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प्राची - जून 2016 / कहानी / मुझे पंख दे दो / शीला नरेन्द्र त्रिवेदी

कहानी

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‘मां आपने मेरी महत्वाकांक्षाओं को नया आसमान मुझे दिया है...उड़ने के लिए पंख दिये है...मुझे अब और कुछ नहीं चाहिए, न ही मुझे अब किसी की जरूरत है सिर्फ और लोगों का असीम प्यार और स्नेहिल आशीर्वाद चाहिए. खुदगर्ज पापा की तो कतई जरूरत नहीं, जिसने मेरी देवी तुल्य मां को इतने कष्ट दिये हों...मैं तो चली...नये क्षितिज में अपने पंख फड़फड़ा कर

उड़ने...’

मुझे पंख दे दो

शीला नरेन्द्र त्रिवेदी

डॉ. शिवांगी, बहुत-बहुत बधाई-आज मैं बहुत खुश हूं- डॉ. मीता ने कहा...और मैं भी बहुत खुश हूं...आज मेरी नातिन ने गर्व से मेरा मस्तक ही ऊंचा नहीं किया बल्कि पूरे खानदान का नाम रोशन कर दिया- डॉ. मीता के पिता वकील साहब ने कहा. बाईस वर्ष कहां बीत गये- वक्त का कुछ पता ही नहीं चला...आज हम सबकी तपस्या पूरी हुई...पापा पता है कल शिवांगी नर्सिंग होम की ‘ओपनिंग सेरेमनी’ है....अब तक ‘मीता नर्सिंग होम’ ने शहर में धूम मचा रखी थी और अब कल से मेरी शिवांगी अपना ‘क्लीनिक’ चलायेगी. कितना अच्छा लगेगा न मां- डॉ. मीता ने कहा- ‘मेरे क्लिनिक के मुख्य अतिथि होंगे-मेरे नाना, नानी, मौसी, मामा और मेरी मम्मा डॉ. मीता- कहकर शिवांगी खिलखिलाकर हंस पड़ी.

‘अच्छा...मैं चलूं .. देर हो रही है.’ कहकर डॉ. मीता रोजमर्रा की तरह अपने ‘नर्सिंग होम’ चली गई. पेशेन्ट्स देखे...राउन्ड लगाया और अपने चेम्बर में बैठकर चाय की चुस्कियां लेने लगी...जीवन के पच्चीस बसंत...पीछे की बीती जिंदगी में खो गई...

पच्चीस बरस पहले डॉ. मीतेश और मीता एम.बी.बी.एस. कर रहे थे...न जाने कब प्यार हो गया और डॉक्टर बनते-बनते माता-पिता की मर्जी के खिलाफ ब्याह भी कर डाला. मम्मी पापा इस ‘लव-मैरिज’ से नाखुश थे...उन्हें डॉ. मीतेश नापसंद थे- मीता के कहने पर जैसे-तैसे मान लिया किंतु दिल में जगह न थी. डॉ. मीतेश स्वभाव से गुस्सैल और घमण्डी थे. दोनों डॉक्टर थे. रुपये-पैसे, कार, बंगले, नौकर-चाकर-सारे ठाट-बाट थे- कोई कमी न थी...

आजकल डॉ. मीता कुछ अनमनी सी रहने लगी थी- तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी. चेक-अप के बाद पता चला. वे मां बनने वाली थी.असीम खुशियां द्वार पर दस्तक दे रही थीं. किंतु डॉ. मीतेश लेशमात्र भी खुश नहीं थे. उन्होंने मीता से कहा- ‘मुझे तो बेटा चाहिए’

‘और मुझे बेटी’ मीता बोली...

‘क्या फालतू की बकवास कर रही हो...तुम भी न...तुम्हें मालूम है न पांच पीढि़यों में मैं अकेला ही वारिस हूं और ऊपर से फिर बेटी...नहीं...नहीं, मुझे तो बस बेटा ही चाहिए.’ डॉ. मीतेश ने कहा- ‘मेरी मानो तुम बेबी एबार्ट करवा लो...’

‘नहीं मीतेश...बेटा और बेटी में फर्क आप कर रहे हैं...मुझे नहीं करवाना बेबी एबार्ट...मैं अपने प्यार की निशानी को जन्म दूंगी.’ मीता ने कहा!...

‘देखो मीता जिद न करो.’ डॉ. मीतेश ने कहा.

‘अरे! तुम्हें पता है...मैं तो अपनी आने वाली बिट्टू के लिए भगवान महाकाल से ढाई किलो मावे के लडडू चढ़ाने की मिन्नत भी ले चुकी हूं.’ मीता बोली!

‘तुम भी गजब करती हो...मैंने कहा न मुझे ये बेबी नहीं चाहिए, तो नहीं चाहिए.’ डॉ. मीतेश ने कहा. दोनों में तनातनी बढ़ती गई...खाई ऐसी बढ़ी जो पाटने का नाम ही नहीं ले रही थी. डॉ. मीतेश रोजाना रात को देर से घर लौटते. मीता यह प्रेम विवाह करके मन ही मन पछता रही थी!

डॉ. मीतेश बेवजह ही क्रोध करते. डॉ. मीता को अमेरिका से इंडिया आई डॉ. रीता के चर्चे पता लगे. दो चार बार डॉ. रीता को लेकर डॉ. मीता एवं डॉ. मीतेश के बीच गर्मागर्म बहस भी हुई...डॉ. मीतेश अनावश्यक क्रोध करते. डॉ. मीता खामोश रहती...एक रात डॉ. मीतेश बारह बजे तक घर नहीं लौटे. मीता बहुत परेशान थी...उन्होंने फोन लगाया तो जवाब मिला- ‘मैं पार्टी में व्यस्त हूं. मेरा इंतजार न करें...’ मीता को ये उम्मीद न थी...

दिन ब दिन दूरियां बढ़ती गईं. कभी घर आना देर से या फिर न आना रोजमर्रा की आदत बन गई. मीता बेहद परेशान रहने लगी और बात एक दिन आखिर तलाक तक पहुंच ही गई...डॉ. मीतेश डॉ. रीता के घर रहने लगे. मीता ने अपने मम्मी पापा से इस संबंध में चर्चा की और एक दिन अपने मम्मी पापा के घर लौट गई. पापा-मम्मी, भाई-बहन, मीता का बेहद ख्याल रखते. डॉ. मीतेश ने डॉ. रीता से कोर्ट मैरिज कर ली. डॉ. मीतेश ने मीता को मंझधार में छोड़ दिया था, जबकि उस समय उनकी खास जरूरत थी.

लगभग तीन माह बाद मीता ने प्यारी सी गुडि़या शिवांगी को जन्म दिया. घर में खुशियां छा गईं. कत्थई आंखों वाली, चंपई रंग, सुनहरे बालों वाली प्यारी सी खूबसूरत-मेरे सपनों की राजकुमारी - मेरी सोनपरी- मेरे टमी के अंदर कितनी बातें करती थी मुझसे. पिंक फ्रिल वाली फ्रॉक पहने मेरे सपनों में आने वाली ‘बेबी डॉल’...मेरी यही शिवांगी थी- मीतेश इस प्यारी गुडि़या को एबोर्ट करना चाहते थे. प्यारी सी गुडि़या के पापा बनना तो दूर, मेरी कोख में ही उसे, मारना चाहते थे...किंतु मैं भ्रूण हत्या के लिए तैयार न थी. एक डॉक्टर होकर उन्हें ‘जघन्य अपराध’ मैं कैसे करने देती. मैंने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी- इस पार या उस पार- मैं मेरी बेटी को दुनिया में लाना चाहती थी, उसे कोख में मारना नहीं चाहती थी...

मीतेश से अलग होने पर मैं कितनी बार कितना रोई थी...तब भीतर से मेरी यही शिवांगी मानों मुझे ढांढस बंधाती थी- मां बस- थोड़ा-सा इंतजार और कर लो. मैं जल्दी ही आ रही हूं न...? मेरी बुलबुल... मेरी गोलू...मेरी प्यारी सी बिट्टू, एकदम गोल मटोल परियों जैसी प्यारी-सी बिटिया पाकर में धन्य हो उठी...मां बनना परमात्मा का सर्वोत्तम उपहार है. नारी मात्र के लिए.

...पापा मम्मी बगैरह बेहद खुश थे...मीतेश का व्यवहार उन्हें सालता था...मैं भी व्यथित हो उठती थी...किंतु शिवांगी के कारण मेरी जिंदगी संवर गई थी. मैंने भी दृढ़ संकल्प ले लिया था...‘‘चिकित्सा जगत में’’ मेरी शिवांगी एक ‘काबिल डॉक्टर’ बनकर उभरेगी और दुनिया नाज करेगी मेरी परवरिश पर...

मम्मी पापा ने कई बार कहा- ‘तुम अपनी दुनिया बसा लो...शिवांगी को हम बड़ा कर लेंगे...पहाड़-सी जिंदगी कैसे कटेगी?’ किंतु मुझे तो गहरा आघात लगा था. मैंने कह दिया...‘नहीं करनी मुझे दूसरी शादी...मैं खुद सक्षम हूं. अपना व अपनी बेटी का बखूबी खयाल रख सकती हूं, बेहतर शिक्षा दे सकती हूं. क्या पति के बिना नारी का कोई अस्तित्व नहीं है...? कब तक? आखिर कब तक वह पुरुष के हाथों की कठपुतली बनी रहेंगी. उसका भी आखिर कोई तो वजूद है...समाज में स्थान है...नहीं...नहीं नारी को अपनी स्वयं ही पहचान बनानी होगी. उसे स्वयंसिद्ध बनना ही होगा...उसे ‘मिसाल’ बनना ही होगा.

मेरी जिंदगी मेरे परिवार की है. मैं अपने मम्मी पापा के साथ रहूंगी- अब शिवांगी मेरे जीवन का लक्ष्य है, भविष्य है...मीतेश मेरे अतीत थे. उसे डॉक्टर बनाकर यह साबित कर दूं कि बेटे और बेटी में कोई फर्क नहीं होता...कुछ बड़ी होने पर शिवांगी चुलबुलापन करती और कह बैठती...मम्मा ये तो आपके पापा हैं...मेरे पापा कहां हैं?...मैं कह देती...आपके पापा विदेश में हैं...मम्मी, पापा, भाई-बहन ने शिवांगी को ऐसा समझाया कि फिर उसने कभी अपने पापा के बारे में नहीं पूछा, बल्कि अपनी पढ़ाई और कैरियर के प्रति अधिक सजग हो गई.

नर्सिग होम पेशेन्ट्स और शिवांगी और मेरा मायका ये चारों ही मेरी जिंदगी के अभिन्न अंग बन गए...मैं चाहती तो ‘घर’ बसा सकती थी...किंतु मेरे भीतर की नारी...घायल शेरनी की तरह तड़प उठती थी...पुरुष के इस झूठे...खोखले दंभ...अंह को क्या नाम देती? अच्छी खासी खुशहाल जिंदगी ‘वीरान’ बना दी थी मेरे लिए. बहुत बड़ी चुनौती थी, जिसे मैंने सहज और सहर्ष स्वीकारा था. एक मिशाल थी ताकि कोई भी पुरुष-नारी को बेटी की खातिर इतना अपमानित और जिल्लत की जिंदगी देने का दुस्साहस कभी न कर सके- एक मासूम बेटी की हत्या न कर सके- एक कली खिलने से पहले ही मुर्झा न जाए...

ज्यों-ज्यों शिवांगी बड़ी हो रही थी- हम सब उसके कैरियर के प्रति गंभीर होते जा रहे थे. उसके ये शब्द मुझे भीतर तक हिलाकर रख देते...जब एक बार उसने मुझसे कहा था...‘मम्मा आप एक बार...मेरे पापा का पता बता दीजिए बस मां- मैं एक ही सवाल उनसे पूछूंगी...जो मेरे जेहन में है...मेरे कारण पापा ने, आपको इतनी बड़ी सजा क्यूं दी?...’

मैं खामोश थी...उसके सारे सवाल जायज थे...किंतु फिर भी मैंने कभी भी उसके ‘‘मन मस्तिष्क’’ में उसके पापा की गलत छवि नहीं बनने दी. मेरे परिवार से उसे भरपूर प्यार-दुलार और ‘संरक्षण’ मिलता रहा. एम.बी.बी.एस. में दाखिला मिलने पर उसने पापा की बातें करना बंद कर दी...शायद वह भली-भांति समझ गई थी....कि...मेरे ये सवाल मेरी मम्मा को कितना बेचैन कर देते हैं? उसने अपना सारा ध्यान पढ़ाई में लगाया और आज एक काबिल डॉक्टर बनकर गांवों में जाकर अपनी सेवा देने को तैयार है...

‘मां आपसे एक बात कहूं...मुझे यहां क्लिनिक नहीं चाहिए. मैं तो एक नया आकाश चाहती हूं....बेटा जब तक शासकीय नौकरी नहीं मिलती, तब तक क्लिनिक चलाओ...मैं तुम्हें नहीं रोकूंगी. तुम्हारी जो इच्छा हो वही करना...मां, उस नये क्षितिज में उड़ने के लिए आप मुझे पंख दोगी न? ताकि मैं भी आपकी तरह बनूं और मुझ जैसी ‘खिलती कलियों’ को नया आकाश मिल सके...मम्मा भले ही अपने मेरे लिए क्लिनिक खोला हैं, किंतु मैं सरकारी नौकरी करूंगी और वह भी गांवों में रहकर...एक नये क्षितिज की रचना करना चाहती हूं...मां मैं उस नए क्षितिज में अपने पंख फैलाकर स्वच्छंदता पूर्वक उड़ सकूं... ऊंची उड़ान भर सकूं और ये साबित कर सकूं कि बेटी कभी बेटों से कम नहीं होती...आप उसे बस एक मौका दीजिए और फिर देखिये उसकी प्रतिभा का कमाल और फिर मम्मा जिसकी आप जैसी मां हो तो क्या कहने? आप यहां शहर में अपना ‘हॉस्पिटल सम्हालिए...इस शहर को आपकी बेहद जरूरत है.’

‘नहीं शिवांगी तुमने जो सोचा है...उसी आकाश से मैं भी ‘चमकता चांद’ इस धरा पर लाना चाहती हूं...अब मैं भी तुम्हारे साथ रहकर गांव के लोगों की सेवा करना चाहती हूं. तुम्हारी सोच सराहनीय है...’

‘ये संस्कार तो आप लोगों ने मुझे दिये हैं. बचपन से आपको देखा है...गरीबों...जरूरतमंदों से आपने कभी फीस नहीं ली...फ्री में सेवा की है...मदद की है...आपका यही जज्बा मुझमें भी है मां...मैं भी गांव में रहकर निःशुल्क सेवा करना चाहती हूं आपने डॉक्टर बनाकर मुझे, बहुत बड़ा तोहफा दिया है...’

मीता शिवांगी की सारी बातें, बड़े ध्यान से सुन रही थी और मन ही मन कह रही थी...बेटा...तोहफा तो तुझे कल मिलेगा...दरअसल बात यह थी कि डॉ. मीतेश ‘डीन’ बनकर अमेरिका से इंडिया आ रहे थे...शिवांगी क्लीनिक का इनोग्रेशन करने...किंतु यह बात मीता ने किसी को नहीं बतायी थी. सबसे गोपनीय रखी थी...

और आज ‘इनोग्रेशन’ में सारी व्यवस्थाओं की बागडोर डॉ. मीता ने सम्हाली थी. तभी डीन महोदय आये...उन्हें पता नहीं था कि शिवांगी उनकी वही ‘अनचाही बेटी’ है...ढेरों आशीर्वाद, ढेर सारी बधाइयां दी. मीतेश ने मीता से पूछा- ‘तुम्हारी लाडली बेटी क्या कर रही है...?’

‘जिस पर आपका वरदहस्त है...वही मेरी बेटी है...’

‘क्या?’

शिवांगी ने देखा...डीन महोदय मेरे पापा है...वह आश्चर्यजनक था...‘मां आपने बनाया नहीं...’ ‘शिवांगी तुम्हारे लिए यही मेरी ओर से ‘तोहफा’ था...या फिर सरप्राइज...अब सारे सवालों के जवाब अपने पापा से मांग लो...’

नहीं मम्मा...नहीं आप ही मेरा सर्वस्व हो...मुझे पापा की अब जरूरत नहीं...’ वाकई शिवांगी को डॉ. मीतेश का यह कहना...‘तुम्हारी वो बेटी क्या कर रही है?’ व्यंग्य बाण ने बहुत आहत कर दिया था...

‘मां आपने मेरी महत्वाकांक्षाओं को नया आसमान मुझे दिया है...उड़ने के लिए पंख दिये है...मुझे अब और कुछ नहीं चाहिए, न ही मुझे अब किसी की जरूरत है सिर्फ और लोगों का असीम प्यार और स्नेहिल आशीर्वाद चाहिए. खुदगर्ज पापा की तो कतई जरूरत नहीं, जिसने मेरी देवी तुल्य मां को इतने कष्ट दिये हों...मैं तो चली...नये क्षितिज में अपने पंख फड़फड़ा कर उड़ने...’

शिवांगी बेहद खुश थी...और डॉ. मीता तो गर्व से फूल उठी थी. शिवांगी उसकी परछाई थी. उसका गुरूर उसका अभियान है. डॉ. मीतेश का चेहरा देखने लायक था!

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सम्पर्कः 71-72 नर्मदा नगर मंगलय होटल के पीछे जोबट,

जिला-अलीराजपुर-457990 (म.प्र.)

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