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ज़िंदगी के तार / कहानी / प्रज्ञा / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

प्रज्ञा

ज़िंदगी के तार

रिश्तों का सफर भी कितना अजीब है, कभी लगता है कि इनके बिना जीना नामुमकिन है। दिन का हर पल उन्हें सींचने,पोसने में व्यस्त रहता है। ज़रा इधर -उधर हुए नहीं तो आंखों की बेसब्री और ज़ुबान से निकली शिकायतों के अंबार पिटारा खोलकर बैठ जाते हैं। और यदि समय के लेख से इनके शब्द मिटने लगें तो सारे संदर्भ धुंधलाते जाते हैं और फिर वही रिश्ते पिटारे से निकलकर समा जाते हैं औपचारिकता की किसी अंधेरी, गहरी खोह में। उनके बिना जीना भी कितना सरल होता चला जाता है। और रूबरू होने पर पिछली स्मृतियां एक जुंबिश भर पैदा करती हैं और फिर पसर जाती हैं अगली मुलाकात तक की एक और लंबी , बेहरकत चुप्पी में। आज सुबह ही लवली के पापा के गुज़रने की खबर के बाद मीता उन्हीं पुरानी गलियों में घूम रही थी जहां दोनों ने साथ-साथ समय को जिया था। कभी बच्चों के बहाने तो कभी नमक-चीनी जैसी रोज़मर्रा की चीज़ों के बहाने और कभी कुछ विशेष पकवान लेकर खड़ी हो जातीं दोनों एक-दूसरे की चौखट पर। एक दहलीज के भीतर, दूसरी बाहर। घंटों इस अनौपचारिकता में बिता सकती थीं दोनों। कभी ठहाकों में घुलती उनकी आवाज़, तो कभी आंखों की कोर से चूने लगते ज़रा-ज़रा से शब्द और हाथ, कंधा सहलाकर सारी उदासी हर लेने की कोशिश में जुट जाते। यही तो सुख था पड़ोस का।

किराए का घर क्या छूटा, दूरियां ही बढ़ गईं पर आज लवली की बहन रानो के फोन ने सब कुछ फिर से ताज़ा कर दिया। अंकल की याद में पाठ रखवाया है लवली ने। और मीता को आज जाना ही है बिना कोई बहाना बनाए। कैसे भूल सकती है वह लवली और जसविंदर अंकल को? बरसों राजस्थान में एक छोटी-मोटी सरकारी नौकरी करने वाले अंकल, रिटायर होकर बड़ी बेटी लवली के ही पास आ गए थे। एक ही मोहल्ले में दोनों किराएदार। लवली से जुड़े मीता के रिश्ते की डोर खुद ब खुद अंकल और उनके पूरे परिवार से जुडती चली गई। लवली का बड़ा भाई बरसों से कनाडा में ही था और उसकी

पत्नी और दोनों बच्चों की ज़िम्मेदारी अंकल-आंटी ही संभाल रहे थे। लवली की अविवाहित बहन विम्मी भी उन्हीं के साथ रहती थी। दिल्ली में ही कुछ दूरी पर मंझली बहन रानो भी थी। लवली उम्र में ही नहीं अधिकार में भी बड़ी थी घर में। भाई की लंबी और अनिश्चित गैरमौजूदगी ने लवली को अंकल का मज़बूत सहारा बना दिया था।

“मीता पापा-मम्मी को पैसों की दिक्कत नहीं है यार बस अकेलापन है। परेशान हो जाते हैं जल्दी से। यहां रहेंगे तो मैं और रानो संभाल लेंगे उन्हें। नौकरी थी तब तक ठीक था अब अकेले नहीं रह पाएँगे।”

मीता लवली के निर्णयों और उसकी दृढ़ता को बखूबी जानती थी। कितने साल से दोनों पड़ोसी ही नहीं दोस्त हैं। एक-दूजे के साथी, किसी राज़ की कोई पर्दादारी कभी नहीं रही। एक गतिमान नदी बहती रही है दोनों के बीच जो समय की सारी टकराहट, तरलता और बाधाओं की साक्षी बनकर कभी बहना नहीं भूली। मुद्दत से शांत पड़ी इस नदी में आज फिर हलचल होने लगी। मीता के सामने सारी कड़ियां बेतरतीब होकर भी एक रूप गढ़ने लगीं और सामने खड़ी हो गई वो भयानक सर्द रात।

“भाईसाहब इतनी रात गए आपस में इस तरह का लड़ाई-झगड़ा क्या ठीक है? बच्चों के चेहरे देखिए। डर से पीले पड़ गए हैं। किसी जंगल में नहीं रह रहे आप। यहां लोगों के बीच हैं और लोग सब देख- सुन रहे हैं। ” मीता के पति रोहित एक अच्छे पड़ोसी का फर्ज़ निभा रहे थे। फिर उस समय जसविंदर अंकल भी तो यहां नहीं रहते थे, कौन साथ देता लवली का?

“और आप ही बताओ लवली ने कब आपका साथ नहीं दिया? आपके एक्सीडेंट के बाद जब आप महीनों बिस्तर पर पड़े रहे तो छोटे-छोटे बच्चों को अकेले संभाला और पूरे मन से आपकी सेवा की। आपके पापा कितना परेशान करते हैं इसे, कभी कहा इसने कुछ? दो प्यारे बच्चे हैं आपके। सुखी परिवार है फिर इतनी रात रोज-रोज के ये झगड़े अच्छे नहीं हैं।” मीता के शब्द बेरोकटोक निकल रहे थे पर डर भी था कहीं रौनक पाजी को नागवार गुज़रा और उन्होंने मियां-बीवी का आपसी झगड़ा बताकर उन्हें दरवाजा दिखा दिया तो कल कौन -सा मुंह लेकर आएगी लवली के घर?

“तो समझाओ न जी, लवली को आप।”

रौनक की आवाज़ गरजी थी, जिसके आगे मीता और रोहित के पैर तो कांपे पर डिगे नहीं। वो लवली के जीवन का कठिन दौर था। भाई देश से बाहर, मां-पिता अशक्त और दूर। उस पर प्रताड़ित करने वाला ससुर। क्या-क्या ज़ुल्म नहीं किए लवली पर उन्होंने। उसकी शिक्षा का मज़ाक उड़ाया, उसके माता-पिता का घर आना बंद करा दिया। उसके पिता का घोर अपमान किया और लवली के साथ जो करते थे वो तो बस हद थी। एक लवली ही थी जो घर भर में कहीं भी थूक दिए उनके बलगम को साफ करती फिरती। सफेद चने बनाती तो उनको परोसने से पहले उनके लिए एक-एक चने की परत उतारती।

“पता है न तेरे को चुभते हैं छिलके गले में मेरे।” कहकर कटोरी दे मारी थी उस पर अंकल जी ने।

लवली अकेली ही संभाले थी अपना मोर्चा। मीता हैरान थी कि शादी के इतने वर्ष ठीक निभाने के बाद अचानक रौनक पाजी को क्या हुआ? एक उन्हीं के कारण तो लवली अपने ससुर की सारी ज्यादतियां झेल जाती थी बिना किसी शिकायत। लवली और रौनक पाजी के बीच जो प्यार था वो हवा कैसे हो गया? कितनी बार जब किसी काम से मीता, लवली के दरवाज़े तक पहुंचती तो पति-पत्नी के बीच चल रही छेड़छाड़ और लवली की होंठ-सिली हँसी उस तक पहुंच जाती थी। कितनी बार दरवाज़े से इसी कारण बिल्ली की तरह दबे पांव लौटी थी मीता, लवली की हँसी को अपने चेहरे पर लिए। पर आज सब कुछ बदल चुका था। रौनक पाजी का मन बार-बार आस्ट्रेलिया के किसी कोने में बैठी अपनी बड़ी बहन की ओर भाग रहा था।

“तेरा भाई भी तो कमा रहा है वहां बैठा फिर मुझे भेजने में क्या परेशानी है?” रौनक का सवाल चीखता।

“देख नहीं रहे मेरे मां-बाप का हाल ? उसके बीवी-बच्चों का हाल? सालों से गया कोई सुध नहीं ली उसने। आज तक एक रुपया नहीं भेजा घर, कहता है लौटने के लिए ही जोड़ रहा हूं। कल को संवारने के चक्कर में सबका आज बर्बाद कर रहा है इतने सालों से। उसे भी पता है पापा पाल लेंगे सबको...पर मेरा कौन है? और फिर क्या मैं कमाती हूं?” लवली ने प्रतिवाद किया।

“मैं क्या अकेला छोड़े जा रहा हूं तुझे?... मेरे पापा हैं न संभाल लेंगे सब।” पति के ये शब्द खौलते सीसे की तरह उतर जाते लवली के कानों में। सब कुछ जानते हुए भी पति किसके भरोसे पर बड़ी-बड़ी बातें कह रहा है? जिस ससुर ने कभी लवली को बहू तो क्या इंसान तक न समझा उसके सहारे छोड़ के जाना चाहता है । वो ससुर जो कई बार महीनों कहीं गायब रहता है और फिर एक तूफान की तरह आता है घर को चौपट करने। वो पिता जिसने अपने बच्चों को कभी आगे बढ़ने में कोई मदद न की और मोहताज बनाकर रखा अपने बच्चों को। जिससे उसकी पूछ बनी रहे सदा घर में। एक जमीन के जरा से टुकड़े का चुग्गा डाला हुआ है लड़कों के आगे जिससे दोनों खामोश रहते हैं।

रोज ही यही झगड़ा होता और मोहल्ला मज़े लेता। दरअसल झगड़े की जड़ रौनक की इच्छाओं और ज़रूरतों से सीधी जुड़ी थी। रौनक किसी सरकारी नौकरी में नहीं था । एक साबुन कंपनी में सेल्समेन था। मालिक खूब काम लेता था उससे। फील्ड की नौकरी थी पर खरीदारों से पैसे उगाहने से लेकर कई और जिम्मेदारियां लादी हुई थीं सब रौनक की ईमानदारी के चलते। शुरू से ही मेहनती, रौनक पाजी ने सारी जिम्मेदारियां फर्ज़ की तरह अंजाम दीं पर समय की फिसलती रेत ने जताना शुरू कर दिया कि रीतना ही उसका मुकद्दर है। मालिक ने उनकी सेवाओं के एवज में केवल उनकी नौकरी बहाल रखी तन्ख्वाह में मामूली बढ़ोत्तरी के साथ। पर काम के बेहिसाब घंटे और बड़े ही हिसाब से दी गई तनख्वाह का फर्क अब साफ-साफ दिखने लगा था। इसी बीच बहन-बहनोई ,अपनी बेटी की शादी के सिलसिले में इंडिया आए। बहनोई लवली के भाई की तरह ही टैक्सी चलाता था पर यहां आकर अपने ठाठ-बाट, दिखावे और खाने-पीने पर की गई ऐश से रौनक को चुम्बक की तरह खींचने लगा। बहनोई का उसे अपने साथ ले चलने और नोट में नहलाने का सपना रौनक को रास आ गया। बस अब एक ही रट थी -“यहां रहना बेकार है। सारी ज़िंदगी गधा नहीं बने रहना मुझे।”

और एक दिन रोती हुए लवली मीता की चौखट से भीतर आई-

“देख इसे कहीं छिपा दे तू और रौनक आए, पूछे कुछ तो साफ मुकर जाना।”

मीता के कांपते हाथों में रौनक और रोमी का पासपोर्ट था।

“रोमी का किसलिए?”

“तू नहीं जानती मीता इनकी सोच बड़ी आगे की है। पापाजी ने समझा दिया है कि लड़का बड़ा हो रहा है अभी से डाल देगा काम में इसे तो कमाएगा-खिलाएगा। सारे सहारे छिनते जा रहे हैं।” लवली की हिम्मत जवाब दे रही थी। उसके कुछ दिन बाद ही रौनक ने रात को झगड़े में लवली पर पहली बार हाथ उठाया । जिसका कारण गुस्से और हताशा में लवली के मुंह से पापाजी के लिए उन सारी बातों का खुलकर निकल जाना था जो बरसों से दबी थीं। झगड़ा बढ़ता ही गया। आधी रात को रौनक ने लवली और बच्चों को घर से निकाल दिया। मीता ने बहुत समझाया पर आज उसे लगा कि ये वो रौनक पाजी हैं ही नहीं जो बच्चों पर जान छिड़कते थे, लवली से छेड़छाड़ किया करते थे और रोहित और मीता से खुलकर बात किया करते थे।

“लवली सुबह तक की बात है ,चल मेरे घर। सुबह अकल ठिकाने आ जाएगी पाजी कीे। अब कहीं नहीं जाएगी तू।” सिम्मी और रोमी को अपने पास सटाए भींगी आंखों और दृढ़ स्वर में मीता बोली।

लवली इस अपमान से हतप्रभ थी और चेतना लौटने पर बोली-

“ऐसे नहीं, इतनी आसानी से नहीं, अब जब तक खुद माफी मांगकर सब सुधारकर नहीं लाएंगे ये, लौटूंगी नहीं।” लाख मनुहार और इसरार के बाद भी लवली रानो के घर चली गई। इधर रौनक पाजी भी अपने बड़े भाई के घर चले गए। अंकल जी भी वहीं थे। उन्होंने कोई कोशिश नहीं की अपने बेटे के घर को बचाने की। मीता लगातार फोन पर लवली को ढाढस बंधाती रही। दो-एक बार लवली घर भी आई।

“मीता घर बसेगा न दोबारा मेरा?” उसका सवाल मीता का कलेजा चीर देता। सांत्वना के सारे शब्द उसे निरर्थक लगते केवल उसकी खामोश, सजल आंखें ही ऐसे में सहारा बनतीं और बाहें जो लवली से लिपट जातीं। जीना उतरते हुए जब लवली अपने घर के दरवाजे को सहलाती तो बंद दरवाजे से चीख-चीखकर उसकी ख्वाइशें उससे लिपटाने लगतीं। ख्वाइशों और लवली के बीच रह- रहकर एक निर्मम, मजबूत दरवाजा खड़ा हो जाता।

कभी-कभी कोई सामान लेने आए रौनक पाजी से जब मीता टकरा जाती तो वो कतराते हुए दरवाजे की आड़ में समा जाते। और सामना होने पर मीता की सवालिया निगाह उनकी निगाह से बंध जाती। अब मीता पहले की तरह उनसे नमस्ते नहीं करती। रोहित ने तो हिम्मत करके कह ही दिया-

“बंद करो झगड़ा पाजी, लौटा लाओ सबको घर।”

जिसका जवाब रौनक पाजी ने नहीं अंकल जी ने दिया-“मरती है तो मर जाए हमें क्या?”

पर कुछ महीनों बाद लवली का फोन आया कि वो लौट रही है। उसने खुलासा किया कि रौनक पाजी इन महीनों में थक और टूट से गए हैं। आस्ट्रेलिया में काम दिलाने के चक्कर में बहनोई कई बार रुपये ऐंठ चुका है और अब टालमटोल कर रहा है।

“देख ले भई इधर हालत ठीक नहीं है। इंडिया के ड्राइवर को काम मिलना जरा मुश्किल हो गया है और मिल भी गया तो बड़ा खतरा है। इधर के बंदे चिढ़ते हैं इंडिया वालों से। आए दिन मार-पीट हो रही है। जैसे धरम के नाम पर कतल होते हैं न कुछ वैसा सा हाल हो रहा है। हम जैसों को जब रात की शिफ्ट मिलती है तो वाहेगुरू का नाम लेकर निकलते हैं घर से। कितनों को तो लोग अनजान जगहों में घेर लेते हैं और टैक्सियां बर्बाद कऱ डालते हैं। दाढ़ी देखी नहीं कि आतंकवादी समझ लिया। जान और माल दोनों का खतरा तो हरदम लगा ही रहता है। तू अभी रुक जा भाई। हालात ठीक होते ही बुला लूंगा तुझे।”

बाहर के हालात ही नहीं रौनक पाजी के लिए भाई के घर के हालात भी ठीक नहीं रहे थे, लवली ने खुलासा किया-

“रौनक की भाभी ने भी शुरू में तो कुछ दिन का चक्कर समझकर संभाल लिया। उसे लगा रौनक के साथ उसके अपने बेटे की नाव भी पार लग जाएगी। जैसे- जैसे समय गुजरने लगा और बाहर जाने के दरवाजे बंद होने लगे फिर तो खाने को भी तरसा दिया इनको। न साफ कपड़े दिए पहनने को, न समय पर खाना। मांगने पर ही खाना देती थी। और फिर बच्चों की याद ने तोड़ दिया था इनको..।” लवली बोल रही थी और मीता की आंखों के सामने लवली की कर्मठ छवि साकार होती जा रही थी। हर चीज का समय से ध्यान रखने वाली सुघड़ छवि।

“मैं वापस आ रही हूं मीता पर अपनी शर्त पर..अब पापा जी को साथ नहीं रखूंगी। मेरा घर दोबारा बसने से सबसे ज्यादा दुखी वो ही हैं। गुस्से में जमीन भी रौनक के बड़े भाई के नाम करने की बात कह चुके हैं। वैसे वो खुद भी नहीं आयेंगे यहां? इनको भी बड़ी गालियां दी हैं।”

लवली आ गई वापस। पूरे सम्मान के साथ। बच्चों की कुदानें, लड़ाई-झगड़ों की आवाजें, लवली की डांट, रसोई के बर्तनों का रखना-गिरना, बाथरूम में धुलते कपड़ों की छप-छपाक, खिड़की-दरवाजों की खटर-पटर, टी.वी - मिक्सी की जुगलबंदी- सारी ध्वनियों ने एक बार फिर लवली का घर बसा दिया पर गायब थी तो उसके और रौनक के बीच की हँसी। लवली के लौटने के बाद भी बहुत कुछ अभी नहीं लौट सका था। सारे काम अपने समय पर थे पर इसरार, खटपट, छेड़छाड़, हँसी और मुस्कान की सरल तान कहीं खो-सी गई थी दोनों के बीच।

यही दिन थे जब जसविंदर अंकल परिवार के साथ यहां आ बसे थे। दुबले -पतले शरीर पर ढीला-ढाला कुर्ता पजामा पहने अंकल को दिन भर दौड़ते ही देखा मीता ने। कभी बाजार, तो कभी कोई बिल भरने ,कभी अस्पताल,तो कभी बेटे के बच्चों को स्कूल से लाने। आंटी घर संभालतीं और विम्मी पढ़ाई के साथ उनकी मदद करती। घर में एक जवान बहू थी पर वो कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती थी। उसका अपना तर्क था-“मेरी ज़िंदगी नरक बना दी इस शादी ने। पति का, पैसे का कोई सुख मिला कभी?” कड़वी जुबान और कलेश के खतरों के चलते अंकल-आंटी ने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया था। काम करे तो ठीक न करे तो ठीक। अंकल का खाली समय अक्सर गुरूद्वारे में बीतता।

“अंकल बड़े सीधे हैं लवली। कोई छल-कपट नहीं है उनके जीवन में।” मीता कहती तो लवली ऐसे-ऐसे किस्सों की पोटली खोल देती जिससे मीता को उसकी ही बात के अनगिनत प्रमाण मिल जाते।

“पापा ने हम तीनों बहनों को खूब पढ़ाया मीता। हम तीनों एम.ए. पास हैं। अकेले कमाकर भी हमें कमी न होने दी कोई। छोटा -सा ही सही एक घर भी बनवाया है पंजाब में। भाई पढ़ न सका तो उसे भी उसका मनमाफिक काम करने के लिए भेज दिया। कितने साल से खिला-पिला रहे हैं उसके परिवार को। आज तक कुछ मांगा नहीं उससे। और भाभी के साथ निभाना तो उनकी ही हिम्मत है। यही कहते रहते हैं-” पराए घर की लड़की को दुख देने नहीं लाए हम। शादी होकर भी अकेली है,जीने दो जैसी उसकी मर्जी।”

अपने पापा की तारीफ करते न अघाती लवली को उनसे एक सीधी शिकायत भी थी कि इतना पढ़ाने के बाद भी वो अपनी लड़कियों को रोज़गार से न जोड़ पाए। पढ़ाई पूरी होते ही दो लड़कियों की शादी कर दी। और परिवार भी कैसे ढूंढे जहां लड़के, लड़कियों से शिक्षा में कमतर थे। उन परिवारों के लिए उनकी शिक्षा का जैसे कोई महत्त्व ही नहीं था। लवली को तो ऐसे हालात में भी पति का प्यार नसीब हो गया था पर रानो की हालत तो बहुत खराब थी। उसका पति महीनों- महीनों घर बैठा रहता। रानो ही छोटे-मोटे काम करके घर चलाती। घर उसका अपना था पर कल का कोई ठिकाना नहीं था। जब कभी पति कुछ महीने कमाकर लाता तो एहसान जताता हुआ ठाठ से खाता। उसके लापरवाह नजरिए से आजिज आकर सगे मां-बाप ने भी नाता तोड़ लिया था उससे। अलग-अलग घरों में बैठी ये दोनों बहनें अल्पशिक्षित से अशिक्षित-सी श्रेणी में सरका दी गई थीं और विवाह के बाद से ही रुपये-पैसे की भी मोहताज रहीं।

“अब विम्मी की शादी जल्दी नहीं होने दूंगी मीता। उसकी किस्मत हमारे जैसी नहीं होगी। देखना तू।”

लवली के सारे प्रयासों के बाद भी विम्मी को एम¸.ए. और कोई डिप्लोमा होते हुए नौकरी करने की छूट नहीं मिली। हां, अंकल ने लड़का इस बार ठोक-बजाकर देखा। खूब जमीन-जायदाद वाला प्रवासी भारतीय जो वर्षों से एक हिंदुस्तानी रेस्त्रां चला रहा था जॉर्जिया में। भरोसा इसलिए भी था क्योंकि ये रिश्ता केवल इंटरनेट या किसी विज्ञापन एजेंसी के जरिए नहीं ढूंढा गया था बल्कि लड़के का परिवार जसविंदर अंकल का परिचित था और वो भी पंजाब में उनके अपने घर से कुछ घंटों की दूरी पर। फिर शर्त भी साफ थी कि विम्मी को भी जल्द से जल्द लड़का अपने साथ ले जाएगा। विम्मी अपनी भाभी जैसा एकाकी और अभिशप्त जीवन नहीं जिएगी। बस फिर क्या था कुछ दिन बाद सब पंजाब रवाना हो गए। शादी अंकल ने अपने घर से ही की। इस शादी ने एक बार फिर लवली और रौनक पाजी को नज़दीक ला दिया और दोनों के मुस्कुराते चेहरे तरल प्रेम की मुग्ध नदी में दिखने लगे।

मीता की आंखों के आगे सारी घटनाएं एक-एक करके साकार हो गईं। उनके घर के सदस्य की तरह ही जुड़ी रही थी मीता। लेकिन उसी साल लवली को घर खाली करना पड़ा। मकान-मालिक को खतरा था कि इतने वर्षों से यहां किराएदार के रूप में रहने के कारण मकान पर कब्जा न हो जाए। निकालने का रास्ता भी आसान था-

“देखिए मकान तो हमने सुखबीर जी को दिया था। अब वो यहां नहीं रहते और नये कान्ट्रैक्ट के मुताबिक किराया आज के रेट से बढ़ेगा। आप देख लो।”

रौनक पाजी जान गए थे कि अब यहां गुजारा मुमकिन नहीं। अकेले कमाने वाले इंसान के लिए दो बच्चों की पढ़ाई के साथ घर चलाना यों भी मुश्किल था फिर इस समय के हिसाब से बढ़ा हुआ किराया दे पाना उनके बस की बात नहीं थी। मीता और लवली बेचैनी में एक-एक दिन का हिसाब जोड़ने लगीं। अगला महीना खत्म होने में कुछ ही दिन बाकी थे। दोनों रोज़ घंटों बतियातीं जैसे आने वाले दिनों में रोज न मिल पाने का कोटा पूरा कर रही हों। सामान बांधते हुए सुख-दुख की दोनों सहेलियां कई बार रो पड़तीं, कभी अतीत की गलियों में बिंदास दौड़तीं और फिर वर्तमान की चौखट पर पस्त होकर हांफने लगतीं। हांफते हुए भी आने वाले कल के ख्वाब बुनतीं-

“हम बात रोज़ करेंगे और महीने में एक बार जरूर मिलेंगे।”

योजनाएं अगर ख्याल की शक्ल जितनी ही आसानी से मूर्त हो जातीं तो जीवन कितना प्यारा और निश्चिंत होता। पर शुरूआत में वादों को मुस्तैदी से निभाने वाली इन सहेलियों के फोन भी जन्मदिन, सालगिरह तक सीमित हो गए और मिलने के नाम पर दिवाली की रस्म अदायगी वाली मुलाकात ही रह गई केवल। पिछले कुछ समय से वो भी नहीं रही। जसविंदर अंकल की मौत की खबर ने एक भरेपूरे अतीत को दिखाने के साथ उस इंसानी फितरत का चेहरा भी नुमायां कर दिया जो आंख ओझल, पहाड़ ओझल की तर्ज पर सबसे उदासीन-सी होकर आत्ममग्न हो जाती है। रिश्तों के इस ग्राफ पर गहराई से सोचने के बाद मीता ने खुद को झटका। मौत के इस सच ने जीवन की क्षणिकता का दर्शन समझाकर जैसे उसे गतिमान कर दिया।

घर और बच्चों की सारी व्यवस्था करके मीता और रोहित लवली के घर पहुंच गए। दूसरी मंजिल के घर के बाहर ही दरवाजे के ऐन सामने जूते-सैंडिलों के बेतरतीब झुंड ने बता दिया कि ठीक समय पर पहुंचने की कोशिश विफल हो चुकी है। कमरे के फर्नीचर को अंदर के कमरों में धकेलकर सिमटा दिया गया था। किराए के गद्दों पर बिछी सफेद चादरों पर लोग बैठे थे। सामने गुरूद्वारे का ग्रंथी पाठ कर रहा था। लवली को मीता ने पीछे से पहचाना। कितने दिन बाद देखा मीता ने उसे। मन में सोचने लगी ऐसे ही मौके बदे हैं क्या मेल-मिलाप के? हम क्या इसी इंतजार में रहते हैं कि दुर्घटनाएं हमें जोड़ने का कारण बनें। बचपन से दी गई सीख सामने आ गई- “सुख में नहीं पर दुख में शामिल ज़रूर होओ।” मीता आज समझ सकी थी कि सुख में शामिल होना भी कितना ज़रूरी है।

मीता को रानो तो दिख रही थी पर आंटी और भाभी नहीं दिख रहे थे । रौनक पाजी काम में व्यस्त थे और फुर्सत पाते ही किसी तगड़े से सरदार से बतिया रहे थे जिसकी दाढ़ी बेपरवाह सी हालत में हवा के रास्ते झूल रही थी। रोमी का निकल आया कद और भींगी मसें गवाह थीं दोनों परिवारों के बीच बरसों की दूरी की। पाठ और लोगों से जरा ध्यान हटा तो मीता ने देखा कमरे में स्पिलिट एसी लगा है और चमचमाता डबलडोर फ्रिज भी अपनी पूरी शान से खड़ा है। घर छोड़ते समय तो एक पुराना- सा फ्रिज ही था लवली के पास और दो कूलर। ये नया परिवर्तन उसकी बेहतर माली हालत का संकेत था। पाठ के बाद लोग की छंटती भीड़ से निकल जब लवली दोनों के सामने आई तो रोहित के गले लगकर रो पड़ी।

“पापा चले गए वीर जी”

निशब्द रोहित की आंखें मीता की तेज रूलाई के साथ भींग गईं और रोहित का हाथ अपनी पूरी कोमलता और ढेर सारे स्नेह के साथ लवली के सिर को सहलाता रहा। इस एक क्षण ने लंबे समय की सारी दूरी पाट दी। रिश्ते फिर उसी ऊर्जा और तरलता से भरपूर हो गए। दुख अपनी जगह रहा पर माहौल के संयत होते ही पता चला कि लवली के भाई के अलावा और कोई नहीं आया पंजाब से। रौनक पाजी के साथ खड़ा आदमी कोई और नहीं लवली का भाई ही था जो सालों से कनाडा में छिपछिपाकर गाड़ी चला रहा था क्योंकि वर्क परमिट की तय मियाद कबकी पूरी हो चली थी। पकड़े जाने का खतरा सूंघकर भाग जाता था कहीं और। जस्सी या जसजीत जिसने अंकल के जीते जी एक रुपया न भेजा। अंकल बेटे का सुख जाने बिना ही चले गए तो कमाऊ पूत के सुख की कल्पना ही क्या करते।

पाठ के बाद कुछ समय बीता तो रोहित चलने की कहने लगे। इस पर लवली अड़ गई- “वीर जी मेहमानों की तरह आए हो क्या?”

“शाम हो रही है,बच्चे अकेले होंगे घर में लवली..” रोहित के अधूरे से शब्दों का सिरा थामते ही लवली मीता की ओर देखते हुए बोली- “तो आप चले जाओ ये कल आ जाएगी। ढेर सारी बातें करनी है इससे।” मीता घर से चलते समय लौटकर करने वाले सारे कामों की फेहरिस्त बनाकर चली थी पर लवली के इसरार से वो लिस्ट पुर्जा-पुर्जा हो गयी। आंखों की हरकत से उसने रोहित को समझाकर लौटने की बात कह दी। रानो, रोमी और पाजी काम में लग गए, लवली का भाई टी.वी खोलके बैठ गया और दोनों सहेलियां कमरे के एक कोने में सिमट गईं।

“अंकल जी के साथ अचानक ये सब कैसे लवली?” मीता ने पूछा।

“बस हादसे अचानक ही होते हैं न। अच्छे भले विम्मी से मिलकर लौट रहे थे कि सामने से आती गाड़ी ने टक्कर मार दी। इलाज भी चला पर...। उनके जाने से मम्मी बहुत टूट गईं हैं।” मीता को याद आ गए वो दिन जब लवली के मकान खाली करने के बाद जसविंदर अंकल भी चले गए थे घर खाली करके। जाने से पहले पंजाब जाकर अपना घर ढंग से बनवाया फिर वहीं से विम्मी की शादी की। बेटा शादी में भी शामिल नहीं था। लवली कनखियों से भाई की ओर इशारा करके फुसफुसाई- “देख शादी में नहीं आया। बहाना मार दिया हमेशा की तरह पर कुछ दिन बाद ही चला आया। वहां पकड़े जाने के खतरा बढ़ गया था और भारत से गए कई टैक्सी ड्राइवरों ने इकट्ठा होकर अपनी सुरक्षा के लिए वहां धरने-प्रदर्शन कर दिए। ये हरकत वहां लोगों को रास न आई। फसाद बढ़ गया। गुस्से की आग में एक दिन इसे घेर लिया था वहां के बंदों ने। मुश्किल से जान बचा के भागा। अब तो रौनक भी शुक्र मनाते हैं जो होता है अच्छे के लिए ही होता है।”

मीता महसूस कर पा रही थी कि लवली के मन में भाई के लिए राई-रत्ती प्यार नहीं था। पहले एक चिंता रहती थी उसके बाहर रहने और बढ़ते खतरों की वो भी अब खत्म हो गई थी। और हो भी क्यों बहनों की छोड़ो उसने जीते-जी अंकल जी को कभी नहीं पूछा। लवली कभी माफ नहीं कर सकेगी उसे?

“वो तो पापा जी की मिट्टी को इसने ही हाथ लगाना था, तो हालात कह ले या पापा के पुण्य कि ये आ गया यहां। पाठ में भी इसलिए आ गया कि कोई काम था यहां इसका।” टी.वी. की आवाज तेज़ हो गई थी जसजीत को न मीता -लवली की बातों से फर्क पड़ रहा था न माहौल से।

“दी, आप लोग अंदर बैठ जाओ न आराम से।” रानो के शब्दों ने सही राह सुझाई।

अंदर सोने वाले कमरे में पलंग को देखकर मीता को हैरानी हुई। आधे पलंग पर स्टेशनरी की दुकान सजी हुई थी। पेन, पेंसिल, कॉपी, रंग, फाइलें कुछ ज्योमेट्री बॉक्सेज़ , बस्ते आदि। कमरे की दीवार पर लटके लकड़ी के रैक में भी इसी तरह का सामान था। इससे पहले कि वो कुछ पूछती लवली ने खुद ही बता दिया- “मैंने अपना काम करना शुरू कर दिया है मीता।”

लवली ने विस्तार से बताया कि यहां आकर संघर्ष और भी बढ़ गया था जीवन का। अकेले की कमाई पहले भी कम थी और यहां आकर कम से कमतर हो गई। बच्चों की स्कूल की फीस अचानक बढ़ा दिए जाने के साथ किराए के मकान से स्कूल की दूरी के कारण बस के किराए का बोझ भी जेब काटने लगा। फिर सिम्मी को पर घंटे के हिसाब से साइंस और मैथ्स की कोचिंग भी चाहिए थी । पहले पापाजी कभी-कभी किराए-विराए में मदद भी कर दिया करते थे अब तो वहां भी पूरी तौर पर निराशा थी। आड़े वक्त के लिए जोड़ी बचत का सहारा भी जब टूट गया, जीना मुहाल होने लगा और जरूरतें आसमान हो गईं तो लवली ने कोई और उपाय न देख ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया।

“मैं नई थी मीता कौन देता मुझे मौका? यहां तो हर फ्लैट में ट्यूशन का ही काम चल रहा है। सबके पुराने बच्चे थे और मैं एकदम नई और बड़ी क्लास तो मैं यों भी पढ़ाने लायक नहीं थी न। फिर यार कोई भी चीज आसानी से मिली कहां है मुझको? रौनक को लेकर डर भी बैठ गया था कि कहीं फिर न चल दे हमें छोड़कर ?”

“फिर कैसे साधा तूने?”

“मीता मैं कोई प्रोफेशनल ट्यूटर तो थी नहीं सो पहले दो बच्चे जो मिले उन पर खूब समय लगाया। एक घंटे की बजाय मैं डेढ़ -दो घंटे का समय देती थी उन्हें। सिम्मी फ्री होती तो उससे टेस्ट पेपर बनवाती। काम जमने में साल भर लगा। इनके पापा को पता चला तो बहुत मजाक उड़ाया उन्होंने मेरा। पर साल भर में जब बच्चे अच्छे नम्बरों से पास हुए और उनकी मांओं ने मेरे काम की तारीफ की तो नाम-काम दोनों होने लगे। धीरे-धीरे बच्चे बढ़ने लगे। मेरा दिमाग भी चलने लगा तो सोचा क्यों न घर पर ये सामान रख लूं। इनके लिए बच्चों को रोज मार्किट दौड़ना ही पड़ता है। ये काम चला तो यहीं पड़ोस के छोटे-मोटे स्कूलों को ज़रूरत मुताबिक स्टेशनरी भी देने लग पड़ी। टाइम अब भी सबसे ज्यादा देती हूं बच्चों को और फीस मेहनत की लेती हूं। बस धीरे-धीरे जीवन को संवार रही हूं।... अब नहीं जा सकेंगे तेरे पाजी कहीं बाहर।”

“तो अब सेल्फ एम्प्लॉयड हो गई तू।” मीता का कथन ऊपर से भले ही छोटा था पर उसमें लवली के लिए गहरा आदर भरा था। कितनी सूझबूझ से उसने जीवन की राह निकाली थी अपने लिए। पति का असंतोष, बच्चों के सपने और अपने भीतर के तमाम डर सभी को एक साथ साध रही थी। इतने में रानो भी चाय लेकर आ गई।

“अब क्या कर रहा है तेरा भाई?” मीता, लवली की ओर मुखातिब हुई।

“कुछ नहीं बड़ी-बड़ी डींगे हांकता है बस। पड़ा रहता है रानो के पति की तरह। दिख रहा है पापा का घर और जोड़ा रुपया तो क्यों करे काम? मानती हूं उसने भी बहुत सहा होगा वहां पर अब... कहता है दुकानें डालेगा घर के हिस्से में। सारी जिंदगी उसने कब सीखा घर की जिम्मेदारियां संभालना? ये भी पता नहीं कब तक टिकेगा यहां? बस भाभी को सुख दे दे उसके हिस्से का और मां का हौसला बनके साथ रहे। पापा का रुपया-पैसा सब ले लिया है इसने। लाख मना करने पर भी पापा जी ने जाने से पहले मेरे और रानो के नाम थोड़ा पैसा अलग से जमा करवा दिया है। विम्मी की हालत तो अच्छी थी ही इसलिए उसने अपने हिस्से की रकम हम दोनों के बच्चों के नाम करा दी है, उनकी शादियों में देगी। जस्सी को कुछ नहीं पता है इस बारे में।”

“विम्मी कैसी है लवली?” आज बातों का सिलसिला रतजगा करवाएगा ही इसलिए एक-एक शख्स अपने इतिहास से वर्तमान में आने लगा।

लवली ने एक ठंडी सांस लेकर बोलना शुरू किया- “पूछ मत यार उसकी जिंदगी भी भाभी जैसी हो गई थी। रोते थे पापा अकेले में उसके लिए। साल में रवींदर आता पर कुछ ही दिन के लिए। हर बार कहता-’ अब ले जाएगा तब ले जाएगा।’ दो बच्चे भी हो गए। जब भी आता विम्मी के लिए कपड़ों का मैला ढेर और उसकी रातों को छीनने ही आता। सब कुछ होते हुए पति की गैरमौजूदगी और लारों से परेशान विम्मी भी उकता गई थी उससे। पता है उसका आना मुसीबत लगता था उसे। रात-दिन का चैन हराम, क्यों रानो बता न...।”

“हां दीदी रविंदर पाजी को छूने भी नहीं देती थी और बीच में छोटे काके को सुलाती थी हरदम। और काका भी ऐसा चंट हो गया था कि रविंदर के विम्मी को छूते ही चीखना-रोना शुरू कर देता । बड़े वाला तो नफरत ही करने लगा था अपने पापा से। ‘न छूना मेरी मम्मा को’ साफ कह देता। फिर पापा ने रट पकड़ ली कि अब सबको लेकर ही जाना होगा। बड़ा बवाल मचा घर में पर विम्मी अब चली गई दीदी। इतने साल में अपने घर। पर मेरा हाल तो वही का वही है। इनमें सुधार न होना था न होगा। बस मेरे लिए मेरी ताकत लवली दी और रौनक पाजी हैं।” कहकर रानो जी खोलके हँसी। साथ बैठकर हमने उसके पति की कमरतोड़ अंग्रेज़ी की पुराने दिनों जैसी चर्चा की और उसके न सुधरने वाले निकम्मेपन के किस्सों को जी भर कर जिया। कितने रंग साथ चल रहे थे इस बात-चीत में ,दर्द की कितनी सतहें। कुछ आज भी भींगी थी तो कितनी खुश्क होकर कड़ी धरती हो गई थीं जिनके दुख न रुलाते थे, न टीसते थे।

मीता ने महसूस किया कि जिंदगी के गमों -तकलीफों के बीच खड़ी लवली एक-एक ईंट जोड़कर घर को संवार रही थी। उसे अपनी मेहनत पर भरोसा था और मेहनत तो उसे ताउम्र करनी ही थी। आजकल खुद से चुने गए काम करने में चुनौतियां कई हैं। यहां तो आप नौकरी के तय घंटों से भी अधिक व्यस्त रहते हैं फिर हर रोज़ तेजी से बदल रहे हालातों में निरंतर नया बनने, साबित करने की उधेड़बुन भी क्या कम है?

“चल अब तो पाजी नहीं न लड़ते तुझसे उन दिनों की तरह?” मीता ने पूछा।

“अब फुर्सत कहां है उन्हें। दूध की एजेंसी दिलवा दी है उन्हें। साबुन वाला काम छोड़ दिया। अब अपना काम है जिसमें मेहनत अपनी और कमाई भी अपनी। किश्तों पर दूध की गाड़ी भी ले ली है मीता। दूध बर्बाद भी होता है कई बार और नुकसान भी होता है पर ये तो धंधे का उसूल ही है। नफा-नुकसान लगा ही रहता है। अभी तो काम जमने में टाइम लगेगा और कर्ज समेत खर्चे भी कम नहीं हैं हमारे पर हम अपनी सच्ची कोशिश कर रहे हैं जीवन के लिए।”

“एक के बाद एक खबर देकर हार्टफेल न करवा देना तू मेरा” मीता बोली। उसे यकीन ही नहीं आ रहा था कि वही लवली है जो एक दिन रात में घर से निकाले जाने के बाद सड़क पर आ गई थी।

“फुंक के जल मत। इतने साल बाद भी उसी हालत में मिलती तो क्या तुझे खुशी होती? अब तेरे पाजी मान गए हैं मेरा लोहा। मेहनती तो पहले ही थे जब से अपना काम हुआ है बहुत खुश रहते हैं। शुरू में झिझके पर अब भरोसा जाग गया है। अपनी मेहनत के बूते बच्चों के लिए हम खड़े हैं , ऐसे में गिरेंगे भी, चोट भी खांएगे, थकेंगे भी पर चलते रहेंगे। बच्चों का जीवन बनाना है फिर अपने घर का सपना भी पूरा करना है मुझे।”

“गुरू लवलीदेव हमें भी कोई मंत्र देव ।” मजाकिया लहजे में मीता बोली। खाना खाने के बाद भी रात न जाने कितने किस्सों में काली हुई। पर दिन को निकलना ही था मीता को जाना ही था। अंकल जी के बहाने से दो बिछड़ी दोस्त फिर एक हो गई थीं।

“देख भई मीता इस बार जा रही है तो गांठ बांधकर जा कि तू आती रहेगी। सालों के लिए गायब न हो जाना अब।”

“और तू भी तो बांध लेना गांठ जरा...माना तू बड़ी बिजी है पर हमारा भी कोई हक है न तेरे कीमती टाइम पर।”

रात ने एक करवट में न जाने कितनी खुशनुमा सुबहें भर दीं दोनों के बीच। चलते-चलते दोनों फिर गले लगीं। भींगी आंखों में न कोई तकलीफ थी न कोई दूरी।

कायदे से कहानी यहां खत्म हो जानी चाहिए पर चलते-चलते एक घटना और जोड़ लीजिए।

मिलने-जुलने,फोन करने का सिलसिला इस बार जो चला तो चलता ही गया। लवली कभी मीता के घर तो कभी मीता लवली के घर और कभी दोनों कहीं बाहर अक्सर मिलने लगीं। ऐसा नहीं था कि दोनों की ज़िंदगियों के अपने-अपने दुख और संघर्ष शेष नहीं थे पर उस साथ से मिलने वाला हौसला और खुशी सब पर हावी थी। अपने लिए अपने से ही निकाली गई इस फुर्सत ने उन्हें फिर बड़े सवालों से उलझती ज़िंदगियों से निकालकर कुछ वक्त के लिए ही सही बेपरवाह लड़कियों की तरह बना दिया था। ऐसे ही एक दिन लवली के घर पहुंचने पर नीचे से दिखती उसकी बालकनी में लवली पीठ किए बैठी दिखी। माहौल सितार की धुन से सराबोर था और सितार का ऊपरी हिस्सा उसके कंधे और गर्दन के बीच से झांक रहा था। पूरी तौर पर नहीं पर हरकत करती उसकी उंगलियां न दिखाईं देकर भी महसूस हो रही थीं। मीता चकित थी इतनी जल्दी तो नहीं सीख सकती लवली इतना अच्छा सितार बजाना। फिर कब? कैसे? ये केवल सरगम नहीं थी कोई पक्का राग था। यादों से धूल झाड़ते ही सुराग मिल गया उसे, संगीत में एम.ए. किया था मीता ने। उसके ससुर कहते थे न-“एम.ए. नहीं एवैंइ किया है इसने।”

उसने मीता को कभी ये नहीं बताया कि सितार उसका वाद्य रहा है शायद इसीलिए कि डाल दिया गया होगा किसी कबाड़ में उसे निरर्थक मानकर। तोड़ दिए गए होंगे उसके तार लवली का संगीत छीनने को। फेंक दिया होगा मिज़राब उसे असुविधा के बीच धकेलने के लिए, तोड़ दी गई होगी उन हाथों की हिम्मत और कुचल दिए होंगे मन के सारे अरमान, उसे अशिक्षितों की पांत में खड़ा करने के लिए। वही लवली अपमान और कुंठा के सारे किले ध्वस्त करके हौसलों के पंखों पर सवार, ढूंढकर निकाल लाई अपना टूटा हुआ सितार। एक-एक करके जोड़ती गई सारे तार। मिज़राब तो फिर भी कहीं न मिला पर उंगलियों की हिम्मत उसके हुनर के ज़िंदा होने का सबूत था और हवा में गूंज रहा संगीत उसका प्रमाण।

मीता ने सोचा आज कहीं नहीं जाएंगे, बस यहीं रुककर जीवन का सच्चा संगीत सुनेंगे दोनों साथ।

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