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प्राची - जून 2016 / लघुकथाएँ

विश्वास

राजेश माहेश्वरी

क बहुत ही सज्जन व दयालु स्वभाव के व्यक्ति थे. उनके पड़ोस में एक महात्मा जी रहते थे. मोहनलाल जी के यहां से उन्हें प्रतिदिन रात का भोजन प्रदान किया जाता था. एक दिन महात्मा जी ने मोहनलाल को याद किया. वह तत्काल उनके पास पहुंचे.

महात्मा जी ने कहा, ‘‘मुझे आप पर आने वाली विपत्ति का संकेत प्रतीत हो रहा है. क्या आप कोई बहुत बड़ा निर्णय निकट भविष्य में लेने वाले हैं?’’ मोहनलाल जी ने बताया-‘‘मैं अपने दोनों पुत्रों के बीच अपनी संपत्ति का बंटवारा करना चाहता हूं.’’ महात्मा जी ने यह सुनकर कहा- ‘‘आप अपनी संपत्ति के दो नहीं, तीन भाग कीजिये और एक भाग अपने लिये बचाकर रख लीजिये. इससे आप को जीवन में किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.’’

मोहनलाल जी ने महात्मा जी की बात पर ध्यान न देते हुये संपत्ति का वितरण किया तो उसके दो ही हिस्से किए.

धीरे-धीरे मोहनलाल जी को अनुभव होने लगा कि उनके बच्चे उद्योग-व्यापार और पारिवारिक मामलों में उनकी दखलन्दाजी पसन्द नहीं करते हैं. कुछ माह में उनकी उपेक्षा प्रारम्भ हो गयी और जब स्थिति मर्यादा को पार करने लगी तो एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी के साथ दुखी मन से अनजाने गन्तव्य की ओर प्रस्थान करने हेतु घर छोड़ दिया.

जाने के पहले वह महात्मा जी के पास मिलने गए. उन्होंने पूछा, ‘‘आज बहुत समय बाद कैसे आए?’’ मोहनलाल जी ने उत्तर दिया, ‘‘मैं प्रकाश से अंधकार की ओर चला गया था और अब वापस प्रकाश लाने के लिये जा रहा हूं. मैं अपना भविष्य नहीं जानता, किंतु प्रयासरत रहूंगा कि सम्मान की दो रोटी प्राप्त कर सकूं.’’ महात्मा जी ने उनकी बात सुनी और मुस्कराकर कहा, ‘‘मैंने तो तुम्हें पहले ही आगाह किया था. खैर, मेरे पास काफी धन पड़ा है, जो मेरे लिये किसी काम का नहीं है. तुम इसका समुचित उपयोग करके जीवन में आगे बढ़ो और समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत करो.’’

महात्माजी के रुपयों से मोहनलाल जी ने पुनः व्यापार प्रारम्भ किया. वे अनुभवी एवं बुद्धिमान तो थे ही, बाजार में उनकी साख भी थी. उनका व्यापार चल पड़ा.

इस बीच उनके दोनों लड़कों की आपस में नहीं पटी और उन्होंने अपने व्यापार को चौपट कर लिया. व्यापार चौपट होने के कारण भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहे दोनों पुत्र उनके पास पहुंचे और सहायता मांगने लगे.

मोहनलाल जी ने स्पष्ट कहा, ‘‘इस धन पर मेरा कोई

अधिकार नहीं है. मैं तो एक ट्रस्टी हूं जो इसे संभाल रहा हूं. तुम लोग अगर सहायता चाहते हो तो उन्हीं महात्मा जी के पास जाकर निवेदन करो.’’ जब वे वहां पहुंचे तो महात्मा जी ने उनकी सहायता करने से साफ इन्कार करते हुए कहा, ‘‘जैसे कर्म तुमने किये हैं उनका परिणाम तो तुम्हें भोगना ही होगा.’’

सम्पर्कः 106, नया गांव, रामपुर (म.प्र.)

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मां : दो दृश्य

ममता बनर्जी

मां, आज मेरे कॉलेज के चार-पांच दोस्त आएंगे घर पर. तुम उनके लिए कोई अच्छी सी डिश बना देना...मेरा काला वाला बुर्शट धो देना जरा...आज मेरी इंटरव्यू है नौकरी के लिए, तुम मन्दिर जाकर मेरे नाम पर चढ़ावा चढ़ा आना...तुम्हारे पास कुछ रुपये हैं तो दे दो मुझे, पापा को इसके बारे में मत बताना...मेरी शादी की सारी तैयारियां तुम्हें ही करनी हैं....मैं सिर्फ दुल्हन लाऊंगा.

मां, तुम अपना काम करो न, बेवजह अपनी बहू की हर बात पर अपनी टांग क्यों अड़ाती हो? ओह! गिरा दिया न दवा की शीशी आज फिर जमीन पर...पता है मुझे कि तुम फिर कहोगी कि तुम्हें ठीक से दिखाई नहीं देता...अब बताओ मैं क्या करूं? चाहे जैसे भी हो, इतनी महंगी दवा फिर से खरीदनी पड़ेगी मुझे. ओह!

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धर्म भ्रष्ट

किशनलाल शर्मा

‘‘इधर क्यों चला गया? उधर से आ.’’ दूध लेने आये लड़के की फटकारते हुए दुलीचंद्र बोला.

दुलीचंद्र के दुत्कारने पर लड़का डरा सहमा-सा काऊंटर के बांयी तरफ लगी बेंच के पीछे चला आया. वह गिलास आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘‘पांच रुपये का दूध देना.’’

‘‘गिलास मुझे क्यों दे रहा है? वहां रख.’’ दुलीचंद्र हाथ से बेंच की तरफ इशारा करते हुए बोला. लड़के ने गिलास बेंच पर रख दिया था. दुलीचंद्र ने भगोने में से

दूध नापकर हाथ बढ़ाकर काफी ऊपर से गिलास में डाला था. फिर हाथ आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘‘ला पैसे दे’’

लड़के ने हाथ में पकड़ा पांच का सिक्खा हाथ ऊपर करके दुलीचंद्र की हथेली में टपका दिया था.

‘‘तुमने उस लड़के को उधर क्यों बुलाया?’’ मैं दुकान पर बैठा चाय पीते हुए सब देख रहा था. उस लड़के के जाने के बाद मैंने दुलीचंद्र से पूछा था. ‘‘और गिलास हाथ में लेकर दूध क्यों नहीं दिया?’’

‘‘बाबूजी आप इस गांव के नहीं है. इसलिए उसे नहीं जानते! वह हरिजन है.’’ दुलीचंद्र बोला, ‘‘अगर उसका गिलास हाथ में ले लेता, तो मेरा धर्म भ्रष्ट हो जाता.’’ दुलीचंद्र की बात सुनकर मैं बोला, ‘‘लेकिन उसके हाथ में पकड़े सिक्के को हाथ में लेने पर तुम्हारा धर्म भ्रष्ट नहीं हुआ?’’

मेरी बात का जवाब दुलीचंद्र के पास नहीं था.

सम्पर्कः 103, राम स्वरूप कालोनी

शाहगंज, आगरा-282010

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मां

ममता बनर्जी

‘‘म म म म म म म....

‘‘ऊं आं ऊं आं ऊं आं आ. आ......’’

‘‘अरी कहां हो तुम, मुन्ना रो रहा है. जल्दी से आकर दूध पिलाओ उसे...मुन्ना इतना रो क्यों रहा है? कहीं पेट-वेट दर्द तो नहीं कर रहा है उसका? कितनी बार मना किया है तुझे कि मटर-कटहल वगैरह मत खाया करो... सुनो, अपनी जीभ पर थोड़ी लगाम दो और अब से और कुछ महीनों के लिए दही-लस्सी भी पीना छोड़ दो. मुन्ने को ठण्ड लग जाएगी. आज कितनी बार तेल-मालिश की है तुमने मुन्ने की? और हां, लो यह दवा रख लो...मुन्ना को हर दो घंटे पर पिलाती रहना...रात को थर्मामीटर पास ही रखना...जल्दी-जल्दी घर के काम निपटा लो, आज हम मुन्ना को डॉक्टर के पास ले चलेंगे.

‘‘क्या कहा? तुम खाना खा रही हो...ठीक है, ठीक है, खाना कुछ देर बाद में खा लेना, पहले यहां आकर मुन्ना का बदन साफ करो...उसने अपना पखाना समूचे बदन में लेप रखा है...हूंह! मुन्ने को मैं क्यों साफ करूं? मां बनी हो तो अपने बच्चे की देखभाल तो तुम्हें ही करनी पड़ेगी न.’’

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भारत माता की जय

राकेश भ्रमर

देशद्रोह और राष्ट्रप्रेम के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था. राष्ट्रप्रेम वाले कह रहे थे कि भारत में रहनेवाले हर नागरिक को ‘वन्दे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ बोलनी होगी. जो लोग इसे नहीं बोलना चाहते थे, उनको देशद्रोही करार दे दिया गया था. रोज सभाएं होतीं, टी.वी. चैनलों पर बहसें होती, परन्तु कोई किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहा था कि राष्ट्रप्रेम की परिभाषा क्या है, और देशद्रोह की सीमा क्या है?

वह एक जवान और जोशीला व्यक्ति था. राजनीति में दखल रखता था. देशप्रेम उसकी रग-रग में भरा था. जाने-अनजाने वह भी राष्ट्रप्रेम और देशद्रोह के बीच चल रहे युद्ध में कूद पड़ा. वह राष्ट्रप्रेमियों के पक्ष में था और जगह-जगह सभाओं में जाकर ‘वन्दे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे पूरे जोशो-खरोश के साथ लगाता.

एक दिन जब वह भारत माता की जय के नारे लगाकर खुशी-खुशी अपने घर लौटा, तो घर में उसकी पत्नी और मां के बीच वाक्युद्ध चल रहा था. उसने मामले की तहकीकात किए बिना अपनी मां को डांटना शुरू कर दिया, ‘‘अम्मा, आप रोज-रोज बहू से झगड़ा करती रहती हो. कभी चैन से नहीं बैठती. जब देखो, तब झगड़ा...इतनी सीधी बहू के साथ भी आपका निबाह नहीं होता. एक मिनट भी बिना लड़े नहीं रह सकती. अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकता. रोज-रोज की खिच-खिच से छुटकारा चाहता हूं. आप अपना ठौर-ठिकाना ढूंढ़ लीजिए और मुझे मेरी पत्नी के साथ सुख से रहने दीजिए.’’

विधवा बूढ़ी मां रोने लगी, ‘‘बेटा, मैंने तो तेरी बहू को कुछ नहीं कहा. वहीं मुझसे लड़ रही थी कि मैं काम की न काज, दुश्मन अनाज की. ताने मारती रहती है कि मैं मर क्यों नहीं जाती. परात भर खाती हूं, और मुटिया रही हूं. बेटा मैं तो खुद ही दूसरों के घर में काम करके अपने पेट भर के लिए कमा लाती हूं. मैंने तो कभी शिकायत भी नहीं कि बहू मुझे सूखी रोटियां और बासी सब्जी खाने को देती है.’’

बेटा और ज्यादा भड़क गया, ‘‘अम्मा, बेकार की बात करके मुझे गुस्सा मत दिलाओ, वरना मेरा हाथ उठ जाएगा. बहू पर झूठा इल्जाम लगाते आपको शर्म नहीं आती. मैं क्या जानता नहीं कि वह कितनी सीधी है और आपका कितना ख्याल रखती है. अब मैं कुछ सुनने वाला नहीं. आप अपना ठौर-ठिकाना ढूंढ़ लीजिए और हमें शांति से रहने दीजिए.’’ उसने अंतिम फैसला सुनाते हुए मां को खींचकर घर से बाहर कर दिया.

दूसरे दिन वह फिर उसी जोश से एक सभा में ‘भारत माता की जय’ के नारे लगा रहा था.

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फासले

अल्पना हर्ष

आज काफी प्रयासों के बाद भी अपने बेटों के परिवारों के बीच सामंजस्य टूटता देख दुर्गा ने निर्णय लिया कि अब इस समस्या का समाधान वह अपने बहू-बेटों पर ही छोड़ देगी.

निर्णय सुनते ही बड़ी बहू के कमरे में आवाजें सुनाई देने लगी, ‘‘सुनो जी, ये रसोईघर तो हमारा बनवाया हुआ है. देवर जी से कहो अपने लिये बरामदे मे नया बनवा लें.’’ दुर्गा को अपने बच्चों के स्वार्थ ओर बढ़ते फासले स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. ‘‘फासले मन के बढ़े हैं, पर मैं अपने बच्चों को अपनी आखों से दूर न जाने दूंगी, मैं हमेशा इसी प्रयास में रहूंगी कि एक आंगन से जुड़े रहें.’’ दुर्गा अपनी बेटी से कह रही थी.

एक मां का दिल अभी भी इस आस में था कि सब फासले, दूरियां वक्त कम कर देगा.

सम्पर्कः पत्नी डॉ. मनोज हर्ष, डी-599, हर्ष निवास, एमडीवी नगर, बीकानेर-334001 (राजस्थान)

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ममता बनर्जी

मदर्स डे

मां आज ‘मदर्स डे’ है, चलो आज तुम्हें मन्दिर लेकर चलता हूं...अरे! तुम्हें तो तेज बुखार है! अभी डॉक्टर बुलाता हूं मैं. तुम तब तक चुपचाप यूं ही लेटी रहो.

मां, आंखें खोलो...? आंखें खोलो न मां...अपनी आंखें क्यों नहीं खोल रही हो तुम? मां, पानी पियो न दो घूंट. मां...मां...मत जाओ मुझे छोड़ कर मां. मां...मां...मां...मां...!!

मां और मां

मां, भूख लगी है. जल्दी से खाना दो...आज मैं रोटी नहीं खाऊंगा, आलू के परांठे बना दो मेरे लिए...मां, मेरा होम-वर्क करवा दो न जरा...आज मुझे एक सुन्दर सी लोरी सुना दो...मेरी कमीज की बटन भी टांकनी पड़ेगी तुम्हें...कल नाश्ते में क्या दोगी मुझे? जाओ, मैं तुमसे बात नहीं करता. मां, चलो हम दोनों लूडो खेलेंगे.

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