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प्राची - मई 2016 : स्मृति शेष / मत्यु सुनिश्चित है : मुइनुद्दीन अतहर / प्रभात दुबे

 

स्मृति शेष

मत्यु सुनिश्चित है : मुइनुद्दीन अतहर

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(जन्मतिथि : 1 जून 1944 , महाप्रयाण : 4 अप्रैल 2016 )

प्रभात दुबे

'अतहर साहब' नहीं रहे, यह समाचार मुझे फेसबुक के माध्यम से अतहर जी की मत्यु के दूसरे दिन प्रातः प्राप्त हुआ. इस समाचार को श्री विजय तिवारी 'किसलय' ने अतहर जी की एक सुन्दर रंगीन तस्वीर के साथ उनके चाहने वालों को अवगत कराने हेतु फेसबुक में प्रर्दशित किया था. समाचार अप्रत्याशित एवं दुखदायी था. समाचार पढ़ते ही सबसे पहले मुझे किसी अज्ञात शायर का यह मिसरा याद आया- 'मौत आई हमें खबर नहीं हुई, ऐसी गफलत तो उम्र भर नहीं हुई.' अतहर जी, उम्र भर अपने काम के प्रति सजग रहे, चैतन्य रहे. उन्होंने कभी भी किसी काम में कोई गफलत नहीं की, यदि वे गफलत करते होते तो लगभग 9-10 बरसों से उनके संपादन में 'प्रतिनिधि लघुकथा' का प्रकाशन नहीं होता और न ही पच्चीस-तीस बरसों से लगातार म. प्र. लघुकथाकार परिषद का वार्षिक सम्मेलन का आयोजन ही हो पाता. उनके यह दोनों कार्य उनकी श्रेष्ठता के परिचायक हैं.

'अतहर जी' का अनायास यूं चले जाना, उनके साहित्यिक मित्रों के साथ ही साथ हिन्दी लघुकथा के लिये भी एक अपूर्णनीय क्षति माना जायेगा. वे जबलपुर संस्कारधानी के लघुकथाकारों की प्रथम पंक्ति के प्रथम लघुकथाकार तो थे ही किन्तु इसके साथ ही साथ वे इन्सान भी बहुत भले थे. वे मदुभाषी और मिलनसार थे. वे हिन्दी लघुकथा के समर्पित सशक्त हस्ताक्षर थे. अतहर जी ने प्रायः देश के सभी छोटे-बड़े लघुकथाकारों को समय-समय पर अपनी त्रैमासिक पत्रिका लघुकथा प्रतिनिधि में प्रकाशित किया है.

सादा लिबास, सादा जीवन उच्च विचार के धनी, मौन साहित्य तपस्वी अतहर जी का सर्वप्रथम मेरा परिचय मेरे ही विभाग के लघुकथाकार श्री राजेश चौकसे जी के माध्यम से ही हुआ था. फिर उनसे मिलने का एक सिलसिला चल पड़ा जो काफी बरसों तक अनवरत जारी रहा. वर्ष 2007 के आसपास जब वे श्री धीरेन्द बाबू खरे (स्टेनो) से मिलने के लिये प्रायः प्रतिदिन उनके एग्रीकल्चर कार्यालय जबलपुर के स्टेनो कक्ष में आया करते थे तो वहॉ स्व. डॉ. श्रीराम ठाकुर दादा, श्री रमेश सैनी, श्री प्रदीप शंशाक, श्री कुंवर प्रेमिल, स्व. मनोहर शर्मा माया, अशोक कुमार श्रीवास्तव सिफर तथा शहर के अनेक लघुकथाकारों के साथ बैठकर हमलोग शाम पांच बजे से रात्रि नौ बजे तक साहित्य चर्चा किया करते थे. अतहर जी से मिलने का एक प्रमुख स्थान और भी याद आ रहा है जहां हम सभी अतहर जी से मिला करते थे. वह स्थान था 'साहित्य सदन' यानि वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजकुमार सुमित्र जी का घर. वहां भी हम लोग बैठ कर काफी देर साहित्य चर्चा में भाग लिया करते थे.

लघुकथा की राष्ट्रीय पहचान कही जाने वाली त्रैमासिक पत्रिका 'लघुकथा अभिव्यक्ति' का प्रारंभ श्री अतहर जी के द्वारा संभवतः 2007 के आसपास प्रारंभ किया गया, जिसका प्रकाशन आज भी अनवरत जारी है. वर्तमान में किसी पत्रिका का नियमित प्रकाशन ही इस बात का परिचायक होता है कि उसका प्रकाशक/संपादक धीर, गंभीर और परिश्रमी है. मेरा ऐसा मानना है कि 'लघुकथा अभिव्यक्ति' के प्रकाशन से हिन्दी लघुकथाओं के प्रचार-प्रसार को काफी बल मिला है.

'म.प्र. लघुकथाकार परिषद' के संस्थापक अध्यक्ष श्री मुइनद्दीन अतहर जी द्वारा हर वर्ष प्रत्येक फरवरी माह में वार्षिक सम्मेलन का पिछले अठारह बरसों से लगातार सफलता पूर्वक आयोजन जबलपुर में किया जाता रहा है.

अतहर जी एक सहज स्वभाव के सरल लेखक थे. वे जैसा बोलते थे वैसा ही लिखते थे. जितने सहज वे अन्दर से थे उतने ही सहज वे बाहर से भी थे. उनमें किसी प्रकार का कोई आडंबर नहीं था. वे सीधे, सच्चे सरल हृदय के व्यक्ति थे. अंहकार से कोसो दूर, विनम्र स्वभाव के धनी जाने माने साहित्यकार थे. उनकी कलम में पैनापन था. उनकी रचनायें प्रायः सभी राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाषित हुआ करती थीं और उन्हें जबलपुर आकाशवाणी से भी सुनने का बहुधा अवसर प्राप्त होता रहा है.

वरिष्ठ लघुकथाकार अतहर जी संस्कारधानी की वर्तमान पीढ़ी के सषक्त हस्ताक्षर थे. उनके लेखन में स्वर्गीय डॉ. श्रीराम ठाकुर 'दादा' का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. अतहर जी स्व. डाँ. श्रीराम दादा की अगली पीढी के लघुकथाकार थे.

साहित्य चितेरे अतहर जी केवल लघुकथाकार ही नहीं थे, बल्कि वे कथाकार, उपन्यासकार और शायर भी थे. समय समय पर उनकी गजलों का प्रसारण आकाशवाणी जबलपुर से होता रहा है. उन्होंने हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में

साधिकार लेखन किया है, और उनकी हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में लगभग अठारह से अधिक कृतियों का प्रकाशन हुआ है, जिनमें से प्रमुख रुप से 'कांटे ही कांटे', 'शैतान की चाल', 'कैक्टस', 'वर्तमान का सच', 'चिलचिलाती चांदनी', 'सदाए वक्त', 'वसीलए निजात', 'अताए रूमी', 'आअत शरीफ', 'खुमार बाकी है', 'अतहर के आयाम', 'हम नहीं

सुधरेगें', 'बहू बेटा', 'जीवन का सत्य', 'खण्डित स्वप्न आदि. उनके संपादन में बारह वर्ष तक लगातार नर्मदा संचार विभागीय पत्रिका भी प्रकाशित होती रही है.

हिन्दी साहित्य को दिये गये उनके योगदान के फलस्वरूप उन्हें नगर निगम जबलपुर द्वारा 1100 रुपये नकद राशि देकर सम्मनित किया गया था. इसके अतिरिकत उन्हें अनेक संस्थाओं ने समय-समय पर उनके साहित्य योगदान के लिये सम्मानित किया गया है. आज अतहर जी हमारे बीच नहीं है, किन्तु अतहर जी हमेशा हमारे मन मस्तिष्क में अपनी कतियों के

माध्यम से सदैव जीवित रहेगें.

मेरी विनम्र श्रदाजंलि उन्हें सादर समर्पित है.

सम्पर्कः 111 पुष्पांजली स्कूल के सामने,

शक्तिनगर, जबलपुर-482001

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