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क्या मिलेगा ? - डॉ. दीपक आचार्य

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सीधा, सहज और सामान्य सा प्रश्न है - क्या मिलेगा? लेकिन यह अपने पीछे बहुत सारे गूढ़ार्थों और संकेतों को समेटे हुए होने के साथ ही जीवन की तमाम जटिलताओं को परिपुष्ट करने वाला है।

कोई सा काम हो, किसी से भी कह दो इसे करने के लिए। बिना कुछ भी जानकारी चाहे सबसे पहला सवाल यही दाग देगा - क्या मिलेगा?  मतलब कि अब इंसान तभी कुछ करेगा, जबकि उसे कुछ न कुछ मिले।

न मिले तो कुछ नहीं करेगा फिर चाहे उसके दादा से लेकर पौते तक कुछ कहें या नानी से लेकर नातिन तक। पड़ोसियों, रिश्तेदारों, परिचितों और सम्पर्कितों के कामों की तो बात ही बेमानी है।

इसी सवाल को लेकर हर इंसान का दिन उगता है और इसी से जुड़े ढेरों सवालों के साथ वह सो जाता है। सपने भी देखता है तो उनमें भी सोचता है कि क्या मिलेगा। मसलन मिलना ही इंसानियत का पर्याय हो चला है।

कुछ मिलेगा तो कुछ करेगा वरना अपनी मौज-मस्ती में कहीं मरा-अधमरा और नीम बेहोशी या कि दारू-भंग-गुटखा और दूसरे किसी न किसी आदतन नशे के आदी और ऎदी की तरह कोने में दुबका पड़ा रहेगा।

उसका जागरण ही तभी हो पाता है जबकि सिक्कों की खनक सुनाई या कि गांधी छाप कड़क-कड़क दिखाई दे। ये कड़कनाथ इतने अधिक भूखे हैं कि बिना कड़क-कड़क की फड़फड़ाहट के इतनी बेहोशी भंग नहीं हो पाती। या फिर ऎसा कुछ चाहिए जिनसे कि इनकी देह तृप्त होने का अहसास कर सके। बस कुछ मिलेगा तो ये अपने आप खड़े होकर चल देंगे, सारे के सारे काम करने को राजी हो जाएंगे।

हर तरफ आजकल यही सवाल सुलग रहा है - क्या मिलेगा?  कोई बिना मिले कुछ करना चाहता ही नहीं। जितना बड़ा आदमी उतनी बड़ी उसकी भूख, उतने अधिक प्रश्न - क्या मिलेगा, कितना मिलेगा, इतना मिलेगा क्या?  आदि-आदि।

फिर जहाँ कुछ मिलने की बात होगी वहाँ मिलने वाली बात की नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाएगी। आदमी तुलना करने लगेगा कि कहाँ कम मिलेगा, कहाँ इससे अधिक। इसी लाभ-हानि के चक्कर में रमता हुआ वह वहाँ दिखने लगेगा जहाँ  ज्यादा मिलने की उम्मीद हो।

बिरले होंगे जो कभी किसी काम के लिए मोल-भाव नहीं करते, न उनका कोई मूल्य तय कर पाता है। सेवा, परोपकार और भलाई के हर काम में बिना किसी इच्छा के स्वेच्छा से आगे आते हैं और अपने फर्ज निभा जाते हैं।

इन लोगों को कभी नफा-नुकसान की परवाह नहीं होती बल्कि समाज और देश की सेवा के लिए जीते हैं और कभी किसी से यह नहीं पूछते कि क्या मिलेगा। लोगों तथा अपने क्षेत्र की निष्काम सेवा से ही इन्हें इतना अधिक सुकून और अपार आत्मतोष प्राप्त हो जाता है कि इसके आगे सारी आशा-आकांक्षाएं, लोभ और लालच तथा प्राप्तियां गौण होती हैं। बिना कुछ भी खर्च किए अपने खाते में असंख्य दुआओं और अक्षय पुण्य का संग्रहण कर लेते हैं वो अलग।

लेकिन ऎसा वे ही कर पाते हैं जिनके भाग्य में लिखा हो। दुर्भाग्यशाली लोग जिन्दगी भर क्या मिलेगा-क्या मिलेगा... यह पूछते रहकर इतना अधिक जमा कर लिया करते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता, बावजूद इसके ये न सुखी रह पाते हैं, न संतुष्ट।

कहीं न कहीं से कुछ न कुछ प्राप्त कर लेने की इनकी यह हाय मरते दम तक रहती है। भिखारियों और इनमें कोई ज्यादा अन्तर नहीं है। भिखारी भगवान का नाम लेकर मांग खाते हैं और ये लोग अपने तथाकथित हुनर या क्षमता का अहंकार रखते हुए कुछ न कुछ पाने की जुगाड़ में लगे रहते हैं।

भिखारी अपने आपको दीन-हीन और कमाने-खाने में अक्षम दर्शा कर भीख मांग रहे हैं और ये लोग हर दृष्टि से सक्षम होने के बावजूद कुछ न कुछ मिल पाने के चक्कर में रमे रहते हैं। जात-जात की भीख और झूठन खाने-चाटने के लिए सदैव लालायित जरूर रहेंगे पर इन्हें यह पसंद नहीं आता कि कोई उन्हें भिखारियों की श्रेणी में रखे।

इनका मानना है कि इनके पास हुनर हैं जमा करने का, इसीलिए उनकी पूछ है। यह अलग बात है कि इन मुद्राराक्षसों से जो कोई इंसान सेवा या काम लेता है वह इन्हें निचले दर्जे के भिखारियों कम नहीं समझता पर काम निकलवाने के लिए यह जरूरी है कि इन लोगों को ऊपरी और कृत्रिम सम्मान का अहसास निरन्तर कराता रहे।

सामाजिक, धार्मिक और सभी क्षेत्रों में रुपयों की इसी सुरसा भूख ने सेवा और परमार्थ का कबाड़ा करके रख दिया है। लोग बिना मेहनत किए और हराम की कमाई खाने के इतने आदी होते जा रहे हैं कि उन्हें हर तरफ टकसालें ही नज़र आती हैं और लगता है कि उनका जन्म संसार से उगाही और जमा करने के लिए ही हुआ है।

निष्काम सेवा का भाव समाप्त हो गया है। हालांकि निःस्वार्थ सेवा और परमार्थ का बीज तत्व अभी नष्ट नहीं हुआ है। बहुत से लोग हैं जो दिन-रात सेवा और परोपकार के किसी न किसी क्षेत्र से जुड़े हुए हैं किन्तु कहीं से कुछ भी प्राप्ति या हड़पने की कोई आशा नहीं है।

लेकिन ऎसे लोग अब निरन्तर खत्म होते जा रहे हैं जिनसे कोई सा रचनात्मक कार्य करा लो, चाहे जितनी समाज और देश की सेवा करा लो, न उफ तक करेंगे, न कभी यह पूछेंगे कि क्या मिलेगा। न कभी किसी से कुछ पाने की कोई आशा रखेंगे। पर इतना सारा बखान करके भी क्या मिलेगा क्योंकि जब इंसानियत ही नहीं रही, लोग बेशर्म होते जा रहे हैं यह पूछ-पूछ कर कि क्या मिलेगा।

समाज और देश की सेवा का कोई सा काम हो, इसके लिए जो यह पूछता है कि क्या मिलेगा, समझ लो कि उसमें इंसानियत नहीं रही, वह कारोबारी हो चला है। और ऎसे लोगों पर न समाज को भरोसा करना चाहिए, न देश को, क्योंकि जो एक बार कुछ ले-देकर बिकने-बिकवाने या गिरवी रखने को तैयार हो जाता है वह किसी को भी बेचने या खरीदने में शर्म नहीं करता। आजकल ऎसे बेशर्म लोगों की दुकानें खूब चल रही हैं।

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