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उदास अगहन / कहानी / उपासना / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

उपासना

उदास अगहन

दीया अनवरत जल रहा था। धीरे-धीरे आँखें कमरे की मटमैली, बेजान रौशनी की अभ्यस्त हो चुकी थीं। देवदत्त सिंह तख्त पर चित लेटे हुए थे। वृंदा ने एक बार फिर अँधेरे में आँखें धँसा कर देखा। दीये की पीली रौशनी में मच्छरदानी की बारीक बुनाई चमक रही थी। देवदत सिंह नींद में बाएँ हाथ से बार-बार कुछ परे धकेल रहे थे मानों। यद्यपि दिन भर की भागा दौड़ी से वृंदा बेइन्तहा थक गई थीं...पर वे खाट से उठीं। उनका संदेह सही था। मच्छरदानी में एकाध मच्छर भिनभिना रहे थे। उन्होंने चारों तरफ़ से मच्छरदानी झटक कर उसकी पट्टियों को फिर गद्दे के नीचे दबा दिया। देवदत्त सिंह गहरी नींद में थे। उनका मुँह खुला हुआ था. होठों के किनारे लार चमक रही थी। पचास के वय में ही कैसी देह हो आई थी? मांसविहीन चमड़ी पसलियों से चिपककर एक-एक बनावट स्पष्ट कर रही थी। दाहिना पैर कठुआया हुआ सा अलग-थलग पड़ा था। बेजान हाथ छाती पर था। घृणा से वृंदा का मुँह कसैला हो आया. घृणा इस देह से नहीं, इस आदमी के प्रति! पक्षाघात तो दो वर्षों से है न...घृणा तो आरंभ से, माँग बोहराई के वक्त से ही।

वृंदा खिड़की के पास चली आईं। मकड़ी के सघन जाले नीचे तक लटक आए थे। वृंदा ने उन्हें हाथ से चीर डाला. रात मनसायन दिख रही थी। अगहन का पूरा चाँद था। चाँद इतना सर्द था कि उसकी उसकी आँच से छाती में बलगम जम गया. स्मृतियों की रात खाँसते-खाँसते बेहाल! जग से पानी लेकर उन्होंने पिया तो कुछ राहत पड़ी।

तब वह तकरीबन दो सौ साल पुरानी महलनुमा हवेली क्या बियावान और भुतहा दिखती थी? अब तो कौवा भी पाँख फड़फड़ाये तो किसी अनजानी आशंका से होठ पपड़ा जाते हैं। वे दिन बरतन, पाजेब व सम्मिलित हँसी की खनखनाहटों से गुंजायमान रहते थे।

बेशक मयूर व बेलबूटों की नक्काशी से सजे खंभे व दीवारें जर्जर होने के कगार पर थीं, पर उनकी शान में कहीं कोई कमी न दिखती। गो कि बूढ़ी हो जाने के बावजूद किसी रानी के रुआब में बाल बराबर फर्क न आया हो। बाहर बड़ा मर्दाना बैठका था। चार खम्भों वाले आँगन के हर ओर कई कमरे थे। बूढ़ी अम्मा तख्त पर अधलेटी बड़बड़ा रही थीं। हीरा बो नाउन उनकी बड़बड़ाहट सुनती चुपचाप उनके हाथ-पैर मीसती रही।

पतोह उनकी एक अमानत थी। पति की सिर चढ़ी लाड़ली। देवदत्त सिंह यूँ तो बड़े कड़क मिज़ाज माने जाते, पर पत्नी के विषय में कैसे तो बाल सुलभ हो जाते थे। बचपन से किसी बहिन की कमी को जिस शिद्दत से उन्होंने महसूस किया था, मानों अपनी लरकोर पत्नी की ऊटपटांग माँगें व ज़िद पूरी करके सारी कसर निकाल लेना चाहते थे। पत्नी से महज तीन साल बड़े वे बुजुर्गों वाली समझदारी व गंभीरता ओढ़े मानों पत्नी को और-और बच्चा बने रहने की छूट दिए जाते। यूँ देवदत्त सिंह के परिवार की चर्चा कम न थी जवार में...पर फूलमती देवी के मायके का रुआब ही कुछ अलहदा था।

बात सिर्फ़ इतनी नहीं थी कि फूलमती के पिता राधाकिशुन सिंह सौ एकड़ ज़मीन के मालिक थे। बयालिस के स्वाधीनता संग्राम में वे जिले के समर्थ कांग्रेसी नेता के रूप में उभरे थे। पुणे में गाँधी जी नजरबंद थे। विरोध में जिलास्तर पर व्यापक हड़ताल का आयोजन किया गया. राधाकिशुन सिंह ने युवाओं व विद्यार्थियों के साथ टीम के भोंपू पर भाषण देते हुए जुलूस निकाला था। जनसभाएँ कीं। कई महीने जेल में भी रहे। इन्हीं सब कारणों से जिले में उनके धन से अधिक उनका सम्मान था।

फूलमती उनकी इकलौती (सिरचढ़ी) बेटी थी। रामकिशुन सिंह ने बड़ी धूम-धाम से उनका ब्याह किया. लाड़ली फूलमती ससुराल में भी उड़ी-उड़ी फिरतीं। सास भी बहुत दुलार रखतीं उनपर। फिर ये दुलार भरे दिन उड़ते-फिरते आठ साल हो गए। अब फुसफुसाहटें मात्र नहीं रह गयी थीं। गोतिया-पटीदार की औरतें आँखें धँसाकर मासिक धर्म के दिन गिनतीं। सास भी उलाहने देने लगी थीं। फूलमती कान न धरती उनपर...पर आखिर कब तक? सास पूरे वेग व क्रोध से छींटाकशी करने लगीं थीं। हँसकर टालने वाली फूलमती भी अब डटकर जवाब देने लगीं. किसी दिन जुड़ती-जुड़ती बातें काफ़ी आगे बढ़ गईं.

फूलमती रूठकर दाई को साथ लिए मझौली चली गईं. देवदत्त सिंह घर आए तो सारा हाल मालूम हुआ। वे हँस पड़े। सास-बहू का पुरातन झगड़ा कौन सुलझा सकता है? महतारी रोती रहीं. आश्वस्तिपूर्वक माँ की पीठ थपथपाकर उन्होंने हीरा हज्जाम को मझौली भेजा...फूलमती के गाँव. फूलमती की माँ एक तेज औरत थीं। उलटे पाँव हीरा को लौटा दिया।

-‘‘भार नहीं है हमारी बेटी, जो नउवा के साथ भेज दें. देवदत्त सिंह से कहना, आकर माफ़ी माँगें तभी बिदाई होगी!’’

हीरा हज्जाम भी क्या कम. जो देखा-सुना नमक-मिर्च बुरक कर परोस दिया। दुबारा हीरा को भेजा गया। देवदत्त अकेले हैं। दँवरी का समय है। सब सँभालना पड़ता है। वक्त नहीं मिलता। हीरा फिर मझौली से खाली हाथ लौटे। अब यह शान का प्रश्न हो गया था। देवदत्त सिंह ने आखिरी हिदायत के साथ हीरा को रवाना किया।

-कहना कि अबकी अगर फूलमती नहीं आईं, तो ठीक न होगा!’’

साँझ के घिरते झुटपुटे में देवदत्त सिंह चंद मुलाकातियों संग बैठे थे। मुँह लटकाए हीरा हज्जाम कोने में आकर खड़े हो गए।

-‘‘क्या हुआ?’’ देवदत्त सिंह ने परिचर्चा बीच ही में रोककर पूछा।

हीरा बड़ी बिचारगी से बोले...

-‘‘महाराज, उनकी माँ तो मुँह की बड़ी तेज हैं!’’

देवदत्त सिंह की भृकुटी टेढ़ी हो गई,

-‘‘जो भी कहा गया हरफ ब हरफ सुनाओ!’’

हीरा ने कंधे पर पड़ी गमछी से ललाट का पसीना पोंछा.

-‘‘देवदत्त सिंह अगर असल के जने हैं, तो दूसरा ब्याह कर लें। बिना माफ़ी बेटी बिदाई नहीं होगी!’’

बैठका में सन्नाटा छा गया. भीतर दरवाजे की ओट में कान काढ़कर खड़ी घर की औरतें, दाई-पहुनियाँ सन्न रह गईं।

शायद दरवाज़े की साँकल बजी थी। फिर कुछ देर चुप्पी रही। वृंदा को लगा कि संभवतः उन्हें मतिभरम हुआ हो। कुछ क्षण कान अड़ाये वे आहट टोहती रहीं। दुबारा धीमी आवाज में साँकल बजी। अब शक की गुंजाइश न थी।

-‘‘बड़ी जल्दी...आज तो!’’

खुद से बुदबुदाती वृंदा ने दीये की लौ से ढिबरी जलायी। दरवाज़ा खोलते ही तेज हवा के थपेड़ों से लौ कांप गई. प्रभुदयाल ने जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया।

-‘‘बादल छा गए हैं. बारिश हो कर रहेगी।’’

वे पैर धोकर ओसारे की खाट पर कथरी रजाई के बीच धँस गए। वृंदा बेआवाज रोटियाँ बेलती रहीं। प्रभुदयाल एकटक तवे पर फूलकर गोल होती रोटियों को देखते रहे। दो रोटियाँ सिंकते ही वृंदा ने थाली में सब्जी रोटी व हरी धनिया की चटनी परोस दी. वे चुपचाप चूल्हे के पास पीढ़े पर बैठ गए। चूल्हे की आँच से चट-चट की आवाज़ आ रही थी। चादर के बावजूद ठंढी हवा चुभ रही थी।

-‘‘बाबूजी सो गए हैं?’’

-‘‘हुम्म!!’’

प्रभुदयाल माँ को देखने लगे. वे क्या अन्य माँओं से कुछ अलग नहीं हैं? बचपन से ही उन्होंने प्रभुदयाल को कुछ चीजें पढ़ाईं-समझाईं और अपनी दी हुई शिक्षा के प्रभाव पर पूरा विश्वास भी किया, अन्यथा प्रभुदयाल कॉलेज के पश्चात् कहाँ जाते हैं? क्या करते हैं? किन लोगों से मिलते जुलते हैं...न इसकी जासूसी की, न तर्क किये। प्रभुदयाल अपने सिद्धांतों, पार्टी के सर्वहारा संबंधी विचारों, विवादों की चर्चा करते। वृंदा ने उनके प्रति सदा विश्वास और जिज्ञासा बनाए रखा।

माँ के कभी खेतों को सहेजने या लाभ जोड़ने की बातें नहीं सिखायीं। घर दुआर, खेत व पिता के स्वास्थ्य जैसी चीजें , जितना जो सम्भव था, वे स्वयं ही करती रहीं।

उन्हें याद है बचपन में घर पर प्रताप, साप्ताहिक हिंदुस्तान, वीर अर्जुन व कल्पना जैसी असंख्य साप्ताहिक-मासिक पत्र-पत्रिकाओं के पुराने अंक पड़े थे। उन्होंने घर में कभी किसी को पढ़ते नहीं देखा था, फिर कौन लाया है ये पत्र-पत्रिकाएँ?

-‘‘एक तुम्हारे चाचा थे। वही पढ़ते थे यह सब!’’

-‘‘तो...कहाँ हैं वो?’’

-‘‘गुजर गए।’’

-‘‘कैसे?’’

इस सवाल पर आँगन भर में सन्नाटा खींच जाता. सब तरह-तरह के कार्यों में व्यस्त हो जाते। बाद के दिनों में जैसे-जैसे प्रभुदयाल बड़े होते गए, इस सवाल का प्रभाव गहराई तक महसूसने लगे थे। फिर उन्होंने इसे अधर में ही छोड़ दिया।

तवा उल्टा करके वृंदा ने दीवार से टिका दिया. कठवत में पानी लेकर वे हाथ धोने लगीं।

-‘‘सब्जी बहुत चटक बनी है अम्मा!’’

वे तृप्ति से मुस्कुराईं। चूल्हे की आँच से उनका गोरा चेहरा लाल हो उठा था। आखिर कौर खाते हुए ही प्रभुदयाल ने उचक कर खाट से अपना थैला खींच लिया।

-‘‘यह लो तुम्हारा समाचार पत्र।’’

उन्होंने आँचल में हाथ पोंछकर पत्र थाम लिया। बूँदा-बाँदी शुरू हो गई थी। प्रभुदयाल अपने कमरे में चले गए। वृंदा ढिबरी की जर्द रौशनी में आँखें मिचमिची कर स्थानीय खबरों वाला पृष्ठ पढ़ रही थीं। एक बहुत पुरानी कविता छपी थी। ‘कुलदीप नारायण झड़प’ की यह कविता स्वप्नों वाली स्मृति में किसी ने हरी-पीली चूड़ियों से भरी नाजुक कलाई को बड़ी सख्ती से थाम कर धीमे-धीमे सुनाई थी...

‘‘राह न लउके, घोर अन्हरिया,

जेने देखीं ओने करिया,

मत्स्य न्याय केहू ना गोहरिया,

मीत! प्रीत के हाथ बढ़ाईं,

आईं, हम रउरा मिली गाईं!!’’

अचानक किसी की आहट हुई थी। डरी-सहमी सी चूड़ियाँ छन-छन की धीमीं होती आवाज के साथ ओसारे के किसी कोने में ओझल हो गईं...!

खिड़की के पल्ले भड़भड़ाते हुए तेज हवा ने जब समाचार पत्र को अस्त व्यस्त कर दिया तो उनकी तन्द्रा टूटी। खिड़की बंद कर उन्होंने ढिबरी ऊँचे ताखा पर रख दी। देवदत्त सिंह पूर्ववत सोये हुए थे. वे भी लेट गईं।

उस बादल वाले चहकते दिन में भी सन्नाटा पोखर के पानी सा गहरा था। कौवों की काँव-काँव भी बहुत दूर से आती हुई लगती थी। अम्बिका सिंह खाट पर सुस्त पड़े थे। बेटा बाप से रार ठानकर बैठा था...

-‘‘दुआह से ब्याह नहीं होगा हमारी बहिन का!’’

कौन समझाए इस मतिमंद को! लड़का सुंदर-सुकांत है, बड़ी ठकुरई है...बेवंत है अईसा बर खोजने का? दुआह नहीं होता तो क्या एक तुम्हारी बहिन ही रूपमती पड़ी थी ब्याहने को!

कनेर की नाजुक डाल सी लच-लच कोमल-छरहरी वृंदा आठवीं जमात तक पढ़ी थीं। सत्रहवाँ चढ़ते ही उनके लिए चहल-पहल आरंभ हो गई। घर में देवदत्त सिंह की चर्चा के साथ ही परिवार दो खेमों में बँट गया था। पुरुष एक ओर, महिलायें एक तरफ़...सिवाय वृंदा के भाई साहब के। वे आरंभ से ही खिलाफ थे. चाचियाँ साफ़-साफ़ भले न कह पातीं हों, पर जब-तब वृंदा को ठुनकिया देतीं...

-‘‘ऐ बन्नी मना कर दो!’’

बन्नी चुपचाप दुपट्टे में अबरक सजाती रहती। सपनों से अबरक झरता जा रहा था। छत की आखिरी सीधी के पास दीवार में जालीदार झरोखा था। रंगरोगन मटमैला हो चला था। साड़ी का बदरंग टुकड़ा परदे सा टंगा था। गाढ़ी, नीरस व गर्म दुपहरिया में भी झरोखे से झर-झर ठंढी हवा सहलाती रहती। कहीं किसी अखबार से बने ठोंगे को पाकर वृंदा बड़ी आहिस्तगी व एहतियात से उसे खोलती। झरोखे के पास दुपहरिया भर बैठी पढ़ती रहती। कच्ची सड़कों पर उड़ता धूल का बवंडर झरोखे से साफ़ दिखता था। दँवरी के समय बारीक भूसे की गर्द से वृंदा के बाल, पलकें, आँगन-सीढ़ियाँ सब पट जाते।

दरअसल अब तो सपनों के गढ़न की उम्र आई थी. सखी को छेड़ती वृंदा, ढोलक की थाप पर गाती,

चलनी के चालल दूलहा,

सूप के फटकारल हो...

तो सखी के चेहरे पर खिलते रंग-बिरंगे गुलाल देख हैरान रह जाती. नर्म, कच्चे और अंजाने-रोमांचक सपनों की आमद से हैरान वृंदा ने बड़े जतन से दुल्हन के साथ बैठ कर ‘माड़ो का भात’ खाया था, जैसी कि कहावत थी...साल भीतर ही विवाह के आसार दिखने लगे थे।

पर यह सपनों का कैसा रंग था। न सपने के ख्याल वृंदा के ख्यालों की तरह कच्चे थे, न ही उसकी फुसफुसाहटें, छुअन, रेशे वृंदा जैसे कोर-नकोर थे।

हीरा को फिर मझौली दौड़ाया गया। निमंत्रण पत्र के साथ,

-‘‘सौत परीछने आएँगी न!’’

फूलमती कठुआ गईं। उसी वेश-दशा में पैदल ही हीरा के संग रोती-कलपती चल पड़ीं। माँ ने किसी प्रकार समझा बुझाकर डोली कहार के साथ बेटी को विदा किया। बात हाथ से बाहर जा चुकी थी। बहू सास की गोद में सिर दिए बड़ी देर तक रोती रही।

आषाढ़ की रात थी। चंदा मामा बादल की टंकी से पानी निकालकर खूब नहाये थे। लगातार कई रातों तक नहाते रहे थे। नहाकर उन्होंने देह और बाल झटके। चमकती बूँदें रात के सुसुम गर्म तवे पर इधर उधर छटक गईं। चंदा मामा ने फिर हवा से रगड़-रगड़ कर अपनी देह सुखाई थी। अब साफ़ सुथरे अच्छे चंदा मामा खूब चमक रहे थे। एक ही पेट्रोमेक्स से आँगन भर में उजाला फैला था। औरतें ‘गारी’ गाकर थक गई थीं। नाउन वृंदा को थामे बैठी रही। हीरा हज्जाम रात भर देवदत्त सिंह का मऊर सँभालते रहे।

अलसुबह विदाई हो गई।

हवेली के सामने औरतों का हूजूम था। नई दुल्हन को देखने की सबमें स्वाभाविक उत्सुकता थी। सबसे पहले सास ने वृंदा के घूँघट में चेहरा अन्दर कर कनिया की ‘माँग-बहुराई’ की। अब फूलमती सामने थीं। उनका धैर्य छूट गया। वे फफ़क पड़ीं। सास की आँखें भी गीली हो गईं। सब चुप थे। देवदत्त सिंह ने आगे बढ़कर अपने बिहउती गमछे से उनके आँसू पोंछे...

-‘‘चुप हो जाओ! कौन कहता है कि सौत है...हम दाई लाये हैं तुम्हारे लिए. जो तुम्हारी जगह थी, वह तुम्हारी ही है।’’

उस सुबह आसमान में हर ओर नहीं बरसने वाले घने बादल थे। रह-रहकर वृंदा के कंठ में कुछ फँस जाता। वे भिंची-भिंची आवाज में लगातार रोती रहतीं। कई दिनों तक कुछ हज़म न हुआ। जो खातीं उल्टी हो जाती। सब यही समझते...नई दुल्हन का रोना स्वाभाविक ही है।

फूलमती से सबको सहानुभूति थी। जिसकी नई सौत आई हो, उसकी पीड़ा तो अथाह है। देवदत्त सिंह अक्सर काम-धाम से फारिग होकर उनके पास बैठे रहते, उनका जी बहलाते।

कुछ दिनों से बारिश जाने कहाँ गुम थी। उमस भरी गर्मी से मन घबराया हुआ था। सड़ती छेना मिठाइयों से आँगन महका पड़ा था। वृंदा खिड़की से सिर टिकाए अन्यमनस्क बैठी थीं। कमरे की लम्बाई-चौड़ाई के बनिस्पत पलंग ने ज्यादा जगह घेरी हुई थी। घर के सभी लोग छत पर गप्पबाजी में मशगूल थे। अचानक वृंदा की जीभ पर खट्टा सा कुछ आया। वे पनोहा पर भागीं। देर तक उल्टियाँ करती रहीं। एक भारी हाथ कोमलता से उनका सिर व पीठ सहलाता रहा। उनसे और खड़ा न हुआ गया। वे बैठ गईं। पस्त होकर उन्होंने सिर हथेली पर टिका दिया। बालों से भरे एक सांवले हाथ ने पानी का लोटा थमाया। मुँह हाथ धोकर वे लड़खड़ाती हुई खड़ी हुईं। उन्हीं हाथों ने सहारा देकर उन्हें कमरे में पहुँचाया। वे हाथ पंखे से हवा करने लगे...

-‘‘अब कुछ ठीक लग रहा है?’’

वो जो कोई भी था, बेहद सुदर्शन था। घुंघराले बालों का एक आवारा गुच्छा चौड़े ललाट पर खेल रहा था। वृंदा इससे अधिक नहीं देख पायीं। उन्होंने धीमे से सिर हिला दिया,

-‘‘आप आराम कीजिये। मैं भेजता हूँ किसी को।’’

कुछ देर पश्चात कमरे में अच्छी खासी भीड़ थी। उन्होंने कोशिश की...पर कमजोरी के कारण उठा नहीं गया। सास ने लेटे रहने की हिदायत दी। कुछ देर बातचीत करने के पश्चात ‘बिछिया’ को उनके साथ रहने का कहकर सब चले गए। बुखार काफी दिनों तक उन्हें झिंझोड़े रहा। बिछिया हीरा हज्जाम की पतोह थी। वह रोज नियम से आकर उनके देह हाथ पोंछती। उनकी चोटी गूँथती। उनसे गप्पें लड़ाती और ‘गते-गते’ घर की अंदरूनी जानकारियाँ भी दे रही थी।

शाम ढलने वाली थी। छत के एक अँधेरे कोने में बैठी वृंदा आज बहुत दिनों बाद झींगुर की आवाज सुन रही थीं। अजीब लग रहा है, मतलब अच्छा सा अजीब। कभी-कभी लगता कि बीमार होना भी आदमी के लिए आवश्यक और अपरिहार्य चीज है। आत्मग्रस्त, आत्मदया के बावजूद आदमी किसी यथार्थवादी स्वप्न में जीता है मानों! जैसे जो जी रहे हैं, वह स्वप्न है। जो पीछे जी चुके वह भी स्वपन जैसा लगता है। तो सच? उस अवस्था में आगत ही सच लगता है। ऐसा महसूस होता है मानों जो होने या आने वाला है वह एकदम ठोस ठनठन सच होगा जिसे हम साबुत देख, सुन, छू सकेंगे। और कहेंगे-हरे हाँ! यही तो है सच। ऐसा सच जिसे देखकर मुँह फेरने का मन न करे...वरन गाढ़े एकांत में बड़े इत्मिनान से निहारा व सहलाया जा सके। पर तबीयत ज्यों-ज्यों ठीक होती जाती है वह उदास-स्वप्निल निद्रा भी टूटती जाती है. जाने क्यों ठीक इसी तरह के ख्याल ने चौड़े ललाट पर घुंघराले बालों का गुच्छा कौंध गया। आँगन में वह का दफ़े दिखा था...हँसता-गुनगुनाता, फूलमती से कोमल ठिठोलियाँ करता...पर वृंदा नहीं जान पायी कि वह था कौन? न किसी ने बताया ही. उन्होंने बिछिया से हुलिया बताकर जानना चाहा. वह झट बोल पड़ी,

-‘‘वो...परभु बाबू हैं.’’

-‘‘कौन परभु?’’

-‘‘देवदत्त बाबू के पितिआउत भाई परभुदत्त. कलकत्ते में रहकर पढ़ रहे थे। अब जाकर पढ़ाई पूरी भई है। माँ बाप तो लड़कपन में ही गुजर गए।’’

फिर कुछ क्षण बिछिया चुप रही। मानों आसपास का जायज़ा ले रही हो। दबे स्वर बोली,

-‘‘देवदत्त बाबू उन्हें ज्यादा पसंद नहीं करते।’’

-‘‘काहे?’’

-‘‘ई पार्टी और जुलुस-वुलुस में लगे रहते हैं न इसलिए।’’

वृंदा चुप रहीं।

हफ्ते बाद देवदत्त सिंह वृंदा के कमरे में आए थे. वृंदा धुले हुए कपड़े समेट रही थी. उन्हें देख ठहर गई. वे इत्मीनान से बैठ गए।

-‘‘तबीयत कैसी है अब?’’

- ‘‘ठीक है।’’ वे कपड़े तहियाने लगी।

देवदत्त सिंह काफी देर तक बतियाते रहे वे हूँ-हाँ करती रहीं। तमाम बातें कहने के पश्चात् उन्होंने आखिर में जोड़ा था...,

-‘‘अम्मा का ध्यान रखना। उन्हें अपनी माँ समझना. और फूलमती तो तुम्हारी बड़ी बहन जैसी ही है।’’

न चाहते हुए भी वृंदा की मुस्कुराहट वक्र हो गई,

गहना-गुरिया, साड़ी-सलुक्का से प्रेम थोड़ी न होता है! प्रेम होता है आदमी से...आदमी के दुलार भरे छुअन से. बीमारी, दवा-दारू के बनिस्पत एक प्रेम भारी झिड़क से ज्यादा जल्दी सही होती है,

-‘‘ध्यान काहे नहीं रखती अपना?’’

वृंदा को लगता आवारा हवा के बीच बेतरतीब उड़ती फड़फड़ाती वे कागज का ऐसा टुकड़ा हो गयी हैं, जिसे कोई नहीं जो तहें लगाकर इज्जत, इत्मीनान से अपनी जेब में रखे। बेशक वे अधिकार व शासन की कसमसाहट में घुटें...पर वह घुटन इस ‘कुछ न’ होने से बेहतर ही होती।

घर-गृहस्ती के बाद कुछ तो होता जो उलझाए रहता! वे कमरे, आँगन में यूँ ही कुछ कागज के टुकड़े, ठोंगे ढूँढा करतीं। बिछिया अक्सर आकर उनसे बतियाती रहती। किसी दिन जाने क्या सोचकर वे कह पड़ीं,

-‘‘एक काम करोगी हमारा?’’

-‘‘कहिए न!’’

- ‘‘परभु बाबू से कोई किताब माँग लाओगी? कहना हमने मंगायी है।’’

बिछिया चुप रह गई। सशंकित सी उन्हें देखती रही।

-‘‘निफिकीर रहो...हम किसी से न कहेंगे!’’

और इस तरह किताबों का लेन देन शुरू हुआ था। शायद यह अधूरा सच है। किताबों के संग-संग बहुत सी चीजें परस्पर संप्रेषित हो रही थीं।

किसी दिन किताब का एक पन्ना मुड़ा हुआ मिला. उत्सुकतावश वृंदा ने वही पन्ना सबसे पहले खोला था। एक ही पृष्ठ के अलग-अलग अनुच्छेदों में चार शब्द लाल रंग की स्याही से रेखांकित थे। उन्हें परस्पर मिलाने पर एक पंक्ति बनी थी...

-‘‘वह बहुत कोमल थी।’’

सहसा हृदय में होती धक-धक की गति बढ़ गई थी। उन्होंने उस एक पंक्ति को कई दफ़े पढ़ा। हर बार उस एक पंक्ति में अनूठे ढंग का नया आस्वाद होता था। उन्होंने तो परभुदत्त को गिने-चुने दफ़े ही देखा था। क्या यह भ्रम मात्र है? या उनका आकांक्षी मन उन्हें वही दिखा रहा जो वह देखना चाहती हैं। संभव है यह भ्रम ही हो। पर, अब अक्सर ही किताबों में कुछ न कुछ रेखांकित दिखने लगा था। प्रत्युत्तर वृंदा के तरफ़ से भी उसी भाषा में दिया जाता। यह आरंभ था। कि अब उन्हें ढेर सी चूड़ियाँ पहनना बहुत अच्छा लगने लगा था। खूब शोख रंग-बिरंगी काँच की चूड़ियाँ। हथेली की गाँठें बहुत नरम न थीं। चूड़ीहारिन लाख जतन से चूड़ियाँ पहनाए वृंदा की सिसकारी निकल ही जाती थीं। आधी दर्जन चूड़ियों के बाद ही वे हाथ झटक देतीं। पर अब ऐसा न था। आहें भरते हुए भी वे कलाइयाँ चूड़ियों से भर-भर लेतीं। चूड़ियों की खनखनाहट में एकांत का गझिन स्वप्नमयी गान भर नहीं था। अनवरत बेढंगी लहर पर थिरकती वे एक पोशीदा ख्याल...एक गुप्त सन्देश भी होती थीं। आश्चर्यजनक रूप से रातों में जब सप्तर्षि आसमान पर टंग जाते, घर के पिछवाड़े कुइयाँ के पास बेतहाशा फैले उड़हुल की झाड़ियों में चूड़ियाँ एक लय में लगातार बजती रहती थीं। दुपहरियों की नीरवता में जब नींद, ऊन-कांटे, कचौरियों की फेहरिस्त में घर की तमाम चूड़ियाँ व्यस्त होतीं...छत की बगल वाली कोठरी में वृंदा की चूड़ियाँ गुनगुनाती रहतीं। अक्सर किसी आहट से चौंक चूड़ियाँ सहमकर खामोश हो जातीं। कभी यूँ भी हैरान होतीं वे कि इतने करीब से गुजरकर देवदत्त सिंह इन चूड़ियों के गुपचुप संगीत से इतने बेपरवाह कैसे रहते हैं?

वे चूड़ियाँ धैर्य थामे कलाई से आगे कभी नहीं बढ़ पायीं। उन चूड़ियों पर होठ टिकाकर प्रभु दत्त ने वृंदा के संग जाने कितने-कितने सपनों के सितारे उनपर टांक दिए थे। कांपती हुई वृंदा ने आहिस्ता से कलाई होठों तले से सरका ली थी। प्रभु दत्त इन सपनों में ही रहे। इनसे आगे नहीं बढ़े कभी। उनके होठों पर हमेशा उन ठंडी चूड़ियों की कंपन थरथराती रहती। इन्हीं सपनों की कड़ी के तहत प्रभु दत्त ने वृंदा को अभी-अभी पास हुए ‘हिन्दू कोड बिल’ के विषय में बताया था।

-‘सो क्या है?’ वृंदा ने उनके हाथ में थमे अखबार पर नज़र टिकाते हुए पूछा।

-‘‘इसके अनुसार, अब पत्नी चाहे तो पति से अलग होने का उसे कानूनी अधिकार है।’’

-‘‘हुम्म’’

-‘‘और...’’

-‘‘और क्या?’’

-‘‘पहली पत्नी के जीवित रहते कोई आदमी दूसरा ब्याह नहीं कर सकता।’’

वृंदा कुछ क्षण एकटक उन्हें देखती रहीं। फिर खिड़की से बाहर देखने लगीं। तीखी धूप में शीशम की पत्तियों का रंग ज्यादा चटख दिख रहा था। देवदत्त सिंह के विशाल खेत में मजदूर पसीना पोंछते जी जान से जुटे थे। एक नीम की छाँह तले कुर्सी पर बैठे देवदत्त सिंह पीतल के लोटे से पानी पी रहे थे। वृंदा बेखयाली में उन्हें देखती रहीं। अचानक उन्हें लगा गमछी से मुँह पोंछते देवदत्त सिंह ने यकायक खिड़की को ही देखा हो। वे झट दीवार की ओट में आ गईं। हालाँकि कमरे में अँधेरा था। मरे हुए चूहों, उपले व सूखी लकड़ियों की गंध हर-सूं फैली थी. वृंदा के कंठ से गहरी साँस निकलकर रह गयी।

-‘‘अब क्या मतलब?’’

-‘‘वे बिचारगी से मुस्कुराईं.’’

-‘‘अब भी बहुत कुछ!’’

-‘‘ऊँ...हूँ...!’’

उन्होंने हथेलियों से दीवार थाम ली.

प्रभु दत्त उनकी उँगलियों में अपनी उँगलियाँ सख्ती से फंसाकर कुछ क्षण उनकी आँखों में झांकते रहे। वृंदा ने छुड़ाने की कोशिश की, पर उंगलियों में उंगलियाँ बेतरह उलझ गयी थीं।

-‘‘हाँ, कल हमें निर्णय सुनना है. कुइयाँ के पास।’’

वे अपने कमरे में आईं तो देवदत्त सिंह बेना डोलाते चहलकदमी कर रहे थे। वे ठिठक गयीं। पर बजाहिर उनके हाथ से बेना लेकर वे हवा करने लगीं।

-‘‘प्यास लगी है।’’ देवदत्त सिंह ने सहज भाव में कहा।

गुड़-पानी पीकर वे चले गए।

वृंदा उलझन में पड़ी थी। वे प्रभुदत्त को नहीं बता पायी थीं अब तक. कैसे बताएँ...कैसी भूमिका बनाएँ, क्या कहें...ऐसा नहीं था कि प्रभुदत्त पति-पत्नी का संबंध नहीं समझते होंगे। या देवदत्त सिंह के तानाशाही प्रवृति को न जानते होंगे। परन्तु ‘यह?’ यह तो साक्षात प्रमाण है संबंधों का। उनके दिन चढ़े थे।

अचानक ही चौंक कर वृंदा की नींद टूटी थी। आजकल जाने क्यों उन्हें बड़ी गाढ़ी नींद आने लगी थी। बिना हिले-डुले उन्होंने बगल में देखा. देवदत्त सिंह नहीं थे। वृंदा को हैरानी नहीं हुई। जिन निश्चित रातों को देवदत्त सिंह उनके साथ होते थे, अक्सर ही दूसरे तीसरे पहर के पश्चात फूलमती के पास चले जाया करते।

खिड़की का पल्ला खोलते ही वे तीखी ठंडी हवा से सिहर गईं। वह अगहन की धुँधली सी अंजोरिया थी। कुहरे की घनी रजाई ओढ़े आसमान खामोशी से सो रहा था। सप्तर्षि नहीं दिख रहे थे। अनुमानतः रात दूसरे पहर से आगे बढ़ रही थी। बदन पर काली शॉल कसकर लपेट वे बाहर निकल आईं. कुइयाँ पूर्ववत उदास खामोश टूटा पड़ा था। दिन में पानी की सतह पर उड़हुल की सूखी पत्तियाँ, सूखे झरे फूल दिखते थे। अभी घुप्प अँधेरा था। झाड़ियों के पास जब ढेर सी चूड़ियाँ एक निश्चित लय में खनकीं तो रात के सन्नाटे में उनकी खनखनाहट दूर तक गूँज गई। डरे हुए चाँद ने कुहरे का लिहाफ़ नाक तक सरका कर देखा। वृंदा को देखते ही उसकी आँखों से एक बूँद दुःख सरककर उड़हुल की चिकनी पत्ती पर सरककर गिर गया। पत्ती दुःख नहीं संभाल पाई। वह बर्फीला आँसू फिसल कर वृंदा की उल्टी हथेली पर जा टपका। सिहर कर वृंदा ने हाथ शॉल में छुपा लिए। चूड़ियाँ बड़ी देर तक खनक-खनक कर किसी को बुलाती रहीं। कोई आखिरी पुकार तक नहीं आया।

-‘‘क्या वह रूठ गया है?’’ असमंजस में घिरी वृंदा कुछ देर कुएँ के जगत पर बैठी रही. कुत्ते कोरस में रो रहे थे. कुएँ की जगत पर बैठी रहीं।

-‘‘रूठा है तो, रूठा रहे. यह कोई वक्त है रुसने का? पता है न...वृंदा कितने जोखिम उठाकर आती हैं...!!’’

वे वापिस चली आईं। बहुत आहिस्तगी से उन्होंने दरवाजा खोला था। जाने कब वापस आकर देवदत्त सिंह बेसुध सो रहे थे। वृंदा चुपचाप लेट गईं. खिड़की की झिर्री से बारीक चाँदनी कमरे में फैली थी. पर अँधेरा ज्यादा गाढ़ा था।

वृंदा की कनपटियों से कुछ सफ़ेद बाल झाँकने लगे थे। बेशक वे देवदत्त सिंह से दस बरस छोटी थीं...पर उम्र तो उनकी भी ढलान ही पर थी। वे गमखोर जीती रहीं। रोना बहुत आसान था। परन्तु रो लेने के पश्चात दिल हल्का हो जाता...प्रतिकार की इच्छा ही खत्म हो जाती. एक हिंसक प्रतिकार जो ‘‘माँग-बोहराई’’ के वक्त से ही उनके भीतर पल बढ़ रहा था...वह क्रमशः एक ‘संदेह’ के साथ प्रबलतम होता गया। कभी-कभी तो उनका जी चाहता कि देवदत्त सिंह की दाल में जहर घोलकर दे दें।

कितनी अजीब बात थी कि देह बूढ़ी हो रही थी, बाल पहचान बदल रहे थे...पर ‘अन्दर’ जो एक ‘कोई’ था वह कभी बूढ़ा नहीं हुआ. और उसके युवा बने रहने से बदले की भावना भी दिन पर दिन युवा होती गईं।

घर खाली होता गया था। दो बच्चियों को जन्म देकर फूलमती चल बसी थीं। वृंदा ने ही उन दोनों का पालन पोषण किया। उनकी शादियाँ कीं। अब इस भुतैले बड़े घर में बस वे तीन लोग रह गए थे. देवदत्त सिंह ने, दो बरस से ज्यादा हुआ लकवाग्रस्त होकर बिस्तर पकड़ लिया था। शुरुआत में सिर्फ़ दाएँ हाथ-पैर ही प्रभावित थे। बिस्तर पर पड़े-पड़े वे चिड़चिड़े होते जा रहे थे। जब-तब किसी भी बात पर चिल्लाने लगते...! एक दिन जाने किस बात पर आपे से बाहर हो वे चिल्लाने लगे। वृंदा को देखते ही उनकी आँखों में खून उतर आया...

-‘‘तू...तू चरित्रहीन साली...रातभर किससे मिलने जाती थी हमें सब मालूम है!’’

वृंदा सन्न रह गयीं। अन्दर ही अन्दर खौलता हुआ वह प्रतिकार अपना स्वरूप स्पष्ट नहीं पहचान पा रहा था। पर अब कुछ तो होना ही है। झूठ या सच पर एक गहरी चोट देनी है. वे इत्मीनान से ठाकुर की खाट पर झुक गईं....उनकी आवाज में बेतरह शांति व ठंडापन था...

-‘‘तब तो तुम्हें यह भी मालूम होगा कि उन सबका परिणाम क्या है? कभी सोचा है तुमने कि जिसे तुम अपना बेटा, अपना बेटा कहते फिरते हो...उसके एक भी लच्छन तुम्हारे जैसा क्यों नहीं है?’’

देवदत्त सिंह कुछ क्षण स्तब्ध उसे एकटक ताकते रहे। उन्होंने दाहिने हाथ-पैर हिलाने चाहे...पर विवशता से होंठ काट लिए। बायीं हथेली वृंदा के देह के नीचे दबी थी। उन्हें कुछ और नहीं सूझा. उन्होंने, वृंदा के चेहरे पर थूक दिया। वृंदा आँचल से चेहरा पोंछ कर मुस्कुरायीं...निरी ठंडी क्रूर मुस्कुराहट।

वक्त के साथ लकवे का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़कर चेहरे तक हो गया था। देवदत्त सिंह स्पष्ट नहीं बोल पाते थे पर अस्पष्ट बड़बड़ाहट में वृंदा को अनवरत गालियाँ देते रहते।

अस्पष्ट परन्तु तेज होती कराह ने वृंदा की गहरी तन्द्रा तोड़ी। देवदत्त बेचैनी से बायाँ हाथ पटक रहे थे। वृंदा ने उठकर दरवाज़े खिड़कियाँ खोल दीं। धीरे-धीरे सफ़ेदी छा रही थी। रौशनी कमरे में भी फ़ैल गई। वृंदा ने मच्छरदानी खोलकर रख दी। देवदत्त सिंह ने बिस्तर पर ही मल कर दिया था। बिस्तर व उनकी देह साफ़ करके वृंदा ने उन्हें तकिये के सहारे खिड़की के पास बिठा दिया। रजाई उनकी गर्दन तक ओढ़ा दी। वे चुपचाप बाहर खिलते उजाले को देखते रहे. थकी हुई आँखों में अब सपने नहीं जग पाते थे। लिहाफ़ के कोर से बाजदफ़े आँखें पोंछने के बाद भी दुनिया धुधंली ही दिख रही थी। रात की बारिश का असर सुबह पर भी था। गीली मिट्टी पर बाँस के सूखे भूरे पत्ते बिखरे थे। वृंदा चाय बनाकर लाई. अपनी प्याली वे हमेशा पहले ढँककर रख देती थीं। देवदत्त सिंह को पिलाने के पश्चात वे पीतीं। देवदत्त सिंह हर घूँट के बाद खिड़की से बाहर देखने लगते। उस दिन के पश्चात उन्होंने कभी वृंदा की तरफ़ नहीं देखा था. जैसे घृणा से उनका रोम-रोम सुलग रहा हो। वृंदा उन्हें एकटक देखतीं, सावधानी से फूँक-फूँक कर चाय पिलाती रहीं...

-‘‘इतने दिन हम घृणा में रहे, पर तुम्हें कभी मना नहीं कर पाए...अब तुम जलो घृणा में, परन्तु मुझे मना न कर पाना तुम्हारी विवशता है! तुम अब जियो, जो मैंने अब तक जीया है।’’

बाहर कोई चिड़िया, भोर का गीत गा रही थी.

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संपर्क:

द्वारा, नवनीत नीरव,

भारती फाउंडेशन,

निकट करणी अस्पताल,

PHD ऑफिस के विपरीत,

बालेसर जिला जोधपुर,

राजस्थान ३४२०२३

मो. - ०९६९३३७३७३३

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