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व्यक्तित्व की पहचान – मोबाइल / डा. सुरेन्द्र वर्मा

न जाने कितने मनोवैज्ञानिकों ने, चिकित्सकों और दार्शनिकों ने, आदमी की क़िस्में समझने की कोशिश की लेकिन कोई भी अपने इस प्रयत्न में पूरी तरह सफल न हो सका. कुछ ने लोगों की केवल दो श्रेणियां तय कीं -मोटे और पतले, या, कृषकाय और मल्लकाय, लेकिन जो न बहुत मोटा है और न बहुत पतला, उसे किस श्रेणी में रखेंगे? एक मनोवैज्ञानिक हुए हैं, कार्ल युंग. उन्होंने वर्षों-वर्ष रिसर्च के बाद मनुष्य के दो प्रकार बताए. बहिर्मुखी और अंतर्मुखी. जो इनमें से किसी कोटि में नहीं आता, उसे उन्होंने उभयमुखी कह दिया. मानो बड़ी रियायत कर रहे हों. बहरहाल, आदमी के न जाने कितने रूप विद्वानों ने गिनाए पर कोई पूरी तरह खरा नहीं उतर पाया.

इधर एक शोध के अनुसार मोबाइल इस्तेमाल करने वालों की कुछ किस्में परिदों के नाम से परिभाषित की गई हैं. इसके अनुसार कुछ लोग “बतासी” कहे गए हैं जो बतासी पक्षी की तरह मोबाइल पर हर समय चहचहाते रहते हैं. लेकिन कुछ “घुग्घू” क़िस्म के लोग भी होते हैं जो मजबूरी की हालत में ही मोबाइल को हाथ लगाते हैं. “फाक़्ता” क़िस्म के वे लोग हैं जो अमन-पसंद और तमीज़दार होते हैं. वे अपने मोबाइल का कभी दुरुपयोग नहीं करते पर जहां ज़रूरी होता है उसे इस्तेमाल किए बिना भी नहीं रहते. “गौरैया” क़िस्म के मोबाइली परिंदे जनसंपर्क बनाए रखने में विश्वास रखते हैं. चिड़िया (गौरैया) की तरह उनकी घर-घर पैठ होती है और इसे बनाए रखने के लिए उन्हें मोबाइल की आवश्यकता सदैव बनी रहती है. “तेलियर” पक्षी चिकना-चुपड़ा होता है और अपनी तेज़ आवाज़ के लिए जाना जाता है. जो लोग अपने मोबाइल पर चीखते चिल्लाते रहते हैं और आक्रामक भाषा का उपयोग करते हैं “तेलियर” की कोटि में आते हैं. मोबाइल परिंदों में एक क़िस्म “मोर” की भी है, ये लोग मोबाइल का इस्तेमाल मोर की खूबसूरत कलगी की तरह करते हैं. मोबाइल उनके शरीर पर कहीं न कहीं एक सुंदर पंख की तरह झलकता रहता है.

अब ज़माना बहुत आगे बढ गया है. यह मोबाइल नहीं स्मार्ट-फोन का ज़माना है. क्या आप के पास आई-फोन, ब्लैकबेरी या एड्रायड में से कोई मोबाइल है? यदि नहीं है तो आपका शुमार व्यक्तित्व के धनी लोगों में हो ही नहीं सकता. हाल ही के एक अध्ययन में यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है. अध्ययन के अनुसार आई-फोन इस्तेमाल करने वाले लोग काफी अधिक ख़र्चीले होते हैं. वे अपने व्यक्तित्व को लेकर बहुत सजग होते हैं. कपड़ों और सौंदर्य प्रसाधनों पर खूब खर्च करते हैं. इनमें ब्लैकबेरी रखने वाले अपने रिश्तों को क़ायम रखने के प्रति काफी संजीदा होते हैं. उनका सामाजिक जीवन भी बेहतर होता है. अपने साथियों और दोस्तों के साथ उनके भावनात्मक संबंध रहते हैं. लेकिन ऐड्रायड फोन का उपयोग करने वाले अधिक औपचारिक होते हैं और शिष्टाचार भर निभाते हैं. टीवी देखने के शौक़ीन ये लोग, लेकिन, हुनरमंद होते हैं. ज़रूरत पड़ जाए तो रसोई के काम में भी अपनी निपुणता दिखा सकते हैं.

व्यक्तित्व के इस प्ररूप-शास्त्र (टाइपोलोजि) को ब्रिटिश कम्पनी टॉक-टॉक मोबाइल ने विकसित किया है. उसका दावा है कि क़रीब 2000 मोबाइल उपभोक्ताओं का अध्ययन करके यह निष्कर्ष सामने आया है कि आई-फोन रखने वालों का व्यक्तित्व आकर्षक होता है, ब्लैकबरी रखने वाले रिश्तों को निभाते हैं और एंड्राइड मोबाइल के उपभोक्ता हुनरमंद होते हैं. किस्सा कोताह, जिसके पास स्मार्ट-फोन नहीं है वह न तो आकर्षक है, न ही रिश्ते निभा सकता है. वह हुनरमंद भी नहीं है. मनोवैज्ञानिक भले कहते फिरें कि व्यक्ति है तो उसका एक व्यक्तित्व भी होगा ही लेकिन जिसके पास कोई स्मार्ट-फोन तक नहीं है उसका भी क्या कोई व्यक्तित्व है? आप ही बताइए |

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