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प्राची - जून 2016 / कहानी / दुनियादारी / डॉ. गजेन्द्र नामदेव

 

कहानी

शोक सभा आयोजित हुई. कुछ शब्द मश्तक की प्रशंसा में कहे गये. दो मिनट का मौन बमुश्किल आधे मिनट में समेटकर औपचारिकता पूर्ण हुई. दूसरी औपचारिकता के लिये एक साथ कई गाड़ियां स्टार्ट होकर धूल-धुआं उड़ाती निकल पड़ीं.

अश्रुपूरित नेत्रों से पंडितजी ने अपनी साइकिल उठाई और वे भी चल पड़े. गाड़ियों के धुएं के गुबार में तैरती उन बातों को लेकर वे सोच रहे थे- ''ठीक ही तो है. दुनिया से जाने वाला तो गया. जो दुनिया में हैं उसे तो दुनियादारी निभानी ही पड़ेगी.''

दुनियादारी

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डॉ. गजेन्द्र नामदेव

क आम भारतीय ऑफिस की तरह चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की फौज ने कर्त्तव्य पालन की इतिश्री की. झाड़-बुहारकर, डस्ंिटग कर फाइलों को यथास्थिति प्रदान करने के बाद अपनी नित्य प्रातः लीला में व्यस्त हो गये. कागज पर अंकों का खेल शुरू हो गया-

''आज तो यार डब्बा हो गया.''

''क्यों ओपन क्लोज कुछ नहीं खुला?''

''नहीं यार.''

''और फेमिली भी नहीं.'' बीड़ी सुलगाकर आगे बढ़ाते एक ने कहा.

''ऊं हूं.'' लम्बा सुट्टा मारते हुए गम्भीर मुद्रा में जवाब दिया गया. सभी गमगीन हैं. नम्बर आज किसी का नहीं खुला. सट्टा चीज ही ऐसी है. शेयर से भी खतरनाक. दे तो छप्पर फाड़ के, ले तो चमड़ी उधाड़ के. कइयों की पासबुक रखी हैं सूदखोरों के पास.

बड़े बाबू का आगमन हो चुका है. सबने ऊपरी मन से नमस्ते करते हुए अंदर से वैसे ही विचार व्यक्त किए जो आम तौर पर बाबू नामक प्राणी के लिये अक्सर व्यक्त किये जाते हैं. बड़े बाबू ने अपने रुतबे पर पालिश करते हुए एक-दो को आवाज दी. जिसे दो-तीन बार आदतन अनसुना कर अगले के जाने की प्रतीक्षा में छोड़ा गया. निर्धारित समय से लेट-लतीफ लेकिन ठीक अपने नियत समयानुसार अन्य कर्मचारियों का आगमन भी शुरू हो गया है. सबसे देर से आने वाली इस ऑफिस की दोनों महिला कर्मियों का पदार्पण भी बतियाते हुए हो रहा है. बड़े बाबू ने चश्मे के अंदर से घुसी सी मिचमिची आंखों से उन्हें अजीब से रंग चेहरे पर लाते हुए कहा-

''मैडम आजकल आप लोग रोज लेट हो रही हैं. जरा समय का ध्यान रखिये. साहब मेरी खिंचाई करते हैं.''

''बाबूजी औरतों को घर में ढेर काम होते हैं. निकलते-निकलते देर हो ही जाती है. और दूसरे ऑफिसों में देखो, महिलायें और भी लेट हो जाती हैं. एक यहीं है जो पीछे पड़े रहते हैं. सभी को कहा करिये.''

दूसरी भी कब पीछे रहने वाली थी-

''और समय से निकल भी जाओ तो क्रासिंग पे ट्रेन जैसे हमारा ही इंतजार करती रहती है. वहां भी तो लेट हो ही जाता है न. और हमारे थोड़े आगे-पीछे होने से कौन ऑफिस का काम ठप्प हो जाता है.''

गाढ़े मेकअप से अटे मुंह को बिचकाते धूप का चश्मा सिर पर चढ़ाते हुए बोली.

बड़े बाबू नारी सशक्तीकरण के समक्ष अशक्त रह गये, रोज की तरह. जानते-समझते हुए भी कहना तो पड़ता ही है. उधर एलडीसी ने मौका ताड़ तुरंत प्रतिक्रिया दी-

''वेरी गुड. जे मारा मेडम ने नहले पे दहला. ऑफिस तो ऐसई चलेगा.''

बाबू फिर खुन्नस खाकर रह गया. अकाउंटेंट ने पान की जुगाली करते हुए कहा-

''जेम्स बांड पानी पिला जरा.''

''साहब जेम्स नहीं आया.''

जवाब पंडित ने दिया. इस ऑफिस के सबसे कर्मठ कर्मचारी. कार्यशैली और उम्र के आधार पर सभी से सम्मान अर्जित करने वाले इकलौते व्यक्ति.

''अरे यार पंडित जी. ये जेम्स बांड कब सुधरेगा. रात में 'ओवर' हो गयी होगी. पड़ा होगा बेसुध घर में. सब परेशान हैं, ऑफिस वाले भी और घरवाले भी.''

पंडित ने उदास मन से पानी का गिलास थमाते हुए कहा-

''साब, अब कोई परेशान नहीं होगा उससे.''

''क्यों? ट्रांसफर हो गया क्या उसका?''

आश्चर्य से गिलास पकड़ते हुए वे बोले और पान की पीक डस्टबिन पे पिच्च से दे मारी, जिसके छींटे दीवार पर स्वच्छता मिशन की छाप छोड़ गये. पंडित बुझे मन से बोला-

''हां साब, इस दुनिया से ही ट्रांसफर हो गया उसका. अभी उसके घर से फोन आया था. लीवर खराब हो गया था.''

''क्या?'' एक साथ कई स्वर गूंजे. हलचल मच गई. ऑफिस चैतन्य हो गया.

''जे तो भोत गलत हो गया.''

''यार जैसा भी था, था तो अपना ही आदमी.''

''बात तो सही है. भले ही नोटिस पे नोटिस मिलते थे उसे, लेकिन काम तो करता ही था.''

''और क्या भई. उधारी भी तो खूब कर डाली थी उसने. अब क्या होगा परिवार का.''

''होना क्या है. बीवी को मिलेगी अनुकम्पा.''

''सुना है देखने में भी ठीक-ठाक है. बच्चे कितने हैं?''

''कुछ तो शरम करो? कम से कम इस वक्त तो ऐसी बातें मत सोचो.''

''आप तो यूं ही बुरा मान गईं. मैं तो यूं ही बात कर रहा था.''

''अमां छोड़ो यार! अब ऐसा करो, शोक सभा हो जाये जल्दी. घर भी जाना पड़ेगा उसके. क्यों बड़े बाबू?''

''साहब को आ जाने देते. फिर कर लेते हैं.''

''देखिये बड़े बाबू, कभी मौके भी देखा करिये. साहब को फोन करके बोल दो. सीधे वहीं उसके घर पहुंच जायें. अपन जल्दी यहां से निकल लें तो ज्यादा अच्छा है. वैसे भी अब काम में मन लगने से रहा.''

''बिलकुल ठीक कहा. क्यों बड़े बाबू ठीक है न.''

''जैसा सब लोग उचित समझें.''

फाइलें यथावत रह गईं. कुर्सियां फिर खाली हो गईं. मैदान में छोटे-बड़े झुंड बन गये. बातें फिर हवा में तैरने लगीं-

''वहां से लौटने के बाद क्या प्रोग्राम है यार. पूरा दिन खाली पड़ा है.''

''प्रोग्राम क्या है. वाइफ मायके गई है. वनडे देखेंगे आराम से घर में. तुम्हारा?''

''अपन का तो पिक्चर का मूड बन रहा है. क्यों मैडम चलेंगी क्या आज?'' ललचाई नजरों से देखा गया. वे इठलाती हुईं बोली-

''नईं न. बहुत दिनों से ब्यूटी पार्लर जाने का सोच रही थी. आज मौका मिल गया है. सोचती हूं चली ही जाती हूं. पिक्चर ड्यू रही. मैडम आप चल रहीं हैं न मेरे साथ?''

''नई रे, मायके में शादी है न. सोचती हूं शापिंग कर ही डालूं.''

''हां मैडम. आज तो मुझे भी वाइफ के साथ कुछ काम निपटाने पड़ेंगे. भौत दिन से पीछे पड़ी है. क्या बतायें ऑफिस के काम से टेम ही नहीं मिलता.''

कुछ लोग मुंह में ही हिनहिनाये. सबसे सुस्त आदमी के मुंह से यह दलील सुनकर. अचानक ही जैसे सबको अपने पेंडिंग काम याद आ गये थे. बच्चों की फीस, बिजली बिल, गैस सिलेंडर, बिगड़े उपकरण...लम्बी फेहरिस्त.

शोक सभा आयोजित हुई. कुछ शब्द मश्तक की प्रशंसा में कहे गये. दो मिनट का मौन बमुश्किल आधे मिनट में समेटकर औपचारिकता पूर्ण हुई. दूसरी औपचारिकता के लिये एक साथ कई गाड़ियां स्टार्ट होकर धूल-धुआं उड़ाती निकल पड़ीं.

अश्रुपूरित नेत्रों से पंडितजी ने अपनी साइकिल उठाई और वे भी चल पड़े. गाड़ियों के धुएं के गुबार में तैरती उन बातों को लेकर वे सोच रहे थे- ''ठीक ही तो है. दुनिया से जाने वाला तो गया. जो दुनिया में हैं उसे तो दुनियादारी निभानी ही पड़ेगी.''

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लेखक परिचय

नामः डॉ. गजेन्द्र नामदेव

जन्मः 13 मार्च 1973

शिक्षाः एम.ए., पी-एच.डी., (भूगोल) (डॉ हरिसिंह गौर विवि सागर)

सृजन संसारः हिन्दी चेतना (कनाडा), हंस, वर्तमान साहित्य, वीणा, साक्षात्कार, कथादेश, प्राची, लघुकथा डाट काम आदिविभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लघु कथाऐं, कहानियां, व्यंग्य, लेख तथा नंदन चम्पक, बालवाणी, समझ झरोखा आदि में बालकहानियां प्रकाशित.

विशेषः आकाशवाणी छिन्दवाड़ा से कहानियों, बालकहानियों, वार्ताओं का प्रसारण

सम्प्रतिः भूगोल विभाग, शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में अध्यापन

सम्पर्कः भूगोल विभाग, शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय छिन्दवाड़ा (म.प्र.) पिनः 480001

मोबाइलः 09993225244

ईमेल

gajendra.namdeo@gmail.com

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