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प्राची - मई 2016 : कश्मीरी कहानी / रोटी का स्वाद / शंकर पाटील

 

कश्मीरी कहानी

मेड़ पर खड़ी होकर जनाई देख रही थी. वह अपनी सुध-

बुध खो बैठी थी. जनाई एकदम उस खेत में ऐसे घुस गयी जैसे संकट के अवसर पर प्रियतम व्यक्ति के मिलने पर हम उसके गले लग जाते हैं. दाने से भरे भुट्टों को अपने हृदय से सटाकर उसने हाथ जोड़े और आसमान की ओर देखते हुए कहा 'भगवान्, इस नन्हें से खेत में मैं अकेली पसीना बहाती रही. ...इतना पसीना बहाया इसलिए यह फसल हाथ में आयी है. अब एक ही मांग है, इसको काटकर एक गरम-गरम रोटी बनाकर अपने लाड़ले बच्चे को खिला दूं, वह रोटी उसके पेट में चली जाय, तब तुम उसको ले जाओ अगर चाहते ही हो.

रोटी का स्वाद

शंकर पाटील

जितना मां ने परोसा था, उतना ही खाकर बच्चे चुप हो गये. उनके पेट अभी खाली ही थे. भूख वैसी ही थी, लेकिन खाने को कुछ था ही नहीं...फिर वे क्या करेंगे? एक-एक लोटा पानी पीकर दोनों बच्चे उठे और खामोश-से, कम्बल में जाकर धंस गये. बिना कुछ बोले चुपचाप सो गये. मां की कठिनाई को वे समझ रहे थे. अकेली मां कितना करेगी? वह तो जी तोड़ मेहनत करती है, जो मिलेगा, पकाकर खिलाती है. बच्चे भी जो मिले सो खाते थे और जो मां देती थी, वे कपड़े पहनते थे. उन्हें जन्मजात समझ थी कि न कभी पिनपिनाना चाहिये, न किसी प्रकार की जिद् करनी चाहिये. गरीब के बच्चों को शायद भगवान् ही ऐसी समझ देकर भेजता है. अब भी वे आधे पेट उठे और बेचारे चुपचाप जाकर बिस्तर पर लेट गये. लेकिन जनाई का दिल भर आया, उसकी आंखों से आंसुओं का टपकना शुरू हो गया. जनाई देर तक वहीं बैठी रही और ऊपर उठाये एक घुटने पर ठुड्डी टेककर वह अपने से ही बतियाने लगी- यह कैसा वक्त भगवान् ले आये हैं, यह कैसे दुर्भाग्य के दिन आ गये हैं! मेरी किस्मत में यह सब क्यों लिखा गया?

जनाई यही सब सोच रही थी. एक-एक करके हजारों बातें मन में आ रही थीं. उधर देवर के घर में अभी भोजन पक रहा था. छौंके का चटपटा स्वाद फैला हुआ था. घर का एक ही बरेंडा था, बीच में एक ही टट्टर था. लेकिन देवर इस बात की पूछताछ भी नहीं करता था कि उधर के बच्चे क्या खा-पी रहे हैं? उसके भाई के ये बच्चे थे. भूख से मर रहे थे, लेकिन देवर के मन में जरा भी फिक्र न थी? बच्चे अनाथ हो गये तो ये सब कैसे पराये हो गये! मनुष्य का मन इतना निर्दय कैसे बन सकता है? छौंक चरचराने लगी, गन्ध फैल गई. लेकिन ऐसे ही बैठा नहीं रहा जा सकता. जनाई ने आंचल से आंखें पोंछीं. मन में आया, अब कल चूल्हा कैसे जलेगा? सुबह बच्चे जगेंगे तो उनके सामने क्या रखा जायेगा? फिर अब किसके पास मांगने जाय? कहीं मजूरी भी तो नहीं मिलेगी?

सबसे निबटकर जनाई आई. बच्चे सोये थे, वहीं पर दीवार से पीठ टेककर बैठ गयी. सोये बच्चों के सूखे मुंह देखकर कलेजा मुंह को आ गया. दोनों बच्चों के शरीर पर उसने एक बार गरम हाथ फेरा तो बड़े ने करवट बदली. जनाई ने गौर से देखकर पुकारा, 'म्हादी...' म्हादी अभी जाग ही रहा था. वह सो नहीं पाया था. शरीर पर से कम्बल दूर कर, उसने आंखें खोलीं. मां ने पूछा, 'अभी नहीं आयी बेटे?'

'अभी आ जायेगी.'

'फिर यह देखो.'

'क्या?'

'एक घड़ी और जगे रहो, मैं जरा बाहर से हो आती हूं!'

बच्चे ने पूछा, 'कहां जा रही हो, अम्मा?'

'देखती हूं बेटे, कहीं काम मिल जाय तो मैं आती हूं, तब तक जगे रहोगे.'

'हां.'

'डर तो नहीं लगेगा न?'

'डर!'

'जी....'

'जल्दी आना, मैं सोऊंगा नहीं, डर काहे का?'

'मेरा हीरा बच्चा!' कहकर उसने बच्चे का मुंह सहलाया और 'अभी आ रही हूं.' कहकर वहां से चल पड़ी.

काम की तलाश में कहां जायेगी? घर पर जाकर थोड़े ही पूछा जा सकता है. जो मजदूरिनें रोज काम पर जाती हैं, उन्हीं से पूछना चाहिये जनाई सीधे मांगी की बस्ती में गयी. लाज-शर्म रखकर पेट कैसे भरा जा सकता है?

मांगी की धुरणा अपनी झोपड़ी के पास बैठकर दातौन कर रही थी. जनाई को सामने देख मुंह में ठुंसी दातौन की उंगली बाहर निकाली. दूसरे हाथ से आंचल संभाल, गर्दन आगे कर उसने अपनाने से पूछा, 'क्यों चौधराइन जी, इतनी रात को कैसे आना हुआ?'

जनाई ने पास आकर कहा, 'आई हूं बहन, तुम्हारो ही पास.'

'बताइये.'

'क्या कहूं, धुरणा!'

'क्या हुआ?'

'कुछ नहीं.' उसने फिर एक बार इधर-उधर देखा. फिर मन को कड़ाकर बोली, 'धुरणा, ये दिन बड़े खराब आये हैं. ऐसा बुरा वक्त आया है, जो नहीं आना चाहिए था. कल तुम लोग कहां काम पर जाने वाली हो तो मुझे भी बुला लेना. इसमें लाज-शर्म की क्या बात है? विपदा में सब करना पड़ता.'

धुरणा की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहा जाये? उसे ही शर्म महसूस हुई. बिना बोले वह जनाई के मुंह की ओर देखती रह गयी. कुछ भी हो, आखिर वह जात की मांग थी, जनाई की और उसकी क्या बराबरी? आज तो खराब वक्त है, लेकिन आखिर जनाई चौधराइन जो हैं. बैलों की पूजा के त्यौहार पर जनाई के घर तोरण बांधने के लिए धुरणा जाया करती थी. वही चौधराइन आज काम मांगने के लिए मांगवाड़े में आयी है. भगवान् ऐसा वक्त क्यों ले आते हैं? धुरणा उलझन में पड़ गयी. वह मूक हो गयी तो जनाई ने ही कहा, 'कल के लिए कहीं मजदूरिनी की जरूरत हो तो बताना बहिन. क्या करूं, बच्चे भूख से मरने को हो गये हैं, धुरणा!'

बड़ी कठिनाई से धुरणा बोली, 'चौधराइन, कल चौगुले के खेत में आइये? मिर्चे खोंटने हैं. देखिये आना हो तो....'

'उपकार मानूंगी, धुरणा!'

'इसमें उपकार की क्या बात है?'

'उपकार नहीं तो क्या? काम कहां मिल रहा है?'

यह कहकर उसने फिर कहा, 'सुबह जाते समय मुझे पुकारना...हमारे दरवाजे पर से ही जाओगी न?'

'जी, थोड़ा दिन चढ़ने पर आऊंगी.'

'आना बहना, मैं तैयार रहूंगी.' कहकर वह मुड़ी ही थी कि धुरणा से न रहा गया और उसने पूछा, 'देवर जी, कुछ सहारा नहीं देते?'

'क्या बताऊं धुरणा, बच्चों को सामने देखकर भी वे उनको कभी नहीं बुलाते. मेरे साथ तो बोलचाल ही बन्द है.'

'ऐसा क्यों है?'

'क्यों बोलेंगे तो कुछ करना भी तो पड़ेगा. भगवान् ने कैसा समय दिखाया है?'

'फिर रिश्ता काहे का? ऐसे समय साथ नहीं देते तो उन्हें आदमी कैसे कहा जा सकता? चाचा तो कहलाते हैं न!'

'काहे का चाचा? पास में जो कुछ था वह दवा-दारू में फुंक गया. चार लोगों का कर्जा सिर पर सवार है. मैं इस चक्कर में हूं कि वह कैसे अदा किया जाय? क्या बताऊं धुरणा, घर के दाने खत्म हुये, आज दो महीने हो गये? कैसे दिन बिता रही हूं, यह मैं ही जानती हूं? एक महीना सिर्फ मकई पर गुजारा. बच्चे रोटी के लिए कलप रहे हैं, लेकिन ज्वार तक नहीं नसीब है. क्या किया जाय?'

धुरणा क्या बोलती? उस बेचारी की आंखों में पानी आ गया. आंचल आंखों से लगाकर खामोश खड़ी हो गयी तो जनाई ने कहा, 'घर में बच्चे हैं, मैं जाती हूं. सुबह पुकारना बहना.' जनाई जल्दी-जल्दी घर की ओर वापस चली गयी.

दूसरे दिन सुबह जनाई चौगुले के खेतों में मजूरी करने के लिये गयी. मजूरिनों के साथ वह भी मिर्चें खोंटने लगी. पति के होते हुये वह कभी खेत पर काम करने के लिये नहीं गयी थी. आज पेट के लिए और बच्चों के लिए मजूरी करने की स्थिति आ गयी. मन को बड़ा कठिन-सा लग रहा था, लेकिन क्या किया जाय? स्थिति आ गयी. इसी चौगुले के यहां शादी पड़ी तो जनाई ने पांच साल पहले उसे तीन सौ रुपये दिये थे, उन्हें लौटाने में चौगुले ने तीन साल लगा दिये. आज उसे एक रुपया भी कोई उधार देगा? बुरा वक्त आने पर ऐसा ही होता है. किससे क्या कहा जाय? जनाई अपने ही मन से बातें कर रही थी. बुरे दिन सिर पर आये थे. भोजन का समय हो गया था. काम रोककर मजूरिनें रोटी खाने बैठीं. जनाई भूसी की एक रोटी कपड़े में बांधकर लाई थी. सब बैठकर रोटियां खाने लगीं तो वह भी बैठी. लेकिन धुरणा को अपने सामने की रोटी निगलना मुश्किल हो गया. तोड़ी हुई रोटी का कौर हाथ में लेकर उसे देखती रह गयी. जनाई बोली, 'क्यों धुरणा! खाओ न रोटी.'

'क्या खाऊं, चौधरानी जी!'

'क्यों, क्या हुआ?'

'सूखी चटनी के साथ आप यह भूसे की रोटी खा रही हैं, यह देखकर हमारे मुंह में कौर कैसे जायेगा?'

धुरणा के सामने तीन बड़ी-सी ज्वार की रोटियां थीं, साथ में तली कुम्हड़ौरी थी. प्याज थे और कुछ मूंगफलियां भी थीं. यह देखकर जनाई के मुंह में पानी भर आया. आना नहीं चाहिये था, परन्तु छोटे बच्चे की भांति उस पर उसे वासना ही आ गयी. लालच प्रबल हुई. वैसे भी खेत पर काम करने के बाद खूब भूख लग आती है. मेहनत के कारण वह तीखी हो गयी थी. जनाई से रहा नहीं गया. अपनी रोटी के कपड़े को आगे कर बोली, 'अगर तुम्हें इतना कष्ट हो रहा है तो दे दो बहना, अपनी एक रोटी, मुझे भी.'

'मेरी रोटी, चलेगी आपको?'

'अब क्या जात और धर्म लेकर बैठी हो? अंग-से-अंग सटाकर परसों सारे गांव ने रोटी नहीं खायीं? अब छुआछूत कुछ नहीं रहा बहना....'

जनाई की इस बात से धुरणा को बल मिला. कोई देखे न देखे इतने में उसने अपनी एक रोटी जनाई के हाथ पर रख दी और उस पर ढेर सारी कुम्हड़ौरी भी दे दी. उसकी सोंधी महक जनाई की नाक में घुस रही थी. उसने कौर हाथ में लिया, भुजिया के साथ मुंह में डाला लेकिन गले के नीचे उतर ही नहीं रहा था. जनाई को अपने बच्चों की याद हो आयी थी. ज्वार की रोटी खाये बहुत दिन हो गये थे. बच्चे भूखे होंगे. उनके बिना वह कौर गिगल भी कैसे सकती थी. उसे लगा कि अगर बच्चों को यह रोटी दी जाये तो चटखारे भरकर खायेंगे. उन्होंने खा लिया तो बस अपना भी खाना हो गया...जनाई ने वह रोटी दूसरी रोटी के नीचे छिपा दी. अपनी भूसी की रोटी के चार कौर तोड़े और कपड़ा लपेटकर पानी पीने के लिए उठ गयी. पानी पी लिया और उसका खाना हो गया. फिर औरतें काम पर जुट गईं. जनाई बाई भी काम में व्यस्त हो गयी. लेकिन उसे लग रहा था कि यह धूप कब नीचे उतरती है और कब वह घर जाती. किसी मूल्यवान वस्तु की भांति उसने वह रोटी कपड़े में बांध रखी थी. उसका सारा ध्यान उधर ही लगा था.

दिन डूबते मजूरिनें काम समाप्त कर घर जाने के लिए तैयार हुईं. जनाई किसी के लिए नहीं रुकी. सबके चलने में देर लग सकती थी. वह अकेली जल्दी-जल्दी आगे चल पड़ी और घर जा पहुंची. सांझ हो गयी थी. बच्चे बाट जोहते हुये द्वार पर ही बैठे थे. आते ही जनाई ने बच्चों के मुंह को सहलाया. जैसे-तैसे अन्दर आकर दिया जलाया और दोनों बच्चों को पुकारकर बोली, 'आओ बच्ची, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाई हूं?'

'क्या है मां,' बच्चे निकट आये. पालथी मारकर बैठ गये, मानो भोजन के लिए बैठे हों. जनाई ने कपड़े से रोटी बाहर निकाली. कुम्हड़ौरी की महक फैल गयी और दोनों बच्चे प्रसन्न हो गये. गठरी की ओर देखने लगे और अपने आप उनके हाथ फैल गये. जनाई ने आधी-आधी रोटी उनके हाथ पर रखी दी. ज्वार की रोटी देखकर बच्चों के मुंह में लार भर आयी. हरखकर वे उतावली से खाने लगे. जनाई सिर्फ देखती रही. उसे लगाआह भगवान, यह कैसे दिन आ गये हैं कि ज्वार की रोटी भी अद्भुत लग रही है! बच्चे रोटी ऐसे खा रहे हैं, जैसे बिस्कुट खा रहे हों.

म्हादी ने बीच में ही पूछा, 'किसने रोटी दी मां?'

'दी किसी ने बेटा!'

वह कहती भी क्या? आंखों में आंसू भर आये. देखते ही देखते रोटी का सफाया हो गया. उस आधी रोटी से क्या खाक होने वाला था? कितने दिनों की आग पेट में धधक रही थी. वह

आधी रोटी कहां, गयी, क्या हुआ, कुछ पता ही नहीं चला? उल्टे रोटी की हविश और तेज हो गयी. उसकी याद ही नहीं रही यही अच्छा था तो बच्चों की रोटी के लिए पागल होने की नौबत आ गयी थी. रोटी खत्म हो गयी फिर भी वे देखते रहे. जनाई की समझ में बात आ गयी. बच्चों के चेहरे पर अभी भी लालच थी, वे आस भरी भूखी नजर से देख रहे थे. जनाई गुस्सा हो गयी. चूल्हे के पास वाली चिप्सी को हाथ में लेकर झल्लाई, 'उठो, मेरे बैरियों! ऐसे क्या देख रहे हो मेरी ओर?'

बच्चे उठे और चुपचाप बाहर बरामदे में खड़े हो गये, बरामदा साझे में था. उनकी चाची बोरे का मुंह खोलकर उसमें से अनाज ले रही थी. अन्दर जनाई का मुंह अभी चल रहा था. आवाज बाहर आ रही थी. चाची मुस्कराती हुई बोली, 'म्हादी, तुम्हारी मां आज क्यों बरस रही हैं?'

दीवार के खम्भे को पीछे से दोनों हाथों से पकड़ता हुआ म्हादी बोला, 'ऐसे ही.'

'फिर सांझ की बेला में मुंह क्यों चल रहा है, क्या हुआ?'

बच्चे खामोश रह गये. फिर चाली ने पूछा, 'आज दिन भर मां कहां गयी थी रे?'

'मिर्चें खोंटने के काम पर गई थी.'

'किसके खेत में?'

'चौगुले के खेते में.'

चाची हंसकर बोली, 'अब मजूरी भी करने लगी. अब तो खूब कमाकर भरपेट खिलायेगी तुम्हें, वह.'

'आज मां रोटी लायी थी, खाली हमने!' छोटा बालू कह गया.

'कहां से मांग लाई थी रे?'

'क्या मालूम..?'

इतने में बंधी हुई भैंस ने वहीं पर गोबर कर दिया. भैंस को एक गाली देकर चाची बोली, 'म्हादी, जरा उसको पैर से पीछे हटा आओ मेरे बेटे!'

म्हादी गया, पैर से गोबर को पीछे हटाकर वहीं पर पत्थर से पैर साफ करने लगा. चाची बोली, 'मेरे हाथ उलझे हैं. जरा वह पैर के पास वाला गोबर हाथ से साफ कर दो. कल एक सीताफल दूंगी तुम्हें.'

आज आठ दिन हुये, चाचा हर दिन बरामदे में बैठकर सीताफल खाया करता है. चाचा ने कभी नहीं कहा कि एक सीताफल तुम भी खा लो. चाचा से तो यह चाची ही अच्छी है. चाची का बताया काम करने को म्हादी में उत्साह आ गया. झट से वह आगे बढ़ा और भैंस के पैर के नीचे पड़ी सारी गन्दगी उसने साफ कर दी.

चाची सराहते हुये बोलीं, 'बहुत अच्छा साफ किया है रे तुमने!'

हाथ गन्दे हो गये थे. म्हादी वहां बड़े संकोच में खड़ा था. एक बार भैंस की ओर और दूसरी बार चाची की ओर देखता हुआ झेंपते हुये वह बोला, 'चाची, मैं हर रोज तुम्हारे यहां भैंस का गोबर साफ कर दिया करूंगा. हमें एक रोटी हर दिन दोगी?'

चाची कुछ बोले इतने में जनाई बाहर आई. हाथ में फुंकनी लेकर वह निकली थी. 'अरे मेरे बैरी म्हादी, यह क्या बोल रहा हैं? रोज इसकी भैंस का गोबर साफ करेगा और रोटी मांगकर खायेगा तू? क्या भिखारी के पेट से पैदा हुआ है. हैजा न हो जाय तुझे!'

अब जनाई पर कोई रोक नहीं रही. एक हाथ से उसने म्हादी का कान पकड़ा और दूसरे हाथ से म्हादी को फुंकनी से पीटने लगी. कहीं किसी नाजुक जगह पर मार पड़ने से अनर्थ हो सकता है, इसका भी ध्यान उसको न रहा. जैसे किसी जानवर को पीटा जाय, वैसे ही वह म्हादी को मारने लगी, मारती ही रही. बच्चा चीखा, चिल्लाया, रोया लेकिन जनाई का मन शांत नहीं हो रहा था. उसका मन धधक उठा था, जैसे तेल की टंकी में आग लग जाय. आग शरीर भर में फैल गयी थी. रास्ते के किसी मुसाफिर के सामने बच्चे ने हाथ फैलाया होता तो उसे गुस्सा न आता, लेकिन चाची....? कौन चाचा और कौन चाची? इतने दिनों में कभी उन्होंने पूछताछ तक नहीं की. उसका कलेजा ही जैसे छिल गया था. आगे-पीछे न देखते हुए उसने बच्चे को पीटा था. आखिर म्हादी जमीन पर गिर पड़ा और उसका रोना एकदम थम गया, जैसे मुंह ही बन्द हो गया हो. जनाई होश में आयी. उसका शरीर कांप गया. नीचे झुककर उसने बच्चे की ठुड्डी से छूकर उसे पुकारने लगी, 'म्हादी...म्हादी, मेरे बच्चे...मेरे लाड़ले..., बोल ना रे, म्हादी...'

जनाई बेहद घबड़ा गयी. मुंह बन्द कर बच्चा चुपचाप पड़ा था, आंखों की पुतलियां ऊपर चढ़ गयी थीं. जनाई के हाथ-पैर की चेतना ही मानो गुम हो गयी. वह झट से नीचे बैठ गयी. दोनों हाथ से बच्चे को उठाकर गले से लगाकर वह चिल्ला उठी, 'म्हादी....'

घण्टे, आध घण्टे के बाद बच्चा होश में आया. लेकिन वह कुछ बोल नहीं रहा था, न कुछ मांग रहा था. बीच-बीच में आंखें खोलकर देख रहा था और पुनः आंखें मूंदकर चुप हो जाता था. किसी प्रकार की हरकत नहीं कर रहा था. बुखार से शरीर तप रहा था. बुखार एकदम चढ़ आया था और बच्चा गुमसुम पड़ा था. गोद में लेकर जनाई बैठी थी. बच्चे की आंख जरा-सी खुलने पर पूछा, 'कहां दर्द हो रहा है, म्हादी!' लेकिन कुछ बोलने के लिए बच्चे का मुंह ही नहीं खुलता था. क्या किया जाय?

रात बीती, दिन बीता, बच्चा वैसे ही गुमसुम पड़ा रहा. खसचन्दन घिसकर पीठ की लीप की, सेंका, लेकिन बच्चा हिलडुल नहीं रहा था. बुखार भी कम नहीं हो रहा था. रात को जरा भी आराम नहीं हुआ था. जनाई का मन अन्दर ही अन्दर सूखने लगा. अब क्या हो सकता है?

दो दिन ऐसे ही बीते. तीसरे दिन बच्चे की तबीयत यकायक खराब हो गयी. बुखार और चढ़ गया और बच्चा विचित्र तरह से कराहने लगा. एक बार हाथ-पैर भी ऐंठ गये. घिग्घी बंध गयी. बीच-बीच में सीना इस तरह धड़कने लगा, जैसे हांफ रहा हो. न जाने कैसे होने लगा. जो कुछ भी हो रहा था, उसे देखते रहने के सिवा कोई चारा नहीं था. जनाई रात भर आंचल से हवा करती रही.

सुबह पहले वाले मुर्गे की बांग सुनाई दी. घर के पिछवाड़े की बाड़ से उल्लू की आवाज भी आ गयी. पता नहीं जनाई को कैसा लग रहा था? वह बच्चे को वैसे ही छोड़कर घर के बाहर आ गयी. वह किसी के घर नहीं गई. गांव में भी किसी के यहां न जाकर उसने सीधे अपने खेत का रास्ता पकड़ा. तेजी से कदम उठाती वह घड़ी भर में अपने खेत में आयी. एक छोटे से खेत के टुकड़े में, जो उसका अपना था, हरे ज्वार की फसल लहरा रही थी. ज्वार का दाना तैयार हो रहा था, अभी-अभी भुट्टे आंखें खोलकर बाहर की दुनिया को देख रहे थे. वह सब इतना सुन्दर था कि हर दिन सांझ की बेला में राई-नोन उतारा जाये, ताकि नजर न लगे. भोर की ओस में हर डण्ठल नहाया था. दाने पेट में लिए तरुणाई में आयी हरी-भरी गर्भवती ज्वार ठण्डी वायु से हिल-डुल रही थी.

मेड़ पर खड़ी होकर जनाई देख रही थी. वह अपनी

सुध-बुध खो बैठी थी. जनाई एकदम उस खेत में ऐसे घुस गयी जैसे संकट के अवसर पर प्रियतम व्यक्ति के मिलने पर हम उसके गले लग जाते हैं. दाने से भरे भुट्टों को अपने हृदय से सटाकर उसने हाथ जोड़े और आसमान की ओर देखते हुए कहा 'भगवान्, इस नन्हें से खेत में मैं अकेली पसीना बहाती रही. चावल बिनते समय जैसे एक-एक कंकड़ दूर करते हैं, वैसे ही मैंने यहां कंकड़ साफ किये हैं. इतना पसीना बहाया इसलिए यह फसल हाथ में आयी है. अब एक ही मांग है, इसको काटकर एक गरम-गरम रोटी बनाकर अपने लाड़ले बच्चे को खिला दूं, वह रोटी उसके पेट में चली जाय, तब तुम उसको ले जाओ अगर चाहते ही हो. तुम्हें उसे ले ही जाना है तो तुम मेरी सुनने वाले थोड़े ही हो. लेकिन मेरी इतनी बात मानो. मैं कुछ ज्यादा नहीं मांग रही हूं. इतनी-सी तो मेरी मांग है. दो महीने हुए, मेरे बच्चे ज्वार की रोटी के लिए तरस रहे हैं. मेरी इतनी-सी बात सुनो मेरे भगवान! हाथ जोड़कर विनती करती हूं.'

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