ या ‘नरेगा की नमकीन’ में मिलेगी, जिस पर यहां चर्चा नहीं करना चाहूंगा।

गांवों में खैरातबांटू योजनाओं की बाढ़ आई हुई है। किसानों से परंपरागत बीज छीन कर हाईब्रीड बीजों पर अनुदान दिया जा रहा है। खाद की किल्लत पैदा कर सहकारी समितियों के जरिये खाद देने का नाटक किया जा रहा है और एक बोरी यूरिया के लिए किसान दिनभर लाइन लगाये खड़े रहते हैं । कृषि केन्द्रों पर न मिट्टी की जांच की सुविधा है और न खेती-किसानी के बारे में नवीनतम जानकारी देने की कारगर व्यवस्था। ‘किसान मित्र’ का गठन भी एक बेहूदा और कुछ को उपकृत करने वाली योजना है। मजदूरों को गांव में काम देने और पलायन रोकने के लिए बुनियादी विकास अब भी दूर है। मगर कहानियों में यह यथार्थ दिखाई नहीं दे रहे ।

च्मनरेगा’ या ‘मिड-डे-मील’ की पूरी कार्ययोजना पर कितनी कहानियां पढ़ने को मिली हैं, पाठक अच्छी तरह जानते हैं । मेरी जानकारी में मनरेगा पर केवल दो कहानी दिखाई दे रही हैं । वर्ष 2012 में सुमन कुमार सिंह की एक कहानी आई थी- ‘मन-रे-गा’ । ‘मन-रे-गा’ कहानी की भाषा, बुनावट, शिल्प में गंवई प्राण है, गंध है या यों कहें कि पूरी गंवई टटका छल-कपट, लूट-झूठ का एक आइना मौजूद है। मुखिया को नरेगा में काम देकर अपना हिस्सा वसूलना है। उपकार के बदले बेगार भी कराना है। सामंतों द्वारा बेगारी कराना, हिन्दी पट्टी की पुरानी बीमारी रही है । दरवाजे पर एक दिन अचानक, सुबह-सुबह मुखिया का आना देख, सुनैना कहती है-‘मुखिया-सरपंच ठीक रहता तो इतने दिन से ब्लाक का चक्कर काटना पड़ता ? अरे पइसवा तो आता ही है, बाकिर इस सब से बचे तब न।’ इस कहानी में बिहार के मुखिया का सामंती वर्ग चरित्र का छल है, बल है, चन्दर का दरिदर (दरिद्रता) है। मनरेगा, गांवों के बजाय प्रधानों का विकास कर रहा है, यह यथार्थ है। मुखिया समझाते हैं-‘देखो चन्दर! योजना तो सरकार की है लेकिन चलाना तो हमहीं को न है ........ जानते हो ! गांव में भी कम नेतागिरी नहीं है? कोई कुछ कहता है, कोई कुछ । तुम उस पर ध्यान नहीं दोगे । तुमको काम मिल जायेगा। और जब पैसा मिलेगा तो बैंक से निकाल कर तुम, आधा पैसा छोटन के हाथ में दे दोगे।’ नरेगा की यही असलियत है। ऐसे ही खर्च हो रहा है नरेगा का पैसा । गांव का आदमी सोचता है कि भागते भूत की लंगोटी भली ? काम तो कुछ खास करना नहीं? केवल पैसे की बंदर बांट करनी है । तो कुछ हाकिम-हुक्काम और मुखिया खा रहे हैं, कुछ मजदूरों को मिल जा रहा है। मुखिया, नरेगा में काम देने का लालच देकर चन्दर जैसों से बेगार भी करा लेते हैं । हाजिरी गड़बड़ा कर भी कुछ धन ऐंठ लेते हैं और इस प्रकार ‘मन-रे-गा’ कहानी, गांवों के टटका यथार्थ को सामने लाने वाली एक सफल कहानी है । कहानी का अंत थोड़ी यांत्रिकता लिए हुए है। क्योंकि मुखिया की पूरी कुटिलता से आसानी से बच निकलने वाला चन्दर और उसका बेटा, अंत में जिस तरह प्रसन्नता जुटा लेते हैं, वह उतना आसान नहीं है। इसी विषय पर दूसरी कहानी-‘नरेगा की नमकीन’ मेरी थी, जिसे पाठकों ने पढ़ा ही होगा। मनरेगा पर कोई तीसरी कहानी मुझे नहीं दिखाई देती । इतने बड़े हिन्दी समाज के बीच से, विभिन्न प्रांतों के भिन्न स्वरूप पर कहानियां आनी चाहिए ।

खेती-किसानी के वर्तमान और जमीनों पर कारपोरेट गिद्ध दृष्टि पर एकाध और कहानीकारों की नजर है । एकाध ही हैं जो देख रहे हैं कि गांव कितनी तेजी से बदल रहे हैं । नई पीढ़ी ने खेती से तौबा करना शुरू कर दिया तो खेत बेचने, खाने-पीने या जुआ खेलने की संस्कृति का विकास हुआ। पंजाब और हरियाणा इसके ज्वलंत उदाहरण हैं जहां हरित क्रांति का सबसे ज्यादा ढिढोरा पीटा गया था। आज पंजाब में जमीन बेचकर जीविका चलाने का प्रचलन चालू है। मध्यप्रदेश में इन्दौर के आसपास जिस तरह किसानों की जमीन खरीद कर बंगले बनाने का कारोबार तेज हुआ है, उस पर कहानीकार सत्यनारायण पटेल की नजर है। ‘लाल छींट वाली लूगड़ी’ सत्यनारायण पटेल की एक महत्त्वपूर्ण कहानी है, जिसमें खेती-किसानी से युवाओं का पलायन और रीयल स्टेट कारोबारियों द्वारा खेती योग्य जमीनों को खरीदने के खेल की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है। ‘पढ़ी-लिखी पीढ़ी में कोई बिरला छोरा ही होता जो खेती-बाड़ी के काम में रुचि दिखाता,’ यह बात कहानीकार बताता है। इस कहानी का एक पात्र है डूंगा। डूंगा एक मजबूत इरादों वाला किसान है। उसे भगवान पर कोई भरोसा नहीं फिर भी ढपली, करताल, खंजड़ी और झांझ बजाने मंदिर जाता है। वह धैर्यवान है। वह अपने भीतर पसीने की अनगिनत धाराओं को समा लेता है। खेतों को बेचने का दबाव बनाने वाले दलालों (टुल्लरों) से वह अनभिज्ञ नहीं है। उसे खेत बेच कर लाखों रुपये बनाने का लोभ नहीं। जबकि दलाल अनगिनत सपने दिखाते हैं । उसकी भी आंखों में सुनहरे तारे झिलमिलाते। वह भी सपने देखता। मगर उसे अपनी मेहनत से सपने पूरे करने हैं, न कि जमीन बेचकर। कहानीकार कहता है, ‘डूंगा की आंखों में झिलमिलाते तारे केवल आसमान के तारे नहीं थे, एक सपना था। सपना भी क्या? एक लुगड़ी का सपना! छींटदार। सितारे टंकी लुगड़ी का सपना।‘

कहानीकार कहता है कि-च्डूंगा ऐसे समय और महान देश के गांव का किसान था, जिसमें डूंगा तो क्या? उसके जैसे गांव के किसी भी रामा बा या सामान्य किसान का पेट भरने के अलावा कोई सपना देखना और मेहनत की फसल बेचकर जीते-जी सपना पूरा करने का सोचना गुनाह से कम न था। ऐसा करने का मतलब सरकार और उसकी नीतियों की खुल्लम खुल्ला तौहीन करना था। हालांकि सरकार इतनी गेली नहीं थी, न उसकी नीतियां इतनी ढीली-ढाली थी कि डूंगा जैसे धोती छाप लोग अपने सपनों को पूरा कर लेते। सरकार ने बहुत ही विकसित और ताकतवर देशों की सरकारों की मंशानुसार जो नीतियां बनायी थीं, उन्हें समझना डूंगा जैसे धोती छाप गांवदियों के बस का तो था ही नहीं। लेकिन सरकार के भीतर-बाहर बुद्धि की खाने वालों का दावा करने वालों के लिए भी, बगैर चन्द्रयान के चांद पर जाने का सपना देखने जैसा था।... ऐसी बखत में डूंगा का एक मनपसंद लुगड़ी का सपना। पारबती का बूढ़ी हड्डियों को आराम और जवान छोरी को परनाने का सपना। पवित्रा(बेटी) की आंखों में अच्छे घर और दूल्हे का सपना। सपना कोई बुरी बात नहीं। लेकिन जीते-जी पूरा करने की जिद। मेहनत की फसल से पूरा करने की अड़। ये सरकार की नजर में क्या था नहीं पता, पर गांव के टुल्लर की नजर में यह एक गेलचौदापना था। उसके मगज में कोई उलझाव नहीं था। डंके की चोट पर कहता-‘वह चूतिया है।’ दलालों की जमात किसानों से जमीन छीनने के लिए यही सब सिखा-बता रही है।

दलाल बता चुका है कि दूसरे किसानों ने तीस लाख में खेत बेच दिये तो ‘ड़ूंगा के दिमाग में वही सरबल रहा-तीस लाख कितने होते होंगे ?...... अगर बैलगाड़ी में चारा, बगदा की तरह नोट भरूं, तो गाड़ी कहां तक भरा जायेगी? आधी-आधी मूंडियों तक तो भरा सकती है। और अगर तीस लाख की खन्डार बनाऊं, तो कितनी लम्बी-चौड़ी और ऊंची बनेगी? दो बीघा के चनों की खन्डार बराबर तो बनेगी ही । किशोर के दो बीघा के तीस लाख, तो मेरे दस बीघा के कितने होंगे !.......पूरी बैलगाड़ी भर जायेगी । लेकिन एक बैलगाड़ी भर नोट में कितनी बैलगाड़ी भर लुगड़ी आयेगी । फिर मैं, मेरी पड़ोसन सम्पत्त काकी को ही नहीं, परगांव की भी कई सम्पत्त काकियों, परबतियों और पवित्रियों को लुगड़ी दे सकूंगा। धरती मां की हरेक बेटी को लाल छींटदार लुगड़ी ओढ़ा दूंगा।’ यह कहानीकार का भी सपना है। वह सिर्फ अपनों का तन ढंकने की सोच नहीं रखता, पूरे समाज के बारे में सोच रहा है। उसकी लुगड़ी का सपना गांव और परगांव, सबके लिए है। सत्यनारायण पटेल की इस कहानी का मुख्य पात्र अपने खेतों को पैसे के लिए नहीं बेचना चाहता। वह कहता है- ‘मां का सौदा करेगा? धरती का बेटा, धरती को बेचे पैसों से रोटी खरीदकर खायेगा?’

मगर डूंगा देखता है कि उसके चारों ओर का वातावरण भयावह है । बीवी, बेटी का दबाव तो है ही, वह देख रहा है कि आसपास के लोगों ने भी अपने खेत बेच कर ऐश करना शुरू कर दिया है। डूंगा देख रहा है कि ‘खेत साले के भी बिक गये थे। उसने सपनों में भी न सोचा था कभी, इतने रुपए मिलेंगे। पर जब मिल गये तो करे क्या इतने रुपयों का? घर बना लिया । कार खरीद ली । थैला भरकर बैंक में रख दिया और क्या करता? इससे ज्यादा उसे ही नहीं, कइयों को नहीं सूझा।‘

उसकी बीवी पारबती समझा रही है-‘और केइं पूरी उमर बीती गयी गारो खोदते-खोदते। ढंग की एक लुगड़ी भी ना लय पाया । बुढ़ापा में तो गार के सुधार लो ।’ दलालों का दबाव बढ़ा है । वे कहते हैं-‘बीस लाख बीघा तक दे सकते हैं। सोचो, दस बीघा का कितना रुपया होगा.........वारा न्यारा हुई जायेगा। चाहो तो लुगड़ी बनाने का कारखाना खोल लीजो । सौ-दौ सौ लुगड़ी रोज बांटोगा तो भी कम नी पड़ेगी।’ सत्यनारायण पटेल की कहानी का नायक डूंगा का आत्मबल मजबूत है। घर-परिवार का दबाव, दलालों की धमकियां और भीतरघात सबसे वह बच निकलता है । वैश्वीकरण का वर्तमान आर्थिक बुलबुला अचानक फूट पड़ता है । शेयर मार्केट धराशायी हो जाता । उसकी जमीन खरीदने की योजना बनाने वाली मुम्बई की कम्पनी दिवालिया हो जाती है और डूंगा की जमीन का सौदा नहीं हो पाता । सत्यनारायण पटेल ने समाज, परिवार और दलालों के दबाव को झेलते डूंगा के स्वामिभान की रक्षा, सर्वग्रासी आर्थिक तंत्र के खोखलेपन को प्रकट करते हुए की है, यह इस कहानी का सकारात्मक पक्ष है और हमें उम्मीद बंधाता है कि कथा साहित्य का जमीनी रिश्ता बचा ले जाने में ऐसे ही कहानीकार सफल होंगे ।

आरा के सुरेश कांटक लम्बे समय से गांव-गिरांव की कहानियां लिखते रहे हैं । वह खेती-किसानी के बहुचर्चित मुद्दों को जरूर उठाते हैं । वह प्रतिरोध को भी अपनी रचनाओं का हिस्सा बनाते हैं। यद्यपि कि कभी-कभी प्रस्तुतिकरण के सपाट रह जाने के कारण उनकी कहानी की प्रभावात्मकता प्रभावित होती है।

किसान की पैदावार का एक समर्थनमूल्य घोषित करती है सरकार और भारतीय खाद्य निगम जैसे संस्थान किसानों का अनाज खरीदने का दायित्व निभाते हैं । समर्थन मूल्य का लाभ गरीब या छोटे किसान नहीं उठा पाते क्योंकि दबंग किसान, गरीबों का अनाज सस्ते में खरीदकर, क्रय केन्द्रों पर अपने प्रभाव और लेन-देन का इस्तेमाल कर महंगे दाम पर बेच देते हैं । इस प्रकार वे बैठे-बैठे लाभ कमा लेते हैं जबकि असल काश्तकार का अनाज खरीदा ही नहीं जाता। सुरेश कांटक ने इस समस्या को अपनी कहानी ‘किसान क्या करे?’ में उठाया है। कहानी का नायक कहता है-‘मेरा नाम मुरारी है। मैं थोड़ा पढ़ा-लिखा, मगर गरीब किसान हूं । ...सरकार ने धान खरीद केन्द्र खोला है। वहां का मैनेजर बहुत बदमाश है। एक नम्बर का घूसखोर है। मुझे तीन हफ्ते से दौड़ा रहा है। ......जिससे पैसा मिल जाता है, उसी का धान तौलवाता है।” कहानीकार बताता है कि काश्तकार का काम दो ही तरीके से हो सकता है । ऊपर के अधिकारियों से शिकायत करने से भी कोई लाभ नहीं। या तो घूस दो या हथियार उठा लो ।

कृष्णकांत की कहानी ‘मुआवजा’ जो, जनवरी-फरवरी 2013 के परिकथा अंक में आई थी, का जिक्र ऊपर किया जा चुका है। यह कहानी पुलिस और प्रशासन के सहयोग से पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से बनाये जा रहे ‘सेज’ के खेल को सामने रखती है । सरकार के पास मुआवजे का फांस ही सबसे आसान तरीका है, किसानों को फांसने के लिए । विकास का वर्तमान किसानों के पीठ से गुजरता है और उससे दब कर किसान का पेट जमीन में चिपक जाता है । कुछ दम तोड़ देते हैं मगर विकास का खेल जारी रहता है। भाषा और शिल्प में बहुत कुछ आरोपित होते हुए भी किसान आन्दोलनों और उनके प्रति पूरे शासन तंत्र की अमानवीयता का एक खाका इस छोटी सी कहानी में मिलता है । आज किसान विस्थापन के जो नये-नये बहाने ढूंढ लिए गये हैं, उनकी एक पड़ताल इस कहानी में की गई है । जमीन लेकर दिए जाने वाले मुआवजे पर कहानीकार सवाल उठाता है-‘पर कितने दिन चलेगा यह मुआवजा? छह महीने.....साल भर.....दो साल.. पर उसके बाद? खेत तो हमारे पुरखों के हैं। उन्होंने भी इसी जमीन में रोटियां उगाईं। हम भी उगा रहे। ये बची रहेंगी तो हमारे बच्चे भी अपना पेट भर सकेंगे। यह हमारे बच्चों को अनाथ करने की साजिश है.. हमारी ही जमीन हमसे छीनकर अनाज उगाएंगे और कल को हमी सोने के भाव गेहूं के दाने खरीदेंगे। यह किससे पूछकर हो रहा है? क्यों हो रहा है? कैसा विकास होगा? बिना हमारी राय लिए, बिना हमारी मरजी के यह कैसा विकास होगा? किसके लिए होगा?’

जैसा कि मैंने शुरू में कहा है कि खेती-किसानी का प्रश्न कारपोरेट हितैषी बन चुका है। कारपोरेट खेती इसका अगला पड़ाव है । ‘मुआवजा’ कहानी में कहानीकार स्पष्ट करता है कि ‘सरकार ने फैसला किया है कि इस इलाके से कुछ जमीन लेकर एक ऐसा क्षेत्र विकसित किया जायेगा जहां पर वैज्ञानिक ढंग से खेती होगी। यह काम उद्योगपतियों को सौंपा जायेगा।’ कहानी की यह उक्ति वर्तमान सरकार की किसान नीतियों का मुख्य बिन्दु कहा जा सकता है, जहां विकास की मार, किसानों के खेतों और अंततः उनके पेटों पर पड़ रही है, पड़नी है। कहानी के शब्दों में-‘आदमी से उसकी रोटी छीन ली जाती है और उसकी मौत की वजह टी.बी., कैंसर या प्राकृतिक आपदा बताई जाती है।’ यह वर्तमान किसान आत्महत्याओं का यथार्थ है । ‘कथा लंबी है शब्द बहुत कम हैं और पात्र असंख्य । कुछ भूखे मर गए, कुछ के घर छिन गए, कुछ ने रसायन पी लिया, कुछ ने फांसी लगा ली।’ किसान संघर्ष को कहानीकार ने उभारा तो है लेकिन किसानों के माध्यम से प्रतिकार का अंत करने के बजाय, करिश्माई कथ्य रचना की ओर बढ़ गया है। कहानीकार ने कहानी का अंत, अनुज के विद्रोह से किया जो अंततः मुख्यमंत्री पर चाकू से वार कर देता है और स्वयं सुरक्षाकर्मियों द्वारा मारा जाता है। यह एक प्रकार से मुम्बइया फिल्मों सदृश्य जान पड़ता है।

जमीनों पर लगी कारपोरेट गिद्ध दृष्टि के अलावा भी भारतीय सामंती समाज में विस्थापन के दूसरे घिनौने तरीके गांव-देहातों में अपनाये जाते रहे हैं। गरीबों और मुख्यतः निम्नजातियों का शोषण और आखेट करना, उनकी थोड़ी बहुत जमीनों को हड़प लेना या अपने हितों के लिए दाना डालने जैसा खेल, चलता रहा है। कहानीकार चरण सिंह पथिक इस खेल पर से पर्दा उठाते, अपनी कहानी, ‘बांध टूट गया’ में कहते हैं-‘बड़े जोता जाल बिछाते, चुग्गा डालते और अपना शिकार फंसाकर मूंछों पर ताव देते ।’ । ‘बांध टूट गयाज्, कहानी ने मिट्टी के बांध और सब्र के बांध को तोड़ते हुए हिन्दी कहानी के सामंती उत्पीड़न को बेपर्दा करने का प्रयास किया है। बांध बांधा गया है कि पानी जमा कर, उसमें से छोटी-छोटी नहरें निकाली जाएं, जिससे किसानों के खेतों को पानी मिल सके। सिंचाई हो तो खेती लहलहाये । कुछ हद तक ऐसा हुआ भी । विकास के नाम पर बने बांधों से सिंचाई होते ही अन्न उपजा । अन्न उपजने लगा तो खेतों के दाम बढ़े । जमीनों के दाम बढ़ते ही सामंती शार्क मछलियों ने छोटी मछलियों को भूमिहीन करना शुरू किया। यह काम पैसे से, धमका कर और खेतों की घेराबंदी कर किया गया । एकाध ने प्रतिरोध किया । कहानी के नायक भरोसी ने बोलने का साहस किया कि-‘पटेल, जमीन चाहे बंजर रह जाए, मगर बेंचूगा नहीं। जमीन तो मां है । मां को कौन पाजी बेचेगा ?’ गाँव का सामंत धनजी पटेल चारा फेंकता है-‘तो जमीन के बदले जमीन लेले ।’ भरोसी, पटेल की चाल को समझता है । वह जानता है कि गांव के गोपाल डोम की जमीन को किस तरह से धनजी पटेल ने हड़प लिया था और गोपाल की बीवी को धनजी के नसेड़ी भाई ने रखैल बना कर रखा था। हालात यहां तक जा पहुंचे कि गोपाल डोम को गांव छोड़ देना पड़ा था।

चरण सिंह पथिक की यह कहानी इस व्यथा को सामने लाती है कि बांध का पानी ज्यादातर ऊंची जातियों के खेतों में जाता है। निम्नजातियों के खेतों को पानी नहीं मिलता । जाहिर है जो पानी हड़पेगा, खेती उसी की होगी । जिसके खेतों को पानी मयस्सर नहीं, वह अपनी जमीन रख कर ही क्या करेगा । तभी तो इस कूटनीति का प्रयोग गरीबों और दलितों की जमीनों को औने-पौने दामों में खरीदने के लिए किया जाता है। कहानीकार ने अपनी कहानी में बड़े जोतदारों द्वारा छोटे जोतदारों की जमीनों को खरीदने के इसी कुचक्र का जिक्र किया है।

गांव से विस्थापन का नया दौर सीमान्त किसानों के उजड़ने के कारण तेज हुआ है। जयनंदन की एक कहानी है- ‘छोटा किसान’ । दादू महतो के बेटे भी उन पर दबाव बनाते हैं कि जमीन बेच कर शहर चलिए। वहीं कर लेंगे छोटा-मोटा काम। गांव से बेहतर गुजारा हो जायेगा। ‘अब खेती-बाड़ी में हम छोटे किसानों के लिए कुछ नहीं रखा है बाऊ.....घर-खेत बेचकर हमें शहर जाना ही होगा। सोचने-विचारने में हमने बहुत टैम बर्बाद कर दिया।’ बेटों के पास दादू को समझाने के लिए तर्क है। कहते हैं-‘जो बड़े जोतदार हैं, उनके पास पूंजी है, उनके पास ट्यूबवेल है, खाद-मसाला देने की कूबत है। बिना खाद-दवाई के तो फसल अच्छी उपजती ही नहीं एकदम। पहले ऐसा नहीं था। माल-मवेशियों के गोबर और घर का कूड़ा-कर्कट ही काफी होता था। किसी छिड़काव की भी जरूरत नहीं होती थी। मानसून ठीक समय पर आ जाता था। इधर कई वर्षों से तो समय पर भरपूर वर्षा होती ही नहीं है, होती है तो असमय हो जाती है और खूब हो जाती है, जिससे फायदे की जगह नुकसान ही नुकसान हो उठता है।’ और एक दिन ऐसा आता है जब गांव की हालात से तंग आ, दादू महतो गांव छोड़ने को विवश होते हैं । हम देख रहे हैं हर विस्थापन में गांव टूट रहा है और शहर बसता जा रहा है।

बदलते गांवों से बैलों और हलों का विस्थापन होने लगा है । पहाड़ के गांवों और खेतों की प्रकृति के कारण ट्रैक्टरों या कृषि यंत्रों का पहुंचना अभी भी दुष्कर बना हुआ है। गढ़वाल के कहानीकार राणी राम गढ़वाली की कहानियों में पहाड़ी किसानों के दुख दर्दों का वर्णन उनकी ज्यादातर कहानियों में मिलता है। कथ्य और शिल्प के आधार पर भले ही ज्यादातर कहानियां उथली और सपाट हैं तब भी पहाड़ी गांवों को समझने में हमारी मदद करती हैं । उनकी कहानियों में बैंलों के तमाम देहाती नाम बड़ी सजीवता से सामने आते हैं। इनकी कहानियों में किसान अपने जानवरों से स्वाभाविक बातचीत करते हैं। ‘सुखू माम’ कहानी में हल चलाता किसान अपने बैलों को साधते हुए कहता है-‘चल खैरा चल। देख भूरा देख। रा....रा...भूरा...रा । ढिस्वाल देख, तिरवाल देख (ऊपर देख,नीचे देख)’ उनकी कहानियों में पहाड़ के पेड़-पौधे और प्रकृति भी प्रमुखता से स्थान पाते हैं ।

सरकार ने किसानों की सभी समस्याओं के हल के लिए-‘किसान चैनल’ की शुरुआत की है। किसान चैनल पर सब कुछ अच्छा-अच्छा है मगर सीमांत किसानों की दुर्दशा, खाद, पानी, उत्तम बीज, कीटनाशकों आदि की समस्याओं और कृषि उत्पाद का उचित मूल्य जैसे मुद्दे गायब हैं । यहां कारपोरेट नजरिये से खेती-किसानी को प्रस्तुत कर किसानों को गुमराह किया जा रहा है। सरकार के इस नजरिये पर भी कहानीकारों का ध्यान जाना चाहिए। पिछले बीस वर्षों में निश्चय ही हिन्दी कहानी में विषयों का विस्फोट हुआ है मगर किसानों के प्रति संवेदना का विस्फोट होना अभी बाकी है। खेती-किसानी की बदलती संस्कृति, उसमें आती विकृति और सरकारी नीति पर साहित्यकारों की निगाह होनी चाहिए। जिन कहानीकारों का मैंने जिक्र किया है उनसे उम्मीद तो जगती है मगर वे संख्या में बहुत कम हैं । वे वही कहानीकार हैं जो मूलतः गांव और गरीबी से वास्ता रखते हैं या जो गांव में लम्बे समय तक जीने के बाद, रोजगार की तलाश में शहरों की ओर आये हैं। इनमें आदिवासी और दलित वर्ग के कहानीकार भी शामिल हैं । उनके सामने रोजी-रोटी की परेशानी है । केवल साहित्य से रोटी तो चलती नहीं, इसलिए लेखन के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुत से जेनुइन कहानीकार, कम समय निकाल पाते हैं । छोटे-छोटे शहरों से निकलने वाली लघु पत्रिकाएं सभी के सामने नहीं आ पातीं । इस कारण भी वहां छपने वाले कहानीकार ओझल रहते हैं । अकादमियों में बैठे उच्च जाति के साहित्यकार निश्चय ही ईमानदार नहीं हैं और वे अपनों और गैर की मानसिकता में जीते हैं । इसलिए हाशिये के समाज के कई जरूरी रचनाकारों को किनारे लगाने का खेल भी चलता रहता है। लेखक संगठनों को चाहिए कि वे इस कुचक्र को तोड़ें और जेनुइन ओझल कहानीकारों को सामने लाएं ।

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गोमतीनगर, लखनऊ 226010

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