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प्राची - मई 2016 : शोध आलेख / प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया' में व्याप्त लोक संस्कृति / प्रदीप कुमार

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  शोध आलेख प्रो . तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया' में व्याप्त लोक संस्कृति प्रदीप कुमार सं स्कृति एक व्यापक शब्द है. इसके अर्...

 

शोध आलेख

प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया' में व्याप्त लोक संस्कृति

प्रदीप कुमार

संस्कृति एक व्यापक शब्द है. इसके अर्थ को परिसीमित करना सरल नहीं है. यह अनेक तत्वों का बोध कराने वाली एवं जीवन की अनेक विशेषताओं से युक्त है. इस संसार में मानव मन की अन्तर्निहित चेतना के द्वारा जिस किसी भी चीज का निर्माण हुआ है, वह संस्कृति है. लोक शब्द का अभिप्राण साधारण मनुष्यों से है, जिनकी व्यक्तिगत पहचान के स्थान पर सामूहिक पहचान होती है और उस समूह की दलित, पिछड़ी, आदिवासी, जंगली, गरीब, मजलूम आदि समस्त लोक समुदाय का मिला-जुला स्वरूप लोक कहलाता है तथा इनकी मिली जुली संस्कृति लोक संस्कृति

कहलाती है.

किसी भी देश की लोक संस्कृति जातीय एवं क्षेत्रीय आधार पर अलग-अलग होती है. किसी भी समुदाय की पूर्ण जातीय लोक संस्कृति उससे परिभाषित होती है. वह उस समूह की आध्यात्मिक एवं नैतिक चेतना को साकार करती है. लोक में कई पीढ़ियों से प्रचलित रीति-रिवाजों एवं संस्कारों से उसकी स्थापना होती है. यही वह लोक भूमि है जिसमें समुदाय के सभी नाते-रिश्ते व तीज त्योहार उत्पन्न होते हैं. उस समुदाय की उत्सवधर्मिता का लोक संस्कृति ही पालन-पोषण करती है तथा उसमें वृद्धि एवं परिवर्तन करती है. इसी से उनकी अलग स्थापना होती है.

प्रो. तुलसीराम जी ने अपनी आत्मकथा 'मुर्दहिया' में जिस तरह लोक-संस्कृति पर एक-एक शब्द गढ़ा है, वह जिजीविषा को उत्पन्न करने वाला है. मुर्दहिया एक बड़े तबके की सम्पूर्ण संस्कृति को उजागर करती है एवं भोजपुरी क्षेत्र में प्रचलित नृत्य, गायन, संगीत, तीज-त्योहार, रस्म-अदायगी इत्यादि के वर्णन से रोचकता प्रदान करती है. प्रो. तुलसीराम ने अपने जीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों एवं लोक संस्कृति की कला को जिस तरह शब्दों में पिरोया है वह कालजयी है, उसका चित्र यकायक आंखों में छा जाता है और पाठक कुछ समय के लिए उन चित्रों को स्वयं भोगता हुआ-सा महसूस करने लगता है.

जब तुलसीराम जी प्रथम कक्षा में पढ़ते थे, उस समय प्रथम कक्षा की पढ़ाई 'पटरी व भरूकी' से की जाती थी. बुन्देली में इसे 'पट्टी-बोरका' कहते हैं, क्योंकि उस समय आज जैसी कॉपी किताबों की सुविधाएं नहीं थीं. बचपन में तुलसीराम जी खड़िया का घोल बनाकर काठ (कठवा) की पट्टी पर लिखा करते थे. कभी-कभी पानी की मात्रा अधिक हो जाने पर बालमन में पहेलियां बूझती थीं एवं इन पहेलियों पर बच्चों को दृढ़ विश्वास होता था. ये पहेलियां लोक संस्कृति की परम्परा के आधार पर काठ की पट्टी से पढ़ने वाले हर बच्चे के काम आती थी. इस पहेली से तुलसीराम जी के साथ-साथ सभी बच्चों को दृढ़ विश्वास हो जाता था कि उनका गीला घोल अब गाढ़ा हो गया है. वे गायन करते ''ताले का पानी पतारे जो, संरभर दुधिया मोरे में आ जो.''1

बचपन सर्वाधिक मनोरंजक अवस्था होती है. इसमें घर के बड़े-बुजुर्गो का लाड़ प्यार मिलना निश्चित होता है. प्रो. तुलसीराम जी को उनकी दादी घुंटू-मुंटू का खेल खिलाती थी. यह खेल आज भी भारत देश के अत्यधिक भूभाग में प्रचलित है. जिसमें खेल खिलाने वाला व्यक्ति पूर्व में पहेली बांचता है, इसके बाद बच्चों को पैरों में बैठाकर आसमान की ओर उछालता है. जिससे बच्चों में हंसी का फुहारा फूट पड़ता है. इन खेलों के साथ अक्का-बक्का खेल भी बचपन में तुलसीराम जी खेलते थे. तुलसीराम जी बचपन के इन खेलों का जिस रोचकता से वर्णन करते है, उससे लगता है कि हम अभी भी उसी खेल में तल्लीन हैं. दृष्टव्य है-

''उसका बक्का तीन चलक्का, लडवा लाची चन्ना काठी,

चनना में का बा, मकई क लावा, आवा हो बिलार हमरे घरवा में गावा

घरवा में गावा.''2

पुरातन काल में बच्चों की कमर व गले में तांबे के सिक्के को काले धागे में पिरोकर पहनाने का प्रचलन व्याप्त है, जिसे बुन्देली में 'नजरबट्टू' कहा जाता है. यह नजरबट्टू तुलसीराम जी के क्षेत्र में डब्बल नाम से प्रचलित है एवं जिसे तांबे के पैसे में छेद कर दिया जाता है, उसे छेदहवा कहा जाता है. लोक व्यवहार में ऐसी मान्यता है कि बच्चों को इसे पहनाने पर बुरी नजरों से बचाव हो जाता है और किसी प्रकार का अशुभ नहीं होता है. तुलसीराम जी इसका बड़ी बारीकी से वर्णन करते हुए कहते हैं- ''आजकल के पचास पैसे के सिक्के के बराबर तांबे का बना एक सिक्का होता था तथा दूसरा एक पैसे वाला सिक्का आज के रुपये वाले बड़े सिक्के के बराबर तांबे का ही बिना छेद वाला होता था, जिसे 'डब्बल' कहा जाता था. छेदहवा पैसों को करधनी में गूंथकर जन्मजात शिुशओं को कमर में पहनाना दलितों के बीच बड़ा शुभ माना जाता था. इसी शुभ प्रक्रिया में चवन्नियों के एक सिरे में सोनार द्वारा हुक लगवाकर धागे की बनी मोटी रस्सी में गूथकर 'जंतर' बनाकर बच्चों के गले में पहनाया जाता था.''3

साठ के दशक में लोगों के मध्य परस्पर विश्वास बहुत कायम था. तुलसीराम जी के गांव में एक हींग बेचने वाला साल में एक बार आया करता था और वह जरूरत के हिसाब से पूरे गांव वालों को हींग देता था जिसका मूल्य वह अगली (आने वाले एक) वर्ष में लेता था, जो उस दशक की विश्वसनीयता को प्रदर्शित करता है. साल भर पूर्र्व में दी गई हींग के रुपये लेने के तरीके का वर्णन करते हुए तुलसीराम जी कहते है- ''हे जगलू के माई, काम धाम बन्द करा हींग क पइसा खर्र करा.''4

ग्रामीण क्षेत्रों में पूर्ववत् आज भी जोगी बाबा होते हैं, जिन्हें विशेष अवसरों पर ग्रामीण लोगों द्वारा बुलाया जाता है. तुलसीराम जी के गांव में भी एक जोगी बाबा थे जो सप्ताह में एक बार उनके गांव आते थे. वे घने जंगल में झोपड़ी बनाकर निवास करते थे तथा निडर निर्भीक स्वभाव के थे. तुलसीराम जी उनका असली नाम रामजीत बताते हैं. यह जोगी बाबा काव्य शैली में बहुत ही कुशल थे, वे किसी एक शब्द को सुनते ही काव्य रचना करने में माहिर थे. इस विधा के बूते वे पूरे क्षेत्र के बहुत ही लोकप्रिय थे, जिसे सुनने के लिए उनके गांव में हुजूम उमड़ आता था. ऐसी काव्यधर्मिता बिरले लोगों में होती है. ऐसे ही कितने जोगी बाबा हुए होंगे जिनमें यह लोक संस्कृति की काव्यता निहित होगी, लेकिन लेखन के अभाव में जोगी बाबाओं की समाप्ति पर लोक काव्य भी विलुप्त हो गया होगा. तुलसीराम जी ने जोगी बाबा के काव्य को मुर्दहिया में वर्णित कर उनको सदैव के लिए जीवन्त कर दिया. तुलसीराम जी जोगी बाबा आशु की काव्य रचना का वाकया इस प्रकार प्रस्तुत करते है- ''जैसे किसी के मुंह से निकल गया, 'जोगीबाबा' वे तुरन्त गाने लगते-

'जइसन कहत बाड़ा जोगी, वइसन बढ़त बाड़ै रोगी

बड़ ससतिया सहबा राम, बड़ ससतिया सहबा राम.'

इसी तरह किसी मुंह से निकल पड़ा कि 'आंधी' आ रही है. जोगी बाबा गातेः

'जइसन कहत बाड़ा आंघी, वइसन मारल गइलै गांधी,

बड़ ससतिया सहबा राम, बड़ ससतिया सहबा राम.'

किसी के मुंह से 'दवा' शब्द निकला तो जोगी बाबा गातेः

जइसन कहत बाड़ा दवा, वइसन चलत बाड़ी हवा,

बड़ ससतिया सहबा राम, बड़ ससतिया सहबा राम.5

निश्चित रूप से इस तरह का आशु काव्य रचना करने की क्षमता अन्य विद्वान कवियों में भी परिलक्षित नहीं होती है, साथ ही जोगी बाबा के कहे गये शब्दों के भारी अर्थ हैं. जोगी बाबा समाज में रोगियों की वृद्धि होने की ओर इंगित करते हैं, जो पूर्णतः सत्य एवं तथ्यपरक है. जब किसी के आंधी कहने पर वे आंधी की तरह गांधी की हत्या का वर्णन करते हैं, जो हृदय को झकझोर देता है, क्योंकि जब भारत देश में महात्मा गांधी जी की हत्या हुई थी, तब उनकी मृत्यु की सूचना आंधी के समान सम्पूर्ण विश्व में फैल गई थी. आगे तुलसीराम जी कहते है- ''इस तरह वे हाजिर जवाब काव्य के एक अति कुशल कवि थे तथा हजारों शब्दों को इस विधा में तत्काल पलटने की उनमें अद्भुत क्षमता थी. जोगी बाबा कभी गद्य में बात नहीं करते थे. शायद उनके जैसा सारी दुनिया में न कोई हुआ है और न होगा.6

तुलसीराम जी के क्षेत्र में जोगी बाबा की तरह एक और व्यक्ति था, जिसका नाम बंकिया डोम था. बंकिया डोम के घर में बांस को चीरकर टोकरी, चंगेरी डाल, मौनी, कुरूई, छिट्टा, दउरी इत्यादि बनाई जाती थी, जिनको वह बाजार में बेचता था. उसका मुख्य कार्य सिंघा बजाना था. वह पूरे क्षेत्र में सिंघा बजाने के लिए प्रसिद्ध था, सिंघा को संस्कृत में तूर्यनाद कहा जाता है. वास्तव में ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सिंघा बजाने की संस्कृति व्याप्त है, लेकिन आज पहले से बहुत परिवर्तन हुआ है और आज धीरे-धीरे इन परम्पराओं काास हो रहा है.

मुर्दहिया का सम्पूर्ण दलित परिवार गरीब, लाचार और बेबस था. पहनने के लिए कपड़े, खाने के लिए भोजन, बिछाने के लिए बिस्तर, ओढ़ने के लिए रजाई नहीं होती थी. रात किसी तरह व्यतीत करने के पश्चात् तुलसीराम जी के साथ सभी बच्चे सुबह होते ही धूप लेने के लिए दौड़ पड़ते थे तथा सूर्य को सम्बोधित कर धूप करने के लिए काव्य शैली में विनती करते, ''दऊ दऊ घाम करा, सुगवा सलाम करा, तोहरै बलकवन के जड़वत हौ.''7

बचपन विविध खेलों से भरा होता है और इन खेलों में बच्चों के विकास के साथ स्वस्थ रहने का रहस्य छिपा रहता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बच्चे विविध प्रकार के खेलों को खेलते हैं. बचपन में तुलसीराम जी अपने साथियों के साथ मुर्दहिया में जानवरों को चराने जाते थे. जहां पर सभी मिलकर ओल्हापाती का खेल खेलते थे. ओल्हापाती को बुन्देली में 'छिलोर' कहते हैं. यह खेल बहुत ही विचित्र ढंग का होने के साथ एक पेड़ पर संचालित होता है. जिसमें पेड़ के नीचे गोलाकार आकृति बनाकर एक लकड़ी रखी जाती है. इसमें एक व्यक्ति नीचे रहता है और बाकी सभी सदस्य पेड़ पर चढ़ जाते हैं. नीचे वाला व्यक्ति फिर पेड़ पर चढ़ता है और पेड़़ में चढ़े हुए जिस किसी सदस्य को छू लेता है तो उस सदस्य को नीचे आकर पूरी प्रक्रिया को दोहराना पड़ता है. तुलसीराम जी इस खेल को खेलते हुए इतने मशगूल हो जाते हैं कि उनको जानवरों की भी ध्यान भूल जाती है. इस खेल से बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास होता था और आत्मविश्वास में वृद्धि होती थी. इस खेल का वर्णन करते हुए तुलसीराम जी कहते है- ''हम बच्चे जानवरों को चरने के लिए छोड़ छोटे-छोटे पेड़ों पर चढ़कर 'लखनी' अथवा 'ओल्हापाती' नामक खेल खेलने लगते थे. इस खेल में एक दो फीट-पतली लकड़ी पेड़ के नीचे रख दी जाती, फिर एक पेड़ से कूदकर उस लकड़ी जिसे 'लखनी' कहा जाता था, को उठाकर अपनी एक टांग ऊपर करके उसके नीचे से फेंककर पेड़ पर पुनः चढ़ जाता था. जहां लखनी गिरनी थी, पेड़ के नीचे खड़ा दूसरा लड़का उसे उठाकर दौड़ता हुआ पुनः पेड़ के नीचे आकर उसी लखनी से पहले वाले को जमीन से ऊपर कूदकर छूने की कोशिश करता, वह भी एक बार में. यदि उसे छू लिया तो पेड़ चढ़े लड़के को मान लिया जाता कि वह अब 'मर' चुका है, इसलिए वह खेल से बाहर हो जाता था. फिर लखनी से छूने वाला लड़का विजेता हो जाता. इस 'मरे' हुए लड़के को पेड़ के नीचे खड़ा होना पड़ता तथा विजेता पेड़ पर चढ़ जाता और खेल प्रक्रिया पुनः दोहराई जाती.''8

ग्रामीण क्षेत्रों में साठ के दशक में पानी की बहुत परेशानी थी, क्योंकि छुआछूत के माहौल की वजह से दलित सवर्णों के कुंओं से पानी नहीं भर सकते थे. तुलसीराम के गांव में कुंओं की कमी थी. जबकि खेती के कार्य हेतु कुंओं के पानी की जरूरत रहती है. तुलसीराम जी के क्षेत्र में धान की खेती अधिक होती है, जिसमें धान रोपाई का काम सर्वाधिक दलित करते हैं. पानी भरते समय व धान की रोपाई करते समय दलित महिलाएं अपने क्षेत्रीय लोक संगीत का गायन कर मनोरंजन करती हैं. यदि ऐसा देखा जाए तो लोक गीतों का सर्वाधिक प्रचलन दलित, मजदूर किसानों में रहा है. दलित मजदूर एक लोकगीत गाते हैं, जिसमें एक स्त्री के सभी आभूषण कुएं में गिर जाने का वर्णन करते हैं. जिसका अर्थ इस प्रकार हो सकता है- सभी कुओं की ऊंचाई अधिक है तथा उनके जगत नीचे हैं. एक सांवली स्त्री झुककर कुएं से पानी भर रही है, और पानी भरते समय कान का झुमका कुएं में गिर जाता है और वह सांवली स्त्री रोते हुए घर लौट जाती है. दलित मजदूर भुखमरी का शिकार थे. इसके पश्चात् भी इनके लोकगीत के सामने कालिदास और जयदेव जैसे कवि भी कहीं खड़े नजर नहीं आते हैं. यह लोकगीत दृष्टव्य है -

''ऊंचे-ऊंचे कुअना क नीची ब जगतिया रामा

निहुर के पानी भरै, हइ रे सांवर गोरिया

पनिया भरत कै हिन कर झुमका हेरैले रामा

रोवत घरवां आवै ले रे सांवर गोरिया.''9

लोकगीतों के माध्यम से दलित स्त्री-पुरुष दुख, दर्द, मनोरंजन, भूख की पीड़ा, उत्पीडन इत्यादि को अभिव्यक्त कर लेते हैं. यही लोक संस्कृति की मूलभूत प्रमुख विशेषता है.

प्रो. तुलसीराम जी के क्षेत्र में नाई, धोबी, मुसहर एवं नट नामक जातियां थीं. अकाल के दिनों में इन जातियों के ऊपर सर्वाधिक मुसीबत आ जाती थी, क्योंकि इन जातियों के लोगों को मुफ्त में अपनी जाति के अनुसार काम करना पड़ता था और फसल आने पर एक-एक केड़ा अनाज दिया जाता था. इस जाति व्यवस्था को निर्मित करने वाले व्यक्ति ने निश्चित रूप से इन अशिक्षित जातियों को 'भगवान' का भय दिखाकर इन्हें अपने जन्म आधारित कर्म के प्रति घोर अन्धविश्वास से भर दिया था. सबसे ज्यादा मुसीबत धोबी जाति के लोगों के ऊपर आ पड़ती थी, क्योंकि वे पूरा दिन मुफ्त में कपड़े धोते रहते थे. कपड़े धोते समय ये लोग लोक गीतों का गायन करने लगते थे क्योंकि ऐसी मुसीबत के समय पर लोकगीत ही इनके मनोरंजन का साधन होता था. ये अपने पैरों में बैलों को पहनाई जाने वाली घुंघरुओं को पहनकर नृत्य करते थे. लोहे के करताल नामक वाद्य यन्त्र को बजाते थे. इन सबका मुख्य कारण एक था कि ये सभी अशिक्षित होते थे, जिसकी वजह से इन्हें अपने विकास की कोई चिन्ता नहीं रहती थी. हकीकत यह थी कि पेट की आग की वजह से ये कभी विकास के बारे में चिन्तन ही नहीं कर पाये. लेकिन इनमें लोक निहित लोकगीत, नृत्य, बाद्ययन्त्र, बजाने जैसी बहुत सी कलाएं विद्यमान थीं. धोबी समाज की लड़कियों के लिए एक अलग ही प्रकार कहावत विद्यमान थी जिसमें यह कहा जाता कि धोबी की पुत्री को न तो पिता के घर आराम होता है और न ससुराल में; क्योंकि उसे दोनों ही जगह कपड़े धुलने का कार्य करना पड़ता था. ऐसी परम्पराओं से भारतीय संविधान के लागू होने के बाद छुटकारा प्राप्त हुआ है. वास्तव में ये परम्पराएं न होकर कुरीतियां थीं, जिन्हें जबरन भगवान का भय दिखाकर, पीड़ित कर थोपा गया था. नई विवाहित स्त्रियों का जब अपने पतियों से झगड़ा हो जाता था तो वे इस झगड़े को भी लोकगीत के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं-

''जो तैं धोबिनी जइबी अपनी नइहरवा

कि ह-म धोबिया अइबै अपनी ससुररिया

कि ह-म धोबिया

-जो तैं धोबिया अइबे अपने ससुररिया

कि ह-म धोबिनी सुतबै अम्मा जी की गोदिया

कि ह-म धोबिनी.

-जो तैं धोबिनी सुतबी अम्मा जी की गोदिया

कि ह-म धोबिया सुतबै तोहरी गोड़वरिया

कि ह-म धोबिया

-जो तैं धोबिया सुतबै हमरी गोड़वरिया

कि ह-म धोबिनी, मरबो लतवा क मरिया

कि ह-म धोबिनी।''10

प्रो. तुलसीराम जी के गांव में एक पग्गल बाबा थे, जो पक्षियों से अत्यधिक प्रेम करते थे, खासकर गिद्ध प्रेमी सर्वाधिक थे. इनको किसी ने सम्पूर्ण जीवन बोलते हुए नहीं देखा, वे सदा मौन धारण किए रहते थे. पक्षियों से प्रेम करना मनुष्य का स्वभाव है लेकिन किसी में इनको लेकर सर्वस्व समर्पण होता है. यही समर्पण पग्गल बाबा में है तभी वे गिद्धों के अण्डों को उनकी खोल से निकाल लाते हैं, सारा दिन लिए हुए घूमते हैं दूसरे दिन पुनः उसी स्थान पर रखकर नये अण्डों को उठा लाते हैं. वे किसी भी अण्डे को कोई हानि नहीं पहुंचाते हैं, यह पक्षियों के प्रति उनके समर्पण को दिखाता है. प्रो. तुलसीराम जी कहते हैं- ''पग्गल बाबा पुराने अण्डों को पुनः उसी खोते पर रख देते और किसी नए अण्डे के साथ उतरकर इधर-उधर फिर बौड़ियाने लगते थे. वे अण्डों को कभी नुकसान नहीं पहुंचाते. वे एक अद्भुत गिद्ध प्रेमी थे.''11

केवल मनुष्य ही पशु-पक्षियों से प्रेम नहीं करता है बल्कि पशु-पक्षी भी मनुष्य से प्रेम करते हैं. तुलसीराम के घर में एक बकैना भैंस थी जो इन्हें देखकर बांव-बांव करने लगती थी और पास जाने पर चाटने लगती थी. इसका मुख्य कारण यह है कि तुलसीराम जी उसको खुद चारा चराने ले जाते थे, उसकी देखभाल करते थे और जो मनुष्य पशु पक्षियों के अधिक नजदीक रहता है, उससे पशुओं का प्रेम हो जाना स्वाभाविक है. यदि कोई पशु किसी व्यक्ति को चाटता है तो यह पशुओं का अपना प्रेम प्रकट करने का तरीका होता है और इसी कारण तुलसीराम को उनकी बकेना भैंस अपना प्रेम प्रकट करते हुए उन्हें चाटने लगती थी. इसका सुरम्य वर्ण करते हुए प्रो. तुलसीराम जी कहते हैं- ''मेरे घर वालों की एक ऐसी बकेना भैंस थी, जो मुझे देखते ही 'बांव-बांव' बोलते हुए मेरे पास आ जाती थी और मुझे चाटने लगती थी. उसका मुझसे बेहद लगाव था. मेरी एक विचित्र आदत थी. मुर्दहिया पर जब भी चराने जाता मैं उसकी पीठ पर एक घुड़सवार की तरह बैठ जाता. उसे किसी भी तरह कोई ऐतराज नहीं होता. मैं उसकी पीठ पर बैठा रहता तथा वह घूमती फिरती-चरती रहती थी.''12

ग्रामीण क्षेत्रों के बहुतायत व्यंजन अब लुप्त से होने लगे हैं. कुछ व्यंजन तो ऐसे हैं जिनका वर्णन केवल साहित्य में मिलता है. अन्यत्र तो ऐसा लगता है कि जैसे इन पौष्टिक व्यंजनों की समापन की घोषणा कर दी गई हो. तुलसीराम जी बचपन में शीतला माई की वार्षिक पूजा में सम्मिलित होने के लिए पूरे परिवार के साथ जाते हैं, जहां पर पैदल चलते-चलते सभी लोग थक जाते हैं और 'गम्भीर बन' नामक गांव में पूरा काफिला रुकता है. सभी लोगों को भूख लग आती है. इस पर औरतें सत्तू सानने लगती हैं. हुक्का पीने वाले चिलम में आग जलाकर हुक्का पीने लगते हैं. इसके बाद अगले दिन शीतला माई के मन्दिर पहुंचकर हलुआ-सोहारी पकाई जाने लगती है. तुलसीराम जी सुरम्य वर्णन करते हुए कहते हैं- ''औरतें भोजन के लिए सत्तू सानने लगीं तथा सोमरिया के हुक्की के ऊपर चिलम में आग धधक उठी. इस पड़ाव में यह भी खूब था कि आग यहां पकाने के लिए नहीं बल्कि हुक्की चिलम के काम आ रही थी. हम दिन के तीसरे पहर शीतला के मन्दिर पर पहुंच गए. वहां रात भर पड़ाव था क्योंकि पूजा दूसरे दिन सुबह होनी थी. वहां सैकड़ों लोग उपस्थित थे. सभी मंगलवार को पूजा के इंतजार में थे. हम सारी रात मैदान में सोकर बिताये. सूर्योदय होते ही शीतला की पूजा शुरू हो गई. हमारे गांव वाले किसी तरह एक-एक सेर गेहूं का आटा इंतजाम करके साथ ले गये थे, जिससे सोहारी-हलवा पकाकर शीतला माई को चढ़ाना था. साथ ही सुअर के छौने की बलि देनी थी. मेरी मां सोहारी हलवा ईंट के चूल्हे पर पकाने लगी तथा मेरे पिताजी मुझे लेकर गांव वालों के साथ छौना ढूंढ़ने लिकल पड़े.''13

दलित समाज में पूर्ववत आज भी देवी-देवताओं में सूअर के छौने चढ़ाए जाते हैं. छौने को बुन्देली में घिटना या घिटला कहते हैं. लेकिन शिक्षित परिवारों में इस रूढ़िवादी परम्परा का प्रचलन बन्द हो गया है, फिर भी अशिक्षित परिवार इसे लोक संस्कृति समझकर इसका निर्वहन कर रहे हैं. बरसात के मौसम में सम्पूर्ण दलित परिवारों के लिये दुःख सुख एक साथ लेकर आती थी. क्योंकि बरसात में भोजन के लिये मछलियां नदी, पोखरों, झीलों, नालों में मिल जाया करती थीं. जबकि घर गिरने की आशंका से दलितों के हृदय को दहला देती थी. बरसात के मौसम में सूरज डूबते ही, झींगुर, कीट-पतंगे, रेउवा, मेढ़क की आवाजें कानों में सनसनी फैला देती थीं. मेला ढोने वाले गोबड़ैरों की स्थिति मस्तिष्क को झकझोर देती थी. इस दृश्य का मार्मिक वर्णन करते हुए तुलसीराम कहते है- ''सूरज डूबते ही झींगुर तथा रेउवां की निरन्तर जारी रहने वाली चिंचियाती धुनों में हजारों मेढकों की तरतराहट मिलकर किसी को सोने नहीं देती थी. वही गोबड़ौरों का समूह मैले के ढेर केा गोलाकार ग्लोब का रूप देकर ऐसे ठेलते नजर आने लगे थे कि मानो दुखों से भरी इस धरती को लुढ़काकर वे किसी अन्य ग्रह पर ले जा रहे हो.''14

सावन का माह बहुत ही सुहाना एवं खुशनुमा होता है. ग्रामीणांचल में सावन का माह आते ही झूले डाल दिए जाते हैं युवतियां गुट्टे खेलने लगती है. गुट्टे शब्द मूलतः बुन्देली का शब्द है. इसमें युवतियां पत्थर के टुकड़ों को हथेलियों में रखकर इसे आसमान की ओर उछालकर पुनः कुछ टुकड़ों को जमीन से उठाकर उछाले गये पत्थर को पकड़ना पड़ता है. इस सन्दर्भ में तुलसीराम चूड़ी बेचने वाली स्त्री के गाए गये सावन गति को प्रस्तुत करते हैं-

''एक दिन छल कइलै हो मुरारी सुनिए-

अनिके अइलैं चुड़िहारी सुनिए ना.''15

मुर्दहिया लोक संस्कृति के समस्त पहलुओं पर चर्चा करने वाली पहली आत्मकथा है, जिसमें लोकगीत, लोकनृत्य, इत्यादि के विविध रंग बिखरे हुए हैं. प्रो. तुलसीराम जी ने भोजपुरी क्षेत्र के जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं है, जिसे टटोला न हो. बचपन से लेकर लेखनकाल तक लेखक ने एक-एक बिन्दु का चित्र उकेरा है, जिसमें पाठक अनचाहे ही उन दृश्यों में तैरता महसूस करता है. क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग कर जमीन से जुड़ी हर वस्तु को महसूस किया है. साथ ही क्षेत्रीयता से जुड़े रहने की प्रेरणा प्रदान की है. लोक जीवन के माध्यम से प्रकृति के हर तत्व का उद्धरण कर कलात्मकता का अहसास कराया है. कहावतों के माध्यम से दलितों को अपमानित करने वाले पहलुओं के समाज के मध्य लाकर उच्च दर्प वाले लोगों की अकड़ को तोड़ते हैं. आपकी लोक भाषा बहुत ही स्वाभाविक एवं सरल है जिससे उन्होंने पीड़ित करने वाले जातिवादी लोगों को चुनौती दी है और उनकी संकीर्णता को नेस्तनाबूत किया है तथा आम जनमानस में मैत्रीय, बन्धुत्व का संदेश प्रदान किया है. इस प्रकार मुर्दहिया लोक संस्कृति का पुरजोर समर्थन करने वाला एक आख्यान है, जिसमें समस्त मानवीय मूल्य समाहित हैं.

1. मुर्दहियाः प्रो. तुलसीराम, राजकमल (पेपर बैक) प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, 2012 पहला संस्करण पृष्ठ संख्या 25

2. वही, पृष्ठ सं. 99

3. वही, पृष्ठ सं. 26-27

4. वही, पृष्ठ सं. 29

5. वही, पृष्ठ सं. 31

6. वही, पृष्ठ सं. 31

7. वही, पृष्ठ सं. 34

8. वही, पृष्ठ सं. 43

9. वही, पृष्ठ सं. 67

10. वही, पृष्ठ सं. 72

11. वही, पृष्ठ सं. 89

12. वही, पृष्ठ सं. 91

13. वही, पृष्ठ सं. 99-100

14. वही, पृष्ठ सं. 102-103

15. वही-

सम्पर्कः शोधार्थी (हिन्दी)

बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी

गांधी महाविद्यालय, उरई (जालौन) 285001 (उ.प्र.)

मो. 7525050125, 8115393117

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कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,649,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,56,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: प्राची - मई 2016 : शोध आलेख / प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया' में व्याप्त लोक संस्कृति / प्रदीप कुमार
प्राची - मई 2016 : शोध आलेख / प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया' में व्याप्त लोक संस्कृति / प्रदीप कुमार
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रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2016/06/2016_24.html
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