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प्राची - मई 2016 : हास्य-व्यंग्य / धारावाहिक उपन्यास / एक गधे की वापसी / कृश्न चन्दर

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  हास्य-व्यंग्य धारावाहिक उपन्यास एक गधे की वापसी कृश्न चन्दर दूसरी किस्त : इस किस्त में पढ़िए ... शुरू होना स्मगलिंग के धंधे क...

 

हास्य-व्यंग्य

धारावाहिक उपन्यास

एक गधे की वापसी

कृश्न चन्दर

दूसरी किस्त :

इस किस्त में पढ़िए...

शुरू होना स्मगलिंग के धंधे का, और पार कर जाना गधे का माहिम क्रीक को आसानी से, और पड़ जाना हाथों से सेठ भूरीलाल के, और बयान माहिम के सट्टेबाजों का....

म्बख्त जोजफ ने रात-भर मुझे भूखा रखा. सुबह भी घास का एक तिनका न तोड़ने दिया और सुबह ही मुझे बान्द्रा के गुप्त अड्डे पर ले गया. बान्द्रा तक पहुंचते-पहुंचते भूख से मैं बेहाल होने लगा. आंतें कुलबुलाने लगीं और मेरा पेट पिचकर पसलियों से जा लगा. मेरी यह दशा देखकर जोजफ बहुत प्रसन्न हुआ, क्योंकि मेरा पिचका हुआ पेट इस बात का प्रमाण था कि मेरा मेदा बिल्कुल खाली हो चुका है.

मुझे भी शुरू ही से इस बात का ख्याल था कि इस काम में मुझे दिन में केवल एक बार खाना मिला करेगा और वह भी सुबह दस-ग्यारह बजे, अपने काम से निवृत्त हो जाने के बाद. किंतु मैंने यह सोचकर संतोष कर लिया था कि इस दुनिया में करोड़ों इंसान ऐसे हैं जिन्हें दिन-भर की मेहनत के बाद केवल एक वक्त की रोटी मिलती है. मैं तो एक गधा हूं. मुझे यदि दिन-भर के परिश्रम के बाद एक वक्त की घास मिल जाए तो क्या बुरा है?

बान्द्रा के गुप्त अड्डे पर पहुंचकर जोजफ ने पूछा, ''अब क्या करें?''

मैंने कहा, ''अब एक बाल्टी भरकर शराब मेरे सामने रख दो. मैं उसे पी जाऊंगा.''

जोजफ एक छप्पर के अंदर गया. थोड़ी देर बाद उस छप्पर के अंदर से दो आदमी निकले. एक जोजफ था, दूसरा उसका मित्र कामता प्रसाद. यह एक दुबला-पतला धोती बांधे हुए एक ठिंगना-सा आदमी था. उसकी एक आंख कानी थी, दूसरी एकदम नीली. दोनों ने दो बाल्टियां उठा रखी थीं.

पहले मैंने एक बाल्टी पी. फिर दूसरी. फिर कामता प्रसाद तीसरी उठा लाया. वह भी किसी न किसी तरह मैंने पी ली. फिर कामता प्रसाद चौथी उठा लाया. मैंने इंकार कर दिया.

''तुम कोशिश तो करो,'' कामता प्रसाद ने मुझे बढ़ावा देते हुए कहा, ''जितनी शराब तुम्हारे पेट में जा चुकी है उतनी शराब तो एक तगड़ा शराबी सुबह से शाम तक पी लेता है. तुम गधे होकर एक बाल्टी और नहीं पी सकते.''

''नहीं,'' मैंने उद्विग्न होकर कहा, ''मेरा पेट फट जाएगा.''

''खैर, न सही,'' कामता प्रसाद ने मुड़कर जोजफ ने कहा, ''इसे हर रोज रात को एक बढ़िया-सा जुलाब देना चाहिए. ईनोजफ्रूट साल्ट या कोई ऐसी चीज. सुबह को इसका पेट ऐसा साफ हो जाएगा कि आसानी से चौथी बाल्टी की शराब इसके पेट के अंदर समा सकेगी.''

मैंने कहा, ''अब मुझे जल्दी से यहां से ले चलो. डर है कि मुझे नशा न हो जाए. सुना है कि खाली पेट यूं भी नशा बहुत होता है.''

उन दोनों ने मुझे बहुत शीघ्रता से बान्द्रा की मस्जिद से कुछ कदम आगे ले जाकर छोड़ दिया और मैं एक आवारा गधे की तरह झूमता-झामता, इधर-उधर सिर मारता, सड़क सूंघता पुलिस चौकी की तरफ बढ़ने लगा.

सुबह का वक्त था. समुद्र से ठण्डी-ठण्डी हवा आ रही थी. क्रीक के पानियों पर मछुओं के जाल फैले हुए थे. बादबानी किश्तियां सामान से लदी हुई खुले समुद्र में जा रही थीं और छोटी-छोटी लड़कियां फूलदार फ्राकें पहने हुए चिड़ियों की तरह चहकती हुई स्कूल जा रही थीं. ऐसा सुंदर दृश्य था कि मेरा दिल खुशी से नाचने लगा और जी चाहा कि शुद्ध आसावरी लय में एक ऐसी तान छेड़ूं जो गले से निकलकर सीधे आसमान के बादलों तक पहुंच जाए बिना किसी स्मगलिंग के. किंतु इस चलते जमाने में यह असंभव है. व्यापार ने हर वस्तु को इस प्रकार जकड़ लिया है कि आजकल कोई मामूली से मामूली वस्तु भी बिना परमिट के, कोटे के, स्मगलिंग के, रिश्वत के इधर से उधर नहीं की जा सकती. शास्त्रीय संगीत को भी आजकल रेडियो वाले सुगम संगीत के प्रोग्राम में स्मगल करके पेश करते हैं.

मैं यह सोच रहा था और अपनी धुन में चला जा रहा था कि इतने में मेरी दृष्टि एक मराठी स्त्री पर पड़ी और मैं उसके लावण्य पूर्ण सौंदर्य को देख वहीं ठिठककर खड़ा हो गया. उसने गहरे हरे रंग की नौगजी मराठी साड़ी पहन रखी थी. उसके ऊदे ब्लाउज पर सोने का मंगलसूत्र चमक रहा था. वह सोने की चमकती हुई नथ पहने हुई थी और अपने एक हाथ में थाली उठाए हुए, उसमें जलते दीप और फूल रखे, मन्दिर को जा रही थी. उसके चेहरे पर सुबह के गुलाब खिले हुए थे, और उसकी बादलों की तरह श्वेत वेणी में से चम्पा की महक आती थी और वह अपनी लंबी-लंबी पलकें झुकाए ऐसी सलज्ज, पवित्र और शर्मीली मालूम हो रही थी. जैसे वह इस धरती की स्त्री न हो, किसी दूर-दराज ऊंचे आसमान की अप्सरा हो. मैं तो उसे देखते ही

मुग्ध हो गया और धीरे-धीरे उसके पीछे चलने लगा.

पुलिस चौकी पर खासी भीड़ थी. बहुत-सी टैक्सियां, गाड़ियां और ट्रक रुके हुए थे. पुलिस के सिपाही बारी-बारी प्रत्येक गाड़ी को अंदर-बाहर गौर से देखते, निरीक्षण करते और फिर उसे आगे बढ़ने का अवसर देते.

अब पुलिस वालों ने एक टैक्सी की 'डिकी' खुलवाई थी और ध्यान से उसके सामान की तलाशी ले रहे थे.

वह सुंदर स्त्री पुलिस के सिपाहियों के निकट जाकर जरा सी ठिठकी. उसने अपनी थाली का संतुलन अपने ऊंचे हाथों पर ठीक किया और नजरें झुकाए आगे बढ़ने लगी. पुलिस वालों ने तत्काल पीछे हटकर उसे रास्ता दे दिया.

इतने में पीछे से पुलिस को एक स्त्री की आवाज आई, ''ऐ कुठे!''

वह सुंदर स्त्री मुड़कर देखने लगी.

पुलिस की स्त्री ने उससे कहा, ''ऐ इकाई.''

वह सुंदर स्त्री खड़ी की खड़ी रह गई. पुलिस की स्त्री उसके निकट पहुंचकर और उसके चेहरे को ध्यान से ताककर कहने लगी, ''कहां जा रही है?''

''मन्दिर.''

पुलिस की स्त्री ने जल्दी से एक हाथ उस सुंदर स्त्री के मांसल कूल्हे पर मारा. मुझे उस स्त्री की यह हरकत बेहद बुरी मालूम हुई. कितनी बदतमीज औरत है यह पुलिस की! मैं अभी यहां तक सोच पाया था कि पुलिस की स्त्री ने दूसरा हाथ उसकी पीठ पर मारा. दूसरे ही क्षण वह उसकी नौगजी साड़ी के अंदर से शराब की भरी हुई रबर की टयूबें बरामद कर रही थी, जो उस स्त्री के पेट के चारों तरफ बंधी हुई थी.

''तुम यह ठर्रा लेकर मन्दिर जाती है?'' पुलिस की स्त्री ने व्यंग्य से कहा. और वह सुंदर स्त्री जोर-जोर से रोने लगी.

पुलिस के एक सिपाही ने मेरी पीठ पर डण्डा मारते हुए कहा, ''अबे, ओ गधे, यहां क्या कर रहा है?''

डण्डा खाते ही मैं वहां से भाग निकला और माहिम के चौक तक दौड़ता चला गया जहां जोजफ और कामता प्रसाद पहले ही से मेरे इंतजार में खड़े थे.

जोजफ ने मेरे गले में रस्सी डाल दी और मुझे खींचकर एक तंग-सी गली में ले गया. वहां जाकर उन्होंने मुझे एक अंधेरे मकान के अंदर ढकेल दिया. यह पुरानी बनावट का एक अंधेरा-सा मकान था. कुछ समय तक उन्होंने मुझे उसकी अंधेरी ड्योढ़ी में खड़ा रखा. फिर कामता प्रसाद ने ड्योढ़ी के अंदर के दरवाजे की कुण्डी खटखटाई.

''कौन है?'' अंदर से एक जनानी आवाज आई.

''मैं हूं कामता प्रसाद.''

दरवाजा खुल गया और उसमें से बादामी रंग का ब्लाउज और गहरे लाल रंग का स्कर्ट पहने हुए एक नवयुवती निकली. उसके होंठ गहरे लाल थे और उसकी बड़ी-बड़ी आंखें गहरी काली थीं. उसने मस्त अदा से अपने दोनों कूल्हे मटकाए और बोली, ''खाली हाथ आए हो?''

''मारिया, तुम पूरा दरवाजा तो खोलो,'' जोजफ ने बड़ी बेचैनी से कहा, ''और खुद परे हट जाओ.''

मारिया ने दरवाजा पूरी तरह खोल दिया और परे हट गई. वे दोनों मुझे खींचकर अंदर ले गए. अंदर एक खुला आंगन था, जिसके एक कोने में आग जल रही थी और एक कोने में बहुत-से ड्रम पड़े हुए थे. एक कोने में एक अलगनी पर धुले हुए कपड़े टंगे हुए थे और एक कोने में एक खाट पर एक बुड्ढा आदमी सो रहा था.

कामता प्रसाद मारिया के साथ एक तरफ के बरामदे में गायब हो गया. थोड़ी देर के बाद वे दोनों रबर की एक लंबी ट्यूब लेकर आए. फिर दोनों ने मेरे मुंह के नीचे एक बड़ा ड्रम रख दिया और मेरे मेदे में ट्यूब डालकर शराब बाहर निकालने लगे.

मारिया ने जब मेरे मुंह से शराब निकलते देखी तो पहले आश्चर्य से उसकी बड़ी-बड़ी आंखें खुली रह गईं. फिर वह कहकहा मारकर हंसी, इतनी हंसी कि उसकी आंखों में आंसू आ गए. जोजफ के कूल्हे पर हाथ रखकर कहा, ''क्या अब तुम्हें कुछ शक है मारिया, कि मैं अब बहुत जल्दी अमीर हो जाऊंगा. फिर तुम मुझसे शादी कर सकोगी न?''

''देखेंगे,'' मारिया ने हाथ मारकर जोजफ के हाथ को अपने कूल्हे से हटा दिया और मेरे समीप आकर बोली, ''फिलहाल तो मेरा इरादा इस गधे से शादी करने का हो रहा है. यह गधा तो सोने की खान है.''

थोड़ी देर बाद कामता प्रसाद ने शराब को बाल्टियों में भरकर कहा, ''पौने तीन बाल्टी शराब मिली है. एक-चौथाई यह गधा हजम कर गया.''

मारिया ने हंसकर कहा, ''शुक्र करो कि यह गधा है, कोई शराबी आदमी नहीं है. वर्ना पूरी शराब हजम कर जाता.''

जोजफ बोला, ''एक-चौथाई पानी डाल दो. क्या पता चलेगा?''

मैंने सोचा-दूध में पानी, शराब में पानी...

कामता प्रसाद ने पूछा, ''सेठ कहां है?''

मारिया ने कामता प्रसाद के कान में कुछ कहा. फिर कामता प्रसाद और मारिया बरामदे के अंदर चले गए. मैंने उचित अवसर समझकर जोजफ से कहा, ''मुझे जल्दी से घास दे दो, वर्ना मैं अभी भूख से मर जाऊंगा.''

''मैंने सब बन्दोबस्त कर रखा है, पार्टनर'.'' जोजफ बड़े प्यार से मेरा कान ऐंठते हुए बोला, ''अय मारिया, अंदर से घास लेती आओ''

मारिया अपनी दोनों गोरी-गोरी बांहों में घास के गट्ठे भर-भरकर लाई और अपने हाथों से मुझे घास खिलाने लगी. कई बार उसकी कोमल उंगलियां मेरे होंठों से जा लगीं. एक बार तो मेरी जबान से छू गई.

आह! उन उंगलियों का स्वाद कितना कोमल और हल्का था, जैसे वसंत के आरंभ में पहाड़ की वादियों में उगने वाली घास के पहले गठ्टे का होता है. दो दिन के बाद कामता प्रसाद रबर की एक मोटी ट्यूब और बड़ा-सा हैण्डपम्प ले आया.

बोला, ''यह गधा कामचोर है. वास्तव में इस गधे के मेदे में कई गैलन शराब ज्यादा समा सकती है.''

जोजफ ने विरोध किया, ''बेचारा जहां तक भर सकता है, भर लेता है.''

''जी नहीं,'' कामता प्रसाद ने कहा, ''हम इस पम्प के द्वारा गधे के मेदे में शराब भरेंगे, जिस तरह मोटर ट्यूब में हवा भरी जाती है.''

मैंने कहा, ''मेरा पेट एक जीव का पेट है, वह मोटर की ट्यूब नहीं हैं.''

किंतु मेरी एक न सुनी गई. उन लोगों ने मेरे मुंह में ट्यूब डालकर पम्प के द्वारा शराब भरनी शुरू की और धीरे-धीरे मेरा पेट फूलना शुरू हुआ. फिर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरी आंतें रबर की ट्यूब की तरह फूल गई हैं. मेरा मेदा एक ढोल की तरह फूलकर कुप्पा होता जा रहा है.

जब शराब मेरे गले से बाहर छलकने लगी, तब जाकर उन कम्बख्तों ने मेरा पीछा छोड़ा. कामता प्रसाद ने मुस्कराकर विजयी स्वर में कहा, ''पूरी छः बाल्टी शराब भरी है मैंने, पहले से दुगुनी.''

जोजफ ने कहा, ''तो हम पहले से दुगुना लाभ कमाएंगे!''

''अरे जालिमो, मेरा पेट फट जाएगा.'' मैं दर्द और पीड़ा से चिल्ला कर बोला.

जोजफ ने मेरे सिर पर हाथ फेरकर कहा, ''केवल पांच मिनट का तो रास्ता है. यूं चुटकियों में तय हो जाएगा. अब हम तुमको माहिम के चौक पर मिल जाएंगे.''

कामता प्रसाद ने कहा, ''अगर हम दो-चार मिनट देर से पहुंचे तो फिक्र मत करना.''

फिर वह जोजफ की ओर मुड़कर बोला, ''इस खुशी में एक-एक पेग हो जाए.''

''हो जाए.''

उन दोनों को पीता छोड़कर मैं माहिम क्रीक की ओर रवाना हो गया. आज कोई विशेष घटना नहीं हुई और मैं पहले दो दिनों की तरह चौकी से निडरता से गुजर गया और माहिम के चौक पर पहुंचकर एक फुटपाथ पर खड़ा जोजफ और कामता प्रसाद की प्रतीक्षा करने लगा.

जहां मैं खड़ा हुआ था वहां टैक्सियों का एक अड्डा था. अड्डे के पीछे फुटपाथ पर एक कबाबिया सीकें, कबाब और परांठे लेकर बैठा था. समीप ही चारपाइयां बिछी थीं, जिन पर कुछ लापरवाह किस्म के लोग सुबह के नाश्ते में कबाब और परांठे खा रहे थे और सट्टे के नंबरों की बात कर रहे थे.

पांच मिनट गुजर गए, दस मिनट गुजर गए, आध घंटा गुजर गया; किंतु जोजफ और कामता प्रसाद कहीं दिखाई नहीं दिए. धीरे-धीरे मेरा नशा बढ़ता जा रहा था. मेरा सिर घूम रहा था. शराब मेरी रग-रग में सरसराहट भरती जा रही थी. मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं हवा में हूं. पहले तो मैंने नशे की हालत में जोर से हांक लगाई, जिसे सुनकर इधर-उधर के सब लोग उछल पड़े; फिर मैंने गाना शुरू कर दिया.

''आवारा हूं, मैं आवारा हूं...''

लोगों ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा और बोले, ''गधा गाता है!''

गीत की धुन पर मेरे कदम स्वयं ही नाचने लगे.

''अरे नाचता भी है!''

मैंने झूमकर कहा, ''यारो, मुझको माफ करना मैं नशे में हूं.''

मेरा नशा क्षण-प्रतिक्षण बढ़ रहा था. मैंने बहक-बहककर चिल्लाना शुरू कर दिया.

''दो घूंट मैंने पी, और सैरे-जन्नत की.''

''विचित्र! बड़े अच्छे स्वभाव का गधा मालूम होता है.'' एक आदमी बोला.

दूसरे ने कहा, ''बीसवीं सदी का आश्चर्य है यारो! इंसान की तरह बोलता है.''

''यह बम्बई है बम्बई,'' तीसरे ने कहा, ''यहां गधे भी आकर इन्सान की तरह बोलने लग जाते हैं.''

चौथे आदमी को मैंने पहचान लिया. यह चिकन का कुर्ता पहने हुए था, जिसमें सोने के बटन लगे हुए थे और अत्यन्त ही बारीक मलमल की धोती धारण किए हुए था. इस व्यक्ति ने अपने साथी को, जो तहमद पहने हुए था, कहा, ''जुम्मन, तुमने आज तक कोई बोलता हुआ गधा देखा है?''

''नहीं, सेठ भूरीमल. आज तक तो नहीं देखा. कसम ले लो.''

सेठ भूरीमल और जुम्मन, दोनों को मैं कबाबिये की दुकान के सामने चारपाई पर कबाब-परांठे खाते देख चुका था. सेठ भूरीमल ने मेरी ओर ध्यान से देखते हुए कहा, ''यार जुम्मन, मुझे तो कुछ गोलमाल लगता है.''

''क्या गोलमाल सेठ?''

''मेरे ख्याल में यह गधा नहीं है. कोई योगी, साधु, सन्त, महात्मा मालूम होता है, जिसने हम दुनियादारों से बचने के लिए गधे का भेस धरा है.''

जुम्मन बोला, ''तुम ठीक कहते हो. मुझे भी कोई पहुंचा हुआ तान्त्रिक मालूम होता है, जिसने कब्र से किसी आत्मा को निकालकर इस गधे के शरीर में कैद कर दिया है.''

सेठ भूरीलाल बोला, ''आओ, इसके पांव पड़ जाएं, और इससे सट्टे का नम्बर मालूम कर लें.''

यह कहते ही सेठ भूरीमल ने सैकड़ों लोगों के सामने मेरा एक पांव पकड़ लिया और प्रेम से विह्नल होकर श्रद्धायुक्त स्वर में बोला, ''मैंने पहचान लिया योगी महाराज, मैंने पहचान लिया.''

जुम्मन ने मेरा दूसरा पांव पकड़कर कहा, ''करामाते फकीर दस्तगीर, करम कर दे, सट्टे का नम्बर बता दे.''

''हटो, यह बकवास है.'' मैंने नशे के बावजूद अपना पांव परे हटाते हुए कहा.

''नहीं छोड़ूंगा, नहीं छोड़ूंगा,'' सेठ भूरीमल ने दृढ़ता से दोनों हाथों से मेरा पांव पकड़कर उसे चूमते हुए कहा, ''नहीं छोड़ूंगा जब तक सट्टे का नम्बर नहीं बताओगे, जब तक अपने ज्ञान में ध्यानमग्न होकर नम्बर नहीं बताओगे, कभी नहीं छोड़ूंगा.''

जुम्मन से मेरे दूसरे पावं को चुमकर कहा, ''तेरे रहमो-करम के सदके, एक नम्बर इस गरीब को भी अता कर दे. अगर तू जलाल पर आ जाए तो बन्दा निहाल हो जाए.''

उनकी देखा-देखी दो-तीन और आदमी मेरे पांव पर गिर पड़े और रो-रोकर प्रार्थना करने लगे.

''तुझे चोगा सिलवा दूंगा साटन का.''

''अगर नम्बर बता दे काटन का.''

''तुझे हलवा खिलाऊंगा हर रोज.''

''एक बार बता दे ओपन टू क्लोज.''

'नम्बर-नम्बर' की बेचैन आवाजें भीड़ से ऊंची उठने लगीं. भीड़ मेरे चारों तरफ बढ़ रही थी और मुझे यह भी मालूम नहीं था कि बम्बई के लोग सट्टे के कितने प्रेमी हैं. अब नम्बर बताए बिना जान कैसे छूटेगी. किसी भी क्षण पुलिस आ जाएगी. और मेरा पेट लगता था, अभी फट जाएगा.

मैं बहुत-से नकली फकीरों, ज्योतिषियों और साधुओं को नम्बर बताते देख चुका था, इसलिए मैंने दुलत्ती की टेकनीक इस समय अपनाना उचित समझा. पहले तो मैंने दुलत्तियां झाड़कर अपने लिए जगह बनाई. फिर मैं झूम-झूमकर नाचने लगा और ऊल-जलूल बकाने लगा.

''अन्तर-मन्तर-जन्तर. कांग्रेस लीग स्वतंतर. न हिन्दू समझे न मुस्लिम जाने. कोई छुरी भोंके, कोई खंजर ताने. एक दिल दो पैमाने.''

''मिल गया, मिल गया.'' सेठ भूरीमल प्रसन्नता से चिल्लाता हुआ बोला, ''एक दिल दो पैमाने, यानी इक्के से दुआ.''

''नहीं,'' जुम्मन खुशी से आंसू पोंछता हुआ बोला, ''एक दिल दो पैमाने, यानी एक में जमाकर दो-दो तो हुए तीन. इक्का से तिया.''

''अरे नहीं,'' तीसरा बोला, ''एक दिल, दो पैमाने. दो से एक निकालो, बाकी रहा एक. इक्के से इक्का आएगा.''

''गलत,'' चौथा बोला, ''न हिन्दू समझे, न मुस्लिम जाने. भाई नतीजा सिफर, यानी कि बिन्दी आएगी.''

सब लोग अपनी-अपनी समझ के अनुसार नम्बर लगाने को भागे. एक मिनट में भीड़ साफ थी. मैं फुटपाथ पर अकेला खड़ा था. इतने में सामने से मारिया, जोजफ और कामता प्रसाद आते हुए दिखाई दिए.

जोजफ ने घबराकर पूछा, ''क्या हुआ था? लोगों ने तुम्हें क्यों घेर लिया था?''

मैंने कहा, ''लारी को ओवरलोड' करोगे, तो क्या इन्जन फेल नहीं होगा? तुमने मुझे ओवरलोड कर दिया. परिणामस्वरूप मुझे नशा हो गया और मैं ऊल-जलूल बकने लगा. इन्सानों की बोली बोलने लगा और तुम्हारी दुनिया ऐसी है कि यहां इन्सान गधे की बोली बोलने लगे तो किसी को आश्चर्य न होगा, किन्तु यदि गधा इन्सान की तरह बातचीत करने लगे तो प्रत्येक को आश्चर्य होगा. अब जल्दी से मेरे पेट से शराब निकालो, वर्ना शायद मेरा हार्टफेल हो जाएगा.''

वे लोग जल्दी से मुझे घसीटकर गली में ले गए. मारिया के घर के आंगन में पहुंचकर मैं लड़खड़ाकर फर्श पर गिर पड़ा और गिरते ही बेहोश हो गया.

क्रमशः....

अगले अंक में.....

होना गिरफ्तार स्मगलिंग के धन्धे में जोजफ, मारिया और कामताप्रसाद का, और भागना गधे का पुलिस के डर से और मुलाकात करना पारसी बाबा रुस्तम सेठ से, और बयान बम्बई के रेसकोर्स का.....

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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,834,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,7,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1922,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,649,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,56,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: प्राची - मई 2016 : हास्य-व्यंग्य / धारावाहिक उपन्यास / एक गधे की वापसी / कृश्न चन्दर
प्राची - मई 2016 : हास्य-व्यंग्य / धारावाहिक उपन्यास / एक गधे की वापसी / कृश्न चन्दर
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रचनाकार
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