गुरुवार, 9 जून 2016

प्राची - मई 2016 : समीक्षा / सतत् अनुभव में पगी कवितायें / बृज मोहन

 

समीक्षा

सतत् अनुभव में पगी कवितायें

बृज मोहन

'अनलपंख' के बाद चित्रकार चन्द्रकान्त घाडगे 'चन्द्र' का हाल ही में दूसरा काव्य-कला संकलन 'अन्तरंग' आया है. स्वर्गीय पत्नी निशा को समर्पित इस संकलन में कवि ने कहा है, सजन के आकाश में कल्पना की उड़ान एवं अन्तःप्रज्ञा अहम् भूभिका निभाते हैं. कितनी भी उड़ान भरो, पर पैरों को

धरती चाहिये ही. बिना यथार्थ की अनुभूति के कल्पना भारहीन हो जाती है. कल्पना का रंग यथार्थ के फलक पर ही उभरकर आता है. जब तक अपने हृदय में पीर की अनुभूति नहीं, दूसरों की पीर नहीं समझी जा सकती है. तब सजन निःसन्देह सार्वभौमिक नहीं हो सकता.

संकलन में जीवन के अनुभवों में पगी विभिन्न रंग लिये 84 कवितायें हैं. कविताओं में प्रेम है, कचोट है, कराह है, देह है, वासना है, जिन्हें जीवन की कसौटी पर परखते हुये सन्तुलित शब्दों में सचेतक की भूमिका निभाते हुये कवि ने एक साधक के रूप में उकेरा है. कवितायें जहां करुणा का भान कराती हैं, वहीं आह्लाद भी उत्पन्न करती हैं.

व्यक्ति के जीवन में तराश सतत् संघर्ष से ही आती है- आग में तपना/हथौड़े से पिटना/पानी में छनकना पड़ेगा कई बार/अगर हम तोड़ना चाहते हैं शिलायें/और रखना चाहते हैं अपनी धार. चूंकि कवि सफल चित्रकार भी हैं तो कविताओं में चित्रात्मकता आना स्वाभाविक है- आंखों में गहरा काजल फैला सा/धूल से धोती का रंग मटमैला सा/श्रम के कारण शंगार बिखरा सा/खेत की बयार से रूप निखरा सा/चाल है जैसे लहरों पर नाव की/चली आ रही वह गोरी गांव की. खजुराहो/उमंग है, आनन्द है/मानवीय एकाकार की उच्चतम अभिव्यक्ति है, खजुराहो/क्रीड़ा है, कर्म है/शरीर का रचनात्मक धर्म है.

प्रेम में क्रोध और वासना स्वीकार्य हैं- वासना/प्रेम का तन है/प्रेम वासना का मन है/समन्वित प्रेम-वासना/सजनात्मक जीवन है. दूर/इतनी दूर से/क्या खींचते हो कमान/मुझे तो होना ही है घायल/पर तुम्हारे पास होने से देख सकूंगा/तुम्हारा भकुटि विलास.

कवितायें वर्तमान की कठनाइयों व स्वार्थपरक जीवन की सच्चाइयों से मुख नहीं मोड़तीं, उन पर कटाक्ष भी करती हैं- चढ़ती रही मीनारों पर मीनारें/जमीदोज हुईं कच्ची दीवारें/अर्थ ने मरोड़े निष्कर्ष/सम्बन्ध सब पड़े रह गये.

कविताओं में प्रकृति, सौन्दर्य व मनोभावों के मुखर चित्रण हैं, जो विचारों को झंकृत करने के साथ संवेदनाओं की सहज अनुभूति देते हैं. कवि ने स्वयं पुस्तक का आमुख सजाया है और प्रत्येक कविता के संग स्वयं का रेखांकन है, जो माडर्न आर्ट की समझ रखने वालों को अलग आनन्द देंगे.

समीक्षक का पताः 35, मनोरम, कछियाना,

पुलिया नं. 9, झांसी-284003 (उ.प्र.)

कृति : अन्तरंग (काव्य संग्रह)

प्रकाशक : विशाल राव घाडगे

-1, 102, स्तुति रेसीडेन्सी, पाल गांव रोड,

अडाजन, सूरत-395009

मूल्य : 200

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