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प्राची - मई 2016 : परिचर्चा - समकालीन कहानी : कुछ प्रश्न प्रकाश चन्द्र गुप्त

परिचर्चा

समकालीन कहानी पर यह परिचर्चा 'माया' के नववर्षांक, 1965 में छपी थी. तब हिन्दी कहानी कई प्रकार के आन्दोलनों से गुजर रही थी. कहानी में नए-नए प्रयोग हो रहे थे. नई कहानी को मुर्दा और जिन्दा कहानियों के बीच में बांटा जाने लगा था. उस समय कहानियों से परिवार, समाज और व्यक्ति में तमाम तरह के बिखराव नजर आने लगे थे. आज भी कहानियों में कोई अन्तर नहीं आया है. उसी प्रकार की कहानियों को आज भी कुछ पत्र-पत्रिकायें महत्त्व दे रही हैं. बीसवीं सदी के सातवें दशक से चलते हुए इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में हिन्दी कहानी कहां रुकी, कहां चली और कहां उसमें परिपूर्णता आई, इसको समझने के लिए उस समय की यह परिचर्चा आज के कहानीकारों के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है. इसी उद्देश्य से इसे यहां उद्धृत किया जा रहा है. आशा है, यह कहानीकारों के लिए ही नहीं पाठकों के लिए भी उपयोगी होगी. संपादक

समकालीन कहानी : कुछ प्रश्न

प्रकाश चन्द्र गुप्त

पिछले वर्षों में हिन्दी कथा-साहित्य का अपूर्व विकास हुआ है, यह बात सर्वमान्य है. 'झूठा-सच' और 'मैला आंचल' जैसे उपन्यासों की सष्टि और अनेक प्रतिभाओं का उदय इसका प्रमाण हैं. कुछ आलोचकों की राय में कहानी की प्रगति में सभी अन्य साहित्यिक विधाओं की अपेक्षा अधिक वेग और तीव्रता है. हम नहीं समझते, कि हिन्दी उपन्यास की प्रगति किसी प्रकार भी कहानी से पीछे है.

कहानी की गति में हम एक विचित्र अन्तर्विरोध पाते हैं. जहां कहानी ने एक दिशा में अपूर्व प्रगति की है, वहां दूसरी दष्टि से वह प्रेमचन्द की परम्परा से कई कदम पीछे भी हटी है. आज हिन्दी कहानी में जीवन का अधिक संश्लिष्ट चित्रण है, जीवन और व्यक्तित्व की अनेक अन्तरपर्तें उसने खोली हैं. फिर भी वह प्रेमचन्द की तुलना में लोक-जीवन से दूर हटी है, उसकी क्रान्तिकारी चेतना में ह्नास हुआ है. इसका यह तात्पर्य नहीं, कि आज के कहानीकार की दष्टि में सामाजिक यथार्थ के प्रति आग्रह नहीं है, वरन् यह कि सामाजिक तथ्य को दष्टि में रखते हुए भी वह अधिक आत्म-लीन हो रहा है, और व्यक्तिवाद के घेरे में

अधिक बंध रहा है. 'झूठा-सच' अथवा 'मैला आंचल' में हम विकास के साथ-साथ तीव्र क्रान्तिकारी चेतना का सहवास भी

पाते हैं.

लोक-चेतन के ह्नास के क्या कारण हो सकते हैं? आज का लेखक बीच के वर्ग को ढुलमुल यकीनी का शिकार हो रहा है. वह अहंवाद को उस हद तक पराजित नहीं कर सका, जितना प्रेमचन्द ने किया था. न आज देश के पास ऐसा केन्द्रीय ध्येय है, जैसा प्रेमचन्द की पीढ़ी के पास था. वह स्वतन्त्रता का ध्येय था, और उसने संपूर्ण राष्ट्रीय चेतना को अनुप्राणित किया था. समाजवाद का सिद्धान्त उस प्रकार अभी देश के प्राण में व्याप्त नहीं हो पाया है. जब कोई सिद्धान्त या विचार जनता की कल्पना में बस जाता है, तो मार्क्स के अनुसार, वह भौतिक शक्ति बन जाता है. पुरानी पीढ़ी के लेखकों में भी व्यक्तिगत दंभ, असहिष्णुता, यश की लालसा और महत्वाकांक्षा आदि दुर्बलताएं थीं, किंतु आज प्रतिभा की इन अंतिम दुर्बलताओं का जैसे अतिक्रमण हो रहा है.

प्रेमचन्द की सबल परंपरा को अपनी पीढ़ी के अनेक कलाकारों ने दढ़ हाथों से संभाला था. 'झूठा-सच' में यशपाल आज की दुरावस्था का प्रभावशाली चित्र अंकित करते हैं. इस चित्र में आगे बढ़ने की दिशा का भी स्पष्ट संकेत है. यही क्रान्तिकारी दष्टि हम राहुल, रांगेय राघव, नागार्जुन और रेणु में देखते हैं. कष्णचन्द्र आदि उर्दू के अनेक लेखकों की रचनाएं, जो हिंदी में छपती रही हैं, इसी चेतना की समर्थक हैं. इन रचनाओं में तीव्र सामाजिक चेतना है. वे लोक-मानस के निकट हैं, और अहंवादी व्यक्तिवादी भावनाओं को प्रश्रय नहीं देतीं. इसी काल में जैनेन्द्र, भगवतीचरण वर्मा, 'अज्ञेय' आदि नागरिक, मध्यम-वर्गीय जीवन की ओर मुड़े, और उन्होंने हिंदी के कथा-पट को नया विस्तार दिया.

हिंदी कथा-साहित्य के इतिहास में आज की पीढ़ी की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं. इस पीढ़ी के अनेक लेखक ग्राम-जीवन की ओर फिर से मुड़े. उनके ग्राम-चित्रण में अद्भुत आत्मीयता है. उनका गांव से बहुत अन्तरंग परिचय है. शिक्षा-दीक्षा से संपन्न होकर, वे गांव के जीवन का तीव्र और मार्मिक अनुभूति से अंकन करते हैं. उनके मन में इस जीवन के प्रति माया-ममता है, जिनके कारण वे यहां के अन्धविश्वासों की भी सराहना करते प्रतीत होते हैं. यह हम मार्कण्डेय की सुप्रसिद्ध कहानी 'गुलरा के बाबा' में देखते हैं. इन लेखकों ने कला-शिल्प को विशेष महत्व दिया, यहां तक कि कभी-कभी ये मानो प्रेमचन्द की सहज-सरलता के प्रति उपेक्षा का भाव प्रदर्शित करते हैं, भाषा का भी अन्यतम, श्रंगार और निखार हम इन लेखकों की रचनाओं में पाते हैं. ये छोटे कस्बे के जीवन का अंकन करते हैं. छोटे परिवारों की कुण्ठा और पराजय-भावना, उनकी मर्म-व्यथा का वर्णन करते हैं, पहाड़ों या मजदूरों का जीवन अंकित करते हैं. इनकी तीव्र सामाजिक चेतना के प्रति संशय रखना अन्याय है. यह 'अंधेरे बंद कमरे', 'भूदान' 'उस्ताद' और 'बदबू' तथा 'दोपहर का भोजन, जैसी रचनाओं से स्पष्ट है.'

आज की परिस्थिति में जो अन्तर्द्वंद्व है, वह इससे स्पष्ट है, कि 'भूदान' और 'पान-फूल' का लेखक आज 'माही' लिखता है. वह प्रयोगवाद और कुण्ठावाद की ओर आकर्षित हो रहा है, जीवन के अंध-कुहासे में उसे हाथ-मारा नहीं सूझता. आज के जीवन में उसे कुछ भी आशाप्रद नहीं दिखाई देता. उसकी दष्टि नकारात्मक होती जा रही है.

क्रान्तिकारी कला सार्थक प्रयोग करती है, किंतु वह विषय-वस्तु के प्रति उपेक्षा नहीं दिखाती. यह मायको-वस्की, अरागों, एलुआर, नेरूदा आदि की कतियों से स्पष्ट है. यही हम मुक्तिबोध के काव्य में देखते हैं. मुक्तिबोध ने मुक्त छंद की शक्ति बढ़ाई, किंतु अपनी क्रान्तिकारी चेतना को कुंठित नहीं होने दिया. वे तेजस्वी स्वर में अपनी प्रतिभा को व्यक्त कर रहे थे, क्योंकि वे जीवन की व्यथा से पीड़ित थे, और इस पीड़ा का बोध अपने पाठक को कराना चाहते थे. यह व्यक्ति की पीड़ा भी थी, क्योंकि यह समाज की पीड़ा थी. आज की कहानी में कभी-कभी यह आग्रह मिलता है, कि यह व्यक्ति की पीड़ा है, इसीलिए यह संपूर्ण समाज की पीड़ा भी है.

आज की कहानी अधिकाधिक व्यक्ति के जीवन पर केंद्रित हो रही है. व्यक्ति समाज का प्रतीक हो सकता है, और समाज से विलग भी हो सकता है. उच्च कला की सष्टि के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह कलाकार की आत्मानुभूति से प्रेरित हो. टॉल्सटॉय का उपन्यास, 'युद्ध और शांति' व्यक्ति पर केंद्रित नहीं है. नाटक, उपन्यास और महाकाव्य में ही नहीं, 'लिरिक' और कहानी में भी समाज का स्वर प्रकट होता है. यह हम कीट्स की Ode to a Nightingale और शैली की Ode to the west wind' ऐसी रचनाओं में देख सकते हैं. यही पन्त की 'ग्राम्या' अथवा 'सुमन' की कविताओं में हम देखते हैं.

आज की कहानी में अनन्य प्रगति के साथ कुछ चिन्ताप्रद वत्तियां भी प्रकट हो रही हैं. अकेलेपन की भावना, निष्फलता का अनुभव, दष्टि में धुंधलेपन का एहसास, मात्र नवीनता का आह्वान, ह्नासोन्मुखी पाश्चात्य कला की पुनरावत्ति, स्त्री-पुरुष के

यौन-संबंधों का निरावरण अंकन, जैसे जीवन में कुछ भी ऐसा शेष न रहा हो, जिसके प्रति अनुराग हो सके, जिसमें मनुष्य आस्था रख सके. कलाकार को अनुभूति-सत्य के प्रति ईमानदार होना जरूरी है. किंतु पाठक और आलोचक इस अनुभूति की परीक्षा और विवेचना करेंगे. यह भी साहित्य-सजन की प्रक्रिया में एक कदम है.

नई कहानी में कुछ ऐसे लक्षण अवश्य प्रकट हो रहे हैं, जिनसे ऐसी आशंका हो सकती है, कि कहानी में भी नई कविता की कुछ पुनरावत्ति हो रही है. किंतु कुल मिलाकर कहा जा सकता है, कि आज की हिंदी कहानी स्वस्थ, सामाजिक दष्टि अपना चुकी है, और उसके विकास की दिशा ठीक है. नई कविता की कुण्ठा और अहंवादिता कहानी की प्रमुख प्रवत्ति नहीं है. मार्कण्डेय, निर्मल वर्मा, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश, कमलेश्वर, आदि अनेक प्रतिष्ठित कथाकार समाजचेता लेखक हैं, और लेखक के सामाजिक दायित्व को वे स्वीकार करते हैं. उन्होंने हिंदी कहानी की परंपरा में विकास की अनेक नई कड़ियां जोड़ी हैं. उन्होंने जीवन के नये, अछूते रूपों का उद्घाटन किया है, शिल्पगत प्रयोग किये हैं, भाषा और कला में श्रंगार की दष्टि से अभिवद्धि की है. फिर भी दिशा-विभ्रम में लक्षण भी कभी-कभी दष्टिगोचर हो रहे हैं. और इसके प्रति सावधानी रखना आवश्यक है.

नये कहानीकार जीवन की छोटी-छोटी मजबूरियों पर कहानी आधारित करते हैं. ऐसे चित्र हमारे सामान्य जीवन के प्रतिनिधि चित्र हैं, और इन चित्रों का अंकन आज की कहानी की बड़ी विशेषता है. इस प्रकार जीवन मूर्त्त होकर पाठक के सामने आता है, और जीवन की आलोचना अप्रत्यक्ष रहती है. हिंदी कहानी के इतिहास पर जब हम एक दष्टि डालते हैं, तो ऐसी कहानियां ही हमारी स्मत्ति में उभरती हैं.

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