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प्राची - जून 2016 / उड़िया कहानी / ढीठ / मनोज दास

उडि़या कहानी

‘देखो न, वहां कौन है?’’ पिताजी ने ड्योढ़ी की तरफ इशारा किया. मां देखने गईं. मैं भी उनके पीछे-पीछे गया. वहां बैठा था ढीठ. भीगी बिल्ली की तरह कांप रहा था और मुस्करा रहा था.

‘‘उसे एक कपड़ा दो, चाहे धोती हो या साड़ी और उस आलमारी के अन्दर कम्बल है. एक निकाल दो. जब मालूम हुआ कि डूब जाएगा तो मैं लांच से गया. तब तक मन्दिर की चोटी ओझल हो चुकी थी. सिर्फ वही ऊंचा पत्थर और बाबू साहब शेष थे. बिना बुलाये, आ गये. लौटते वक्त इंजन में गड़बड़ी पैदा हो गई. दुर्घटना से बाल-बाल बचे. सीधे आ रहा हूं. अच्छा, मैं सोने जा रहा हूं. तुमने नहीं खाया होगा, खा लो.’’

ढीठ

मनोज दास

हम लोगों को अपने गांव के अस्तित्व का सही ज्ञान सहसा उस दिन हुआ, जिस दिन दोपहर के समय अपनी प्राथमिक पाठशाला के प्रधान शिक्षक जी ने शाला के तीसरे दर्जे की सबसे बड़ी कक्षा के विद्यार्थी समझे जाने वाले बच्चों को ‘‘मेरा गांव’’ शीर्षक पर एक निबन्ध लिखने को कहा. तब तक हमारे गांव का अपनापन हमारे साथ अभिन्न बना जी रहा था. उस दिन पहली बार गांव का वैभव रहस्यमय प्रतीत हुआ. पेड़-पौधे, पोखरे, उसके समीप खड़ा शंकर जी का मंदिर, मंदिर के उस पार वाला ठूंठ पहाड़ आदि आदि. उनके अलावा और कई वस्तुओं से गांव का व्यक्तित्व सम्पन्न था. मन्दिर के सामने का एक भग्न तोरण. उसके खण्डहर पर बैठकर एक लंगड़ा कौआ कांव-कांव करता था. उसे भगाने की हिम्मत किसी में न थी. हरिजनों की बस्ती में एक आदमी रहता था, उसकी त्वचा बचपन से सफेद थी. जाने कहां से खाकी रंग की टोपी उसे मिल गई थी? वह टोपी पहनकर साप्ताहिक बाजार में घूमता-फिरता था. लोग उसे साहब पुकारते थे. बल्कि सामान्य जनता साहब की तरह खातिर करके उसे कुछ-कुछ दे देती थी.

पाठशाला के पीछे एक लंबा-चौड़ा मैदान था. दूर तक फैले हुए मैदान में कहीं-कहीं पेड़ खड़े थे, जिन्हें हम लोगों ने अचेतन समझने की गलती नहीं की थी. उनमें से एक पेड़ घुटने टेक कर बैठने की मुद्रा में था. दूरी पर दो पेड़ वैसे खड़े थे, मानों आपस में दोनों बात कर रहे हों. जब कभी अध्यापक महाशय हमें डांटते थे या बेंत चलाते थे, वे पेड़ हमारे प्रति हमदर्दी प्रकट करते जान पड़ते थे. हम लोग यह भी महसूस करते थे कि किसी लंबी छुट्टी के पहले अपने दिल में संजोये गये रोमांचक अनुभवों की वे चर्चा भी किया करते हैं.

मन्दिर से सटे हुए ठूंठ पहाड़ पर एक बुढि़या रहती थी. उसके साथ एक पागल कुत्ता और एक पगली बिल्ली भी रहती थी. बुढि़या और कुत्ते की बात छोडि़ये. बिल्ली निश्चित रूप से पगली थी, जिसका प्रमाण गांव वालों के पास था. मैंने छुटपन में यह सब सुना था. स्वयं बिल्ली के पागलपन की जांच कर सकने की उम्र में पहुंचने से पहिले तीनों चल बसे थे. बुढि़या का एक जवान लड़का बचा था, जो आधा पागल था. वह खूब जिद्दी था. जब चाहा, जिस किसी के बरामदे पर हाजिर. बिना खाना-पीना लिए वहां से हटता ही न था. वह अपने अर्ध बोध्य कण्ठ से पहाड़ों के सियारों और कौओं के संलाप सुनाता था. पता नहीं किसने उसे सिखाया था? उसका रंग-रूप बेसिलसिलेवार था और बोली की दुर्बोध्यता ने कुछ हद तक एक रहस्यमय जीव बना दिया था, जो उसके लिए फायदेमन्द था. गांव के अनेक बुद्धिजीवी लोगों ने कई बार अच्छे कामों में लगाकर उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न किया था. एक बार एक सम्पन्न किसान ने धूप में सूख रहे धान की रखवाली करने का काम दिया था. कुछ समय के बाद देखा गया कि शंकर जी का सांड़ धान पर लेट कर आराम से जुगाली कर रहा है और वह लड़का सांड़ के विश्राम को अधिक सुखमय करते गाना गा रहा है. एक व्यक्ति ने उससे चरखा चलवाने की कोशिश की. पर कोई फायदा नहीं हुआ. इन सभी कारणों से सम्भवतः लोग उसको ‘ढीठ’ कहकर पुकराते थे.

कुल पांच साल की उम्र से मुझे अपने इंजीनियर पिता के साथ शहर में रहना पड़ता था. गांव से संबंध टूट गया था. फिर भी जिस दिन मैंने सुना कि एक विराट बांध का निर्माण किया जाने वाला है और हमारे गांव समेत वह इलाका पानी में डूब जाने वाला है, उस दिन मैं एकदम उदास हो गया था. मेरी मां खूब रोई थी. हमारे इलाके के अनेक लोग शहर आकर हमारे घर खूब रोये थे. हालांकि पिता जी का उस योजना से कोई सरोकार नहीं था, फिर भी वे लोग और मां जी ने पिता जी से बार-बार प्रार्थना की कि वे अपने प्रभाव से प्रस्तावित नदी-बांध योजना को रोक दें. पिताजी प्रायः चुप रहते थे, कम बोलते थे. जरूरत के वक्त मौन तोड़कर गुस्से में बात करते थे.

एक बार कुछ लोगों ने हमारे बाहरी बरामदे में छाते और छोटी-बड़ी गठरियां रखकर पिताजी को उस क्षेत्र की गौरवगाथा सुनाई थी. उसकी मिट्टी का महत्व और हवा में पूर्वजों के शरीर और सांस का होना, मन्दिरों में स्थापित देवी-देवताओं, खेतिहर जमीन का अत्यन्त उपजाऊ होना आदि बाताया था.

सब कुछ पानी में डूब जायेगा. ‘‘बाबू जी, हम कैसे अनाड़ी हैं, तुम्हारे समान सुपुत्र पैदा करके भी हमें अपना पुश्तैनी ऐश्वर्य छोड़कर जाना पडे़गा?’’ बूढ़े लोग यह सब कहते हुए बार-बार आंसू पोंछ रहे थे.

पिताजी शान्त होकर सुनते थे. हमें ऐसा प्रतीत होता था, मानो उनका दिल भी टुकड़े-टुकड़े हो रहा है. जब वे बोले तो मुझे ऐसा लगा कि न केवल उनका मंतव्य कठोर था, बल्कि उनका मौन भी निर्दयता का दूसरा रूप था.

उन्होंने कहा, ‘‘देखिये, दुनिया का इतिहास दो चीजों पर आधारित हैµनिर्माण और ध्वंस. कहां है वह आटलांटिस और बेबिलोनिया या मोहनजोदड़ो की सभ्यता. महाकाल ने सब कुछ समाप्त कर दिया है, क्यों? केवल परिवर्तन के लिए. दूसरी बात यह कि मान लीजिए हमारा इलाका पानी में डूब गया तो उससे समूचे राज्य का हित होगा कि नहीं? सरकार हमें हरजाना देगी और अनेक सुविधाएं भी मिलेंगी? पूर्वज किसके पुण्यात्मा नहीं होते? उपजाऊ जमीन, मठ-मन्दिर कहां नहीं है? अगर हम उसकी दुहाई देने लग जायेंगे तो देश की बड़ी-बड़ी योजनाएं कैसे कार्यान्वित होंगी?’’

बूढ़ों ने युवकों की अपेक्षा ज्यादा आंसू बहाये थे. मां ने उन लोगों के लिए मुझसे और मेरी छोटी बहन पुटू के हाथ नाश्ता भेजा. मुझे ऐसा लगा, उन लोगों ने पहले नाश्ता लेने से मना किया, शायद पिताजी के व्यवहार के कारण लेकिन बाद में मां की सहानुभूति से स्वीकार कर लिया.

बाद के वर्षों में हमारे इलाके का पूरा परिवर्तन हो गया. गांवों में सभाएं हुईं. लोग चूहा, चावल, दाल की गठरी बांध कर एक बार शहर आये. जुलूस निकाला गया जो एक बहुत ही मार्मिक दृश्य था. कार या मोटर साइकिल आती तो वे लोग किनारे सरक जाते. सलाई की गोली काड़ी के जलने से पहले बुझ जाने के समान उनके नारे अभ्यासहीनता के कारण पूरे-पूरे उच्चरित होने से पहले बुझ जाते थे. धीरे-धीरे नेताओं का जोश भी ठण्डा पड़ गया. अन्त में यह मालूम हुआ कि योजना का कार्यान्वित होना अनिवार्य है. यह जानकर लोग तितर-बितर हो गये. देवी-देवता उनके सांड़-गरुड़ के पुतले सहित और अधिकांश ग्रामवासी सरकार की ओर से मिली जमीन पर जा बसे, जो पास के टीले पर ही थी. और दूसरे लोग हरजाना लेकर दूसरी जगह चले गये और दूसरे विभिन्न धंधों में लग गये. कई लोग अपनी पुश्तैनी मिट्टी छोड़ने से पहले घण्टों गांवों की धूल पर लौटे थे.

बांध बने पांच साल व्यतीत हो चुके थे. नदी-बांध योजना की सफलता पर किसी को तनिक भी शंका न थी. तीन जिलों का एक विस्तृत भूखण्ड स्थायी रूप से बाढ़ के संकट से बच गया था. सिंचाई द्वारा प्रचुर फसल पैदा हुई. जनसंख्या की वृद्धि के कारण वह समृद्धि सिर्फ कृषि विभाग के आंकड़ों में सीमित रह गई.

एक दिन एक अजीब समाचार मिला. उस साल दूर के पहाड़ों में वर्षा की कमी के कारण नदी सूखी पड़ी थी. बांध का जल-भंडार सूखा पड़ा था. फलतः मन्दिर की चोटी और समीप का पहाड़ सतह से उभरे हुए थे. यह समाचार भेजा था डैम-क्षेत्र के समाचारदाता ने. समाचार पत्र पढ़ते-पढ़ते पिताजी बोले, ‘‘वहां के बंगले में बैठक है. तुम लोग भी मेरे साथ चलो. मोटर लांच से तुम लोगों को टापू घुमा दूंगा.’’

मां बेहद खुश हुईं. उनकी आंखों में पानी आ गया.

दो दिनों के पश्चात् जब हम लोग वहां पहुंचे, तब आसमान में बादल छाये हुए थे. पूरे क्षेत्र का चेहरा एकदम बदल गया था. मां वह सब देखकर खूब आश्चर्य कर रही थीं. बांध के दोनों तरफ दो सरकारी बंगले खड़े थे. वाह, कितने सुन्दर लगते थे. बांध के कर्मचारियों के लिए पक्के मकानों का एक छोटा-सा नगर बस गया था, उसके बीचोंबीच एक बाजार भी था.

इसी बीच पिताजी की तरक्की हो गई और वे अपने विभाग के सर्वोंच्च अधिकारी हो गये. इसी कारण उनके स्वागत के लिए लोग बड़े उत्साह में थे.

दाहिने अटक के बंगले पर हम लोग पहुंचे. उसके ठीक नीचे जल-भण्डार था. बंगले के दूसरे तल्ले पर से जल-भण्डार के बीच के मन्दिर की चोटी और पहाड़ कुछ-कुछ नजर आ रहे थेµअतीत के कुहासे में डूबी एक स्मृति की तरह.

बैठक में आमन्त्रित अधिकारियों में से कुछ तब तक पहुंच चुके थे. दूसरों को शाम तक पहुंच जाना था. पिताजी ने आदेश दिया कि अधिकारियों के आ जाने के बाद यानी शाम को ही बैठक रखी जाय. वे हम लोगों को लांच में बिठाकर घुमाने चल दिये. पिताजी इसलिए जल्दीबाजी करने लगे थे कि नदी के ऊपरी क्षेत्र में भारी वर्षा होने की सूचना मिली थी. बांध भर गया तो टापू डूब जाएगा.

‘‘सर, इस क्षेत्र के पुराने बाशिंदे समाचार पाते ही मंदिर और पहाड़ देखने के लिए दौड़े थे. वहां जाने के लिए यदि आप अनुमति न देते, तो वे लोग काफी दुखी होते.’’ पिताजी के एक सहयोगी अभियन्ता बोले.

मेरे दिमाग में मन्दिर और पहाड़ी की स्मृति बिलकुल ताजा थी. अतः वे स्मारक देख सिहर उठना और हर्षित होना मेरे लिए स्वाभाविक था. गांव छोड़ते समय पुटू की उम्र डेढ़ साल की थी. मुझे ऐसा लगता था कि वह मुझसे ज्यादा प्रसन्न हो रही थी.

मां अपने हाथ पर चेहरा टिकाए बैठी थी. मेरे ख्यालों में उस मेघ से भरे आकाश और उदास जल-भण्डार के साथ उसका चेहरा एकाकार हो गया था.

कुछ पर्यटक वहां पहले से ही उपस्थित थे और कुतूहल से हमारी तरफ देख रह थे. नावों के माझी हमें घाट का संकेत दे रहे थे. यदि वे हमारे लांच ड्राइवर को टापू के पास होने का संकेत न देते तो हमें बड़ी तकलीफ हो सकती थी.

हम लोग पहाड़ पर उतर गये. पिताजी को पहचान कर कइयों ने नमस्कार किया. कई लोगों ने मुझे बड़े प्रेम से बुलाया और पुटू को उठाकर गले लगाया. मैंने कई लोगों को कुछ-कुछ पहचाना. मां के पास दो-एक बूढ़ों ने सात वर्षों से संचित आंसू बहाये. पिछले दिनों मिलने वाले प्रतिनिधियों में से कुछ लोग दूसरे लोक सिधार चुके थे. उनका ब्यौरा भाव विह्नल पर्यटकों ने मां के सामने प्रस्तुत किया.

वे नावें, जिन्हें जल-भण्डार में पीछे छोड़ कर हमारा लांच आगे बढ़ गया था, अब तक वहां पहुंच गयी. किसी समय के हमारे पड़ोसी का सम्मान के साथ विस्तृत समाचार आगंतुकों ने पिताजी को दिया.

‘‘बाबू जी, ढीठ की याद है? वह वहां है.’’

सबसे ऊंची एक शिला पर संतोष भरी मुद्रा में बैठे हुए एक दाढ़ी वाले की ओर लोगों ने इशारा किया.

‘‘वह यहां कैसे आया?’’ पिताजी ने पूछा.

‘‘बाबू जी, आपको विश्वास नहीं होगा.’’ बोलते-बोलते एक सज्जन रुक गये.

‘‘मतलब?’’

‘‘कहा जाता है कि वह यहीं रहता है.’’

पिताजी हंस पड़े. दूसरे लोग भी हंसे. मैंने उस खुशी के वातावरण में बातचीत से यह अनुमान लगाया कि बहुत से लोग उस अफवाह पर विश्वास कर रहे थे. कई लोग उसके पास जाकर पूछने लगे, ‘‘अरे, बोलो न, तू इन पांच साल तक पानी के अन्दर कैसे सांस ले रहा था, क्या खाया?’’

‘‘और क्या?’’ गुनगुनाते हुए ढीठ हाथ हिला-हिलाकर इतना भर कह देता था. पर्यटक अपने साथ बना बनाया थोड़ा बहुत खाना ले आये थे. उससे ढीठ को कुछ मिल जाता था. वह चटपट निगल लेता था. देखकर प्रमाणित हो रहा था कि वह सचमुच पांच साल से भूखा है.

पिताजी ढीठ की बात पर अधिक ध्यान न देकर दूसरे प्रसंगों पर चर्चा कर रहे थे. उसके बाद मन्दिर की उभरी चोटी के चारों ओर उछलता पानी देखते रहे. फिर जोर से सबको सुनाते हुए बोले, ‘‘देखिए, पानी का स्तर बढ़ना शुरू हो गया है. बारिश भी आ रही है. आप लोग देर मत कीजिए, जल्दी वापस चलिए.’’

उनकी बात खतम होते ही ठण्डी हवा का एक झोंका आया और एक आदमी का अंगोछा उड़ा ले गया. उसने पकड़ने का प्रयास किया, पर रोक नहीं सका. बेचारा उदास हो गया.

उसके पीछे हल्की-हल्की वर्षा होने लगी. देखते ही देखते बड़ी-बड़ी बूंदें टपकने लगीं. लोग झटपट नाव पर चले गये.

‘‘अरे, ढीठ को कौन लाया था?’’ पिताजी ने जोर से पूछा.

टोलियों ने एक-दूसरे को अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा. समझ में आ गया कि कोई उसे नहीं लाया था. हो सकता है कि पहले किसी दिन किसी और दल ने उसे वहां छोड़ दिया हो.

नाव के सभी लोगों ने उसे बुलाया, पर वह बकता रहा, ‘‘मैं यहीं था और यहीं रहूंगा.’’

‘‘सच, यहीं रहेगा? बस, आप लोग जायें, इसे यहीं रहने दें, यहां पानी में भीगे. सब डूबने के बाद आराम से पानी में रहे.’’ नाव वालों से पिताजी ने कहा. उनका ख्याल था कि पहली नाव चलने के बाद वह जरूर निकलेगा. डर कर पहाड़ी से उतरेगा.

पर, एक के बाद दूसरी, तीसरी, चौथीµसभी नावें खुल गईं, ढीठ पत्थर पर से नहीं उतरा, बल्कि आराम से बैठकर टांग हिलाता रहा और मुंह में मूंगफली डालता रहा.

‘‘अरे, मेरी मान जा, आ, वरना पानी में मर जाएगा.’’ पिताजी बिगड़ कर बोले.

‘‘मैं तो यहीं था...यहीं.’’

‘‘चुप कर.’’

पिताजी ने आखिरी नाव की और देखा. पर्यटक वापस जाने को उतावले थे. पिताजी के हाव-भाव से उनकी सहमति जानकर चल पड़े. वे पिताजी से बोले, ‘‘बाबू जी, आप भी चले आइए. पागल अपने आप तैर कर चला आयेगा...तैर कर.’’

अन्तिम नाव खुलने के बाद भी पिताजी ने कई बार उसे बुलाया, ‘‘क्या यह सोच रहा है कि कल भी लोग आयेंगे और तुझे खिलायेंगे. अरे सुन, कल किसी को यहां की अनुमति नहीं मिलेगी. कल यह टापू डूब जायेगा.’’

वर्षा के कारण हम लोग लांच में छुपे बैठे थे. पिताजी आखिरी बार चिल्ला कर लांच में आ गये.

लांच खुल गया. घनघोर वर्षा हुई. लांच डोल रहा था. जल-भण्डार का दृश्य डरावना हो गया था. पुटू मेरी गोद में छुप गई थी. पिताजी हमें दक्षिणी बंगले में छोड़, उत्तरी ओर के बंगले में बैठक के लिए चले गये. चाय भी नहीं पी सके.

मूसलाधार पानी बरसा. हमारे लिए भोजन का प्रबन्ध हो चुका था. मां बार-बार दूसरी मंजिल की खिड़की से जल-भण्डार की ओर आंखें दौड़ा रही थीं. अविराम वर्षा की वजह से कुछ भी दीख नहीं पड़ता था. लगातार बिजली की कौंध मानों आकाश को फाड़ रही थी. बीच-बीच में वज्रपात के निनाद से पुटू चौंक जा रही थी. एक प्रचण्ड वज्राघात के बाद उसने सहमते हुए पूछा, ‘‘मां, उस ढीठ का क्या हुआ?’’

मां धीरे-धीरे फोन के पास गई. बैठक स्थान से संपर्क करने की कोशिश की, पर लाइन गड़बड़ थी. मां हमें खाना परोस कर खिड़की के पास एक कुर्सी खींच कर बैठी रही. पुटू तब तक सो चुकी थी. मैं ढीठ के बारे में सोच रहा था, पिताजी के कठोर जवाब को याद कर रहा था. कैसे मां को आश्वासन दूं?

सन-सन चलती हवा के बीच ऐसा लगता था, मानों जल-समाधि में गांव की प्रतात्मा रो उठती हो. आधी रात को पिताजी लौटे. लगभग भीगे थे और ठण्डक से कांप रहे थे. ‘‘कुछ खाने को है?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘क्यों नहीं?’’ कह कर मां खाना परोसने चली गई. तब तक बंगले के कर्मचारी सो चुके थे.

‘‘मेरे लिए नहीं, मैं तो अफसरों के साथ खा चुका. टेलीफोन काम नहीं करता, कैसे खबर करता?’’

‘‘तो किसके लिए.’’ मां ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘देखो न, वहां कौन है?’’ पिताजी ने ड्योढ़ी की तरफ इशारा किया. मां देखने गईं. मैं भी उनके पीछे-पीछे गया. वहां बैठा था ढीठ. भीगी बिल्ली की तरह कांप रहा था और मुस्करा रहा था.

‘‘उसे एक कपड़ा दो, चाहे धोती हो या साड़ी और उस आलमारी के अन्दर कम्बल है. एक निकाल दो. जब मालूम हुआ कि डूब जाएगा तो मैं लांच से गया. तब तक मन्दिर की चोटी ओझल हो चुकी थी. सिर्फ वही ऊंचा पत्थर और बाबू साहब शेष थे. बिना बुलाये, आ गये. लौटते वक्त इंजन में गड़बड़ी पैदा हो गई. दुर्घटना से बाल-बाल बचे. सीधे आ रहा हूं. अच्छा, मैं सोने जा रहा हूं. तुमने नहीं खाया होगा, खा लो.’’

पिताजी कपड़े बदलने चले गये.

मां ढीठ को खिलाते समय देवी के समान लग रही थीं. मां के खाना खाने के वक्त बारिश थम गई थी, पर तेज तूफान चल रहा था. उनके कहने पर मैंने जल-भण्डार की तरफ वाली खिड़की बन्द कर दी.

खिड़की बन्द करते हुए मैंने पिताजी का चेहरा बड़ी श्रद्धा की भावना से देखा. पुटू की हल्की हंसी सुनाई पड़ी. एक गुप्त समाचार देने के लिए वह मेरे कानों में फुसफुसाई थी, ‘‘पिताजी कितने अच्छे हैं?’’

‘‘गधी, तू आज समझी?’’

उसके बाद बड़े भाई का फर्ज निभाते हुए मैंने पिताजी की तरह गम्भीरतापूर्वक आदेश दिया, ‘‘जा, सो जा!’’

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