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प्राची - मई 2016 : नयी कहानी : विचार की दिशा / अमृत राय

नयी कहानी : विचार की दिशा

अमत राय

'नये' कहानीकारों ने जितना 'नयी' कहानियों के बारे में लिखा है, उसका दसवां हिस्सा अगर 'नयी' कहानियां लिखी होतीं, तो 'नयी कहानी' की चर्चा करते समय उन्हें सदा दस-पंद्रह बरस पुरानी कहानियों का नाम न जपना पड़ता, और शायद अपनी बात को मनवाने में भी आसानी होती, यानी कि अगर उनके पास ऐसी कोई बात थी और है.

इस बात को, मैं समझता हूं, इसी तरह कहना जरूरी है, क्योंकि उन सैकड़ों-हजारों पन्नों के बावजूद, जो 'नयी कहानी' के बारे में लिखे गये हैं, कोई बात सफाई से उभर कर सामने नहीं आती. बल्कि यह भी कह सकते हैं, कि हर नये भव्य से इस अभिनव वेदान्त का सूत्र और उलझता ही गया है. एक भी जिज्ञासा का समाधान आपको नहीं मिल सकता. सब अपनी-अपनी ढफली बजा रहे हैं. कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है. अब तो शोर कुछ मद्धिम हो गया है, शायद चिल्लानेवालों के गले बैठ गये, वर्ना एक वक्त वह भी गुजरा है, जब कान पड़ी आवाज नहीं सुनायी देती थी. उस वक्त तो कुछ ऐसा ही ढोल-ढमाका था, कि आसमान तक हिल उठा था, और ऐसा मालूम होता था, कि किसी नये मसीहा का जन्म हुआ है. चलो, सब लोग चलो, उसके आगे सिजदा करो, वर्ना जहन्नुम रसीद होगे! लेकिन वह जो समय नाम का एक मसखरा है, न, उसके आगे किसी की नहीं चलती. वह सब को छांट-पछोरकर यथा-स्थान रख देता है. कली अलग, भूसी अलग. 'नयी' कहानी के साथ भी यही हो रहा है. इसमें घबराने या चौंकने की कोई बात नहीं है. और न इस तरह का कोई डर ही मन में होने की जरूरत है, कि 'नयी कहानी' की जितनी और जो सचमुच नयी उपलब्धि है वह भी कहीं अंधे वक्त के हाथों फिंक न जाये. ऐसा न पहले कभी हुआ है और न अब होगा. पंचतंत्र से लेकर आज तक कहानी ने जितनी करवटें ली हैं, और आज जिस जगह पर आकर ठहर गयी है, वह खुद इस बात का काफी सबूत है, कि समय और सब हो अंधा नहीं है, और अचल भी नहीं है. थोड़ा कठोर जरूर है, जल्दी पसीजता नहीं, और तिकड़म खेलने वालों से, शोबदेबाजों से उसे सख्त नफरत है. जहां इस तरह का खेल खेलनेवालों की दुनिया में कोई कमी न हो, इस तरह की एहतियात शायद जरूरी है. मगर जहां बात में खरापन है, सच्चाई है, दम है, और वक्त ने अपने ढंग से उसका इम्तहान ले लिया है, वहां फिर उसने नया असर कबूल भी किया है, वर्ना आदमी आज भी अपने वनमानुस पुरखों की तरह उन्हीं पुरानी कंदराओं में पड़ा होता. शायद इसके जवाब में कोई यह भी कह सकता है, कि 'क्या बुरा होता!' लेकिन वह एक अलग बहस है. यहां इतना ही कहना ईप्सित है, कि समय नया असर लेता है, लेकिन अपने सहज ढंग से लेता है, किसी के शोर मचाने से नहीं, काम के नयेपन को देखकर-परखकर. जीवन के सभी क्षेत्रों में यही उसका ढंग है, और कती साहित्यकारों ने भी इसी तरह साहित्य के सीमान्तों को विस्तार दिया है, गहराई दी है. 'नये' कहानीकार के पास भी अगर समय को देने के लिए ऐसा ही कुछ नया है, तो वह भी उसी समय सहज भूमि पर कठोर परीक्षण के बीच होकर, आत्म-बलिदान के द्वारा ही दिया जा सकता है. दूसरा कोई रास्ता नहीं है. जो शार्ट-कट नजर आते हैं, वह सब भटककर उन्हीं सहराओं में जा निकलने के रास्ते हैं, जहां की खाक इस वक्त 'नयी कहानी' छान रही है.

बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है, कि जिन लोगों ने सबसे पहले 'नयी कहानी' की हांक लगायी, उनके निकट अपने निवेद्य से अधिक अपने-आप को मनवाने का आग्रह ही बड़ा था. जहां निवेद्य बड़ा होता है, वहां जाने-अनजाने आदमी की निगाह अपने से बाहर किसी समानधर्मा पर होती है, और इस तरह परिवार निरन्तर बढ़ता जाता है. जहां निवेद्य छोटा या आनुषंगिक और व्यक्ति का 'मैं' बड़ा होता है, वहीं पर वह स्थिति देखने में आती है, जो आज 'नयी कहानी' में दिखायी दे रही है. तबेले में अच्छी खासी लताहुज मची है. जो इस नयी विधा के भाष्यकार है (और जो लिखनेवाले हैं, वही उस लिखे के भाष्यकार भी हैं!), उनके शास्त्रार्थ ने अब आपसी सिरफुड़ौवल का रूप ले लिया है. सब एक-दूसरे को गलत साबित करने में लगे हैं. 'नये' कहानीकारों की टोली बढ़ना तो दूर रहा, बराबर घटती ही जा रही है. मुझे पता नहीं, मैं तो बाहर का आदमी हूं, पर मैंने सुना है कि पहले उसमें अठारह-बीस लोग थे, फिर वह घटकर दस-बारह रह गये, फिर और छंटनी हुई तो मालूम हुआ कि पांच ही रह गये, फिर तीन और बस तीन. लेकिन सुना है, कि उन तीन में से भी एक अब जल्दी ही बाहर जाने वाला है, और भगवान ने चाहा, तो वह दिन भी आ ही जाएगा, जब कि एक ब्रह्म के समान एक ही 'नया' कहानीकार होगा. वही किस्सा है. पांच पूत रामा बुढ़िया के... अजीब हालत है. दूसरों को अपना गोत्र बढ़ते देखकर खुशी होती है, खासकर उन्हें जिनको अभी जाने कितना लड़ना-भिड़ना है, मगर यहां तो हिंदुओं की जातिप्रथा की तरह घेरा बराबर छोटा ही होता चला जाता है. कहने की जरूरत नहीं, कि यह जिंदगी नहीं मौत की अलामत है.

सबसे पहले तो रचनाकार के भीतर बैठे हुए रचयिता की, सर्जक की, ढेरों वक्त तो उठा-पटक की इन्हीं तदवीरों में निकल जाता है. आदमी लिखे, तो कब लिखे? लेकिन सिर्फ वक्त की ही बात नहीं है, मन की भी बात है. एक ही तो मन है. उसे आप सर्जना में लगाइए तो सर्जना में लगेगा, उखाड़-पछाड़ में लगाइए तो उखाड़-पछाड़ में लगेगा. और अगर बहुत दिनों तक उससे यही उखाड़-पछाड़ का काम लेते रहिए, और सर्जना को भूल जाइए, तो एक बड़ा अंदेशा उसमें इस बात का भी है, कि मन की कंडिशनिंग मुस्तकिल या लगभग मुस्तकिल तौर पर उस उखाड़-पछाड़ के लिए ही हो जाये, और आप कभी लिखने बैठे भी, तो तबीयत हाजिर न हो, घिसते रहें अपना अलादीन का चिराग और जिन प्रकाट ही न हो! (जिन मैं इसलिए कह रहा हूं, कि सरस्वती और म्यूज से सब प्रतीक पड़े गये.) यह कुछ अच्छी बात नहीं है, कि ऐसी-ऐसी अनूठी प्रतिभा के होते हुए बरसों गुजर जायें, और कोई मार्के की नयी कहानी कलम से न निकले, और हरदम उन्हीं पुरानी 'नयी' कहानियों का तकिया करना पड़े. यह तो कुछ रचना-ोत के सूख जाने की बात है. कुछ समझ नहीं आता. अभी तो एक-एक के पास जाने कितनी-कितनी जबर्दस्त नयी कहानियां बाहर आने को छटपटा रही होंगी. यही लिखने की उम्र है. फिर क्यों वह इस फिजूल की मार-धाड़ में अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं? यह ठीक है, कि इससे थोड़ा तत्काल लाभ मिलता है, यहां-वहां अपनी कुछ चर्चा हो जाती है, मगर आखिर को तो अपना लिखना ही बड़ी चीज है, उसी से तो और सब चीजें हैं, और उसी दम घुटकर रह जाय, तो बात क्या बनी? हम पुरानों की कौन कहे, अब तो बहुत से नये कहानीकारों की भी उम्र ढल चली, कनपटी के बाल सफेद हो चले. शायद अच्छा होगा, कि इस सब दंद-फंद से अपना ध्यान हटाकर वह अपने लिखने-पढ़ने की ओर लगायें. मगर यह मैं क्यों और किससे कह रहा हूं? नये कथाकार के पास तो अपने इस न लिख पाने या बहुत कम लिख पाने की भी दलील मौजूद है, वैसे ही जैसे अपने उलझे हुए, बेजान और फुसफुसे लिखने के लिए. बरसों से नयी कहानी की वकालत करते-करते इस दलीलबाजी में अब वह बड़ा हातिम हो गया है. वह अगर ज्यादा लिखता है, तो यह उसकी सिफत है, उसके पास इतना कुछ कहने को है, एक ऐसी तड़प, एक ऐसा बलबला, जो किसी पुराने के पास नहीं. हो भी कहां से? सब बुझ जो गये हैं! वह अगर बहुत कम लिख पाता है, तो यह भी उसकी सिफत है. नयी कहानी लिखना कोई दाल-भात का कौर है? कोई पहलेवाली कहानी तो है नहीं, कि जब मन में आया बैठ गये, और कहानी घसीट दी. भाव के पकने में, शिल्प का रूप लेकर ढलने में भी तो कुछ समय लगता है कि यों ही? कोई जानता है, समुंदर की तलहटी में एक मोती को मोती बनने में कितना वक्त लगता है? नयी कहानी भी ऐसी ही चीज है. उसकी चीज अगर पढ़ी जाती है, तो उसके लिखने का कमाल है, अगर नहीं पढ़ी जाती, तो यह पढ़नेवाले की जहालता है. आवां गार्ड (हरावल दस्ते) को आर्ट की दुनिया में हमेशा इस चीज का सामना करना पड़ा है. हमारी चीज का खास मजा लोगों की जबान पर चढ़ने में आखिर कुछ तो वक्त लगेगा ही!

इसी चीज को नये से अलग कहानीकार पर पलट दीजिए, तो यह शकल बनती है

वह अगर खाने-पीने, सोने-जागने की ही तरह निसर्ग की प्रेरणा से बराबर लिखता है, और नियम से लिखता है, तोयह आदमी कहानी लिखता है कि घास छीलता है! इसने तो आर्ट को भी मुंशीगीरी की शक्ल दे दी. आजमाये हुए पुराने नुस्खे लेकर बैठ गया है, और वही एक रग के पॉ-ब्वप्यलर्स लिखता चला जाता है. कहीं ताजगी नहीं. अगर बेचारा कम लिख पाता है, तोदेखा न? हम पहले ही कहते थे, चुक गया यह आदमीबिलकुल खलास! अगर उसकी चीजें पढ़ी जाती हैं, तो यह उसके घटिया लेखक होने की बहुत काफी दलील है. और अगर नहीं पढ़ी जातीं, तोदेखिए जमाना कहां से कहां निकल गया, आप अब भी अपना वही पचड़ा गाये जा रहे हैं. आखिर कहां तक कोई बर्दाश्त करे? अब टके को नहीं पूछता कोई.

यानी कि चित भी मेरी और पट भी मेरी, हैड्स आई विन टेल्ज यू लूज!

अपनी इस स्थिति को बनाये रखने के लिए एक जगह पर आकर यह भी जरूरी हो जाता है, कि यह नया कहानीकार अपनी रचना के बारे में साफ-साफ कोई बात कहने से सयत्न बचे, एक खास तरह की संध्या भाषा में गोल-मोल बातें करे, अपनी उसी कुहरे में लिपटी हुई शब्दावली के सहारे अपनी कला के इर्द-गिर्द एक ऐन्द्रजालिक-से रहस्यलोक की सष्टि करे. और शायद इसीलिए, अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, एक प्रमुख नये कहानीकार ने, जो उतने ही प्रमुख भाष्यकार भी हैं, नयी कहानी के एक जाने-माने और शायद पहले भाष्यकार की इस बात को लेकर बड़ी लानत-मलामत की है, कि उसने नयी कहानी की परिभाषा करनी चाही, और अपनी इस कोशिश में दस बरस में दस परिभाषाएं कीं. मेरे इस यार ने कहा, कौन इस बकबक में पड़े, हर बार एक नयी परिभाषा देनी पड़ेगी, लाओ कन्ने ही से काट दूं, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. जब मैं कोई बात साफ-साफ कहूंगा ही नहीं, तो कोई मुझे पकड़ेगा कैसे? इसीलिए तो लोग अपने सैकड़ों-हजारों रुपये देकर बड़े-बड़े वकीलों-मुख्तारों से अपने कानूनी दस्तावेज लिखवाते हैं, ताकि कहीं पकड़ न रहे!

कानून की वद्धि और साहित्यकार-सर्जक की बुद्धि एक नहीं होती. दोनों में निश्चय ही कुछ मौलिक अंतर हैं, इस बात को याद रखना शायद अच्छा होगा. साहित्य की प्रकत भूमि सहजता है. उसमें बनावट के लिए जगह नहीं है, और जहां बनावट का सहारा लिया जाता है, वहां उसको उघड़ने में भी बहुत देर नहीं लगती.

जो हो, छोड़िए उसको. फिर भी इन तमाम नयी कहानियों और इनके (उलझे-पुलझे ही सही) भाष्यों से कुछ तो एक तस्वीर उस चीज की हमारी आंखों के आगे बनती ही है. उसी के सहारे हम पूरी सद्भावना से समझने का यत्न करें, कि यह नयी कहानी क्या है, क्यों पैदा हुई है, और इसी वक्त क्यों पैदा हुई है? वह क्या कहना चाहती है, और नहीं कह पाती, या नहीं कहना चाहती, और अनजाने कह जाती है?

पहली बात तो यह, कि अगर 'नयी कहानी' कहानी से इतर कोई बिलकुल भिन्न विधा नहीं है, तो यह नया विशेषण बिल्कुल निरर्थक है, जिस नयेपन को अपने नयेपन का बिल्ला लगाकर घूमना पड़े, वह कोई नयापन नहीं है. साहित्य में कति ही प्रमाण होती है. 'नये' कहानीकारों को अगर इस बात का विश्वास था, कि वह एक ऐसी कहानी साहित्य को दे रहे हैं, जैसी पहले कभी नहीं लिखी गयी, तो उनके अंदर यह आत्म-विश्वास भी होना चाहिए था, कि वह अपनी कहानियों के ही जरिये, बगैर अपने नयेपन का ढिंढोरा पीटे, लोगों पर अपना सिक्का जमा देंगे कि यह एक बिलकुल नयी और अछूती चीज है. 'नयी' का साइन-बोर्ड टांगने में जो मुस्तैदी दिखायी गयी, उससे आदमी निश्चय ही सोचने को प्रेरित होता है, कि शायद यह कोई नयी दूकान जमायी जा रही है, और यह भी कि इस नामकरण की प्रेरणा हो न हो नयी कविता से मिली है. कोई कितना ही बगलें झांके, इस बात से बच पाना शायद मुश्किल है, कि 'नयी कविता' के वजन पर ही 'नयी कहानी' को यह नाम मिला है. इतना ही नहीं, जैसा कि मैं आगे चलकर दिखाने का यत्न करूंगा, नयी कहानी और नयी कविता में निश्चय ही किसी जगह पर कुछ भावगत साम्य है.

दूसरी बात यह कि अपने अर्थ में हर अच्छी और खूबसूरत कहानी नयी होती है, क्योंकि वह अपना एक नया भावलोक लेकर आती है, और हमको एक नयी-सी, अछूती-सी संवेदना देती है. और इसलिए देती है या दे पाती है, कि उसने लिखे जाने से पहले सर्जक के मर्म को भी कुछ-कुछ उसी तरह हुआ था. वही कथा-बीज अंकुरित पल्लवित होकर कहानी के रूप में पाठक के पास पहुंचता है, और अगर उसको एक नया-सा स्वाद कहानी में न मिले, तो शायद वह उसमें सहज ही एक नयापन होता हैकथ्य और शिल्प दोनों में. वह ओढ़ा हुआ नयापन नहीं होता, न विज्ञपित नयापन होता है, वहां तक कि ऐच्छिक नयापन भी नहीं होता. वह सहज नयापन होता है, और इसलिए होता है, कि जीवन और समाज और व्यक्ति (जो ही कहानी के उपजीव्य हैं) जब गतिशील हैं, यानी बराबर बदलते और नये होते जा रहे हैं, और अगर इस बदलते हुए जीवन-यथार्थ के सत्य को, सार-मर्म को पकड़ना है, रूपायित करना है, तो कहानी का कथ्य और शिल्प भी उसके अनुरूप बराबर बदलने और नये होते जाने के लिए बाध्य है. यह कोरे सिद्धान्त की बात नहीं है. यही होता है. रचना के स्तर पर यही वह चुनौती है, जिसका सामना हर सजग और गंभीर कहानीकार को करना पड़ता है. हर बार जब वह कोई नयी कहानी हाथ में उठाता है, और जिस सीमा तक वह इस चुनौती को निबाहने में खुद अपनी कसौटी पर खरा उतरता है, उसी सीमा तक उसको अपनी रचना से सुख होता है. सजन के स्तर पर वही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होती है. और यह कहना जरूरी है, कि अपने युग के सत्य को, बदलते हुए जीवन-परिवेश के नये राग और उसकी नयी संवेदनाओं को अपनी कला में रूपायित करने का सर्जनात्मक आग्रह कोई ऐसा आग्रह नहीं है, जिससे आज पहली बार नये कहानीकार को दो चार होना पड़ रहा है. यह बहुत पुरानी बात है, और हर देश-काल के लिए सही है. इसी नाते कथा-साहित्य का इतिहास, अपने विशिष्ट स्तर पर और अपनी विशिष्ट शैली में, बदलते हुए जीवन और समाज का इतिहास भी बन जाता है. इसीलिए हम देखते हैं, कि, दूर क्यों जाइए, प्रेमचंद के यहां जहां आपको एक तरफ बिल्कुल पुरानी दकियानूसी तिलिस्म और ऐयारी की कहानियां भी मिलती हैं, वहां दूसरी तरफ 'कफन' और 'पूस की रात' और 'बड़े भाई साहब' और 'गुल्ली-डंडा' और 'नया विवाह' और 'कशमीरी सेब' जैसी ढेरों कहानियां भी मिलती हैं, जो अपने कथ्य और शिल्प दोनों में बिलकुल नयी हैं. अभी हाल में 'नयी कहानी' के एक प्रमुख प्रवक्ता ने अपने एक लेख में कहा है, कि 'कफन' नयी कहानी है, जब कि महीनों हुए वाद-विवाद के बावजूद 'वापसी' नयी कहानी नहीं है. मैं समझता हूं, कि उन्होंने समझ-बूझकर काफी जिम्मेदारी के साथ यह स्थापना की होगी, और उससे सहज ही निकलते निष्कर्षों पर भी यथेष्ट ध्यान दिया होगा. जो हो, मुझे स्मरण है, कि अब से सात-आठ बरस पहले 'नयी कहानी' की एक चर्चा-गोष्ठी में जब मैंने तथाकथित 'नयी कहानी' को हिन्दी कहानी की परंपरा से जोड़ने का यत्न करते हुए उदाहरण के रूप में प्रेमचंद की कुछ कहानियों का उल्लेख किया था, तो इन बंधु को मेरी बात बहुत रुचिकर नहीं लगी थी. उस गोष्ठी में विषय का प्रवर्तन इन्हीं

बंधु ने किया था, और प्रायः सभी जाने-माने नये कहानीकार उसमें उपस्थित थे. मगर खैर, अब मैं इन बंधु से इतना ही कहना चाहूंगा, कि वह 'कफन' को प्रेमचंद की एक 'फ्रीका' कहानी मानने की गलती न करें, तो अच्छा होगा, क्योंकि प्रेमचंद के पास ऐसी ही और भी बहुत-सी कहानियां हैं, भले वह इन बंधु के आगे से न गुजरी हों. और प्रेमचंद के ही यहां नहीं, औरों के यहां भी उनको ऐसी कहानियां मिल जायेंगी, जिनकी परंपरा से अपना योग स्थापित करने में उनको अपनी 'नयी कहानी' की मानहानि का भय न होना चाहिए. यशपाल के संपूर्ण कहानी साहित्य को उन्होंने जितनी आसानी से डिसमिस कर दिया है, यह उन्हीं के साहस की बात है. यह ठीक है कि यशपाल ने कमजोर फार्मूलावादी कहानियां भी लिखी हैं, जैसा कि हर कोई लिखता है, मगर उसी ने 'पर्दा' और 'गंडेरी' और 'साग' जैसी कम-से-कम दो दर्जन ऐसी जबर्दस्त कहानियां भी लिखी हैं, जो सदा उतनी ही नयी और ताजा रहेंगी. यशपाल से जुड़ी हुई और उसके तत्काल बाद की पीढ़ी में चंद्रकिरण के यहां, अमत के यहां, रांगेय राघव के यहां और बहुत-से लिखनेवालों के यहां, जिन सब के नाम यहां पर गिनाने की जरूरत नहीं, उनको बहुत-सी ऐसी कहानियां मिल सकती हैं, जिनसे आज की कहानी अंगागि रूप में जुड़ी हुई है. प्रेमचंद से शुरू करके यशपाल के रास्ते होते हुए अज्ञेय की 'रोज', राधाकष्ण की 'अवलंब' और 'एक लाख सत्तानवे हजार', चंद्रकिरण की 'बेजुबां' और 'आदमखोर', अमत की 'कठघरे' और 'लोग' और रांगेय राघव की 'गदल' जैसी कहानियों तक चली आती हुई हिंदी कहानी की अविच्छिन्न जीवन्त परंपरा से अपना नाता तोड़कर इस तथाकथित 'नयी कहानी' ने किसी और का नहीं अपना ही अकल्याण किया है. जिस तरह अपनी चर्चाओं में वह अपने से पहले की कहानी की चर्चा से बराबर बचते रहे हैं, उससे यह नतीजा निकालना बहुत गलत न होगा, कि वह अपने से पहले के किसी कहानीकार का अस्तित्व नहीं मानते. न प्रेमचंद को, न जैनेन्द्र को, न अज्ञेय को, न यशपाल को, न और किसी को. यह उनकी अपनी खुशी की बात है, पर जो देखने में आता है, वह यही कि इस तरह अपनी परंपरा से समूल अपना नाता तोड़ने का अभिनय करके (क्योंकि नाता वह तोड़ नहीं सके हैं, वह तो है, उसी तरह जैसे उनकी रगों में ख्ूान बह रहा है), उन्होंने खामखाह अपने को एक आकाशबेल बना लिया है, जिसमें और सब हो स्थायित्व तो नहीं ही होता, क्योंकि उसकी जड़ धरती में नहीं होती.

'नये' कहानीकारों के लिए यह बात बहुत गंभीरता से सोचने की है. रूढ़ि से नाता तोड़ना एक बात है, परंपरा से नाता तोड़ना बिल्कुल दूसरी. रूढ़ियों से नाता हर समर्थ साहित्यकार तोड़ता है, इसलिए कि रूढ़ियां उसको आगे बढ़ने से रोकती हैं, उसकी कला को, अभिव्यक्ति को कुठित करती हैं. मुर्दा अतीत को ही रूढ़ि कहते हैं. मगर उसी अतीत का ही एक जीवन्त तत्व ऐसा भी होता है, जो हमारे साथ चलता है, बराबर चलता आया है. उसी को परंपरा कहते हैं. चिंतन की उन रूढ़ शैलियों को, जो वक्त के तकाजों का जवाब न दे सकने के ही कारण मर गयीं और रूढ़ियां बन गयीं, बदलते हुए जीवन परिवेश में, उन्हीं जीवन-संघर्षों में से होकर निकलती हुई अग्निपूत रक्ताक्त चिंतन-संपदा से, जो समय की धारा के साथ बराबर होती चलती हैं, पुरानी मुर्दा चीजें छोड़ती और नयी जानदार चीजें जो अपने में जोड़ती चलती हैं, और जिसका ही नाम परंपरा है, ऐसी उन मुर्दा रूढ़ियों को उस जीवन परंपरा से अलग करके देख सकने में ही हर सोचनेवाले और लिखनेवाले का सबसे बड़ा इम्तहान होता है. इसी में उसकी सूझ-बूझ की अन्तर्दष्टि की सबसे कठिन परीक्षा होती है. यकीनन यह मुश्किल काम है, मगर यह कब किसने कहा कि साहित्य-रचना आसान काम है?

'नयी कहानी' की भावधारा क्या है? मैं सोचता हूं, कि उसके भीतर कोई केंद्रीय भावधारा ढूंढ़ना गलत होगा. यानी कि अगर बहस के लिए मान लें, कि 'नयी कहानी' नाम की कोई चीज है. अभी तो वह नये लिखनेवालों की बस एक टोली है, जिसमें कई रंगों के लिखनेवाले हैं, और जिनका अपना-अपना रंग-ढंग भी अलग-अलग कहानियों में अलग-अलग दिखायी पड़ता है. जहां तक पढ़नेवाली की बात है, उसको उनकी बहुत-सी कहानियां या तो पल्ले नहीं पड़तीं, या बहुत उबानेवाली मालूम होती हैं, और कुछ जो बहुत अच्छी मालूम होती हैं (और ऐसी कुछ कहानियां सभी के पास हैं,) उनका स्वाद उसको किसी तरह पहले की कहानियों से अलग नहीं मालूम होता. बहरहाल जिस तरह इस नाम की कहानियों में अक्सर यौन-कुंठा का उलझा-उलझा-सा ताना-बाना बुना जाता है, उसको देखकर ऐसा जरूर मालूम होता है, कि जिस भी वजह से हो, उन्होंने अपने से बाहर अपनी आंखों के आगे फैली हुई रंग-बिरंगी दुनिया के साथ अपने को मिलाकर जीवन का एक अधिक समग्र चित्र देने के बदले अपने भीतर सिमटकर मकड़ी के जाले बुनना अधिक श्रेयस्कर या निरापद समझा है. इस नाते मेरे देखने में निश्चय ही नयी कहानी में रुग्ण व्यक्ति-परकता का स्वर उभरा और समाज-परकता का स्वर दबा है. ऐसी बात न होती, तो 'नयी' कहानियों में हमारा बहुमुखी जीवन बोलता, हमेशा वही कुंठा और वासना की ढीली या कड़ी चाशनी न मिलती. वही ऊब, वही थकन जो सब उसी रुग्ण मानसिकता के प्रतिफल है, जिसमें आदमी ने बाहर की दुनिया पर, जो अच्छी भी है बुरी भी है, काली भी है, सफेद भी है, आंखें मूंद ली हैं, और अपने अकेलेपन की मानसिक ग्रंथियों में खो गया है. इसीलिए जहां

सीधे-सीधे यौन कुंठा नहीं भी है, वहां भी समाज में और किसी भी प्रकार के सामाजिक कर्म में और मनुष्य के भविष्य में अनास्था का स्वर जरूर है, जिसको उभारने के लिए आदमी की पशुता पर, नीचता पर, क्षुद्रता पर विशेष बल है, और उसका कोई भी मंगल रूप भूले से भी नहीं आने पाता, क्योंकि आंखों पर गलत चश्मे लगे होने की वजह से उसको उच्छल भावुकता या थौथी आदर्शवादिता मान लिया गया है, जब कि सच बात यह है कि वह बौद्धिकता ही थोथी हैं, रुग्ण है, एकांगी है, जो आदमी को, समाज को, दुनिया को उसके द्वंद्व में नहीं देख पाती, जहां दोनों तत्व बराबर संघर्ष करते रहते हैं. वह कोई प्रौढ़ दष्टि नहीं, रोगी की दष्टि है. प्रौढ़ दष्टि वह है, जो जीवन को खुली आंखों देखती है, और उसके समग्र रूप में देखती है. और दूर तक देखती है. यह ठीक है कि आज हमारे इस पूंजी-संचालित समाज में (समाजवाद की तमाम उद्घोषणाओं के बावजूद जो निरा पाखंड है) समाज को स्वस्थ निर्माण की ओर ले जाने वाले विधायक तत्व बड़े ही कमजोर हैं, भविष्य बहुत ही अंधेरा है, विदेशी पूंजी और देशी पूंजी की सांठ-गांठ से जो उद्योगीकरण हो रहा है, उसने हमारे पुराने समाज की, उसके नैतिक संस्कारों की, मानव-मूल्यों की चूलें हिला दी हैं, और उनकी जगह पर रातोंरात ले आकर बिठाल दिया है महाजनी समाज की तमाम विकतियों को. आप चाहें तो इसे एक मौन क्रान्ति कह सकते हैं, जैसा कि नेतागण अकसर बड़े गर्व से कहा भी करते हैं, लेकिन क्रान्ति हो चाहे प्रति-क्रान्ति, चाहे उत्क्रान्ति, स्थिति निश्चय ही अत्यंत भयावह है, और हम उसके साक्षी हैं. गहरे मंथन का युग है, जो एक चुनौती की तरह हमारे सामने खड़ा है, और हमसे उतने ही गहरे आत्म-मंथन की मांग करता है. जीवन का सारा रंग-रूप हमारी आंखों के आगे बदल रहा है, और दुर्भाग्यवश एक बुरी दिशा में बदल रहा है, और एक विचित्र-सी असहायता की स्थिति है. हम भी उसी स्थिति का अंग हैं, और वह जहर हमारे अंदर भी पैठता है, और अपनी इस मनः स्थिति में हमारी भी सहज प्रवत्ति ऐसी जीवन-दष्टि की ओर होती है, जो आदमी की पशुता को ही उभारकर हमारे सामने रखती है (क्योंकि यही तो हम अपनी आंखों के आगे होते भी देख रहे हैं), और मनुष्य की नियति को एक अंधी गली में जाकर खत्म होते देखती है (क्योंकि अपने आसपास देखकर हमको भी तो बहुत बार ऐसा ही लगता है) लेकिन यहीं पर हमारे साहस, धैर्य और जीवट की परीक्षा होती है. पुरानों का भी, नयों का भी. हमारे सामने दो ही विकल्प हैंया तो हम अपनी साहसपूर्ण, प्रखर निर्मम वस्तु-दष्टि से और गहरी आत्मसजग अंतर्दष्टि से आज के समाज के बदलते हुए यथार्थ को देखने, समझने और पहचानने का यत्न करें, और फिर उसको अपने मानस-चित्र के अनुसार दिशा या संस्कार देने का यत्न करें, ढहते हुए जीवन-मूल्यों की इस घड़ी में सत्य के न्याय के सौंदर्य के नये मूल्यों की सष्टि करें, या फिर आत्यंतिक पराजय की मनःस्थिति में इन सबसे पराङमुख होकर अपनी कोठरी में जा बैठें, और कोरे सौन्दर्यवादी यानी ईस्थीट की तरह बियर और कॉफी की चुस्कियां लेते हुए अपनी आत्मरति की परतें खोलें मगर युग की प्रकति को ध्यान में रखते हुए, अपने को या दूसरे को छलने के लिए कहें कि यह हमारी विशिष्ट सामाजिकता है, जो निरी सामाजिक दष्टि से अच्छी है, क्योंकि इसको हमने अपने भीतर से पाया है. साहित्य हमेशा जो कुछ पाता है, अपने भीतर से ही पाता है, और जो कुछ देता है, वह भी अपने भीतर से ही देता है, लेकिन बुनियादी सवाल यह है, कि आपने पहले उसके भीतर डाला क्या है, जिसकी पुनर्सष्टि करके आप बाहर ला रहे हैं? और यह एक ऐसा सवाल है, जैसे सवालों का जवाब दूसरे को देने के बदले अपने-आप को देना ज्यादा अच्छा रहता है, क्योंकि उसमें आदमी ज्यादा सच्चा जवाब देता है. वर्ना बहस तो कयामत तक चल सकती है!

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