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प्राची - जून 2016 / हास्य-व्यंग्य / गड्ढों का सीक्रेट दिनेश बैस

यहां वहां की

गड्ढों का सीक्रेट

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दिनेश बैस

भारतीय फैशन शास्त्र में जून का महीना गड्ढों के नाम समर्पित होता है. कार्यालयों के, वित्तीय संस्थानों के गये साल के गड्ढे मार्च के महीने में जस्टीफाइड कर लिये जाते हैं. यों तो सफल खिलाड़ी पूरे साल इतने संतुलित ढंग से खेलते हैं कि मार्च में अधिक कुछ करने के लिये नहीं रह जाता है. एक कृत्रिम कार्यालयी तनाव के अतिरिक्त. वह जनता के संक्रमण से स्वयं को सुरक्षित रखने में सहायक होता है- भई, अभी तो ईयर एण्ड चल रहा है. बहुत काम है. बाद में मिलिये- फिर भी कहीं कुछ लोचा रह जाता है तो उसे सब मिल कर सम्हाल लेते हैं- साथी हाथ बढ़ाना- यहां मानवीय दयाभाव काम आता है- अब आदमी ही आदमी के काम नहीं आयेगा तो कौन आयेगा. आज वे गड्ढे में गिर रहे हैं. उन्हें गड्ढे से निकालना हमारा कर्तव्य है; ताकि कल अपन गिरने लगें तो अपन को खींच कर निकालने वाला भी तो कोई हो. कहा गया है कि सब मिल कर एक-एक बांस लगायें तो कैसा भी तम्बू हो, खड़ा हो ही जाता है.

अप्रैल का महीना, कुछ पूछिये मत. अरे दादा रे, कुछ चैन लेने दोगे? देख रहे हैं कि अभी-अभी मार्च गुजरा है. आप जानते हैं, कितना टेंशन रहता है. कुछ सांस तो लेने दीजिये. पहली तारीख होते ही चले आये. अभी तो प्रैक्टिकली पिछला साल ही चल रहा है. दस दिन बाद मिलिये तब ऑफिस में अप्रैल लगेगा- साहब सांस लेने के लिये स्मार्ट फोन पर कुछ मानसिक सुख देने वाले दृश्यों में उलझे हुये हैं.

मई लगते-लगते छुट्टी अप्लाई होने लगती हैं- बहुत बोर हो चुके हैं, यार. इस नौकरी ने तो बिल्कुल चूस लिया है. एल टी सी ड्यू हैं. अभी ले लें. नहीं, पहाड़ों पर नहीं जायेंगे. बेबी तो बहुत मचल रही है लेकिन वाइफ ने साफ मना कर दिया है. कहती हैं कि पहाड़ों का क्या भरोसा. कब धसकने लगें. साउथ या राजस्थान सर्किट का इरादा है. गर्मी है लेकिन ऑफ सीजन का लाभ मिलेगा- आदमी कितना भी कमा ले, मध्यवर्गीय मानसिकता पांवों में कीचड़ की तरह चिपकी रहती है. सेल और ऑफ सीजन के माया मोह ग्रस्त कर ही लेते हैं. देस की मांटी से जुड़े हैं न. वह कल्चर कैसे छूटेगा. संस्कृति की प्रेरणा है कि मुफ्त में गंदगी मिल रही हो तो उसे भी ले लो. फिर यू नो, बीकानेर में ससुराल भी है. सालियां वगैरह भी आ रही हैं. बच्चे मौसी से मिलने के लिये मचल रहे हैं- एक आंख अजाने ही दब जाती है- यह कुछ उस नियम के अंतर्गत होता है कि मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है- इस पूरे कर्मकांड में अंतर्निहित अर्थ है कि सरकारी खर्च पर पर्यटन प्रोत्साहन के नाम पर ससुराल प्रवास में रहना है. भारतीय मानुस को प्रोत्साहित किया जाये तो कफन से भी कमीशन की जुगाड़ कर ले. लोग भ्रम निकाल दें. पृथ्वी वीरों से खाली हो सकती है लेकिन यह वीर वसुंधरा नहीं-

जून हड़बड़ा कर जागने का मौसम होता है- कब तक यों हाथों पर हाथ रखे बैठे रहोगे- मन कचोटने लगता है- इतना वेतन लेते हैं. यह देश की जनता की गढ़ाई कमाई से मिलता है. कुछ तो काम करो. क्या हुआ जो सड़ी गर्मी पड़ रही है. कुछ न कुछ तो पड़ेगा ही. गर्मी जायेगी तो बरसात होने लगेगी. बरसात नहीं होगी तो सूखा पड़ेगा. पड़ने के डर से कब तक एसी जोतते रहोगे? चलो, कुछ करो- आत्मा ललकारती है.

कुछ करने के लिये साहब ने कमर कस ली है. करने के नाम पर मीटिंग बुला ली गई है. अंडाकार टेबिल के एक सिरे पर ऊंची सी कुर्सी पर साहब विराजमान हैं. वातावरण आध्यात्मिक सा हो उठा है. टेबिल के चारों ओर बैठे अधीनस्थ भक्ति भाव से साहब को निहार रहे हैं- सारी कृपा वहीं अटकी है- ठेकेदार ने व्यवस्था की है. सब श्रध्दापूर्वक चिप्स कुतर रहे हैं. चिप्स के बाद कोल्ड- यह हाजमे के लिये अच्छा होता है- साहब बता रहे हैं-

-क्या चल रहा है- साहब समाधि से बाहर आते हैं.

-सर, गड्ढों का नया टारगिट आ गया है- पी ए सूचना दे रहा है- पिछले साल से डेढ़ गुना अधिक गड्ढे खुदवाने हैं. जुलाई के पहले सप्ताह से ही वृक्षारोपण शुरू हो जायेगा.

-हुं- साहब अपने होने का प्रमाण दे रहे हैं- एनी हाउ टारगिट तो अचीव करना ही होगा- साहब चिंतित नहीं हैं. बस, निर्णय लिया है.

-सर कैसे होगा टारगिट...पूरा-फण्ड्स नहीं बढ़ाये हैं. पिछला काम ही ऑडिट में फंसा है. पी ए बता रहा है.

-वह सेट राइट हो जायेगा- पी आर ओ सूचना दे रहा है- ऑडिट ऑफीसर की बेटी एक्टीवा के लिये मचल रही है. बड़ी सुंदर है बेचारी-

-कौन...? बेटी या एक्टीवा- साहब की आंखें कामुक हो रही हैं.

-हा-हा-हा- वातावरण ठहाकों से भर गया है. जो कुढ़ रहे रहे हैं वे पकड़े जाने के डर से और जोर से हंस रहे हैं. साहब की लम्पटता को विनोद प्रियता प्रमाणित किया जा रहा है.

-एनी वे, टारगिट कैसे पूरा होगा- साहब मुद्दे पर लौट आये हैं- खनूजा, क्या कह रहे हो तुम?

खनूजा कार्यदायी कम्पनी का मैनेजर है. ऐसी परिस्थितियां कैसे मैनेज की जानी हैं, वह जानता है. आत्मविश्वास से योजना पर प्रकाश डाल रहा है- सर फॉरचुनेटली पांच साल के लिये गड्ढे खोदने का काम हमारी कम्पनी को ही मिला है. इसलिये डिपार्टमेंटल कोऑपरेशन मिले तो अधिक परेशानी नहीं होगी. बस, आपको थोड़ा एकाउण्ट और ऑडिट को हैंडिल करना होगा- खनूजा विस्तार से बता रहा है- और हां एमर्जेंसी में मीडिया को भी देखना होगा.

साहब आश्वस्त हो रहे हैं- करोगे कैसे?

-सर, पिछली साल गड्ढे खोदे गये थे- खनूजा सीक्रेट बता रहा था- पानी नहीं बरसा. लक्ष्य के अनुसार पेड़ नहीं लगाये गये. बड़ी संख्या में गड्ढे पेड़ विहीन रह गये. उन्हें भरने के लिये फण्ड रिलीज हुआ था. गड्ढे नहीं भरे गये. वह गड्ढे हमारे स्टॉक में हैं. उन्हें इस साल के गड्ढों में जोड़ देंगे तो हमारा टारगिट पूरा हो जायेगा.

-दैट्स ओ के- साहब सभा विसर्जित कर रहे हैं- तालियां-तालियां-तालियां- जो जन जहां से आये हैं सो तहं प्रयाण कर रहे हैं. सबके चेहरों पर अद्भुत संतुष्टि है- खनूजा बहुत प्रौफेशनल है. सबके हितों की रक्षा करता है.

सम्पर्कः 3-गुरुद्वारा, नगरा, झांसी-28003

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