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कोकिला व्रत / कहानी / संजीव / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

संजीव

कोकिला व्रत

‘मिली?’ पचहत्तर वर्ष की बूआ उत्कंठा में उठ कर खड़ी हो गईं। साथ ही किरपाल की आई, जुगल की ताई और दूसरी औरतें भी। ये सभी बुजुर्ग थीं; बाकी प्रौढ़ा और युवतियाँ।

‘नहीं।’ सत्तरह साल के भतीजे गुड्डू ने जवाब दिया।

‘घर में तो मिलने से रही।’ जुगल की ताई को थोड़ा तैश आ गया।

‘घर में ...? क्या कहती हो ताई! अक्खा मुंबई छान मारा। जहां-जहां बूआ को ले जाया जा सकता था, सभी जगह।’

‘ठाणे के पहाड़ पर एक मंदिर है, वहाँ गए थे?’

‘वो शुक्ला जी का मंदिर? वहां बाघ आता है।’

‘तुमने चिड़ियाखाने में ढूंढा, माँ ने पूछा था? वहाँ तो मिलनी ही मिलनी थी।’

‘चिड़िया बेचनेवालों से भी पूछा- वे जो लालमुनिया, गौरैया, तोता, मैना, काकातुआ से मोर तक बेचते हैं, बोले, एक थी तो लेकिन सात दिनों पहले कोई सेठ ले गया।’

‘उस मुए सेठ को भी अभी ही ले जाना था!’ उदास हो गईं बूआ।

ताई ने चिड़ियाखाने की बात को फिर उठाया, ‘और चिड़ियाखाना?’

‘मुंबई में चिड़ियाखाना कहाँ हैं, हमें नहीं पता।’

‘अक्खा मुंबई ही चिड़ियाखाना है। मुंबई ही क्यों अक्खा देश और दुनिया भी। ’ यह गुड़िया थी जिसे छोड़कर सबने व्रत रखा था। सभी हँस पड़े।

‘और इस चिड़ियाखाने की तू रही कोकिला। मिल गई बूआ, मिल गई। उपवास तोड़ो।’ गुड़िया ने गुड्डू को मुंह बिराया, गुड्डू ने गुड़िया को।

बसंत बीतते न बीतते आ जाता है गर्मियों का मौसम। और फिर आता है कोकिला पर्व। पूरे अठारह बरस गिनने पड़ते हैं- एक-एक साल, एक-एक दिन, तब जाकर आता है यह कोकिला...’ आता है तो महीने भर रहता है। पेड़ों के नीचे घंटों खड़ी रहती हैं हम औरतें। पर मेरे जानते ऐसा तो कभी हुआ नहीं कि पर्व के समय कोयल दिखे ही नहीं।‘

‘पर यह कोयल ही क्यों बूआ?’ गुड्डी ने पूछा।

‘कोयल साक्षात पार्वतीस्वरूपा है बेटी। दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में सबको बुलाया पर अपने दामाद शिवजी को नहीं। न्योता न मिलने और पति के मना करने के बावजूद पार्वतीजी पिता के घर गईं। तभी पार्वतीजी जी ने यह कोकिला व्रत किया था। कोयल की तरह फरियाद करती रहीं- ‘क्यों, क्यों? क्यों? क्यों? यानी कोयल और पार्वती एक! पार्वतीजी के यज्ञ में जल मरने के बाद कोयल भी काली हो गई, झुलस कर। तबसे एक महीने तक व्रत के चलने का विधान है। दिन भर उपवास और शाम को कोयल की बोली सुनकर भोजन! इससे पति-पत्नी का प्यार अमर रहता है।’

‘तो इसका यह मतलब हुआ कि महीने भर कोयल ढूंढनी पड़ेगी?’

‘हाँ।’

‘महीने भर बाद?’

महीने भर बाद ब्राह्मण दंपति को को दान-दक्षिणा देकर भोजन कराकर इसका उद्यापन!’

माने तपस्या हम करें महीने भर और दान-दक्षिणा-भोजन ब्राह्मण दंपति को?’

‘ऐसा नहीं बोलते बेटा, पाप लगता है।’

गुड्डू के भैया प्रदीप भी कोकिला-संधान में असफल होकर लौटे तो उन्होने खीझ कर पूछा, ‘ये तो बताओ बूआ, आपको कोयल चाहिए या कोयल की बोली?’

‘बेटा कोयल होगी तभी तो बोलेगी?

‘मादा हो या नर?’

‘व्रत का नाम कोकिला व्रत है। पार्वतीजी भी औरत थीं तो मादा ही ठहरी न!’

‘उहूँ! पहले बताओ कैसे बोलती है आपकी कोकिला?’

‘कुहू-कुहू’ एक साथ सारे विशेषज्ञों ने अपना ज्ञान पेश कर दिया। घर कुंज बन गया।

‘कोयल सी तेरी बोली... कुहू-कुहू! कुहू-कुहू... गुड्डू अनिल कपूर बन गया तो गुड़िया ने राग भोपाली में देखो कोयलिया बोले अमवा की डार पर’ के द्वारा गुड्डू को आम की डाल पर ही चढ़ा दिया। बूआ के चालीस वर्षीय भतीजे प्रदीप ने गंभीर होकर पूछा’ तब बूआजी आप यह व्रत तोड़ दीजिये।’

‘क्यों बेटा?’ औरतों में खलबली मच गई।

‘अव्वल तो वह सुरीली बोली नर कोयल, माने कोकिल की होती है, मादा कोयल यानी कोकिला की नहीं। पार्वती वाली कथा में भी अनेक झोल हैं। थोपी हुई अज्ञानता को कब से ढोये जा रहे हैं हम? कथा गढ़ने में हमें कोई नहीं मात दे सकता। क्या कथा है! पार्वती जल मरीं और पार्वतीस्वरूपा माने गौरीरूपा कोयल अभी भी पिता से पूछे जा रही है क्यों? क्यों? क्यों? क्यों? मगर बूआजी यह क्यों-क्यों या कुहू-कुहू तो कोकिल बोलता है, न कि कोकिला। अब अगर कोकिला ही गलत हो गया तो कहाँ सार्थक रह गया कोकिला व्रत?’

महफिल में एकदम से सन्नाटा छा गया। कुछ पलों बाद सन्नाटा टूटा तो महिलाएं कचर-मचर करने लगीं।

बूआ ने याचना भरे स्वर में कहा, ‘यह तर्क नहीं आस्था का प्रश्न है। मेरी वर्षों से जमी आस्था को झमेले में न फंसाओ बेटे! कोकिल हो या कोकिला वह जो भी हो, ले आओ, मेरा मतलब है खोजो।’

‘ओहो! बूआ तुम समझती क्यों नहीं, वह कोई पैसों पर बिकी गायिका नहीं जो तुम्हारी आस्था के सवाल या कथा सुनकर पिघल जाये। तुम हमारे साथ चलो, जहां भी मिले, जहां भी बोले, देख-सुन कर अपने व्रत की मर्यादा को बचा लो’

‘चलो।’

गाड़ी में दादी समेत पाँच जन बैठे। ड्राइव प्रदीप कर रहे थे और गाइड कर रहे थे गुड्डू और बूआ। गुड्डू अपनी कनपटी पर बराबर दस्तक दे रहा था। ‘मैंने वाकई सुनी है कोयल की बोली। ऐसा करो, पवई चलो, वहाँ लेक पर बहुत सारे पक्षी आते हैं।’

पवई बीता, कोयल की बोली न सुनाई पड़ी।

‘अब गोरे गाँव।’ पेड़-पेड़ ढूंढा। कोयल न मिली।

‘गोरे’ ही नहीं न जाने कितने गाँव देखे जो कहने भर को गाँव थे। वहाँ कई-कई मंजिली इमारतें उन्हें डराने को खड़ी हो गई थीं।

‘अब कहाँ चलें बूआ?’ प्रदीप ने थके स्वर में पूछा।

बूआ खुद कन्फ़्यूज्ड थीं। कभी दायें बतातीं कभी बाएँ। अठारह साल पहले कोयल की बोली उन्होंने कहाँ सुनी थी? बूआ के लिए बैठी तो होगी नहीं, वह कोयल अबतक। अब आगे अरब सागर था।

‘रुको, रुको!’ अचानक बोल पड़ीं दादी, ‘यहीं कहीं होना चाहिए। यहीं समंदर था। तुम्हारी दादी भी थीं मेरे साथ। यहीं से लौटे थे तब वो पड़ा था।’

‘समुद्र तो जहां-तहां है मुंबई में।’

‘उधर आगे था जंगल।’

‘वहाँ तो बीस-बीस मंजिली बिल्डिंगें हैं।’

‘वहीं किसी से पूछो, पता चल जाएगा।’

बूआ को कौन समझाये!

एक टावर के बूढ़े माली को बुलाकर पूछा तो वह हमें खासा मूर्ख समझ बैठा। ‘आपलोग किसी निपट देहात से आए लगते हैं। अरे भई, अब कहाँ रहे जंगल! उन्हीं जंगलों को काट कर ही तो बिल्डरों ने ये टावर्स खड़े किए हैं।’ वह तनिक रुका, फिर बोला, ‘मगर आपको चाहिए क्या जंगल में?’

‘कोयल! वो आज से व्रत शुरू हो रहा है न, कोकिला व्रत!’ गुड्डू ने कहा।

‘लेकिन यहाँ कहाँ मिलेगी कोयल?’

बूआ कहती हैं, अठारह साल पहले यहाँ के किसी जंगल में उन्होंने कोयल की बोली सुनी थी।

आसपास के कुछेक सेक्यूरिटी गार्ड वगैरह आ जुटे। हमारी स्थिति पर सभी को तरस आ रहा था। कुछ तो हमारी मूर्खता पर मुस्कुरा भी रहे थे।

‘जलाल चाचा को बुला लाओ’ एक ने कहा।

जलाल चाचा! अस्सी को छूती उम्र। थोड़ी देर तक सुनते रहे सहलाते हुये अपनी सफ़ेद दाढ़ी फिर बोले, ‘आपकी बूआ गलत नहीं हैं।’

‘माने?’

‘माने यहाँ हुआ करती होगी कोयल।’

‘होगी माने?’

‘मैं तब यहाँ गार्ड था। जंगल और पेड़ों को काट कर, झुग्गियों को पाटकर ये टावर खड़े हो रहे थे। मेरे देखते-देखते वे आबाद होते गए। अब लोग यहाँ देर रात दफ्तरों से लौटते। देर से सोते। देर तक सोते। एक दिन रात 3-4 बजे एक कोयल उधर वाले टावर पर आकर बोलने लगी। नींद में खलल पड़ी तो वहाँ से लोगों ने भगाया। वहाँ से भागी तो इस टावर पर आकर बोलने लगी। यहाँ से भगाई गई तो उड़ गई। यह वाकया दूसरे दिन भी हुआ तो मैंने खुद देखा वह जहां-तहां टकरा रही थी। वो टावर बन रहा था। जहां तहां रोड, जहां तहां बिजली के तार। कभी फड़फड़ाती हुई इधर, कभी टकरा कर उधर। बीच बीच में कूक- कहाँ-कहाँ’। करंट खाकर मर गई या खुदकुशी कर ली, जो भी मान लो। मुमकिन है यहीं कहीं उसका पुराना आशियाना रहा हो।’ जलाल की आवाज़ भारी हो रही थी। ‘वह इस इलाके की आखिरी कोयल थी। उसके बाद फिर कभी किसी कोयल को कूकते हमने नहीं सुना यहाँ।’

‘कैसे पत्थरदिल हैं यहाँ के लोग मियां जिन्हें कोयल की बोली भी नहीं सुहाती!’ किरपाल की आई ने कहा।

‘वो क्या है न बहिनी, देर रात थके-मांदे आते हैं लोग। सोयें या कोयल की बोली सुनें! अगले दिन फिर काम पर जाना है। शायरी नहीं करनी।’ एक रोबीले दरबान ने हस्तक्षेप किया।

उदास बूआ को लेकर गाड़ी आगे बढ़ी। जिधर भी जाओ राह रोक कर खड़ी ठट्ठ की ठट्ठ वही ऊंची-ऊंची बिल्डिंगें और उनके बीच से लाखों गाड़ियों, ट्रेनों, वाहनों का हुजूम। आखिर में वे हीरानन्दानी भी गईं, जहां उनकी उम्मीदों की आखिरी कोयल बसती थी। पर कहाँ! जलाला की उस आखिरी कोयल की तरह हर टावर से टकरा-टकरा कर घायल हो गई बूआ की नज़र!

‘घर चलें बूआ?’ प्रदीप ने पूछा, ‘शाम होनेवाली है।’

‘घर...?’ बूआ की आवाज़ कैसी तो भखरा गई थी। ‘उसे तुम घर कहते हो? वो पिंजरा है, पिंजरा। कंकरीट के पेड़ पर लटका हुआ एक पिंजरा। उस पिंजरे में कोयल या सुग्गे की तरह कैद हो तुम सब। रही शाम की बात, तो मेरी ज़िंदगी की शाम हो चुकी। अब और किस शाम से डरा कर उस पिंजरे में टाँगने की तसल्ली दे रहे हो तुम?’

घर हो या पिंजरा, जैसे तैसे उन्हें मना कर ले आया गया फ्लैट में।

पूड़ी-खीर, सब्जी, फल-वल की थाल सजा कर उनके सामने कर दिया गया। बाकी औरतों के भी।

‘मैं सिर्फ फल लूँगी। मेरा व्रत अधूरा है।’

‘नहीं, बूआजी नहीं,’ नारद मुनि की तरह ऐन वक्त पर प्रकट हो गए पंडित जी।

‘आप खुशी-खुशी उपवास तोड़ सकती हैं, बूआजी।’

‘मगर कोयल की बोली... और माटी का दीया?’

‘सारा इंतजाम हो गया है। वही नहीं, और भी बहुत कुछ। आपकी तपस्या का ही फल है कि टावर्स के बिल्डर्स की ओर से ग्यारह हजार रुपये भी आए हैं, कोकिला व्रत अनुष्ठान के लिए।’

बूआ तनिक अचकचायीं तो पंडित जी ने स्पष्ट किया, ‘कोइलिया उन्हीं के बिजली के तार से करंट खा कर मरी थी न!’

‘उन्हें याद था?’

‘वो जलाल मियां ने बताया न!’

‘बड़े धर्मप्राण लोग हैं!’ सबकी आँखें विस्मय से फैल गईं।

‘अरे उन्हीं जैसे धर्मात्माओं के ऊपर तो देश टिका है। वो तो कहिए की टाइम न था नहीं तो सोने की कोयल बनवा कर बाकायदा कोई अनुष्ठान करते।’

पंडित जी ने ग्यारह हजार रुपयों का पैकेट थमाते हुये एक और राज की बात बताई, ‘अब जलाल मियां तो मियां ठहरे लेकिन उनको भी आपके इस व्रत ने हमारे रंग में रंग दिया। यह कम बड़ी जीत है!’

गुड्डा भागा-भागा आ रहा था। बोला, ‘बूआ। मीडिया वाले खड़े हैं बाहर। यह सबसे बड़ी जीत है। बड़ी से बड़ी घटना-दुर्घटना पर भी नहीं आते। वे आपके कोकिला व्रत को कवर करने आए हैं। आपलोग अपने-अपने लुक पर ध्यान रखना।’

थोड़ी देर में सारा इंतजाम पूरा हो चुका था।

छोटे से पिंजरे के अंदर से प्लास्टिक की कोयल झांक रही थी।

लैपटॉप में आभासीय प्रदीप झलमला रहे थे।

जिन्हें कोकिल-कोकिला का भेद तक नहीं मालूम वे पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। प्रदीप जैसे इक्के-दुक्के लोगों को छोड़कर दूसरों को भी नहीं मालूम है। पर चल रही है पूजा। सवाल ज्ञान और तर्क का नहीं, आस्था का है। मीडिया पूरी निष्ठा से इस महत्त्वपूर्ण समाचार को कवर कर रहा था। इस तरह इस आस्थावान धर्मप्राण देश में यह कोकिला व्रत सम्पन्न हो रहा था... माने बूंदी का एक और नकली किला फतह किया जा रहा था। सबसे चाँड़ थी मोबाइल के रिंग टोन की पंचम स्वर में कूकते कोयल की टेर, मानो उसकी आत्मा ही फट कर बाहर आने को हो - ‘कुहू-कुहू! कुहू-कुहू!’

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