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प्राची - जून 2016 / हास्य-व्यंग्य / धारावाहिक उपन्यास / एक गधे की वापसी / कृश्न चन्दर

हास्य-व्यंग्य

धारावाहिक उपन्यास

एक गधे की वापसी

कृश्न चन्दर

तीसरी किस्त:

इस किस्त में पढि़ए...

होना गिरफ्तार स्मगलिंग के धन्धे में जोजफ, मारिया

और कामता प्रसाद का, और भागना गधे का पुलिस

के डर से और मुलाकात करना पारसी बाबा रुस्तम

सेठ से, और बयान बम्बई के रेसकोर्स का....

जब मैं होश में आया तो मैंने देखा कि गली के बाहर नुक्कड़ पर एक कोने में बाजार की मोरी के समीप पड़ा हूं. मेरे मुंह से झाग बह रहा है और बाजार के कुछ लौंडे मुझसे कुछ दूर खड़े मुझे ध्यान से देख रहे हैं.

मैंने अच्छी तरह से आंखें खोलकर इधर-उधर देखा, कान फटफटाए, टांगें सीधी की, तो मुझे प्रतीत हुआ कि मेरा पेट बहुत हल्का हो चुका है और मेरा नशा भी लगभग उतर चुका है.

मगर जोजफ, मारिया और कामता प्रसाद गायब थे. उन लोगों ने मेरे पेट से शराब निकाल ली थी और मुझे मुर्दा समझकर गली से घसीटकर मेरी लाश को बाजार के कोने में फेंककर चले गए थे. लगता है कि बिजनेस की दुनिया में यही होता है. जब कोई आदमी काम के योग्य नहीं रहता तो उसे एक लाश की तरह घसीटकर बेकारी के कूड़े-कर्कट में फेंक दिया जाता है. पहले तो वे आपके शरीर से जीवन का रस और रक्त की अंतिम बूंद कड़े परिश्रम के पम्प से निकाल लेते हैं, फिर धक्का देकर मोरी में गिरा देते हैं.

जब इन्सान इंसानों के साथ यह व्यवहार करते हैं, तो फिर मैं तो एक गधा हूं. मुझे संतोष कर लेना चाहिए और धन्यवाद देना चाहिए कि इन लोागों ने मेरी जान बख्श दी है.

मैं यूं ही सोच रहा था कि इतने में मैंने कनखियों से देखा कि सामने माहिम के चौक में जोजफ, मारिया और कामता प्रसाद चले आ रहे हैं. तीनों के हाथ में हथकडि़यां हैं और उनके साथ पुलिस के दो सिपाही हैं.

मैं घबराकर उठ खड़ा हुआ. इतने में उन लोगों ने मुझे देख लिया. मारिया ने चिल्लाकर कहा, ‘‘वह रहा गधा!’’

पुलिस का सिपाही मेरी तरफ भागा. उसे देखते ही मैं भी भागा.

‘‘पकड़ो, पकड़ो!’’ पुलिस के सिपाही ने शोर मचाया.

मगर मेरे कदमों को जैसे पंख लग गए थे. मैं भय से चीखता, चिल्लाता, हिनहिनाता, दुलत्तियां झाड़ता माहिम के बाजार के बीचों बीच भागता हुआ, दौड़ता हुआ, शिवाजी पार्क तक चला गया. पुलिस वाले एक जीप लेकर मेरा पीछा करने लगे. मगर मैं भी अपनी पूरी शक्ति के साथ भागने लगा. मुझे यह आशंका थी कि यदि मैं गिरफ्तार हो गया तो वे लोग मुझे जीवित न छोड़ेंगे.

हरी-निवास के अड्डे से मैं शिवाजी पार्क की तरफ भागा, जीप मेरे पीछे-पीछे आ रही थी. मैंने एक चौकड़ी भरी और शिवाजी पार्क की दीवार फांदकर मैदान में आ रहा. जीप छलांग न लगा सकती थी. अतः वह रुक गई. फिर चक्कर काटकर शिवाजी पार्क के दरवाजे की ओर रवाना हो गई, जो यहां से बहुत दूर था. तब तक मैं शिवाजी पार्क का मैदान पार करके फुटबाल खेलने वाली टीमों के बीच से गुजरता हुआ, क्रिकेट की विकेट उड़ाता हुआ, वर्ली साइड की दीवार फांदता हुआ दूसरी तरफ जा पहुंचा और वहां से सरपट भागता हुआ, तीर की तरह सनसनाता हुआ, टैफिक के तमाम नियमों का उल्लंघन करता हुआ, ‘वर्ली सी-बीच’ पर जा पहुंचा. समुद्र के किनारे पहुंचकर मेरी टांगों ने जवाब दे दिया और मैं बेबस और निढाल होकर समुद्र के किनारे लेट गया.

वर्ली का दृश्य बहुत सुन्दर था. दृष्टि-सीमान्त तक समुद्र एक अर्धवृत्ताकार रूप में फैला हुआ था, ऊपर आकाश महराब के आकार में झुका हुआ था, जिस पर उषा की झालरें और रंगीन बादलों की जालियां जड़ी हुई थीं. उन रंगारंग झालरों और बदलियों के स्वच्छ झिलमिलाते हुए सौन्दर्य ने मुझे मोहित कर लिया. और मैंने सोचा, यह सुन्दरता मुझसे कितनी दूर है! सौंदर्य का सुन्दर प्रतिबिम्ब कितना मनमोहक है! बढ़ती हुई भूख बेकारी और

अपराध की इस दुनिया में एक साधारण गधे के लिए कहीं आराम नहीं है. क्या कोई ऐसा समय आएगा जब मैं सौंदर्य की इस ऊंची महराब को छू सकूंगा! अभी तो असम्भव ज्ञात होता है- मैंने मन में सोचा. अभी तो जीवन प्रायः अनेक स्थानों पर एक गधे के स्तर से ऊपर नहीं उठा है. अभी सुन्दरता बहुत दूर है, न्यास की महराब बहुत ऊंची है. और मैं एक गधा हूं, जिसका पुलिस पीछा कर रही है.

मैंने थककर अपनी आंखें बन्द कर लीं. अब जो हो, सो हो. चाहे पुलिस आए और मुझे गिरफ्तार कर ले, चाहे समुद्र की एक बड़ी उछाल आए और मुझे लहरों में समेटकर समुद्र के नीचे पहुंचा दे. इस समय मैं इतना थक चुका हूं कि प्रत्येक परिणाम के लिए तत्पर हूं.

मेरे कानों में एक मोटर के रुकने की आवाज आई. मैंने समझा, जीप आ गई पुलिस की. लेकिन मैंने आंखें बन्द कर लीं, उसी तरह लेटा रहा.

मोटर के पट खुलने की आवाज आई. फिर कदमों की चाप सुनाई दी और फिर वे कदम मेरे समीप आकर रुक गए, पर मैं उसी तरह आंखें बन्द किए लेटा रहा.

फिर मेरे कानों में आवाज आई, ‘‘खेमजी, कहीं से एक ओपन ट्रक लाना.’’

‘‘क्या करेगा रुस्तम सेठ?’’ दूसरी आवाज ने पूछा.

‘‘हम इस गधे को लादकर अस्तबल में ले जाएगा.’’

‘‘काहे को सेठ?’’

‘‘तुम इस वक्त जास्ती बात मत करो. हमारा खोटी मत करो.’’ रुस्तम सेठ ने शासकीय स्वर में कहा, ‘‘अभी पुलिस वाला इधर आता होगा. उन लोगों के आने से पहले हम इसको अपने अस्तबल में ले जाना मांगता है.’’

‘‘बहुत अच्छा सेठ! अभी लाता हूं.’’ दूसरी आवाज ने आज्ञा मानते हुए कहा. और फिर कदमों की चाप दूर होती गई. शायद खेमजी ट्रक लेने आया था. अब मुझे यह भी मालूम हो गया था कि ये लोग जो कोई भी थे, पुलिस वाले हर्गिज नहीं थे. इसलिए मैंने बिना किसी भय के अपनी आंखें खोलीं.

मैंने देखा- एक लाल चेहरे वाला, लम्बी मुड़ी हुई नाक, गंजे सिर और सफेद बालों की कनपटियों वाला, एक लम्बे कद का पारसी बाबा है, जो मेरे ऊपर झुका हुआ है और मुझे दयालु दृष्टि से देख रहा है.

बाद में मुझे रुस्तम सेठ ने बताया कि मैं उनके अस्तबल में लगातार तीन-चार दिन मृत्यु-शय्या पर पड़ा रहा. रुस्तम सेठ ने मेरे इलाज के लिए अच्छे-से-अच्छे जानवरों के डॉक्टर बुलाए, जो जानवरों का इलाज करने में दक्ष समझे जाते थे. किन्तु चूंकि ये सब-के-सब भारतीय थे, इसलिए ठीक तरह से मेरा इलाज नहीं कर सके. रुस्तम सेठ के ख्याल में मुझे एक विदेशी एक्सपर्ट की आवश्यकता थी, जो सही ढंग से मेरी बीमारी का निदान करके मेरा इलाज कर सके. दुर्भाग्य यह था कि बम्बई में इस समय कोई ऐसा डॉक्टर नहीं था जिसने अपना जीवन गधों के इलाज में गुजारा हो; क्योंकि बेचारे गधे फीस नहीं दे सकते, और बम्बई में जितने डॉक्टर हैं सब फीस लेते हैं.

किन्तु रुस्तम सेठ के यहां फीस की तो कोई समस्या न थी; समस्या गधों के इलाज के अनुभव की थी. बहुत दौड़-धूप के बाद ज्ञात हुआ कि हांगकांग में एक अंग्रेज डॉक्टर मेकन्ले रहते हैं. जो गधों के इलाज में प्रवीण समझे जाते हैं. और चूंकि अंग्रेजों को पिछले दो सौ वर्षों से एशिया के गधों के रोग का अनुभव रहा है, इसलिए रुस्तम सेठ ने वायुयान के द्वारा उसे तत्काल मेरे इलाज के लिए बुलावा लिया और उन्होंने आते ही मेरे रोग का सही निदान करके शीघ्र मेरा इलाज आरम्भ कर दिया. ये तमाम बातें मुझे बाद में मालूम र्हुइं. इस समय मुझे इतना याद है कि तीन-चार दिन की बेहोशी के बाद जब मैंने आंखें खोलीं तो मैंने अपने-आपको लकड़ी की एक बड़ी मसहरी पर लेटा हुआ पाया. मेरे हाथ-पांव बंधे हुए थे. मेरे सिर के पीछे बड़े-बड़े आरामदेह रबर के तकिये रखे हुए थे. एक नर्स मेरी बायीं तरफ खड़ी हुई थी. दायीं तरफ डॉक्टर मेकन्ले बड़े ध्यान से कांच की कुल नलकियों को देख रहे थे. रुस्तम सेठ मेरे पास खड़े थे और बड़े प्यार से मुझे देख रहे थे.

मैंने आंखें खेालकर पूछा, ‘‘मैं कहां हूं?’’

‘‘मेरे अस्तबल में.’’ रुस्तम सेठ बड़े प्यार से बोले.

‘‘यह क्या हो रहा है?’’

‘‘तुम्हारी नसों में खून डाला जा रहा है.’’

‘‘बोलो नहीं,’’ डॉक्टर मेकन्ले अपने होंठों पर उंगली रखते हुए बोले, ‘‘आराम करो.’’

मैंने अपनी आंखें बन्द कर लीं. कुछ क्षणों पश्चात् मुझे ऐसा लगा जैसे शरीर की रगों में जीवन-संजीवनी की धारा दौड़ रही है. धीरे-धीरे मुझमें शक्ति वापस आ गई. हौले-हौले एक शान्तिप्रद, कोमल, रेशमी तन्द्रा मुझ पर छा रही थी और मैं आंखें बन्द करके सो गया.

पता नहीं, कितने समय बाद मैं जागा. किन्तु जब जागा तो देखा कि रात का समय था. मेरी मसहरी के पास एक नीले रंग का टेबिल लैम्प जला हुआ था. और उसके समीप एक आराम कुर्सी पर मारिया बैठी थी.

‘‘मारिया?...तुम?...यहां कहां...’’

मारे खुशी और आश्चर्य के मेरे मुंह से एक चीख-सी निकल गई.

मारिया की बड़ी-बड़ी कृपालु आंखों ने मुझे घबरा-सा दिया. फिर वह धीरे-धीरे कहने लगी, ‘‘तुम्हें रुस्तम सेठ ने खरीद लिया है. जोजफ तुम्हें लेने के लिए आया था किन्तु रुस्तम सेठ ने उसे पांच हजार रुपये देकर खरीद लिया है. और मुझे तुम्हारी देखभाल के लिए नर्स नियुक्त कर दिया है. दो और नर्सें भी हैं. हम तीनों बारी-बारी ड्यूटी देती हैं. कहो, क्या हाल है तुम्हारा? कैसा महसूस करते हो?’’

‘‘किन्तु पांच हजार रुपये!...’’ इतना आश्चर्य था मुझे कि मेरी आवाज बैठ-सी गई, ‘‘पांच हजार रुपये! जरा सोचो तो मारिया, हिन्दुस्तान में किसी गधे का इतना मूल्य न लगा होगा!’’

‘‘हां,’’ मारिया ने स्वीकार किया, ‘‘वर्ना यहां जितने गधे हैं, रोजाना कुछ आने की ही मजदूरी पाते हैं और बड़ी मुश्किल से दिन में एक बार घास खाते हैं. तुम्हारी किस्मत तो वाकई अपनी किस्म का एक रिकार्ड है. हालांकि सुना है कि तुम्हारी नस्ल अच्छी नहीं.’’

‘‘एक गरीब गधे की नस्ल कहां अच्छी हो सकती है!’’ मैंने दयनीयता से कहा, ‘‘आजकल अच्छी नस्ल तो एक अच्छी नस्ल की गाड़ी रखने से स्पष्ट होती है, एक ‘केडीलक’ या ‘रोल्स रायज’! पैदल चलने वाले गधे की क्या नस्ल और क्या उसका खानदान! इसलिए मुझे आश्चर्य हो रहा है कि रुस्तम सेठ ने मुझे पांच हजार रुपये में क्यों खरीद लिया?’’

मारिया ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखें कई बार घुमाई, अपने कोमल कन्धे उचकाए और बोली, ‘‘क्या मालूम? मगर यह मुझे मालूम है कि उन्होंने तुम्हारे इलाज पर अब तक हजारों रुपये खर्च कर दिए हैं. मुझे तो रुस्तम सेठ बहुत ही शरीफ आदमी मालूम होता है. उन्होंने तुम्हें सपने में मेरा नाम दो बार बड़बड़ाते सुना और फौरन मुझे उचित वेतन देकर नर्स के काम के लिए नौकर रख लिया.’’

मारिया यह कहते-कहते शर्मा-सी गई. मैंने भी उसकी कोमल भावना का सम्मान करते हुए मुंह फेर लिया और रुंधी आवाज में धीरे से बोला, ‘‘रुस्तम सेठ मेरा रक्षक है. उसने मेरी जान बचाई है. वह एक सज्जन आदमी है. उसके दिल में इन्सानियत का दर्द मालूम होता है- गरीबों के लिए सहानुभूति और गिरे हुओं के प्रति प्रेम. मैं मृत्यु-पर्यन्त ऐसे आदमी का अहसान नहीं भूल सकता.’’

मेरी आंखों में आंसू आ गए. सम्भव है कि मैं कुछ और भी कहता, किन्तु इतने में डॉक्टर मेकन्ले आ गए और उन्हें देखते ही मारिया उठ खड़ी हुई और डॉक्टर का संकेत पाकर कमरे में बाहर चली गई. मैं तो उसकी कमर के लचकदार मोड़ को देखता ही रह गया.

‘‘अब कैसे हो?’’ डॉक्टर मेकन्ले ने मेरी नब्ज टटोलते हुए पूछा.

‘‘बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूं! थैंक्यू.’’

डॉक्टर मेकन्ले मुस्कराए. उन्होंने नब्ज देखनी छोड़ दी और अपनी आराम कुर्सी मेरी मसहरी के समीप घसीटते हुए बोले, ‘‘तुम्हें वास्तव में रुस्तम सेठ का धन्यवाद करना चाहिए. यदि वे मुझे समय पर न बुलाते तो तुम्हारी जान का बचना बहुत कठिन था.’’

‘‘मुझे क्या बीमारी थी डॉक्टर?’’

‘‘ओवर ईटिंग.’’

‘‘हालांकि मेरी बीमारी अधिक पीने से हुई होगी, डॉक्टर!’’ मैंने कहा.

‘‘एक ही बात है. अधिक खाना, अधिक पीना एक ही क्रम में आते हैं.’’

‘‘किन्तु मुझे स्मरण है,’’ मैंने अपनी स्मरण-शक्ति पर जोर देते हुए कहा, ‘‘उस दिन तो मैंने घास का एक तिनका तक न तोड़ा था और उससे पहले भी दो दिन बारह-बारह घण्टे के लिए मुझे खाने के लिए कुछ नहीं दिया गया था. आज तक तो मुझे याद नहीं कि कुछ अच्छे दिनों को छोड़कर मुझे कभी भरपेट खाना मिला हो.’’

‘‘इसलिए तो जब तुम्हें पेट-भर खाने को मिलता है तब तुम अधिक खा जाते हो और बीमार पड़ जाते हो. मैंने अक्सर

गधों को यही बीमारी देखी है.’’

‘‘देखिए यह तो कोई बीमारी नहीं है डॉक्टर!’’ मैंने बात का विरोध करते हुए कहा, वास्तविक बीमारी तो भूख है, जिससे सब गधे मरते हैं.’’

‘‘भूख का हम इलाज नहीं कर सकते हैं,’’ डॉक्टर ने कहा, ‘‘भूख एक असाध्य रोग है.’’

‘‘और बेकारी?’’

‘‘बेकारी भी असाध्य है.’’

‘‘और अशिक्षा?’’

‘‘अशिक्षा भी असाध्य है, बल्कि भयानक है,’’ डॉक्टर ने कहा, ‘‘जहां-तहां गधों को शिक्षा दी गई, राज्य उलट गए हैं.’’

मैं चुप हो गया. मैंने सोचाµडॉक्टर से उलझना व्यर्थ है. सम्भव है, इलाज ही करना बन्द कर दे और वापस हांगकांग चला जाए. अतः मैंने बात पलटते हुए कहा, ‘‘तो आपके ख्याल में मेरी बीमारी अधिक घास खा जाने से हुई है?’’

‘‘निस्सन्देह.’’

मैंने दिल में कहा, ‘डॉक्टर साहब, कहीं आप ही तो घास नहीं खा गए!’ किन्तु मैं दिल को रोककर चुप रहा.

डॉक्टर मेकन्ले बोले, ‘‘तुम एक पढ़े-लिखे गधे हो. मैंने अखबारों में तुम्हारा हाल पढ़ा था. इसलिए तुम्हें बताता हूं कि तुम्हारा रोग बहुत भयंकर है. एक तो अधिक खा जाने की बीमारी, ऊपर से खून खराब.’’

‘‘खून खराब था?’’

‘‘हां. जो गधा पढ़-लिख जाए, उसका खून प्रायः खराब हो जाता है. दिमाग भी खराब हो जाता है. इसलिए मैंने आते ही तुम्हारे पेशाब, पाखाने, खून और पसीने का निरीक्षण किया.’’

‘‘पसीने का भी निरीक्षण होता है डॉक्टर साहब?’’

‘‘हां. फिर दिल-दिमाग, फेफड़े, जिगर, गुर्दे, तिल्ले, मेदे का एक्स-रे किया और मैं इस परिणाम पर पहुंच गया कि पढ़ने-लिखने से तुम्हारा खून खराब हो गया है. इसलिए जब तक तुम्हारे शरीर में किसी अनपढ़ गधे का खून प्रविष्ट न किया जाएगा, तुम ठीक नहीं हो सकते. रुस्तम सेठ का ख्याल था कि बम्बई में किसी अनपढ़ गधे का मिलना कठिन है. किन्तु जब विज्ञापन दिया तो हजारों गधों के प्रार्थना-पत्र मिले जो दस रुपये से घास के गट्ठे तक के लिए अपना खून बेचने के लिए तैयार थे. रुस्तम सेठ को बड़ा आश्चर्य हुआ.’’

‘‘इसमें आश्चर्य की क्या बात है? गरीबों ने आज तक अपना खून ही बेचा है.’’

डॉक्टर के गाल मेरी बात सुनकर लाल होते हुए एकदम आग के रंग के हो गए. वह एक क्षण मौन रहने के बाद बोला, ‘‘मालूम होता है तुम्हारा दिमाग अभी तक बीमार है. अभी तुम्हें और खून की आवश्यकता है. अभी तुम्हें काफी समय तक अनपढ़ गधों का खून दिया जाएगा और पुराना खून निकाल लिया जाएगा. और एक सप्ताह तक मैं समझता हूं कि तुम्हारे शरीर में तुम्हारे खून की एक बूंद तक न रहेगी.’’

‘‘क्यों मेरी उम्मीदों का खून करते हो डॉक्टर?’’

डॉक्टर हंस पड़ा. बोला, ‘‘अच्छा, अब मैं चलता हूं. तुम आराम करो. रात अधिक जा चुकी है.’’

दस-बारह दिन के पश्चात् मैं बिल्कुल अच्छा हो गया और अस्तबल के बाहर मैदान में चहलकदमी करने लगा और दौड़ लगाने लगा. डॉक्टर मेकन्ले भी पर्याप्त फीस लेकर हांगकांग वापस चला गया. मारिया अलबत्ता अभी तक मेरी देखभाल पर तैनात थी, हांलाकि दूसरी दो नर्सों की छुट्टी कर दी गई थी.

चहलकदमी करते समय प्रायः मारिया मेरे साथ होती थी और अपनी लुभानी बातों से मेरा दिल लुभाती थी.

फिर एक दिन रुस्तम सेठ मेरे पास आया. उसके साथ एक नाई भी था. रुस्तम सेठ ने मेरी ओर संकेत करके नाई से कहा, ‘‘इसके शरीर के सारे बाल मूंड डालो और इसके शरीर को घोड़े के शरीर की तरह स्वच्छ और चिकना बना दो.’’

हजामत के बाद मुझे साबुन और पानी से कई बार नहलाया गया. सूखे तौलिये से मेरा शरीर कई बार रगड़ा गया. फिर कई दिन तक मेरे शरीर पर जैतून के तेल की मालिश होती रही और अन्त में एक विचित्र-सा पॉलिश मेरे शरीर पर किया गया, जिससे मेरा शरीर सिर से पांव तक एक मुश्की घोड़े की खाल के समान चमकने लगा.

सारे जीवन में मैंने अपने-आपको कभी ऐसा सुन्दर न पाया था. अब तो कभी-कभी मारिया भी चाव-भरी निगाहों से मेरी ओर स्वीकारात्मक ढंग से देख लेती थी.

मैंने मारिया से कहा, ‘सेठ रुस्तम जैसा देवगुण-सम्पन्न देवता-स्वरूप इन्सान मैंने आज तक नहीं देखा. कैसा निःस्वार्थ, सहानुभूतिपूर्ण हृदय पाया है इसने! अरे, अपने सगे रिश्तेदार ऐसा व्यवहार नहीं करते जो इसने मुझसे किया है. इसे देखकर मेरे जैसा गधा भी मानवता पर विश्वास ला सकता है.’

मारिया ने कहा, ‘‘खुदा मेरे और तुम्हारे रक्षक को प्रबल तक जिन्दा रखे!’’

इस वार्तालाप के दूसरे दिन एक धनी मूंछों वाला, सांवले रंग का, दोहरे बदन का, अधेड़ उम्र का आदमी, जिसकी दृष्टि मेरे शरीर को बर्मे की तरह छेदती थी, एक डॉक्टर को लेकर आया. सेठ रुस्तमजी और खेमजी भी साथ ही थे.

डॉक्टर ने मेरा अच्छी तरह से निरीक्षण करने के बाद कहा, ‘‘यह तो मुझे गधा मालूम होता है.’’

रुस्तम सेठ ने कहा, ‘‘अजी नहीं, यह पीरू का घोड़ा है. पीरू प्रान्त दक्षिणी अमरीका में स्थित है. वहां के घोड़े बिल्कुल

गधों के समान होते हैं.’’

‘‘बौना भी है.’’ घनी मूंछों वाले ने एतराज किया.

‘‘वहां के घोड़े इस प्रकार ही बौने होते हैं.’’ खेमजी बोला, ‘‘सेठ ने इसे खासतौर पर पीरू से मंगाया है. हिन्दुस्तान में आज तक इस नस्ल का घोड़ा कभी नहीं आया. यह दोगला घोड़ा है. बाप स्पेनिश, मां साउथ अमेरिकन इण्डियन. दोनों की क्रासब्रीडिंग से यह नस्ल तैयार हुई. दौड़ने में बहुत बढि़या होती है.’’

‘‘हूं...’’ घनी मूंछों वाले ने सन्देह से सिर हिलाया. फिर बोला, ‘‘इसका नाम क्या है?’’

‘‘गोल्डन स्टार!’’ रुस्तम सेठ बोला.

क्रमशः....

अगले अंक में.....

सम्मिलित होना महालक्ष्मी की रेस में घोड़ों के साथ,

और मजाक करना देखकर गधे को लोगों का, और

बयान घुड़दौड़ के आर्श्चयजनक परिणाम का....

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